एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
लंबे एकांत के बाद पूरे परिवार के साथ रहना एक बेहद विस्मयकारी
अप्पू की मोटरसायकल पर उसके साथ मैं और बाकी सब स्कॉर्पियों में यहां से जंगल के रास्ते, घटिया, खारी, लफरा, कटंगाटोला होते हुए सुरपन नदी पार करके हिरदेनगर (ह्दय नगर) पहुंचे। इस रास्ते में बंजर नदी पार नहीं करना पड़ती जहां अभी पुल नहीं बना है। हिरदेनगर काफी बड़ी और ऐतिहासिक बस्ती है। वहां बहुत बड़ा मेला लगता है। पराक्रमी गोंड़ राजा हिरदे शाह के नाम पर यह बस्ती बसी है। सोलहवीं शताब्दी ईस्वीं में हिरदे शाह ने गोंडवाना पर राज किया था। मैं सन् उन्नीस सौ अड़सठ में अपने एक घनिष्ठ मित्र के साथ यहां आकर रात को रूका था और यहां टूरिंग टॉकीज में ‘उपकार’ फिल्म देखी थी। उसके बाद सन् दो हजार एक में अपने भंवरताल प्रवास के दौरान इस मेले में सुनुआं के साथ आया था और यहां से गाय खरीदी थी। सब कुछ धीरे-धीरे याद आता जा रहा है। यह अच्छा भी लग रहा है।
समय के साथ आए परिवर्तन को आंकने का और कोई जरिया भी तो नहीं है। लंबे एकांत के बाद पूरे परिवार के साथ रहना एक बेहद विस्मयकारी अनुभव है। मेरा बचपन भी साथ चल रहा है, जबकि इस सफर में मैं सबसे उम्रदराज हूं। हिरदेनगर से पक्की सड़क पर आठ-दस कि.मी पद्मी चौराहा है। यहां से मंडला, रायपुर बिलासपुर और रामनगर के लिये रास्ते फूटते हैं। हम लोग रामनगर की ओर चले। पद्मी से लगभग दो किलो मीटर दूर मधुपुरी एक बड़ा गांव है। यह हमारे पूर्वजों की जमींदारी का बड़ा गांव था। एक तरह से यह जमीदारी का केंद्र था और हमारे आजा के समय तक परिवार मुख्यतः यहीं रहता था। मंडला में महलनुमां घर था जहां आना-जाना होता था। बाद में सब मंडला में रहने लगे और हमारे आजा ने यह गांव गिरवी रख दिया। उसके बाद भी यहां एक मकान और कुछ जमीन रखी थी। मुझे याद है बचपन में छकड़ों और घोड़ों में बैठकर हम लोग मंडला और मधुपुरी के बीच कई बार आये गये थे। हमारे बब्बाजी अधिकतर मधुपुरी में ही डेरा डाले रहते थे। नर्मदा नदी में बड़ी बड़ी फ्लेट नावें चलती थीं, जिन्हें जहाज कहते थे और जहाज पर चढ़ाकर ही छकड़े बैलगाड़ी,घोड़े आदि नदी पार करते थे। मंडला के रास्ते पर बंजर नदी पर पुल तो हमारे सामने सन उन्नीस सौ साठ-पैंसठ के बीच बना होगा। नर्मदा पर तो आज भी पुल नहीं बना है। एक ख्याल यह भी आ रहा है कि आज बहुत सा विकास समय बचाने के लिए किया जा रहा है, लेकिन उस बचे हुए समय का उपयोग हम कैसे कर रहे हैं इस पर कभी विचार नहीं करते!
मधुपुरी की याद एकदम बचपन की है। मधुपुरी से लगभग एक-डेढ़ किलो मीटर आगे गूडा अंजनियां हमारे परिवार का जमीदारी गांव है और यहां की जमीन बेहद उपजाऊ है। जमीदारी खत्म होने तक यह गांव परिवार के पास था और हमारे दो काकाओं के हिस्से में आया था। हम लोग यहां तो कुछ बड़े होते तक आते रहे हैं। गूडा अंजनियां का एक बड़ा तालाब है जिसकी मेंढ़ पर एक बड़ा-सा मकान बना हुआ था, जिसे मेंढ़ों कहते थे। पास में नर्मदा नदी के घाट पर घोड़ाघाट का ऐतिहासिक मेला भरता है। घोड़ाघाट मेले के समय मेंढ़ों में पूरे परिवार के पुरूष इकट्ठे होते थे और यहां खाना-पीना, अहीरां का नाच और जुआं चलता था। कौड़ी का जबर्दस्त जुआं यहां होता था जिसमें दूर-दूर से लोग आते थे। कौड़ी का जुआं पारंपरिक है जो महाभारत काल से चला आ रहा है। अब तो सब उजड़ चुका है। यहां भी ज्यादातर जमीन बिक चुकी है और जमींदारी का तो अब नामोनिशान भी नहीं है। समय चक्र ने जैसे उथल पुथल सी मचा दी है।
विकास का विध्वंस
कुछ ही किलोमीटर आगे चलकर रामनगर का ऐतिहासिक किला आ गया। यह कभी गाेंडवाना की राजधानी हुआ करती थी। सब लोगों ने चाय पी और यहां के मुख्य महल ‘मोतीमहल’ में गए। इसके अलावा यहां रानी महल और मंत्री महल भी हैं। नर्मदा के तट पर 16 वीं शताब्दी में राजा हिरदे शाह (ह्दयशाह) द्वारा बनाया गय मिट्टी गारे की दीवारों का यह ऐतिहासिक भव्य महल। करीब तीन-तीन फीट मोटी दीवारें। कोई किला मिट्टी गारे का बना होगा यह कभी कल्पना में नहीं आता। किले का दृश्य तो उभरता है, भारी-भारी पत्थरों की ऊंची-ऊंची दीवारें। अंदर महल के बीचोंबीच स्विमिंग पूल। मिट्टी महल में स्विमिंग पूल? कमाल ही है। पहले एकदम जीर्ण-शीर्ण हालत में थी। अब राज्य पुरातत्व विभाग इसका रेस्टोरेशन कर रहा है। काफी कुछ संभाल लिया गया है। जगह-जगह दीवारों और फर्श पर बड़े-बड़े गड्ढ़े खुदे हैं जो खजाने की तलाश करने वालों ने खोदे हैं। एक सुरंग है जो कहा जाता है मंडला के किले और जबलपुर के मदनमहल में निकलती है। दीवारों पर जगह-जगह तोप से छोड़े गये गोलों के निशान हैं जो अंग्रेजों से युद्ध की निशानी हैं। अंदर बहुत ठंडक है। सबको बहुत अच्छा लगा। मैं भी कम से कम चालीस साल बाद यहां आया। इस बार इसे देखा तो कुछ अलग अनुभूति हुई।
इसके बाद सब लोग चौगान पहुंचे, यहां से करीब तीन-चार किलाे मीटर। चौगान गांव में गोंड़ों का अति प्राचीन धार्मिक स्थल है, जिसे चौगान की मढ़िया कहते हैं। बहुत पुरानी झोंपड़ी में इनके देवी-देवता स्थापित हैं। यहां ऊंचे-ऊंचे खंभों पर झंडे लगे हुए हैं, जिन्हें चंडी कहते हैं। आसपास अब पक्की दीवार से घेर कर सुरक्षित कर दिया गया है। आसपास घर बन गये हैं। बहुत बचपन में आया था, तब यहां एकदम वीरान और घना जंगल था। बहुत सुंदर स्थान हुआ करता था। विकास का विध्वंस यहां भी दिखने लगा है। मढ़िया की झोपड़ी के बाहर एक बूढ़ा पंडा बैठा हुआ मिला। उसने कहा आज ताला नहीं खुलता, कल खुलेगा। अंदर से कल देख सकते हो। बाबा ने पैसे दिये, कहा बहुत दूर से आये हैं, लेकिन वह खोलने को तैयार नहीं हुआ। मुझे ध्यान आया कि सुनुवां ने एकबार बताया था कि यहां चतरू के ससुराल के लोग पण्डा हैं। मैंने कहा-भंवरताल से आये हैं, चतरू भोई के गांव से। यह हमारी बेटी-दामाद भोपाल से आए हैं दर्शन करने, आज लौट जाएंगे…।
वह बूढ़ा भंवरताल और चतरू का नाम सुनकर एकदम चैतन्य हो गया। स्नेह जैसे उसके अंदर से उमड़ सा पड़ा और तुरंत ताला खोलकर वन्या से बोला, चली जा बेटा अंदर, तू तो देवी है। अंदर देखकर वन्या चमत्कृत रह गई। यह स्थान बहुत पवित्र माना जाता है और सारे इलाके में गोंड़ों का प्रमुख स्थान है। गौंड़ राजाओं की पूजास्थली यही थी।
चौगान मढ़िया से दिन डूबते समय टिकरिया पहुंच गये। नर्मदा के किनारे-किनारे पहाड़ियों पर से होता हुआ यह रास्ता बहुत ही खूबसूरत है। रास्ते भर नदी में डूबता हुआ सूरज दिखाई देता रहा। नर्मदा के किनारे-किनारे चलता हुआ यह रास्ता संभवतः पर्वतीय राज्यों को छोड़कर देश के सुंदरतम सड़क मार्गों में गिने जाने योग्य होगा। निरंतर सड़क के साथ-साथ चलता हुआ इतना लम्बा जंगली रास्ता और पवित्र पावन नदी का बहता हुआ जलदर्शन एकसाथ मिलना दुर्लभ है। टिकरिया में रेस्ट हाउस में अभी तक कभी रात रूकना नहीं हुआ था। खानसामा बहुत अच्छा है। मुस्लिम हैं, पूरा परिवार रहता है और मिलकर खाना बनाता है। देर रात तक सब बातचीत करते रहे। यह बहुत सुंदर स्थान है। ऊपर पहाड़ी से नीचे चलती हुई सड़क और थोड़ी दूरी पर नर्मदा का जल दिखाई देता है। यह एक गोल पहाड़ी है, टापू की तरह।
मेरे भोपाल छोड़ने के बाद अनायास ही मेरे और वन्या के संबंधों में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे रहे हैं। पिछले कुछ अर्से से मेरे और वन्या के बीच काफी दूरी पैदा हो गई थी। विचारों का आदान-प्रदान ही बंद हो गया था। तनाव भी बहुत हो गया था। वैसे वन्या का यहां आना सबको बहुत अच्छा लगा। यह तनाव काफी कुछ दूसरों की वजह से उत्पन्न हुआ था। दो दिनों में सबकुछ साफ हो गया। अब मन बहुत हल्का हो गया है। आगे से ऐसा न हो, और यह स्थिति दोबारा उत्पन्न न हो, इसके लिए मुझे भी सजग हो प्रयत्नशील रहना होगा। एक महीने बाद वन्या की शादी की पहली वर्षगांठ है। मैंने यह कहा कि भोपाल का मेरा दफ्तर जब तक पूरी तरह से बंद नहीं हो जाता, तब तक मेरा वहां जाना ठीक नहीं है। वन्या भी इससे सहमत है। वन्या को समझाया कि जल्दी काम करना शुरू कर दे। अभी वह दुनियादारी नहीं समझती है। मेरे इस नए जीवन का यह पहला सकारात्मक परिणाम सामने आया है। लोग सोचते हैं कि मेरा कितना कुछ छूट रहा है, परंतु मुझे लगता है कि मैं कितना कुछ पा रहा हूं, अर्जित कर रहा हूं। जिस तरह से सबका स्नेह मिल रहा है उससे जो खोया है, वह तो मायने ही नहीं रखता। सब लोग लौट गए है। भोपाल पहुंचते ही, वन्या का फोन आया। उसने कहा जबलपुर में मेरा आफिस वाला फ्लेट देखा। उसने बहुत कहा कि उसे अभी रखना चाहिए। परंतु मैंने दो टूक कहा “नहीं”। शायद जितनी कम संपत्ति होगी, उतना ही संतोषप्रद जीवन चल पाएगा और वकालत की निशानी खत्म हो जायेगी।
मामा, वापस लौट आओ
आज सत्रह नवंबर है। कई दिनों बाद आज फिर अकेला हूं। वैसे सबका आना-जाना बहुत अच्छा लगा। आज से नियमित रूप से थोड़ी देर सायकल चलाने का तय किया है। टांगों के लिये अच्छा है। इतना जबर्दस्त खाना हो रहा है कि लगता है लौटने तक वजन बढ़ जायेगा। बेफिक्री भी खूब है। सुबह जल्दी उठकर तैयार हुआ और छह बजे घूमने निकल गया। सात बजे लौटा। रात में मेरी भांजी शिप्रा का फोन आया, बरसों बाद। शिप्रा आजकल खण्डवा में डिस्ट्रिक्ट जज है। बस रोती रही, बोलती रही मामा, वापस लौट आओ, आपके प्रोफेशन को आपकी जरूरत है। मैं भी भावुक हो गया।
आज एकादशी है। खेत से गन्ने तुड़वाए। आज गन्ने आदि की पूजा होती है। दीवाली से जो त्यौहार शुरू होता है, उसका आज के दिन समापन होना माना जाता है। एकादशी तक दीये जलते हैं और जुआं खेलना और अहीर नाचना निरंतर चलता रहता है। पिछले साल तक यहां अहीरों के दलों का आना निरंतर चलता रहता था। लेकिन इस साल ऐसा नहीं है संभवतः आस-पास यह खबर फैल गई है कि मैं ‘बैरागी’ हो गया हूं और इनाम की आशा नहीं करना चाहिये। इसलिये अहीर पहले की तरह नहीं आ रहे हैं। अब इसे क्या मानूं? सिर्फ इनाम की आशा न होने पर ये लोग बरसों-बरस की अपनी परंपरा को तोड़ देंगे? मन बड़ा विचलित हुआ। अभी तो मैं वास्तव में ‘बैरागी’ हुआ भी नहीं हूं! नए जमाने के यह नए संस्कार बहुत गहरे तक पैठ बना चुके हैं। जहां आर्थिक हित न सधे उसका बहिष्कार। खैर, यह एक नई सच्चाई भी सामने आ गई। वैसे हो सकता है मेरा ऐसा सोचना गलत हो। जैसे-जैसे लोगों को मेरे आने की सूचना मिल रही है, वे लोग मुझसे मिलने आ रहे है। दुर्ग से दो फुफेरे भाई अभय और जयदीप आ गये। मुझसे बहुत स्नेह है। रात करीब दस बजे मंजूर एहतेशाम का पिछले छह−सात महीनों में पहली बार फोन आया। पैंतीस मिनट बात की। शायद उनका गुस्सा शांत हो गया है और उन्होंने वास्तविकता को स्वीकार कर लिया है। मंजूर भाई बोलते रहे मेरे भोपाल छोड़ने से कभी-कभी एकदम अकेला महसूस करते हैं।
क्रमशः…
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