एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
20 अगस्त 2007 शाहगंज : वापस साधुओं के बीच
सुबह सात बजे शाहगंज पहुंच गया। ऐसा लगा, अपने गांव आ गए। इस बार तो हुलिया थोड़़ा बदला हुआ है। बस स्टैंड से पैदल आते हुए वही जासूस अवधेश शर्मा दिख गया। शायद एकदम से पहचाना नहीं। पहचाना तो पैर छू लिए और फिर गले लगकर रोने लगा। यह वही सज्जन हैं जो मुझे डाकू या हत्यारा समझ बैठे थे। शर्मा जी बहुत कमजोर दिखे। कहने लगे बहुत दिन से आपकी बाट जोत रहा हूं, विस्तार से बताऊंगा। मंदिर पहुंचा, नर्मदा जी को देखकर बहुत अच्छी अनुभूति हुई। यहां तो उनका सौंदर्य देखते ही बनता है। शिव मंदिर में सामान रखा, ‘नर्मदे हर’ बोला और बाबा जी से मिलने राम मंदिर गया। श्रीमती बाबा जी प्रसन्न हो गई। उन्होंने ‘नमस्ते सर’ बोला। चाय बनाकर पिलाई। शिव मंदिर में एक तखत रखवाया और बाबा जी ने एक छोटा सीलिंग फैन भी तखत के ऊपर लगा दिया। इन लोगों को इस बीच कुछ अधिक जानकारियां मिल गई हैं, ऐसा लगा। पहचान का खुलते जाना ज्यादा समस्याएं खड़ी करता जा रहा है। लगता है निजता खत्म होती जा रही है।
थोड़ी देर में किसी बात पर मैंने उनसे कहा कि मैं आप लोगों को कुछ अधिक कष्ट दे रहा हूं। तो वह बोली “पिता की सेवा करना तो बेटी का कर्तव्य है। इसमें कष्ट की क्या बात? आप पता नहीं कहीं से पिछले जन्मों का कर्ज उतारने हमारे यहां आ गए हैं, हमारे सौभाग्य हैं।” लो तो अब हम पिताजी भी हो गए इस बतीस साल के लड़के की मां और छह साल की पोती की दादी के पिताजी! एकदम समझ में आ गया। अब यहां से दण्ड-कमण्डल समेटने का समय आ गया है। मैंने कहा “पता नहीं कौन किसका कर्ज उतार रहा है।”
भोजन पा कर रात की थकान उतारने को सो गया। पंखा बड़ा मददगार सिद्ध हुआ। शाम को शर्मा जी के साथ बाजार की तरफ निकल गया। दो-तीन पंडित और भी शामिल हो गए। मैंने एक धोती खरीदी, कुर्ता सिलने दिया। शाहगंज की गलियों से निकलते हुए ऐसा लगा जैसे बम्हनी की गलियां हों। एकदम वैसी ही। वैसे ही ब्राह्मण मोहल्ला, अहीर मोहल्ला, मुसलमान मोहल्ला, ढीमर मोहल्ला वगैरह। कहते हैं, जैसे-जैसे इंसान बड़ा होता है, वह बचपन की ओर खिंचने लगता है। बम्हनी और शाहगंज एकदम एक जैसे कस्बे हैं। न मालूम क्या संयोग है कि हर रोज अपना बचपन एकाध बार तो याद आ ही जाता है। आज शाम एक और बाबा कहीं से घूमते हुए आ गए। बाबा प्रेमदास। करीब पैंसठ साल के वृद्ध और बीमार। स्थान अकोला (महाराष्ट्र) में है, लेकिन घूमते रहते हैं। अभी गोवा से आ रहे हैं। रात उनकी बैठक जमी। गांजे की अच्छी खुराक है। दीनदयाल गौर साथ देता है। बालक संदीप को लेकर वैद्य के पास जाएंगे। बहुत बीमार है और कोई ध्यान नहीं देता।
मैंने यहां बैठकर लिखना शुरू कर दिया है। शर्मा चिपका रहता है। यहां प्रेमदास बाबा समझदार व्यक्ति है। उससे थोड़ी-बहुत बातचीत हो जाती है। धीरे से बता दिया कि वह भी ब्राहाण घर के हैं। गरीब ब्राह्मण जो चौदह-पंद्रह साल की उम्र में घर छोड़कर निकल गया और अविवाहित है। इन साधुओं में वैसे तो जात-पात नहीं पूछने का नियम है, लेकिन मैंने देखा कि ब्राह्मण और क्षत्रिय घर के बाबा लोग सबसे पहले अपनी जात बताते हैं और शूद्रों को नीची नजर से देखते हैं। इनके बीच शूद्र साधु मंदिर के गर्भगृह में और भंडार गृह में प्रवेश नहीं करता। जिस किसी बाबा की खिल्ली उड़ानी हो तो उसे अरे, वो चमरा बोलते हैं। वैष्णव लोग दूसरे सम्प्रदाय वालों को तुच्छ मानते हैं, स्वयं को शुद्ध और पवित्र क्योंकि ये किसी के हाथ का बना नहीं खाते, जबकि दूसरे साधु घरों में बना हुआ भोजन कर लेते हैं। शैव सम्प्रदाय वालों से इन्हें खासी चिढ़ है। अपने बीच किसी का मजाक उड़ाना हो तो उसे कहते हैं “तू त्यागी नहीं है, संन्यासी है।” रामभक्त त्यागी है जबकि शिवभक्त सन्यासी। तुलसीदास ने रामायण में लिखा है कि “शिव स्वयं राम के भक्त थे और राम शिव की पूजा अर्चना करते थे।”
इस परिस्थिति में यह भी समझ में आ रहा है कि भारत में जाति-व्यवस्था कितनी गहरी और व्यापक है। संन्यास ले लेने वाला व्यक्ति सामान्यतया जीवित रहते अपना श्राद्ध भी करवा लेता है। यानि उसे हर हाल में निर्लिप्त ही रहना है। लेकिन इस मृत (जीवित) देह से जाति का मोह नहीं छूट रहा। परलोक का वरण कर लेने के बाद भी जाति मोह नहीं छूट रहा है तो जीते-जी भारतीय समाज के जातिविहीन होने की कल्पना ही कैसे की जा सकती है?
आज एकादशी है। ये परिक्रमावासी महिलाएं सुबह से कह रही हैं कि महाराज, एकादशी की कथा पढ़कर सुना दो। टालते-टालते, बैठ ही गया। उनके पास एक किताब है। एकदम अनपढ़ हैं ये लोग, लेकिन नर्मदा मैया की आरती और भजन इन्हें अक्षरश: याद हैं। इनकी किताब में हर महीने की एकादशी, दोनों ही पक्ष यानी कृष्ण एवं शुक्ल की, अलग-अलग कथा लिखी हुई है। सब में लिखा यही है कि ये करो और ये मत करो तथा भगवान ने भक्त को क्या दिया, उसका वर्णन है। सब धूपबत्ती, फूल रखकर ध्यान लगाकर बैठ गए और मैं तखत पर बैठकर पढ़कर सुनाने लगा। मेरी यह एकदम नई भूमिका कथा वाचक की थी। वैसे भी भारत में कथावाचकों की चांदी ही चांदी है। परंतु पढ़ते हुए अंदर से हँसी आ रही थी। लेकिन इन लोगों की भक्ति और तन्मयता देखकर गंभीर हो गया। करीब पंद्रह-बीस मिनिट कथावाचन चला होगा। सबने पैर छूए, आरती उतारी और ग्यारह रूपए दक्षिणा दी। वाह, कमाई भी हो गई। इन वृद्धाओं ने खूब आशीर्वाद दिया और कहा कि दो साल परिक्रमा करते हो गए, इतने दिनों में आज पहली बार किसी ने अच्छे से पढ़कर कथा सुनाई। उनकी दक्षिणा तो अगरबती लाने के लिए वापस दे दी, लेकिन आशीर्वचन संजोकर रख लिए। इन लोगों को थोड़ी सी खुशी देकर बहुत सारी आत्मिक प्रसन्नता मिली। ये कितने भोले-भाले लोग हैं। इस सहजता, आत्मीयता और सरलता की तुलना सिर्फ बहती नर्मदा से ही हो सकती है।
मुकेश साढ़े नौ आ गया। उसे रेस्ट हाउस में व्यवस्था देखने भेजा। एक-डेढ़ बजे लाला और मंजूर भाई आ गए। बातें करते रहे। थोड़ा लेट गए। मंजूर भाई बीमार भी लग रहे हैं और उखड़े-उखड़े भी। इतने दिनों से उनसे मिलने की इच्छा जिस तरह से थी, वैसा कुछ लगा नहीं। चार बजे देब साहब और दास शर्मा साहब आ गए। सब दूसरे कमरे में चले गए। एक घंटा रूके। फिर कहने लगे कुकरू साथ चलना है। मैंने कहा जरूर चलेंगे। जाते-जाते कुछ काम की बातें कर ही लीं। फल, एक बोतल शहद और पांच सौ रूपए भेंट दे गए। आसिफ ड्राइवर बस चुपचाप देखता रहा।
मंजूर भाई के साथ अब बाहर निकलकर बैठ गया। मौसम अच्छा हो गया। मैंने कहा, चाहें तो रूक जाएं। यहां दो कमरे हैं। कहने लगे, जाएंगे। इतने में शलभ भदौरिया और उसके साथ कुछ उस जैसे पत्रकार-खुर्रम आदि ढूंढ़ते हुए आ गए। वे भी जम गए। केसवानी का फोन मंजूर भाई के पास आया, उससे भी बात हो गई, कहा कल आता हूं। मंजूर भाई और लाला चले गए। बड़ी औपचारिक सी भेंट रही। शलभ ने कहा ये तो पलायन है। शलभ के एक दो केस मेरे पास हैं। मैंने कहा अपना-अपना नजरिया है। जाहिर सी बात है हममें से प्रत्येक का जीवन को लेकर अपना नजरिया होता है। पिछले कई दशको से मैं जिस तरह का जीवन जी रहा था और जिस वैचारिक प्रतिबद्धता से बंधा था, यह नया अवतार उससे एकदम भिन्न था।
मुझे थकान लग रही थी और सर में दर्द भी था। सुबह उठने के बाद ठीक लगा। अब इतनी देर तक लोगों के साथ बैठने की आदत भी नहीं रही है। आज शाम चार बजे होटल जहांनुमा पैलेस के मालिक यावर रशीद और कादिर भाई आएंगे। ठीक चार बजे यावर और कादिर आ गए। थोड़ी देर-चुपचाप बैठे रहे। फिर यावर ने धीरे से कहा “आपको देखकर बहुत अच्छा लगा। इतने फिट लग रहे हैं और इतने कंटेंट। आपको तो जो अच्छा लगे करें, दुनिया तो चलती रहेगी। आपके जैसा इंसान आपके प्रोफेशन में और कोई नहीं मिल सकता। हमेशा आपकी कमी महसूस होती रहेगी। आपसे बहुत ही करीबी रिश्ता हो गया था, वह तो बना रहेगा। जब भी कुछ हो, हमें बताएं।”
बहुत ही अच्छा लगा यावर रशीद से मिलकर और उनकी बातें सुनकर। मैं सचमुच बड़ी किस्मत वाला इंसान रहा हूं। काफी देर बैठे। साढ़े पांच के करीब गए। बहुत सारे कुकीज लेकर आए हैं, “एगलैस हैं।” उनके जाने के बाद महसूस हुआ कि मित्रता में कैसे एक अनकही संप्रेषणीयता होती है। यावर की सह्दयता से मेरे मन में उनके प्रति आत्मीयता और बढ़ गई।
पांच बजे के करीब खान वगैरह आकर दूसरे कमरे में बैठ गए थे। खान, संदीप, दिलीप और मेहरा जी। बातचीत चलती रही। सब कह रहे थे वहीं चलें सर, ऐसे न छोड़ें। ऐसे कोई नहीं करता। आपकी जगह कैसे भरेगी, वगैरह-वगैरह। थोड़ी देर बाद नदी के किनारे-किनारे टहलते हुए मंदिर तक गए और मैंने अपने रहने की जगह दिखाई। बाबा से मिलाया। लौटकर रेस्ट हाउस आए। मैंने कहा, रूक जाओ, दो कमरे हैं। लेकिन कल रक्षाबंधन है। सात बजे के करीब सब लौट गए। मुकेश ने मुझे भी मंदिर पहुंचा दिया।
मंदिर पहुंचा तो वहां एक नई किस्म की परिस्थिति मेरी बाट जोह रही थी। परिक्रमावासी एक स्त्री कहने लगी, महाराज यहीं रहते, दूसरी जगह क्यों जा रहे हो। माताजी कह रही थीं कि तुम लोगों की वजह से परेशानी होती है, इसलिए सर दूसरी जगह रहने जा रहे हैं। ऐसा मत करो, हम लोग और किनारे हो जाएंगे, या फिर कहीं और चले जायेंगे। तुम यहीं रहो। मैंने कहा, तुम्हारी माता जी बकवास करती हैं, उसका दिमाग खराब है। जब तक शाहगंज में हूं, यही रहूंगा। जो आएगा यहीं भेंट देकर जाएगा और कहीं नहीं। माताजी से कहना घबराएं नहीं। उनका नुकसान नहीं होगा। तुम्हारे लिए वे कुछ करें न करें, उनके लिए तो होता रहेगा। मुझे परिक्रमावासी महिलाओं की बात सुनकर उन पर बेहद श्रद्धा हो आई। मैं संबंधों में व्याप्त स्वार्थ व नि:स्वार्थ को एक साथ देख रहा था। परिक्रमावासी मुझे किसी तकलीफ में नहीं डालना चाहते थे। उधर बाबी, कमोवेश अप्रत्यक्ष ही सही, मेरे पर अघोषित अधिकार जताना चाहती है। साथ ही उसे शायद मेरे लिए आ रहे विभिन्न सामानों, वस्तुओं को सबमें बांटना होगा, ऐसी शंका भी रही होगी।
आज रक्षाबंधन है और मुझे घर छोड़े भी दो महीने हो गए हैं। विचित्र सा संयोग है। आज का दिन एकतरह से परिवार के पुर्नमिलन का दिन भी होगा। थोड़ी उत्सुकता और थोड़ा रोमांच दोनों ही हैं। अर्पणा आ रही है। अर्चना तो बहुत बीमार है। जबलपुर आ गई है। पिछले छह साल से हर बार मंडला चला जाता था, दोनों बहनों से राखी बंधवाने। शायद यही भंवरताल की उपलब्धि रही है, बहनों से संबंध की प्रगाढ़ता। यह भी लगता है कि उम्र बढ़ने के साथ रिश्तों की अहमियत भी बढ़ने लगती है। बचपन जैसी ललक भी महसूस होने लगती है। अर्पणा लोग आए तो रेस्ट हाउस जाकर राखी बंधाऊं और फिर सब यहां भोजन के लिए आएं। दोपहर में दाल, बाटी लड्डू बनेंगे। भोलू भी आ रहा है। वन्या और अर्पणा की अंततः बात हो गई और तय हुआ कि यहां से शाम को ये लोग भोपाल चले जाएंगे और रात में मंडला लौट जाएंगे। कल मंडला में भुजरियों का मेला नर्मदा किनारे भरता है, जो वहां का बहुत बड़ा त्यौहार होता है। आने में बहुत देर हो गई। सब नौ बजे पहुंचे। मैंने कहा अब नहा-धोकर यहीं आ जाओ, यहीं राखी बांध लेना।
साढ़े दस के करीब आए-अर्पणा, बाबा, भोलू। ढेर सारी मिठाईयां, घर में बनाई रबड़ी और फल। अर्पणा ने राखी बांधी। बहुत सारे कपड़े लाए हैं और एक पीतल का कमंडल। मैंने एक शॉल और लुंगी-कुर्ता का कपड़ा रख लिया। कमंडल ले लिया और मंदिर में सजा दिया। अर्पणा को इक्कीस रूपए दिए तो वह रोने लगी। मेरे इस नए कलेवर से उसका यह पहला साक्षात्कार भी था। मिठाई का एक डिब्बा मुकेश के हाथ परिक्रमावासियों के पास भिजवा दिया। बाकी डिब्बे-करीब पांच-छह किलो मिठाई के बाबी ने अंदर रख लिए कहा, भगवान को भोग लगने के बाद खाएंगे। अर्चना से बात करने की कोशिश की। बड़ी मुश्किल से फोन उठाया और बस-फफक-फफक कर रोती रही। ओल्या से भी बात हुई। दस सितंबर को हैदराबाद जा रही है, सत्यम में काम करने। बंबई से आकर अर्चना की तबियत फिर खराब हो गई है। रश्मि और शिखा राजनांदगांव गए हुए हैं क्योंकि आलोक और अनीता अब दोनों राजनांदगांव में हैं। रश्मि व शिखा से बात हुई। पावनी ने भी बात की। बड़ी चिंतित है मामा के लिए। देब साहब कह रहे थे, राजन का बेटा अक्सर पूछता रहता है। बच्चों पर बड़ा असर पड़ता है, शायद किसी के न रहने का।
हमारा टफी भी याद करता होगा। पूरा परिवार और अतीत आज कमोबेश सामने है। मेरे इस कदम को लेकर सभी सशंकित भी हैं और कहीं न कहीं मेरे साथ भी हैं। जाहिर है मैं अभी संन्यासी तो नहीं ही हुआ हूं। खाना खाकर सब लोग रेस्ट हाउस चले गए। वहां बातचीत होती रही और सबने आराम किया। चाय पी। ठीक चार बजे अर्पणा लोग भोपाल के लिए निकल गए। हमने भी अपना सामान बटोरा। रेस्ट हाउस को अलविदा कहा और मुकेश ने मुझे मंदिर छोड़ दिया। पांच बजे मुकेश भी निकल गया। उसकी भी बहन आई हुई है, गंजबासौदा से। पानी बहुत तेज उठ गया पर पहुंच जाएगा। सच्चा सेवक है। ऐसे हो गया रक्षाबंधन।
मैं भी तीन दिन की गहमा-गहमी के बाद फिर वापस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में लौट आया। मंदिर आकर प्रेमदास और सियाचरण बाबा के साथ बैठ गया। वे बोले कल परिवा है, यात्रा नहीं करते। परसों निकलने का सोचा। इसके बाद अपने इस नए जीवन का नया कैलेंडर भी सामने आया। पहली बार दिशाशूल और यात्रा के दिन के मुहुर्त से साबका पड़ा। प्रेमदास तो महाराष्ट्र जाएंगे। हम दोनों मथुरा-वृन्दावन जाएंगे। संदीप की इच्छा प्रेमदास के साथ घूमने जाने की है। यहां माताजी के साथ उसकी बिल्कुल नहीं बनती। प्रेमदास तो साथ ले जाने को इच्छुक है ही। सियाचरण जाने नहीं देना चाहते। उन्हें लगता है पता नहीं लौटकर आएगा या नहीं। मुझसे सलाह की। मैंने कहा जाने दो, प्रेमदास आदमी तो ठीक लगता है। यहां रहकर तो संदीप कुछ सीख नहीं पाएगा। माताजी से तंग आकर भाग जरूर जाएगा। यह विचारणीय है कि शरण में आया व्यक्ति गुलाम नहीं बन जाता। उसकी भी भावनाएं होती हैं। हमारे समाज में तो वैसे ही बच्चों की कोई नहीं सुनता। यही हाल यहां पर भी है।
आज भुजरिया है। मंडला जिले का बहुत बड़ा त्यौहार। यहां भी इसका महत्व है। शायद नर्मदा के किनारे-किनारे सभी जगह हो। यह फसल का त्यौहार है। पत्तों के दोनों में बीज अंकुरित कर देखा जाता है कि फसल कैसी आने वाली है। हम लोग आज के दिन शाम को सभी बड़ों के पास जाकर उन्हें भुजरिया देकर आशीर्वाद लेते थे। छोटों के कान में भुजरिया रखकर आशीर्वाद देते थे। गिले-शिकवे, मनमुटाव भुलाकर बड़ों के पास जाते थे। पता नहीं अब यह सब रहा या नहीं? भारत की देहाती दुनिया के ये सारे तीज-त्यौहार, रीति-रिवाज? ये सब खेती किसानी से भी जुडे़ थे। विदेशी हाइब्रीड बीजों के बाद देशी बीजों को परखने की कला भी धीरे-धीरे विलुप्त हो जाएगी। टीवी ने बचे हुए मेल-जोल भाईचारा, सामाजिकता को जड़ से मिटाने का काम किया है और व्यक्ति को उसके घर के अंदर कैद कर दिया है। टी.वी. युग की पैदाइश बहुत अधिक व्यक्तिपरक है। दिन भर नर्मदा जी में स्नान करने और भुजलियां सिराने का दौर चलता रहा। बस्ती के सारे ब्राह्मण एक साथ मिलकर नर्मदा तट पर स्नान करके बैठते हैं और यहां शिव मंदिर मे आकर पूजा-अर्चना करते हैं। सुबह से यही सब चल रहा है। ये सारे मंदिर एक ब्राह्मण भार्गव जी और सियाचरण के ताऊ ठाकुर जी ने मिलकर बनवाए थे। दोनों मित्र थे और निःसंतान थे। अब ये मंदिर सियाचरण दास के नियंत्रण में है और मंदिर की जमीन अन्य लोगों के। मंदिर की अधिकतर मूर्तियां भी उन्नीस सौ तिहत्तर की बाढ़ के बाद गांव में दूसरा बड़ा मंदिर बनाकर उसमें स्थापित कर दी गई हैं और एक ट्रस्ट कमेटी इसे नियंत्रित करती है। जमीन उन्ही के पास है। बाबा सियाचरणदास को इसका बेहद अफसोस है।
आज शायद शाहगंज में आखिरी दिन है। विचार तो यही है कि अब रहने के लिए फिर कभी यहां न आऊं। शायद परिक्रमा भी कहीं और से ही शुरू करूं। शाहगंज का मेरे जीवन में बड़ा महत्व रहेगा। यह मेरे इस नए जीवन की पहली आश्रयस्थली है।
सुबह उठकर तैयार हो गया, सारा सामान रख लिया। बाबागिरी का यह मेरा दूसरा सफर है। प्रेमदास बाबा ने इच्छा व्यक्त की कि जाने से पहले बालभोग में भजिया खाएंगे। अभी तक मिठाई भी उन्हें नहीं खिलाई, आज दी। मैंने कहकर बिस्किट और नमकीन का पैकेट भी उनके साथ रखवा दिया। बेचारे माताजी से त्रस्त हो गए हैं। इस तरह गृहस्थ लोग आश्रम नहीं चला सकते। अजय मेहता को फोन किया आठ बजे तो बताया कि बस निकल रहे है, बबलू ने देर कर दी। अब आकर बातें कब करेंगे? रास्ता देखते-देखते पौने दस बजे पहुंचे। मैंने उनसे कहा अब होशंगाबाद तक छोड़ना होगा। रास्ते में ही बातें होंगी। अजय मेहता मिलकर प्रसन्न हो गए। कहने लगा नाना की याद आ गई, वह साधु हो गए थे। बहुत देर बातें करते रहे। मुझे सचमुच चाहता है। बबलू शुक्ला बड़े दुःखी और परेशान लगे। बोला सब काम बिगड़ गया, आते-जाते रहना चाहिए। कौन देखेगा सारा काम? अलंकार से खासे निराश थे। कहा नियमित रूप से आते ही नहीं, तो करेंगे क्या? मैंने कहा अब जाकर देखो। उनकी मदद करो। अलंकार और वन्या दोनों नियमित रूप से जाने लगे हैं। उनको गाइड करो। मैं अब तुम्हारे चक्कर में आकर वापस नहीं लौटने वाला हूं।
आखिर में जाते-जाते कहने लगा “आपने ठीक किया। आपका जीवन देखकर खराब लगता था, आपको चाहिए ही क्या? सबके लिए करते रहते थे और आपके लिए कौन क्या करता था? आपने सब कर्तव्य पूरे कर ही दिए। अब सबकी अपनी-अपनी किस्मत है।” बबलू पहली बार इतना बोला। दोनों को मिठाई- नमकीन खिलाया गया, चाय पिलाई। बाबा जाकर सो गए। उठाया तो डोल-डाल और स्नान करने निकल गए, कल सुबह तक के लिए फुर्सत।
क्रमशः…
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