एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
16 जुलाई 2007
पाठ के बाद खूब स्नान किया। लौटते में नदी, जंगल, वहां के निवासियों, पशु-पक्षियों को प्रणाम किया और मंदिर आ गया। मेरे यहां रूके रहने में व्यक्तियों से ज्यादा ये सब अधिक जिम्मेदार थे। पेंट-टी शर्ट पहनी। कपड़े प्लास्टिक की थैली में रखे। सब लोगों से बड़ी आत्मीयता से विदाई ली। पांच तारीख को यहां पहुंचा था, आज सोलह तारीख है। इन दस-ग्यारह दिनों में जो अनुभव अर्जित किया वह वास्तव में अवर्णनीय ही है। एक नए संसार से परिचय हुआ। समझ में आया पल में तोला, पल में माशा क्या होता है। अलगाव, आत्मीयता और आंशिक अलगाव शुरू हो गया। घटनाचक्र इतनी जल्दी बदलता है, यह सर्वथा नया अनुभव था। खैर, शेखर ने आकर कुछ पैसे दिए जो शायद रामायण पाठ का पारिश्रमिक था। जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की! मैंने गिने नहीं, उनमें एक सौ का नोट और कुछ दस-दस के थे। अंदाजन शायद डेढ़ सौ रुपए होगे। मैंने नमस्कार किया और चल दिया। चलते-चलते शेखर ने कहा अगर हमसे कोई धृष्टता हुई हो तो क्षमा करें। मैंने कहा शर्मिंदा कर रहे हैं, रामायण पाठ में भूल तो मुझसे हुई है।
यह भी समझ में आ रहा था कि वस्तुतः अधिकांश धार्मिक स्थलों में सिवाय थोथी भक्ति और स्वार्थमय आचरण के अलावा ज्यादा कुछ नहीं होता है। आध्यात्मिकता से इनका बिल्कुल भी लेना देना नहीं है। रामायण पाठ भी नौकरी बजाने से ज्यादा कुछ नहीं है। आधुनिक भक्ति मार्ग जैसे कर्म कांड से ज्यादा कुछ भी नहीं है। वैसे कुल मिलाकर बैकल्या छोड़कर जाते हुए दु:ख तो हो रहा था। यूं मैं लौट तो शाहगंज ही रहा था, परंतु भीतर अकुलाहट तो नए प्रस्थान, नई राह और नई भटकन को लेकर थी।
(आगे बढ़ने से पहले यह बताना जरूरी है कि कई वर्षों बाद जब मैं पुनः इस स्थान पर पहुंचा तो तब भी वहां रामायण पाठ निरंतर-अखंड चल रहा था। तमाम कमियों के बावजूद इस कार्य में निहित निरंतरता वास्तव में अच्छी लगी।)
बैकल्या हनुमान मंदिर से सुबह सात बजे निकला। पिछले दस दिनों की याद करते-करते सवा-आठ बजे के करीब लोहारदा पहुंच गया। वहां उसी ढाबे में गया। दो रुपए का पोहा और दो रुपए की चाय। बस इतना ही। थोड़ी देर बाद एक बस आई भोपाल जाने वाली। वो मुझे रेहटी उतार देगी। वहां से शाहगंज की बस मिल जाएगी। रेहटी तक का किराया पचास रुपए है। सोचा अब तो काफी पैसे हो गए हैं। जब आया था तक बीस रुपए थे, अब तो दो सौ बीस हैं। यानी दस गुणा। (कभी सुना है दस दिनों में कमाई दस गुणा हो जाती है? पर भगवान के दरबार में सब संभव है। शायद आप सहमत न हों। पर हुआ तो है।)
शाहगंज: आगे क्या?
बस बदलकर दो बजे शाहगंज बस स्टेंड पर उतरा। अड्डू दुकान पर ही मिल गया। होशंगाबाद में दो रुपए की मूंगफली खाई थी। अब भूख लगने लगी थी। आजकल अनायास ही पैसे-पैसे का हिसाब लगाने लगता हूं। अच्छी बात है। खर्च पर लगाम भी लगती है। अड्डू से कहकर भजिए और चाय मंगवाई। अड्डू ने बताया बाबा नसरूल्लागंज गए हैं। वही पुराना धोखाधड़ी वाला केस! थोड़ी देर बाद मंदिर जाने का तय किया। सोचा इतनी देर में कुछ सामान इकट्ठा कर लिया जाए। तिवारी और मुकेश अड्डू के पास पांच-छह सौ रुपए छोड गए थे। अड्डू को अलग से भी एक हजार रुपए दिए थे। शायद मेरा ख्याल रखने के लिए। मैंने लट्ठे का कपड़ा खरीदा और चड्डी बनियान और एक आधी बांह का कुर्ता सिलने दे दिया। एक धोती खरीदी। कटवाकर उसकी दो लुंगी बनवा लीं। एक दरी और ओढ़ने के लिए एक चादर भी खरीदी। साथ ही दो गमछे भी खरीद डाले। अब सामान पूरा हो गया। इस नए जीवन में मेरी संपत्ति बढ़ती ही जा रही है।
छह बजे मंदिर पहुंचा, उसी समय बाबा भी आ गए। साथ बैठकर चाय पी। मैंने कहा भोपाल से आए लड़कों को मेरा पता क्यों बताया जबकि मैंने तो मना किया था। अड्डू ही साथ लाया था, उसमें गंभीरता की कमी है। पैसे पाकर शायद उसके मन में लालच आ गया होगा। बाबा ने बताया कि आश्रम में जो पैसे दे गए थे उससे नर्मदा से पानी-चढ़ाने वाली मोटर लगवा रहे हैं। इससे आश्रमवासियों और परिक्रमावासियों को थोड़ा सुभीता हो जाएगा। मैंने कहा तो नहीं था, परंतु मेरी भी मंशा तो यही थी। इसी बीच हंसदास बाबा भी आ गया। बैकल्या की ही चर्चा होती रही। देखा कि छोटा लड़का संदीप इतने से दिनों में बहुत चंट हो गया है। बाबा की वेषभूषा बना ली है और आश्रम का हिस्सा हो गया है।
बाबा जी ने इस बार कुछ ज्यादा सम्मान दिया। तिवारी और मुकेश के आने का प्रभाव है? अपनी पहचान उजागर होने से थोड़ी असहजता तो बन गई है। थोड़ी देर में नहाकर आया। आरती में शामिल हुआ। बाबा और हंसदास ने बाटी बनाई और अंदर रसोई में दाल और सब्जी बनी। बहुत दिनों में अच्छे से स्वाष्दिट भोजन “पाया”। वहीं शिवमंदिर में जाकर जमीन पर सो गया। बैकल्या के बड़े जंगली डॉस मच्छरों ने इतना घायल कर दिया था कि यहां के मच्छरों के काटने का असर ही नहीं हो रहा। क्या यहां के मच्छर कुछ पालतू टाइप के हो गए हैं? सोते हुए सोचा कि कल से बाबा के साथ बैठकर आगे की योजना बनानी है।
17 जुलाई 2007
अब परिक्रमावासियों से भी बातचीत होने लगी है। आज मंगलवार भी है। सुबह से बहुत से श्रद्धालु आने लगे हैं। बहुत से परिचित हो गए हैं। उनसे नमस्कार चमत्कार और बातचीत भी होती रही। महाशंकालु अवधेश शर्मा भी आ गए। इस बार तेवर और सुर थोड़े बदले हुए हैं। तिवारी व मुकेश से जानकारी मिल गई होगी। भोजन के बाद बाबा ने कमोबेश हंसदास बाबा को जबरदस्ती बम्होरी भेज दिया। उसके बाद बाबा से बातचीत शुरू हुई। मैंने बताया टांगों की हालत बहुत अच्छी नहीं है। चलने में तो नहीं पर उठने-बैठने में बड़ा कष्ट होता है। खासकर जमीन पर बैठकर उठने में। वजन उठा पाना तो संभव ही नहीं है। बाबा ने कहा ऐसे में तो चढ़ाई चढ़ने और उतरने में भी दिक्कत होगी। यह तो तय है कि दशहरे के बाद नर्मदा परिक्रमा पर जाना है। अभी तीन महीने हैं। बाबा का कहना था कि उत्तराखंड जाने की तो तुम्हारी स्थिति नहीं है। चढ़ाई बहुत अधिक है तथा ठंड भी हो जाएगी। गुजरात भी भादों के बाद ही जाना संभव है। वैसे जन्माष्टमी से वृन्दावन में चालीस दिन की परिक्रमा की जा सकती है। उससे पहले गुरूपूर्णिमा पर कुंभराज में रहना है। एक हफ्ता वहां रह सकते हैं और मन लगे तो ज्यादा भी रह सकते हैं।
मैं भविष्य के बारे में विचार करने लगा। चूंकि अब साधुओं के साथ चलना है तो वेशभूषा भी बदलनी पड़ेगी।
मैंने बाबा से कहा, “जनेऊ पहनना है।”
बाबा बोले, “एक हीरा भी पहनना चाहिए।”
मैंने पूछा “हीरा?”
“तुलसी के पेड़ का जो मनका बनाकर गले में लाकेट की तरह पहनते हैं, उसे हीरा कहते हैं।”
मैंने कहा “जनेऊ पहना दो और हीरा डाल दो”।
बाबा बोले “आप ब्राह्मण हैं और मैं क्षत्रिय। इसलिए कोई ब्राह्मण साधु मिलेगा वही पहनाएगा।”
मेरे मन में प्रश्न उठा क्या साधु की भी जात-पात होती है। हमने तो सुना है, जात न पूछो साधु की! इस नए संसार के अपने ही दस्तूर हैं। मैंने बात आगे बढ़ाई, “उपनयन संस्कार तो बचपन में हो चुका है। (एक बार फिर बचपन आंखों के सामने उभर आया) बस यज्ञोपवीत (जनेऊ) त्याग दिया। दोबारा धारण करना है।”
बाबा ने कहा “ठीक है, गुरूपूर्णिमा के दिन किसी ब्राह्मण से पहनवा देगें।”
मेरा ब्राह्मण होना, जनेऊ धारण करने में भी बाधक बन रहा है? खैर। यह तय हुआ कि अभी कुछ दिन यहीं रहेंगे। गुरूपूर्णिमा से पहले कुंभराज जाना है और उसके बाद आगे का कुछ तय करेंगे।
मैंने कहा “मुझे रामायण पाठ करना अच्छा लगता है। यहां बैठे-बैठे रामायण पाठ करूंगा।”
बाबा ने शिवमंदिर में एक तखत रखवा दिया और अंदर से एक बड़ी सी ‘रामचरित मानस’ निकालकर दे दी। जाहिर है अब मेरा ठिकाना यहीं रहेगा। सिर्फ भोजन के लिए आऊंगा। यहां के लोगों को भी भरोसा हो गया है कि मैं कोई चोर-डाकू या खूनी नहीं हूं। अलबत्ता उन्हें यह जरूर लगता है कि ये कोई अधपगला सा आदमी है जिसके मन में बैराग समा गया है। मेरे लिए ऐसी सोच कमोबेश काफी अनुकूल भी है। मैं नहीं चाहता हूं कि लोगों को मेरा पूरा परिचय मिले। यदि ऐसा हो गया तो आने जाने वाले शुरू हो जाएंगे और यहां रहना मुश्किल हो जाएगा। मैं तो स्वयं को मंडला का बताता हूं और यह भी कि बेटी भोपाल में रहती है। अब ध्यान लगातार बेटी वन्या की ओर लगा रहता है। तीन दिन बाद उसका जन्मदिन है। कैसे करूंगा? मोह नहीं छूटता। शायद मैं मोह से छूटना भी नहीं चाहता।
दोपहर में सोचता रहा कुछ तो तय करना ही होगा। बाबा ने बताया था कि गुजरात में उनके गुरूभाई का आश्रम है, वहां रहा जा सकता है। यह भी सोचा कि वहां रहकर तीस्ता सीतलवाड़ वगैरह से संपर्क कर व जुड़कर कुछ काम किया जा सकता है। यानी “सेक्युलर बाबा”! सोचने में तो मजेदार लग रहा है। लगा इस संबंध में पहले अपने लोगों से बात करना चाहिए। देबू (देवीलाल पाटीदार) से बात करना चाहिए। इसी के समानांतर दूसरा ख्याल पुराने मित्र दीपक (सूर्यवंशी) का हो आया। उसकी मदद से कुछ स्वयंसेवी संगठनों से संपर्क किया जा सकता है। खासकर आदिवासियों के बीच काम करने के लिए। एक और बात दिमाग में आई कि नर्मदा जी के किनारे रहते किसी अपेक्षाकृत ईमानदार स्वयंसेवी संस्था से भी जुड़कर काम किया जा सकता है। मंडला जाना तो ठीक नहीं लग रहा था। भविष्य की इन सारी योजनाओं पर सोचते-सोचते यह भी ध्यान आया कि बस्तर में कुछ किया जाए। परंतु किसी राजनीतिक दल से जुडकर काम करने की तो अब दूर-दूर तक कोई इच्छा नहीं रही। काफी कुछ देख लिया है पहले ही।
अजीब सी बात है कि एक ओर अभी तक जीवन से विरक्ति सी हो रही थी और दूसरी ओर भविष्य की योजनाएं भी भीतर ही भीतर आकार ले रहीं थीं। साथ ही यह भी तय किया कि मौका मिलते ही नियमित लिखना भी शुरू करना है। परंतु विशेष बात यह है कि ये सारे दिन धार्मिक स्थली और गतिविधियों में भटकते बीते, लेकिन उससे जुड़े किसी भी कार्य के प्रति किसी भी प्रकार का कोई आकर्षण पैदा नहीं हुआ।
18 जुलाई 2007
नया दिन शुरू हुआ। अड्डू ने सुबह आकर कहा कि भोजन के बाद नर्मदा पार शंकरगढ़ी जाएंगे। दो बजे रवाना हुए। नर्मदा के किनारे ऊपर की ओर चल पड़े ऊपर यानी अमरकंटक, मंडला। नीचे यानी जिधर नर्मदा जी जा रहीं हैं, भडूच, बुदनी। पूर्व से पश्चिम। दो ढाई किलोमीटर पर एक बड़ा आश्रम है। अड्डू ने बताया कि यह आश्रम इसी क्षेत्र के बड़े पुराने किसान (किसी काछी) ने बनवाया था। अपनी सारी जमीन जो करीब सौ एकड़ थी, आश्रम को दान में देकर तीर्थयात्रा को चला गया था। मुझे ध्यान आया कि नर्मदा परिक्रमा करने वाले तमाम लोग अपनी पूरी संपत्ति का त्याग या दान करके ही नर्मदा जी की परिक्रमा पर निकलते थे। लोगों को सहज विश्वास नहीं होता था कि वे वापस लौटेंगे भी कि नहीं। मैं तो इस तरह का पारंपरिक परिक्रमावासी हूं नहीं। परंतु इस तरह की बातें, सामान्यतया कल्पना लोक की जान पड़ती हैं, लेकिन यह एक वास्तविकता है।
19 जुलाई 2007
सुबह जल्दी स्नान किया, आरती की और हवन किया। अड्डू किसी का मोबाइल फोन ले आया है। मुकेश को फोन करके कहा कि कल सुबह तिवारी के साथ वन्या-अलंकार के घर जाए और मेरी तरफ से एक फूल दे दे। वन्या के लिए उसके जन्मदिन के लिए मैंने कुछ पैसे एक जगह रखे थे, वह भी उसे दे दे। उसके बाद मैं वन्या से बात करके उसकी प्रतिक्रिया जानूंगा। अड्डू से कहा सुबह फोन लेकर आना शायद काफी देर रखना पड़े।
20 जुलाई 2007
आज वन्या का जन्मदिन है। वन्या ने मुकेश व तिवारी को दस बजे आने को कहा है। मैंने कुछ छोटी-मोटी चीजें खरीदीं। मिठाई देखी। अड्डू का कहना था यहां अच्छी नहीं मिलेगी। मैंने कहा जैसी भी मिले ले आना। ग्यारह बजे मुकेश को फोन किया, वह वन्या से मिलकर निकला ही था। उसने कहा अप्पा आते तब कोई बात होती। खैर, मैंने बारह बजे वन्या को फोन किया। वह शायद इंतजार ही कर रही थी। बहुत देर बात हुई। अलंकार कोर्ट जा रहा था। दोपहर जल्दी लौट आएगा। वन्या ने कहा हम अभी आते हैं। मैंने समझाया थोड़ा आराम करके शाम पांच बजे तक यहां पहुंच जाओ। वन्या से कहा मुकेश को बोल देता हूं, वह ले आएगा। वन्या से बात करके बहुत अच्छा लगा। स्वाभाविक है, पहले से ज्यादा समझदार हो गई है। हिसाब लगाया कि आज भोपाल से निकले तीन हफ्ते से ज्यादा हो गए हैं।
बाबा को बताया कि पांच बजे बेटी दामाद आएंगे। इंतजार शुरू हो गया। चार बजे के करीब अड्डू आया। साथ में हल्दीराम के रसगुल्ला, सोनपपड़ी और नमकीन ले आया था। मुझे गुस्सा आया और मैंने कहा वापस ले जाओ और खुद खा लेना। मैंने उससे बार-बार कहा था, जैसा भी हो यहीं का बना होना चाहिए। उसने मुझे समझाया, एकदम बेकार था, आपके लायक नहीं था, इसीलिए ये ले आया। जाहिर है उसने तो अपनी समझ से अच्छा ही किया था। पर मुझे क्रोध आ गया। मैंने उसे काफी बुरी तरह से झिड़क दिया और सब कुछ लगभग फेंक कर उसे दे दिया।
तभी जैसे आत्मबोध सा हुआ। काम, क्रोध, मद, लोभ, इन सब पर नियंत्रण रखना ही तो मेरी इस तपस्या का लक्ष्य है। परंतु यह बेहद कठिन है। वैसे भी ये परस्पर जुड़े हैं और एकदूसरे को प्रभावित करते हैं। लोभ पर तो मेरा नियंत्रण है ही, काम पर भी कर लिया है। आज अवसर आया और ‘मद’ से उत्पन्न ‘क्रोध’ ने प्रभावित कर लिया। विचार आया कि यदि अड्डू को पुरस्कार स्वरूप पैसे न दिलाए होते तो संभवतः उस पर अधिकार का बोध भी न होता और साथ ही प्रभुत्व का मद भी न होता। शायद क्रोध के पीछे एक कारण यह भी था कि वह मेरे निर्देश की अवहेलना करके मुकेश व तिवारी को बैकल्या ले आया था। जो भी हो अड्डू मुंह लटकाकर चला गया। पर मेरे लिए यह एक नया सबक था।
पांच बजे के आसपास वन्या और अलंकार, मुकेश के साथ स्कार्पियो लेकर आ गए। इस रास्ते के लिए यही गाड़ी ठीक है। नर्मदा जी के सौंदर्य को देखकर दोनों एकदम से प्रसन्न हो गए। शंकराचार्य ने नर्मदाष्टक के पहले श्लोक में कहा है, “अपने जल बिन्दुओं से सिन्धु की उछलती हुई तरंगों में मनोहरता लाने वाले तथा शत्रुओं के भी समूह के विरोधी और कालरूप यमदूतों के भय को हरने वाले हैं। देवी नर्मदा! तुम्हारे जलयुत चरण कमलों को प्रणाम करता हूं”। लगता है, मैंने इसके किनारे नवजीवन की शुरूआत कर कोई गलती नहीं की है। बाबा और माताजी ने दोनों का खूब स्वागत-सत्कार किया। बाबा ने दोनों को स्वयं नाव खेकर नर्मदा भ्रमण कराया। ऊपर आकर बाबा ने प्रस्ताव रखा कि अब ये लोग भोजन करके ही जाएंगे। मैंने कहा यह संभव नहीं है। आज इसका जन्मदिन है और शाम को सब लोग वहां (भोपाल में) इकट्ठा होंगे। परंतु आशा के विपरीत वन्या ने और रूकने की इच्छा प्रकट की। संभवतः उसे मेरा यह नया ‘अवतार’ अधिक सहज और अपनापन लिए महसूस हुआ होगा। या मेरी अनुपस्थिति ने उसे अधिक ही विचलित किया होगा। या उसे मेरे चेहरे पर शांति और आनंदभाव नजर आया होगा। पता नहीं, क्या उसे रोक रहा था। मुझे भी बहुत अच्छा लग रहा था। वन्या की हामी के बाद बड़े उत्साह से बाटी, दाल और चूरमा बना। जो दो नए साधु आए थे, वे बहुत सुंदर आरती-मंगल गा रहे हैं। खूब आनंद रहा। वे दोनों रात साढ़े दस बजे के करीब यहां से विदा हुए। वन्या का जन्मदिन अदभुत ढंग से मनाया गया। मेरे लिए यह एक अविस्मरणीय शाम रही। वन्या को जैसी आशंका थी शायद उतनी बुरी स्थिति में मुझे नहीं पाया। इसलिए थोड़ी आश्वस्त लगी। बाबाजी उसे अच्छे लगे।
21 जुलाई 2007
फिर एक नई सुबह। नियमित गतिविधियां जैसे नित्यकर्म, खूब सा जल पीना, डोलडाल प्रभाती, स्नान, मंगलस्वरूप व हवन। जीवन में इतनी नियमितता से सब कुछ होगा, ऐसा कभी सोचा नहीं था। पर अब हो रहा है। इसके बाद बाबाजी के साथ मिलकर कुछ छोटा-मोटा शारीरिक कार्य किया जैसे झाडू लगाई, निंदाई की, आसपास की सफाई वगैरह की। कुछ देर कल शाम जो कुछ हुआ उसकी चर्चा की। इसके बाद नये साधुओं से परिचय हुआ। जो इनमें से बड़े हैं वे बाबा से भी वरिष्ठ हैं और काफी विद्वान प्रतीत होते हैं। सभी उन्हें विशेष सम्मान भी देते हैं। वे मंगल आरती, और रामायण पाठ में पारंगत हैं। रामायण का काफी भाग उन्हें कंठस्थ भी है। अयोध्या के साक्षी नृत्यगोपालदास महाराज के शिष्यों में से हैं। यहां बरेली में स्थान बनाया था, लेकिन वर्तमान में लगभग विस्थापित से हैं। बहुत नखरे हैं और कॉफी ही पीते हैं। दूसरे कनिष्ट साधु 30-35 वर्ष के हैं। बहुत ही सौम्य, मृदुभाषी और दुबले-पतले, कहें तो कमोवेश कृषकाय। शायद मालवा के हैं। दोनों की भेंट नेपाल में हुई और साथ-साथ पदयात्रा करते यहां तक पहुंचे हैं। वरिष्ठ साधु को देखकर लगता है कि शायद नेपाल के हैं। उन्होंने गत रात दामाद-बेटी को महंगी गाड़ी में आते देख लिया होगा शायद तभी मुझमें विशेष रूचि ले रहे हैं। काफी उपदेशात्मक बातें कर रहे हैं।
मुझसे पूछने लगे, “क्या चाहिए? किस चीज की इच्छा है। लक्ष्मी, धन या यश, नाम?”
मेरा मन उद्वेलित हो रहा था, यह सब सुनकर। मैंने एक क्षण स्वआकलन किया, अतीत का स्मरण किया। पिछले तीन हफ्तों का परिदृश्य भी एकाएक सामने आया। मैंने जवाब दिया “बाबाजी, लक्ष्मी या धन की न तो इच्छा है और न आवश्यकता। शायद आवश्यकता से कुछ अधिक ही हो गया था। जहां तक यश या नाम का प्रश्न है, उसकी भी कोई आवश्यकता नहीं है। शायद योग्यता से अधिक मिल गया। अब तो बस दोनों ही से स्वयं को मुक्त करने की प्रक्रिया चल रही है। देखो, कहां तक सफल हो पाता हूं।”
यह सब मैं महसूस तो लगातार कर रहा था, परंतु कह पाने का उचित समय व पात्र शायद अब तक नहीं आया था। आज मन थोड़ा हल्का भी हुआ। इस वार्तालाप के बाद मुझसे बातचीत का स्वरूप थोड़ा परिवर्तित भी हो गया।
वरिष्ठ बाबा का नाम छबिराम दास और कनिष्ट का मोहनदास है। वरिष्ठ रास्ते में घुटने में चोट की वजह से लाठी लेकर चलते हैं। लगभग मेरी ही लंबाई-चौडाई के हैं। प्रभावशाली व्यक्तित्व के साथ ही साथ वार्तालाप मे निहित चातुर्य और भाषा से लगा कि ये मैथिल ब्राहमण हैं। जीवन में पहली बार मैंने अपनी तरफ से यह बताया कि मैं मैथिल ब्राह्मण हूं। शायद ऐसा उनके रहस्य जानने के लिए किया हो सकता है। मेरा अंदाज सही निकला। छबिराम का मूल नाम ‘राकेश झा’ है। गाजियाबाद विकास प्राधिकरण की नौकरी छोड़ करीब बीस साल पहले साधु हो गए हैं। मेरे दिमाग में आया, “जरूर गबन किया होगा।” मुझे महसूस हुआ कि अपनी मूल प्रवृत्ति में मैं अभी ज्यादा परिवर्तन नहीं ला पाया हूं। वामपंथ का प्रभाव भी जोर मारता ही रहता है।
मोहनदास बाबा मध्यप्रदेश के मालवा में स्थित शुजालपुर के हैं। दस बारह बरस की उम्र से घर छोड़कर बाबा हो गया है। विलक्षण है। यूं तो निरक्षर है किंतु केवल अभ्यास से रामायण पूरी पढ़ लेता है। यहां पर अनायास ही मेरा एक एकदम अलग किस्म के भारत से साक्षात्कार हो रहा था। दिनभर बाबा लोगों से बातचीत होती रहती है। दोपहर में भोजन के समय घूमते-घामते एक और बाबा आ गए, कमलदास। मोटू और खूब लंबी दाढ़ी। नरसिहंपुर जिले में नर्मदा किनारे कहीं रहते हैं। देखने में तो बड़े अनुभवी और ज्ञानी दिखते हैं, लेकिन मुंह खोलते ही मूर्खताओं का साक्षात प्रमाण नजर आते हैं। यहीं बाड़ी बरेली के पास के किसी गांव के रहने वाले हैं। भोजन से उठते बाबा हंसदास भी आ गए, उन्होंने भी भोजन पाया।
इस स्थान की सामाजिकता और सहकार की भावना अद्भुत है। यहां जब भी, जो भी आता है और यदि भूखा है तो उसके साथ भोजन बांटकर ही पाया जाता है। मैंने ऐसा कभी नहीं देखा कि कुछ लोग भोजन, चाय या कुछ और ले रहे हों और कोई वैसे ही बिना खाए-पिए बैठा हो या कोई आकर बिना बांटे बैठा रहे। अब यहां कुल मिलाकर छह बाबा एक प्रशिक्षु बालक बाबा और एक अज्ञानी आवेदक यानी मैं, कुल आठ लोग हो गए हैं। बड़ा आनंद है। भजन कीर्तन और वार्तालाप चलता रहता है। वहीं बाबा लोगों को खाते और उन्हें मेरी खुराक पर तरस खाते देखता रहता हूं। अड्डू आज नहीं आया। कल वन्या वगैरी के रहते भी बेहद औपचारिक तरह से आया। शायद मेरे गुस्से से दुखी व नाराज हो?
धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों को मेरी उपलब्धता की जानकारी मिलती जा रही है। आज (22 जुलाई 2007) इतवार है। मंडला से छोटी बहन अर्पणा के पति बाबा मिश्रा ने आने को कहा है। वन्या ने बताया कि देबू इस दौरान पूरे समय संपर्क में रहा और उसकी भूमिका सकारात्मक रही। मैं भी देबू से बात करना चाह रहा था। मैंने देबू को भी ले आने को कहा। सबसे मोटरसाइकल से ही आने को कहा है। दस बजे तक सब आ गये। बाबा मिश्रा ने अतिनाटकीयता के साथ आंसू बहाते दंडवत किया। परंतु देबू स्वाभाविक सहजता से रहा। बातचीत के दौरान बाबा ने मण्डला चलने को कहा और बोला भंवरताल में आश्रम बना लेंगे। देबू का कहना था जानी-पहचानी जगह रहो और भोपाल से संपर्क बनाए रखो। ऐसा काम करो जिसमें कानूनी ज्ञान का फायदा मिल सके। धामनोद के पास स्थित खलघाट के टापू में निवास भी सुझाया। बाबा जी ने सबको शानदार भोजन कराया। देबू के साथ दिनभर सार्थक बातचीत होती रही। मैं अपने में एक परिवर्तन महसूस कर रहा हूं। अब मैं केवल भविष्य की बातें करता हूं। अतीत की नहीं। और भविष्य भी मूलतः स्वयं के बारे में। एक माह में यह बड़ा परिवर्तन मुझमें आया प्रतीत हो रहा है। महसूस हो रहा है कि मुझमें अब काफी स्पष्टता आती जा रही है।
शाम को सब लौट गए। रात में साधु-संतों के साथ भजन,कीर्तन वार्तालाप का नित्यक्रम जारी रहा। दुखद-सुखद जो भी कहें छविदास बाबा को यह पता चला गया है कि उनके साथ जो व्यक्ति रह रहा है वह नामी वकील रहा है और उसके पास शायद काफी धनसंपदा भी है। इससे शायद उनके समझने का नजरिया भी कुछ बदल गया है। वे समझा रहे हैं कि प्रभु भक्ति तो गृहस्थ रहते और सभी सांसारिक कार्य करते हुए भी हो सकती है। उसके लिये सबकुछ त्यागना जरूरी नहीं है। उनके अनुसार किसी पंथ और गुरू को अपना लेना तथा कर्मकाण्ड का पालन कर लेना ही पर्याप्त है। बाबा ने बताया कि जनेऊ पहनना है तो आप दोनों ब्राहमण हैं। ब्राहमण का गुरू ब्राहमण ही हो सकता है और वही जनेऊ पहना सकता है तथा पंथ में शामिल कर सकता है। अजीब बात है, सन्यास के बाद भी जाति पीछा नहीं छोड़ती!
महसूस हुआ कि मेरे जीवन में जैसे कुछ नया घटित होने जा रहा था। सोमवार सुबह तय हो गया कि सभी साथ चलेंगे और गुरूपूर्णिमा तक कुंभराज में साथ-साथ रहेंगे। मैं गुरूपूर्णिमा का आकर्षण बन गया। यह भी तय हुआ उस दिन छोटे प्रशिक्षु, संदीप ‘बाबा’ का भी प्रारंभिक संस्कार कर दिया जाएगा। सबसे पहले मुंडन और उपनयन एकसाथ होता है और गले में कण्ठी माला जिसे त्यागी ‘हीरा’ कहते हैं, पहना दी जाती है। इसके बाद उसे गुरू द्वारा शरणागत मंत्र दिया जाता है। इस मंत्र के साथ ही व्यक्ति का ‘बाबा जगत’ में प्रवेश हो जाता है। इसके बाद क्रमशः शरणागत, अभ्यागत, अंतर्गत, महंत, श्री महंत, मंडलेश्वर, महामंडलेश्वर और अंततः जगदगुरू। यह अक्सर व्यक्तित्व पर निर्भर करता है कि वह कहां तक का सफर तय कर पाता है।
वैसे मुझे भी शरणागत बनाने का मामला अभी ‘विचाराधीन’ है। हमारे बाबा ने समझाया था कि मैं ब्राहमण तो हूं ही, लेकिन जनेऊ और गले में हीरा पहने बिना भंडार में प्रवेश और साधुओं के साथ बैठकर भोजन प्राप्त करने का अधिकार नहीं प्राप्त होता। कोई आपत्ति ले सकता है। इसलिए गले में हीरा पहनना होगा, बाकी मेरी मर्जी। बाबा बोले अभी ऐसी कोई जल्दी भी नहीं है। उनका कहना था, अभी घूमो, देखो और समझो। अभी तो वैष्णव सम्प्रदाय देख रहे हो। शैव भी देखो। मुख्यतः यही दोनों संप्रदाय हैं। शायद शैव, ठीक लगे। हो सकता है दोनों में से कोई भी न जमे।
उन्होंने समझाया गुरू चुनने में जल्दी नहीं करना चाहिए। पढ़े लिख व्यक्ति के लिये जरूरी है कि खूब सोच समझकर और परखकर ही किसी को गुरू बनाए। वे बोले,किसी को गुरू बना लेने के बाद अपना अस्तित्व उसे समर्पित करना होता है। मैं सोच रहा था कि कोई अपना पूरा अस्तित्व ही किसी और को कैसे समर्पित कर सकता है? क्या यह संभव है? क्या अस्तित्वहीनता संभव है? वैसे यह अपने अहम को खत्म कर देने की एक अद्भुत प्रक्रिया भी है। मैं समझ पा रहा था कि यह सियाचरण बाबा उर्फ कपूरी बाबा उर्फ ठाकुरबाबा काफी संतुलित व्यक्ति है। मैं देख रहा था कि साधु लोग कमर में केले के पेड़ को सुखाकर उसके धागे बनाकर उससे बनाया हुआ रस्सा बांधते हैं और उसी में बिना सिला हुआ लाल कपड़ा फंसाकर लंगोट बन जाती है। इस पर बाबा ने बताया काम (यौन इच्छाओं) पर नियंत्रण रखने के लिए इस तरह का लंगोट पहनते हैं। साधु संन्यासी गांजे का सेवन भी ‘काम’ पर नियंत्रण के लिए ही करते हैं। इसके अलावा जगह-जगह का पानी और वायु से सामंजस्य बैठाने में भी गांजा मदद करता है। मैंने अभी तक तो इसका सेवन नहीं किया है। वैसे छवि बाबा तो यहां का बड़ा गंजेड़ी है।
क्रमशः…
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एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…

