एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
कट्ठीवाड़ा: मालवा का कश्मीर
हम कट्ठीवाड़ा गांव पहुंचे गए थे। आज साप्ताहिक बाजार (हाट) का दिन है। ताजी सब्जियां, मुर्गे-मुर्गियों के अलावा लंबी तगड़ी हरी मिर्च के भजिए, बड़े लुभावने लगे। हमने खाए। तेल अच्छा नहीं था। यानी स्वाद का मोह अभी बाकी है। वहां प्रवीण नाम का युवक प्रतीक्षा कर रहा था। चौबीस पच्चीस वर्ष का आदिवासी युवक है। महेश जी का पूर्व परिचित भी नहीं है। बोला, भूरी अंबा गांव चलना है।
तीन किलोमीटर बाद पैदल चले। यहां पहली बार धान की फसल देखी। बहुत अच्छी फसल। पास ही बेहद स्वच्छ नदी बहती है। पर्याप्त पानी है। यहां नदी गोल घेरा बनाती है और यही है प्रवीण का फलिया। इसमें ताड़ के बड़े-बड़े पेड़ हैं। यहां ताड़ के पेड़ होना आश्चर्यचकित करता है। यहां लोग ताड़ के पेड़ से ताड़ी बनाते हैं। जिसके पास जितने अधिक पेड़ उतना ही समृद्ध। शादी में दहेज में भी ताड़ के पेड़ देने का रिवाज है। नदी के किनारे-किनारे खेत और बाड़ी। नदी की रेत पर दौड़ते-भागते, अठखेलियां करते मुर्गियों के चूजे और उन्हें डांटती-डपटती, सहेजती स्वस्थ मुर्गियां, साथ ही शहंशाही अंदाज में घूमते रंग-बिरंगे शानदार मुर्गे। तबियत खुश हो गई। लगा यही मेरी जगह है। मैं तो नदी में ही कुछ देर बैठ गया। महेश जी से कहा, अब कुछ भी हो आज तो यहां से नहीं जाऊंगा। महेश जी ने कहा, ऐसा ही कुछ करेंगे। अनायास ही इतनी सुंदर दुनिया से मेरा साक्षात्कार हो गया था।
प्रवीण का घर तो पूरा बाड़ा है। वह भिलाला है और अभी अविवाहित ही है। इस गांव का सरपंच भी है। पूरा खानदान एकसाथ-आसपास ही रहता है। सम्पन्न कृषक है। बहुत सारे मवेशी-बकरियां और मुर्गियां है। यह नदी इनके फलिया की प्राकतिक सीमा रेखा है। यहां मुझे तो एक कमरा मिल जाये तो बस यहीं रहूं। प्रवीण बहुत ही सौम्य, सुशील और सुलझा हुआ युवक लगा। किसी ने बताया यहां इसने बहुत विकास कार्य कराये हैं।
अब नहाने की बारी है। करीब पांच-छह किलोमीटर दूर पहाड़ से गिरता हुआ झरना है। किसी ने कहा अभी नदी में यहां नहा लेते हैं, खाने के बाद झरने पर। मैंने कहा, नहीं झरने पर नहाकर खाने में आंनद आएगा। डूंगरी माता का प्रसिद्ध मंदिर एक पहाड़ी पर है। वहां शाम को जाएंगे। सब लोग झरने की ओर चल दिए। पांच-छह किलोमीटर बाद गाड़ी का रास्ता खत्म हो गया। अब आगे पैदल ही जाना है। तभी निगाह पड़ी कि यह जीर्णशीर्ण अवस्था में कट्ठीवाड़ा के पूर्व शासक का पुराना महल है। राजा साहब इंग्लैड जाकर रहने लगे हैं। महल तो जो है सो है, उसके आसपास करीब पचास एकड़ में फलों का दर्शनीय बगीचा है। लगभग सभी किस्म वाले फलों के पेड़-काजू, बादाम, लीची, नाशपाती और क्या नहीं? आम के पेड़ों की तो बहार है। बताया कि यहां के आम दुनिया में मशहूर है। पांच-पांच किलो का एक-एक आम। आम का नाम भी “नूरजहां” है। मैं तो बगीचा देखकर दंग रह गया। कभी सोचा नहीं था कि ऐसी जगह में, ऐसा बगीचा देखने को मिलेगा। जहां बगीचे की हद खत्म होती है वहीं से झरने के लिए चढ़ाई शुरू हो जाती है, रास्ता पथरीला है। करीब बीस-पच्चीस मिनिट की चढ़ाई के बाद झरने तक पहुंच गए। बेहद रमणीक स्थान है। मैं तो खड़ा देखता ही रह गया। बेहद ठंडा पानी बहुत ऊपर से गिरता है। खूब नहाया। यहां से हटने का मन ही नहीं कर रहा था। इस झरने से ही गुजरात का पंचमहाल क्षेत्र लग जाता है। यहां गुजरात का ही नेटवर्क आता है।
प्रवीण के यहां सबने बेहद स्वादिष्ट, अच्छा और भरपूर भोजन किया। जिस बड़े कमरे में बैठकर भोजन किया उसकी दीवारों पर ऊपर से नीचे तक रंग-बिरंगे भित्तिचित्र बने हुए हैं। तरह-तरह की आकृतियां मनुष्य, देवी-देवता, पेड़-पौधे, जानवर, सभी। रेलगाड़ी और हवाई जहाज की भी कल्पना की है। एक आदिवासी हवाई जहाज की छत पर पग्गड बांधे बैठा है और स्टेयरिंग घुमा रहा है। कमाल की कल्पनाशीलता है। न तो इन लोगों ने कभी हवाई जहाज देखा और न ही कभी शायद रेलगाड़ी। यह यहां का पारंपरिक चित्रण है जो पिथौरा कहलाता है और इसमें परंपरा के साथ-साथ नवाचार की जबरदस्त संभावनाएं मौजूद है। अभी तक का सबसे स्वादिष्ट भोजन शायद आज किया जो प्रवीण की भाभी और भतीजियों ने बनाया है। ये सब चचेरे भाई हैं। खूब खाया और खूब सोए। महेश जी ने कहा कि अब कल जीप से ही धार चले चलेंगे। वे भी साथ चलना चाहेंगे। दीपक से भी भेंट/चर्चा हो जाएगी और बेटी-दामाद से भी मिल लेंगे। मैंने कहा बहुत अच्छा रहेगा। यह नहीं बताया कि उनका आना पक्का नहीं है, नहीं तो रूकने को बोलेंगे। परसों से कांवड़ यात्रा है। मैं उसमें हिस्सा लेने से बचना चाहता हूं। वैसे इन लोगों को छोड़कर जाने का जरा भी मन नहीं कर रहा है। कैसे निश्छल, निष्कपट, स्वाभाविक और प्रेमातुर लोग हैं। कौन कह सकता है कि प्रवीण और उसका परिवार हममें से किसी को भी नहीं जानता।
प्रवीण की भतीजियां भोजन परोस रहीं थीं। एक बारह-तेरह की बच्ची, जो स्कूल में पढ़ती है, इतनी सुंदर और आकर्षक कि बस कुछ देर देखते ही रह गया। साहित्य में जो भील सौंदर्य के बारे में पढ़ा है, उसी की जीती-जागती तस्वीर। कितना पवित्र, अछूता और अल्हड़ सौंदर्य! मेहमानों को खाना खिलाने आई हैं। इसके बाद वापस कस्बे के कमरे में चली जाएंगी। आपसी प्रेम,सौहार्द, और अपनत्व अब तो जैसे गुजरे जमाने की बात हो चली है, परंतु यहां आकर वह धारणा गलत साबित हुई। संतोष मिला। भोजन के बाद प्रवीण से विवाह के बारे में पूछा तो बोला, इसी साल करेंगे, लड़की तय कर ली है। ताती-अंबा गांव की है। उसने बताया कि पढ़ी लिखी है। बच्चों के स्कूल में पढ़ाती भी है। मैंने पूछा “तुमसे ज्यादा पढ़ी है क्या?”
“हां, बी.ए. पास है।”
“तब तुम्हें दबायेगी तो नहीं?”
“अरे नहीं शादी के लिये वही इंतजार कर रही है, कई साल से।”
मैंने कहा “शादी से पहले इंतजार करने में और शादी होने के बाद एकदम फर्क आ जाता है, जरा संभल के रहना।”
सब हंसने लगे। हमने कहा, “बुलाओगे तो हम लोग भी आकर बारात में शामिल होंगे। हां, शादी तो जरूर करो, लेकिन तुम भी उसके बराबर पढ़ लेना, तब पटरी अच्छी बैठेगी।”
प्रवीण को बात जम गई। कहने लगा, “आदिवासियों में तो लड़के वाले रिश्ता लेकर जाते हैं दारू और मुर्गा-और लड़की वाले बारात लेकर आते हैं। दहेज भी लड़के वाले देते हैं।
मैंने कहा, “हां, गोंड़ों में भी ऐसा ही होता है।”
मंडला और बचपन पीछा ही नहीं छोड़ते। छाया की तरह साथ बने रहते हैं। शायद छाया से अधिक क्योंकि रात के अंधेरे में छाया तो नहीं दिखती पर स्मृतियां तो समानांतर साथ बनी ही रहती हैं।
डूंगरी माता के लिये शाम चार-साढ़े चार बजे निकले। महेश जी ने प्रवीण को बता दिया है कि रात यहीं रूकेंगे। थोड़ी दूर जीप, बाकी पैदल। जहां से रास्ता अंदर जाता है उसके दूसरी तरफ एक आधुनिक तरीके से बना हुआ आश्रमनुमा स्थान दिखा। महेश जी ने बताया ऑस्ट्रियन दम्पति है जो कई सालों से यहां रहकर आदिवासी लड़कियों के लिए शिक्षा का काम करते हैं। इनसे कोई शिकायत नहीं है। यह स्पष्ट नहीं किया कि शिकायत क्यों नहीं है? दोपहर में झरने में नहाने और नीचे आने के बाद से कमर, पीठ और टांगों में काफी दर्द है। झरने में ऊपर से अत्यन्त वेग और भार के साथ आता हुआ पानी पीठ पर गिरा और उतरते में शायद पैर कहीं ऊंचा-नीचा पड़ गया, इसी से दर्द हो रहा होगा। अब धार जाकर कुछ समय इलाज कराना होगा।
डूंगरी माता की चढ़ाई काफी लंबी है। सीमेंटेड़ सीढ़ियां बनी हुई हैं। ऊपर बहुत सुंदर स्थान है, लेकिन तमाम विज्ञापन भरे पड़े हैं। यह तो आदिवासियों की देवी थी, पत्थरों के बीच, पत्थर की। तमाम टाइल्स लगाकर पूरा स्थान बरबाद कर दिया है और अब यह मंदिर कम टॉयलेट अधिक लगने लगा है। बड़ी-बड़ी शिलाओं और पेड़ों से यह स्थान आच्छादित है, लेकिन उन्हें हटाकर भी वहां काफी बड़े क्षेत्र में भजन-कीर्तन, भोजन-भजन का स्थान बनाने की तैयारी चल रही है। आधुनिक वास्तुशास्त्र कमोबेश परंपरा और पारंपरिक आकल्पनों से सामंजस्य बैठा ही नहीं पा रहा है। एक अजीब किस्म की फूहड़ता स्थान की पवित्रता को ही नष्ट कर देती है। ऐसे तमाम रमणीक स्थान जब से इन तथाकथित आधुनिक हिंदुओं के हाथ लगे हैं, उन्होंने उन्हें पूरी तरह से बर्बाद करके रख दिया है। चाहे वह मैहर हो, देवास हो, डोंगरगढ़ की बमलेश्वरी देवी हो या डूंगरी माता। एक आंदोलन चलाना चाहिये ऐसे स्थानों को उनके मूल रूप में वापस लाने के लिए। यही तो वे स्थान थे, जहां शांति की खोज में लोग आते थे। अब तो यहां का पर्यावरण इतना वीभत्स कर दिया है कि उसके पार जाना ही संभव नहीं दिखता। मुझे इतना खराब लगा कि मैंने लंबा-सा उपदेशात्मक प्रवचन दे डाला और सब चुपचाप सुनते रहे। मुझे लगा कि जैसे षड़यंत्रपूर्वक परंपराओं को नष्ट करने की मुहीम जारी है। वास्तुशिल्प का इतना दुरूपयोग और तो कहीं नहीं होता होगा। एस्थेटिक्स (सौंदर्य बोध) से तो जैसे हम सबका नाता ही छूट गया है।
मंदिर के पीछे की ओर जाकर बड़ी-बड़ी शिलाओं पर बैठ गए। जहां तक दृष्टि जाती है, बस जंगल और पहाड़ ही नजर आते हैं। वह झरना भी दिखाई दे रहा है। पूरे पंचमहाल में जंगल पहाड़ हैं। नीचे जंगल में कोई चरवाहा बेहद सुरीली बांसुरी बजा रहा है। ऐसा लगा, बस बैठे ही रहो। साथ के युवाओं ने उछल-कूद शुरू कर दी। शिलाओं पर चढ़ने और उतरने की होड़ लग गई। कोई चढ़ा कोई फिसला, किसी की पेंट फटी। खूब ठहाके लगे। महेश जी का भी पूजा-पाठ में विश्वास नहीं है लेकिन हैं हिंदुत्ववादी। परंतु कर्मकाण्डों के विरोधी हैं।
शाम ढ़लने लगी। दूर पहाड़ों पर से सूरज की रोशनी सिमटने लगी। बात होने लगी कि इस बियाबन में रात में कोई अकेला नहीं रह सकता। एक पुजारी दिन में रहता है, लेकिन वह भी रात रूकने की हिम्मत नहीं करता इस डर के मारे कि कोई बचेगा ही नहीं। कहानी-किस्से शुरू हो गए, ऐसा हुआ था, वैसा हुआ था। सब बोले।
“चलो, अब चलते हैं।”
मैंने धीरे से कहा, “महेश जी आज रात मैं यहीं सोऊंगा।”
सब देखने लगे। मैंने कहा, “अकेले।”
कोई कुछ नहीं बोला। इस रमणीक स्थान ने मेरे भीतर एक नया आत्मविश्वास पैदा कर दिया था।
मैंने कहा “महेश जी, अपने अनेक अवगुणों के बीच अपना एक गुण मुझे मालूम है और वह है भय का अभाव। भय मेरी डिक्शनरी में है ही नहीं, न मृत्यु का, न भूत-प्रेत-पिशाच का, न देवी-देवता का, न पशु-पक्षी का, न कुछ छोड़ने का, न ही कुछ न पा सकने का, न कष्ट का, न व्याधि का, न पराजय का और न ही असफलता का। मैं कभी भी, कहीं भी, कैसे भी रह सकता हूं, और कुछ भी त्याग सकता हूं। मेरी कोई आवश्यकताएं नहीं हैं, मैंने इस हद तक अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण पा लिया है।”
अनायास ही, न मालूम कैसे मैं आत्मविश्लेषण करने लगा। इस जगह में, इस रमणीय व पवित्र स्थान में शायद कुछ ऊर्जावान है। महेश जी ने कहा “जाने कितने गुणों की खान ही भय पर विजय प्राप्त कर सकता है।”
माहौल गंभीर हो गया।
महेश जी ने कहा “ये विभुदत्त जी वगैरह नहीं जमता। हम तो अब से आपको विभू जी महाराज ही बोलेंगे और ऐसे ही परिचय कराएंगे।”
मैं हंसने लगा। हम लोग वापस लौटने लगे। प्रवीण के घर लौटे। चाय पी लेकिन दोपहर का खाना इतना भारी था कि इतना चलने फिरने दौड़ने कूदने के बाद भी खाना अभी तक पचा नहीं था। कुंए के किनारे कुर्सी डालकर महेश जी और मैं बातें करने लगे। अब महेश जी ने पूछ ही लिया “तो आप दिल्ली से बीच-बीच में कभी भोपाल भी आते थे, या वहीं रहकर गैस पीड़ितों का केस लड़ते थे?”
आधी-अधूरी जानकारी का परिणाम मैं समझ गया। मैंने तय किया कि उनको अपना ठीक-ठीक व पूरा परिचय देना ही ठीक रहेगा। मैंने कहा, वैसे तो मैंने अभी तक किसी भी अपरिचित को नहीं बताया है, लेकिन आपको अब बता देने में कोई हर्ज नहीं हैं, बल्कि ठीक ही है। मैं भोपाल का ही हूं, और भोपाल से ही आया हूं। मैंने अपना पूरा नाम बताया तो एकदम उछल पड़े।
“अरे इस नाम से तो खूब परिचित हैं, बेहद चर्चित नाम है। मैं तो उस समय भोपाल में ही था। हमारे कार्यालय में, बैठकों में, प्रचार के दौरान अक्सर आपकी चर्चा होती थी। संघ में सभी आपको बहुत अच्छी तरह से जानते हैं।”
मैंने कहा “बस अपने तक ही रखिए।”
महेश जी कहने लगे “इस तरह, इस स्थान में और इस रूप में आप से भेंट होगी, यह कल्पना से भी परे है। दीपक जी ने हमें कृतार्थ कर दिया।”
परंतु मैं सोच रहा था कृतार्थ कौन हुआ। वे या मैं? मुझे लगा कि मैं ही कृतार्थ हुआ हूं क्योंकि पहली बार मुझे कहीं से थोड़ी रोशनी आती दिखाई दे रही थी।
रात के खाने पर जब पंगत बैठी तो खाना देखता ही रह गया। पूरी, कचौड़ी, उड़द के बडे़, लड्डू, भजिया, मक्के की रोटी, गेहूं की रोटी, दाल, चावल,सब्जी। सब इतना स्वादिष्ट कि क्या खाएं, कितना खाएं और क्या छोड़ें। समझ में आ भी रहा था कि पेट पर अत्याचार हो रहा है। साथ ही यह भी लग रहा था पता नहीं इतना अच्छा खाना अब कब मिले। रात नदी किनारे टहलते रहे। सबेरे जाना है तो जल्दी लौट आए। बहुत कम बार इतना अफसोस हुआ होगा किसी स्थान को छोड़ते हुए। महेश जी और मैं दूसरे कमरे में सो गए। मैं जमीन पर सोया। अब तो सब जान गए हैं कि मैं जमीन पर ही सोता हूं। सुबह जल्दी ही नींद खुली। निकलना है। परंतु अच्छे भोजन की वजह से तीन बार नदी हो आया हूं। दबाव लगातार बनता जा रहा है। समझ आया कि रात मूर्खता कर दी है। अंततः दुखी मन से कट्ठीवाड़ा से निकले। एक यादगार पड़ाव के बाद वापसी। सोचता हूं अब कब आना होगा?
महेश जी से मिलकर बहुत अच्छा लगा। पहली बार यह भी लगा कि वैचारिक भिन्नता के बावजूद सौहार्दपूर्ण वातावरण में निजी संबंध कायम रखे जा सकते हैं। मैं अपने इस सफर में सामने आई परिस्थितियों का ठीक-ठीक व विस्तृत विश्लेषण कर लेना चाहता था। ऐसा इसलिए भी जरूरी था कि इसी से मेरी भविष्य की गतिविधियां भी तय होने की संभावना थी।
शिवगंगा के मूल में यदि संघ न होता तो इनसे जुड़ने में अधिक विचार करने की आवश्यकता ही न होती। ग्राम सशक्तिकरण की जो कल्पना मेरे मन में है, ये लोग उसी दिशा में चल रहे हैं। और आगे चल सकने के सभी तत्व मौजूद हैं। समस्या हिंदुत्ववादी सोच की है ईसाई विरोध, मुस्लिम विरोध। ईसाईयों के प्रति घृणा और दुश्मनी की जमीन पर ही यह बीज अंकुरित हुआ है। झाबुआ को गुजरात सब ओर से घेरे हुए है। गोधरा और दाहोद एकदम करीब है। स्टैन्स कांड की यादें अभी बहुत पुरानी नहीं हुई हैं। गांव-देहात, जंगल के लोगों को आकर्षित करने और संगठित करने के लिये धार्मिक प्रतीकों और बिम्बों का उपयोग आपत्तिजनक नहीं हो सकता, लेकिन उन प्रतीकों और बिम्बों को दूसरे समुदाय के लोगों के लिये दमनकारी और विनाशकारी ढंग से स्थापित करना घोर आपत्तिजनक है। अभी साथ रहते हुए ऐसी कोई परिस्थिति उत्पन्न नहीं हुई, लेकिन साथ काम करने में समझ, सिद्धान्त और विचारधारा के स्तर पर खुल्लमखुल्ला विरोध हो जाना स्वाभाविक है। मैं तो बदल नहीं सकता, और इन्हें बदल पाना इतना आसान नहीं है। आकर्षक भी है, लेकिन रास्ता बड़ा कठिन है। उदयगढ़ के जंगलों-पहाड़ों की गतिविधियां सुनकर एक आशा की किरण तो जगी, लेकिन वहां भी क्या हो, कैसा हो, कह नहीं सकते। अभी बहुत सोचने, समझने, विचार करने की आवश्यकता है। इस स्थिति में जुड़ जाने से किसी को भी लाभ नहीं होगा। एक बार सबके साथ बैठकर लंबी चर्चा करनी होगी। वैसे आरएसएस में भी अच्छे लोग हैं, अच्छा काम कर रहे हैं और एकदम अछूत नहीं हैं, यह नया अनुभव हुआ। साथ ही यह भी लग रहा है कि मैं किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में जल्दबाजी तो नहीं कर रहा हूं।
क्रमशः…
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