एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
धार: भगवद् गीता सार
उज्जड़ में काफी देर तक घूमते रहे। फिर वापस धामनबाड़ा फलिया आ गए उस घर में गए जहां की लड़की रात में गाने वाली टोली का नेतृत्व कर रही थी और अपने घर बुलाकर गई थी। अच्छा सम्पन्न घर है। लड़की शिक्षिका है और उसका भाई भी शिक्षक है। भाई की शादी नहीं हुई है। लड़की की शादी दूसरे गांव में हो गईं। छोटा-सा बच्चा भी है पर यहीं रहती है। पति आया हुआ है। इस समाज में दामाद का सम्मान नहीं है। परम्परागत रूप से तो वह बराबर से बैठ भी नहीं सकता। इसकी वजह यह है कि दहेज देकर लड़की का हाथ मांगता है जबकि हिंदू समाज में इससे एकदम उल्टा है। शायद परस्पर सम्मान हो तो और भी अच्छा लगने लगे। इस समाज में स्त्रियों का बड़ा सम्मान और प्रतिष्ठा है। इस घर में सुविधा के तमाम साधन हैं। ज्यादा बच्चे भी नहीं हैं। भाई-बहन दोनों नौकरी करके कमाते हैं और खेती-बाड़ी तो है ही। मां-बाप भी खेती करते हैं। खाना बना, खाया और थोड़ी देर सोए। उठकर सीताफल खाया। इस घर में सम्पन्नता अधिक है, लेकिन थोड़ी औपचारिकता है और आत्मीयता की कमी भी खलती है। यह केवल तुलनात्मक बात है-टक्कर सिंह के घर से तुलना करें तो, काफी कमतर है, आत्मीयता के मामले में।
उठकर फिर घर-घर घूमने चल दिए थामनबाड़ा और सत्ती फलिया के घरों में। एक घर में काली चाय बनाकर पिलाई। कप या ग्लास में नहीं थाली में! बहुत ही अच्छी लगी। थाली में चाय, एकदम नया अनुभव। चलते-चलते विक्रम के यहां पहुंचे गए। यह वह लड़का है जो कल रात बहुत सुंदर गा रहा था। अभी पढ़ता भी है। बडा भाई डोंगर सिंह है-वही घर का मुखिया है। माता-पिता सीधे-सादे हैं और घर भी अच्छा बना लिया है। बाहर बड़ा-सा ढका हुआ बरामदा है। अंधेरा हो गया था इसलिए हम लोगों ने रात यहीं रूकना तय किया। बरामदे में डेरा जमा लिया, खाना बना। एक खाट झूले की तरह बंधी हुई है, मैंने उसी पर डेरा जमाया। सेक्रिया भाई के यहां रात्रि भोजन और विश्राम तय था, लेकिन यहीं रूक गए। उनके घर के पास नदी है। सेक्रिया भाई को बोलने गए कि अब सुबह आएंगे। सेक्रिया भाई के यहां सब हमारा रास्ता देखते बैठे थे, बड़े निराश हुए। वादा करा लिया कि सुबह खाकर जायेंगे। सेक्रिया भाई की पांच बेटियां हैं। तीन की शादी होकर अपने-अपने घर चली गई। उनमें से एक स्कूल में पढ़ाती है। दो बेटियां रह गई हैं। एक हाईस्कूल में पढ़ती है और घर में आंगनवाड़ी का भी काम देखती है। सबसे छोटी बिल्कुल नहीं पढ़ी। वह पूरी खेती संभालती है। मां,बाप उसकी मदद करते हैं। बड़े सुखी मां,बाप हैं। अब चिंतित है कि दोनों लड़कियों की शादी होकर चली गई तो हमारा क्या होगा? कहते हैं एक शादी कर के चली जाए और एक घरजमाई ले आयेंगे, लेकिन दोनों ही मां-बाप को छोड़कर जाने को तैयार नहीं हैं। बड़ी सुशील और सुसंस्कृत लड़कियां हैं। बड़ी वाली तो शलवार-कमीज वाली है और छोटी एकदम पारम्परिक वेशभूषा वाली बेहद सुंदर, आकर्षक, चंचल, भोली-भाली लड़की है जिसके चेहरे और अंग-अंग से उसका सौम्य और पवित्र रूप छलकता है। कितने भाग्यशाली हैं ए मां-बाप! अब कल सुबह इनके घर आना है। डोंगर सिंह-विक्रम के घर वापस आए और खूब खाना खाया। थोड़ी देर गाना-बजाना, बातचीत चलती रही, फिर सो गए। मैं उसी झूले वाली खटिया पर सोया।
आज ईद है। यहां सिग्नल नहीं है, वरना सबको ईद की मुबारकबाद दे देता। दीपक आज भोपाल पहुंचा होगा। उसने मेरी तरफ से मुबारकबाद दे दी होगी। बहुत सालों बाद ऐसा हुआ होगा कि ईद पर मैं अपने शहर और दोस्तों के बीच नहीं हूं। पर यहां मेरे कुछ नए दोस्त हैं और वहां से एकदम अलग दुनिया यहां देखने को मिली है। पता नहीं कब तक इनकी यह नैसर्गिकता बनी रह पाएगी?
सुबह जल्दी उठकर काली चाय पी और सामान लेकर निकल पड़े। सेक्रिया भाई के यहां सामान रखा और नदी गए। वहां स्नान आदि करके फिर आ गए। यहां जल्दी-जल्दी खाना बना। खाना खाकर सामान उठाया और चल दिए। नदी पार करके काफी ऊंचाई पर शिवलिंग की स्थापना की है। शिवगंगा या शिव की स्थापना यह भी समझने की बात है। वहां एक पुराना मंदिर भी है। वहां आजकल दुर्गाजी की स्थापना की हुई है, क्योंकि नवरात्रि चल रही है। शहरों और कस्बों में गरबा होता है। यह गुजरात का प्रभाव है। धीरे-धीरे इनका हिन्दूकरण होता जा रहा है। यह घातक होगा, इस समुदाय की पूरी संस्कृति के लिए। रामलीला होते तो कहीं भी नहीं देखा। मंदिर से उमराली के पटेल फलिया चले, जहां से रात में लोग मिलने आए थे। लगभग दो किलो मीटर दूर है। एक घर में बैठकर चाय पी और फिर उसके दूसरे भाईयों के यहां भी मिलने गए। काफी ऊंची पहाड़ी है यहां थोड़ी-थोड़ी दूर पर सबके घर हैं। पहाड़ी की ढलान पर पत्थर-मिट्टी पटे पड़े हैं। लगभग सत्तर डिग्री की ढलान होगी, लेकिन ये लोग उस पर भी बैलों से जुताई करके खेती करते हैं। कमाल के पराक्रमी लोग हैं। बिना देखे कोई विश्वास ही नहीं कर सकता कि ऐसी जगह पर भी जुताई और खेती हो सकती है। वास्तव में ये दुनिया के सबसे अनूठे कृषक हैं, पर किस्मत उतनी अच्छी नहीं, जितनी होनी चाहिए। फसल काटकर सब मजदूरी करने गुजरात जाते हैं। गुजरात से मजदूर बटोरकर ले जाने वाला व्यवसायी आया हुआ है। वह बैठकर नरेन्द्र मोदी के गुणगान कर रहा है और कह रहा है कि यहां भी अगर भाजपा की सरकार होती तो बस चकाचक हो जाता! अपने को होशियार समझने वाला महामूर्ख, मुंह लगाने लायक नहीं। यही सब लोग इन आदिवासियों को बेवकूफ बनाकर उनका शोषण करते हैं। यही इस इलाके का सबसे दर्दनाक पहलू है।
इस प्राकृतिक सौंदर्य में रहने वाले मनुष्य को गुजरात में बड़ौदा, अहमदाबाद,सूरत जैसे शहरों में फुटपाथों पर सोना पड़ता है या ये बालसिनोर जैसी जगहों में पत्थर तोड़ने के कारखानों में काम करते है। जहां सिलिका के महीन कण इनके सीने में जमते जाते हैं और इस इलाके के हजारों लोग सिलिकोसिस नामक लाइलाज बीमारी से, सांस न ले पाने की वजह से तड़प तड़प कर मर जाते हैं। आश्चर्य यही है कि ये लोग इतनी विरोधाभासी परिस्थितियों में भी रह लेते हैं और स्वयं को उसके अनुकूल भी बना लेते हैं। परंतु यह शोषण का मुद्दा नही बनता। शिव व दुर्गा ही अब मुख्य मुद्दे हैं! बढ़ता हिन्दूकरण हमारी पूरी सामाजिक सभ्यता के लिए खतरा है।
थोड़ी देर में सबसे मिलकर सड़क की ओर निकले। लगभग दो किलो मीटर चलकर आलीराजपुर की बस मिल गई। यहां से बारह बजे के करीब छोटा उदयपुर (गुजरात) जाने वाली बस पकड़ी और रास्ते में कटठीवाड़ा फाटा पर उतर गए। यह जगह भी गुजरात के बड़ोदरा जिले में है। यहां से छोटा उदयपुर लगभग बीस किलो मीटर और कट्ठीवाड़ा करीब पंद्रह कि.मी. है। थोड़ी देर में एक जीप में बैठकर कट्ठीवाड़ा रोड पर चले और रास्ते में खेड़ा में दोपहर करीब ढाई बजे उतर गए। यहां से थोड़ी दूर पर एक मंदिर में गए जहां सरपंच रहता है। वह साधु का वेश धारण किए है। बड़ा-सा मंदिर बनवाया है और बड़ा-सा घर। उसकी बहू सरपंच है। इस क्षेत्र में कार्यकर्ता सुमेर सिंह है। उसने अपनी बुद्धि से इस मंदिर के कमरों में रूकवाना उचित समझा, क्योंकि यहां पक्का पाखाना भी है। सत्ता हाथ में आते ही अपना असर दिखाना शुरू कर देती है। यहां आकर यही लग रहा था। पानी पिया, थोड़ी देर बैठे फिर महेश जी और मैंने एकदूसरे की तरफ देखा और सामान उठाकर चल पड़े। बिल्कुल ही अनुपयुक्त स्थान। लेकिन सुमेर सिंह ने विशेषकर मेरी सुविधा के हिसाब से व्यवस्था की थी। उसे लगा था कि मैं एक शहरी व्यक्ति हूं जिसे शहरी सुविधाएं मिलनी चाहिए।
यहां से साथ में एक नया संपर्क स्कूली छात्र नान सिंह है। उसी के घर यानी थोड़ी दूर जाबनिया गांव गए। उसके घर में हमें कोई विशेष स्वागत की दृष्टि से नहीं देखा गया। फिर भी बैठे रहे। तीन-चार भाई हैं तथा अलग-अलग रहते हैं। नान सिंह छोटा है और सबसे बड़े भाई-भाभी साथ रहते हैं। बहुत सीधा है उसकी समझ में नहीं आ रहा है कि कैसे व्यवस्था करे। छोटा सा घर और आर्थिक स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं लगती है, नया-नया संपर्क है। सामान वहीं रखकर हम लोग टहलने निकल गए। एक दूसरा युवक साथ में है-रवीन्द्र। वह कुछ होशियार है, संघ की इकाई सेवाभारती से जुड़ा रहा है। इसका यहां काफी प्रभाव भी दिखा। सेवा भारती संघ की सांस्कृतिक इकाई है, जो कि आदिवासियों के सांस्कृतिक परिवेश में हस्तक्षेप करती सी प्रतीत होती है। पास के गांव मोटी बड़ोई में उसका घर है, वहां भी गए। उसके माता-पिता खेत में काम कर रहे हैं। बड़ा भाई पानी के पम्प का मैकेनिक है। रवीन्द्र पढ़ता और घूमता है। खेती-बाड़ी अच्छी होने से इनकी आर्थिक स्थिति भी ठीक है। बड़ा सा घर है। एक बड़ा कमरा खाली पड़ा है, जहां बीयर की खाली बोतलें पड़ी है। बीयर आदिवासी संस्कृति का नवीनतम प्रतीक है। शादी ब्याह में इसकी खपत देखकर दिमाग घूम जाता है। हमने घोषणा कर दी कि रात यहीं सोयेंगे। नान सिंह के यहां सोने की जगह नहीं है। वैसे उसकी काकी के घर में रूक सकते थे। काकी के घर में अंदर भी गए थे वहां दीवारों पर बड़ी सुंदर चित्रकारी की हुई है। दस साल पहले चित्रण हुआ था। परंतु अभी भी रंग एकदम ताजे लगते हैं। बताया बड़वा ने की है।
सामान्यता भीलों में चित्रकारी चितेरे करते हैं, लेकिन इस इलाके में बड़वा (ओझा) भी यह कार्य करते हैं। इसे पिथौरा भी कहते हैं। रवीन्द्र के घर में रूखा सा व्यवहार मिला। इसी मोटी बड़ोई गांव में वेर सिंह रहते हैं जो पिछली बार भूरिया अम्बा में प्रवीण के घर मिले थे। उनके घर भी गए। वेर सिंह को सब लोग जयराम जी के नाम से जानते हैं क्योंकि इस क्षेत्र में वही जयराम जी की कहते हैं। बाकी सब राम-राम या जय सियाराम कहते है। यहां संबोधनो में भी अजीब सा विरोधाभास नजर आता है। राम की वैसे यहां कोई अधिक मान्यता नहीं हैं फिर भी अनेक तरह से इनके नाम को आपसी संबोधन में शामिल किया गया है। वेर सिंह कहीं बाहर गए हुए हैं। कल सुबह आयेंगे। पास में एक आदिवासी छात्रावास है, वहां के बच्चों से बातें करते रहे। आसपास के गांवों के होशियार बच्चे हैं। स्कूल आठवीं तक है लेकिन यहां गणित पढ़ाने वाला कोई शिक्षक नहीं है। पास में एक ठाकुर साहब रहते हैं। उनका लड़का भी यहां आठवीं में पढ़ता है। जाबनिया जाने लगे तभी जयराम जी आ गए और जिद करने लगे कि उनके घर चलो। बड़ी मुश्किल से उन्हें समझाया और सुबह उनके यहां आकर भोजन करने का वादा किया, तब माने।
नान सिंह के यहां पहुंचे। खाने के लिए इंतजार हो रहा था। खाना खाकर निकलने की तैयारी करते समय गांव के दो बुजुर्ग लोग आ गए, परिचय हुआ। पास के फलिया से आए हैं उनमें से एक बड़वा है (झाड़-फूंक करने वाला ओझा) और दूसरा उसका बड़ा भाई। बताया कि इस घर में एक स्त्री बीमार रहती है उसे ठीक करने आए हैं। अब रात भर यह सब चलेगा। इक्कीसवीं शताब्दी में भी यहां पर यह पारंपरिक चिकित्सा पद्धति मौजूद है। यह परंपरा में विश्वास है या आधुनिक चिकित्सा प्रणाली की असफलता? बड़वा से बातचीत होने लगी। बगल के काकी के घर में दीवारों पर चित्रकारी इसी ने की है, बडवा उसका भाई है। पहले तो बातचीत चलती रही और बड़वा सुनता रहा। फिर अचानक बोला “मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं।” हम लोग एकदम चौंक गए। हमारे लिए यह नई किस्म की डिग्री जो थी। अच्छी हिन्दी बोलता है, थोड़ी पिए हुए भी है। काफी देर तक बातचीत, गप्पें होती रहीं। माहौल बहुत अच्छा हो गया और घर में सब लोग अब जुड़ गए थे। उठने की इच्छा ही नहीं हो रही हैं, लेकिन रात काफी हो गई। बड़वा ने अपने घर आने का निमंत्रण दिया। बड़ा ज्ञानी आदमी जान पड़ा और मजेदार भी है। बताया कि यहां से थोड़ी दूर पर साजनपुर नाम का गांव मध्य प्रदेश में हैं, लेकिन सब तरफ से गुजरात से घिरा हुआ है। बड़वा से और सबसे विदा लेकर जाबनिया से छोटी बड़ोई गए और रवीन्द्र के यहां जाकर सो गए।
मैं इस बार सबकुछ बहुत सूक्ष्मता से देखभाल रहा हूं। इसकी एक वजह यह है कि मुझे अब अपने भविष्य की रणनीति को अंतिम रूप देना है। बहुत दिनों तक यायावरी का जीवन नहीं बिताया जा सकता। वैसे जीवन जीने का कोई विशेष अर्थ भी तो होना चाहिए। चूंकि मेरे दिमाग में यह इलाका भी कार्यक्षेत्र के दायरे में है, तो इसका ठीक से विश्लेषण और मूल्यांकन भी जरूरी है। सुबह उठकर नदी पर जाकर नित्य कर्म से निवृत हुए और लौटकर रवीन्द्र के यहां से सामान उठाया और निकल पड़े। किसी ने चाय के लिए भी नहीं पूछा। अभी तक का सबसे रूखा व्यवहार यहीं पर देखने को मिला। इसकी वजह समझ में नहीं आई। यह भी संभव है कि यह लोग शिवगंगा के विचार से सहमत न हों। लेकिन अभी तक जिन लोगों के घरों में रूके वे सब शिवगंगा से जुड़े हों या उसे जानते हों, ऐसा नहीं है। बड़वा या उसके भाई ने तो कभी नाम भी नहीं सुना। उज्जड़ गांव में सेक्रिया भाई या विक्रम का शिवगंगा से कोई लेना-देना नहीं है। यह आवभगत-आत्मीयता तो इस आदिवासी समाज का नैसर्गिक गुण है। यहां रवीन्द्र के घर में लोग अपेक्षाकृत सम्पन्न हैं, मुख्य सड़क के किनारे नगरीय क्षेत्र के पास हैं और वह खुद हिन्दुत्ववादी विचारधारा से प्रभावित हैं, यही कारण हो सकता हैं ऐसे रूखे व्यवहार का, मेरी समझ के अनुसार।
विदा लेने नान सिंह के यहां गए। वहां पहुंचे तो देखा कि बड़वा की महफिल अभी जमी हुई है। बाहर चूल्हे पर मुर्गा पक रहा है और अंदर परछी में महुआ चल रहा है। हम लोग पहुंचे तो सब एकदम संकोच में पड़ गए। हम जाकर बैठ गए और बातें करने लगे।
बड़वा ने कहा “मैं धर्मात्मा भी हूं और पापी भी। लोगों का भला करता हूं इसलिए धर्मात्मा और दारू मुर्गा का सेवन करता हूं इसलिए पापी।” मजेदार व्याख्या थी।
मैंने कहा “दारू, मुर्गा कोई पाप नहीं है। अच्छे लोग भी सेवन करते हैं।”
उनके साथ बैठ गए और खूब बातें चलीं। हमें चाय पिलाई और फिर जबर्दस्ती उड़द के बड़े बनवाकर भी खिलाए। बड़वा से महेश जी की बड़ी मित्रता हो गई। उनके लिए भी शायद यह पहला ही अवसर होगा किसी शराबी के साथ बैठने का। घर के सारे लोग घुल-मिल गए और कहने लगे अगली बार हमारे घर रूकना। एक ही गांव में दो बिल्कुल विपरीत स्वभाव वाले लोग मिले। यहां से निकलकर दूसरे फलिए में बड़वा का घर देखने गए। थोड़ी देर उसकी पत्नी और बच्चों के पास बैठे। बगल में भाईयों के घर गए। लौट रहे थे तो फिर बड़वा मिल गए। डोलते हुए चले आ रहे थे, नशे में धुत। रातभर पूजा जो चली थी। भंवरताल के चतरू की याद आ गई। फिर जिद पकड़ ली कि मेरे घर चलो और खाकर जाओ। उसने बड़ी मुश्किल से जाने दिया। धन्ना बड़वा बड़ा जोरदार आदमी है। उसकी सत्तर के करीब उम्र होगी लेकिन बिल्कुल जवान रखा है। बाल काले हैं, दाढ़ी भी। उसका बड़ा भाई भी एकदम चुस्त-दुरूस्त है। दारू और मुर्गा उसकी अच्छी सेहत का राज हो सकता है?
थोड़ी देर में जयराम जी के यहां पहुंचे। सामान रखकर नहाने गए। पास में ही नदी है। उनका लड़का साथ गया, वह आठवी में पढ़ता है। पत्नी आंगनबाड़ी में काम करती है। खाना बनाकर चली गई। लड़कियां भी कट्ठीवाड़ा पढ़़ने जाती हैं, वे भी चली गई। नदी के उस पार शौच करने गए। कपड़े धोए और नहाने लगे। लड़के से पूछा-गुजरात कितनी दूर से शुरू होता है। उसने बताया जहां आप शौच करने बैठे थे वह गुजरात है और जहां कपड़े धोए वह मध्यप्रदेश है। खूब हंसी आई। भूगोल समझाने का इससे अच्छा तरीका और क्या हो सकता था। गुजरात की ओर एक किसान जुताई कर रहा है वह भिलाला है। उससे बातें करते रहे। उसे अपने गुजरात प्रदेश पर गर्व है, जबकि रिश्तेदारी ज्यादा म.प्र. के गांवों में है। बताने लगा कि मोटी बड़ोई का पाटीदार भी ठाकुर नहीं भिलाला ही है और उसका रिश्तेदार है। उसके गांव का नाम देकड़ा है। वहां से पांच−छह किलो मीटर मध्य प्रदेश का गांव साजनपुर है। नहाकर आए और वेर सिंह के यहां उसने और उसके बेटे ने अच्छा भोजन कराया। अच्छा सम्पन्न परिवार है। अगली बार उसी के यहां आकर रूकने का वादा करके कट्ठीवाड़ा के लिए निकल पड़े। यात्रा निर्बाध जारी है। मौसम में थोड़ी ठंडक होने से निरंतरता बनी हुई है।
इस बीच भूरिया अम्बा के सरपंच प्रवीण से फोन पर बात हुई। उसने आने का बोला था लेकिन आया नहीं। मोटीबड़ोई भी भूरिया अम्बा पंचायत में ही है और एकदम लगा हुआ है। प्रवीण भाजपा का सक्रिय पदाधिकारी है और शायद उस पर दबाव पड़ा होगा, शिवगंगा से दूर रहने के लिए। वैसे बहुत अच्छा लड़का है। पिछली बार उसने खूब आवभगत की थी। कट्ठीवाडा यहां से करीब चार-पांच कि.मी दूर है। सुबह का साढ़े ग्यारह बजा है। पैदल ही चले। कुछ दूर तक जयराम जी भी छोड़ने आए। सुमेर सिंह तो कट्ठीवाड़ा तक साथ जाएगा और वहां से दूसरे गांव लेकर जाएगा। करीब दो किलो मीटर चलने के बाद पीछे से एक जीप आ गई और उसके पीछे पायदान पर खड़े होकर कट्ठीवाड़ा पहुंच गए। कुछ लोग ऊपर छत पर भी बैठे हैं और कुछ सामने बोनट पर भी। सुमेर सिंह भी बोनट पर बैठा। पीछे खड़े होकर चलने में बड़ा मजा आया। यह अपने आप में अनूठा अनुभव था। उस जीप में कम से कम 30 लोग तो रहे ही होंगे। यह समझ नहीं आ रहा था कि ड्राइवर अंदर है या बाहर? वह आगे देख कैसे पा रहा होगा? ब्रेक आदि कैसे लगा रहा होगा? वास्तव में यह एक चमत्कार जैसा ही था।
कट्ठीवाड़ा से फिर पैदल पगडंडी पर चल पड़े, लखावट गांव की ओर। इस समय दोपहर का लगभग दो बजा है। और अच्छी धूप हो गई है। रास्ते में दो गांव पड़े। एक जला हुआ छोटा-सा चर्च भी दिखा। कुछ साल पहले हिंदू सम्मेलन के बाद इसे जला दिया गया था। यहां के गांवों में थोड़े-बहुत ईसाई हैं। कुछ दूर पर घने जंगल के बीच आमकोट जगह है। यह ईसाईयों का गढ़ है और डर के मारे हिंदूवादी संगठन के लोग वहां घुस नहीं पाते। अजीब सी रस्साकशी चलती रहती है। परंतु आपसी रंजिश व मनमुटाव बढ़ता ही जा रहा है। इतनी तीखी सांप्रदायिकता इस आदिवासी क्षेत्र में होगी, इसका अंदाजा नहीं था। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। चलते-चलते लखावट गांव पहुंच गए। सुमेर सिंह का जो संपर्क है उसके घर कोई मौजूद नहीं है। दरवाजे पर सांकल चढ़ी हुई है। यह खेतों में काम का वक्त है, घरों में लोग नहीं रहते केवल बहुत बूढ़े और बहुत छोटे बच्चे ही रहते हैं। सांकल उतारकर दरवाजा खोला और अंदर परछी में सामान रखा, पानी पिया और थोड़ी देर बैठकर सुस्ताए। फिर आसपास के घरों में देखने गए कि कोई मिल जाए। इस समय दोपहर का लगभग साढ़े तीन बजा है।
बगल के एक घर में एक व्यक्ति बैठा खाना खा रहा था। उसने अंदर से ही कह दिया कि अभी आलीराजपुर से आया है, टाइम नहीं है। सामान्यतया यहां रूखापन नहीं मिलता है लेकिन सब कुछ एक सा ही हो यह जरूरी भी नहीं है। सब घर एक-दूसरे से लगे हुए हैं। थोड़ी दूर कोने में एक परछी में खाट पर एक बहुत बूढ़ा व्यक्ति लेटा हुआ है। वहां स्कूल की तरह के कुछ पोस्टर नक्शे टंगे हुए हैं। बूढ़े के पास बैठकर बातें करने लगे। इतना बूढ़ा है कि बोल नहीं पाता। उसे पकड़ कर खड़ा किया तो खुश हो गया। इतने में वह व्यक्ति आ गया, जो पिए हुए है, अभी खाना खा रहा था। बूढ़ा उसका पिता है। वह व्यक्ति नाराज सा दिखा। उसका छोटा भाई यहां स्कूल चलाता है। उसने सोचा कि कोई जांच पड़ताल करने आए हैं।
महेश जी ने पूछा, भील हो क्या?
उसने चिढ़कर कहा, नहीं भिलाला हैं।
भिलाला को भील कहना उसका अपमान है। भिलाला अधिक ऊंचे हैं। इस तरह की ऊंच नीच आदिवासी समाज में कम ही मिलती है। परंतु मध्यप्रदेश के इस इलाके में यह काफी गहरी पैठ बनाए हुए है। धीरे-धीरे बातचीत करते उसकी नाराजी दूर हुई और वह मित्रवत हो गया। उसका संदेह भी दूर हो गया।
सुमेर सिंह वहां ले चला, जहां शिवलिंग स्थापित है। रास्ते में एक घर के अंदर गए। उस घर की महिला पढ़ी-लिखी लगी तथा पति भी नौकरी करता है। एक दुकान सी है। आधुनिक सा घर है। फ्रिज में से निकालकर पानी पिलाया। मैंने मटके का मांगकर पिया। उसे आश्चर्य हुआ। मकान में आसपास काले मटके टांग रखे हैं कि नजर न लगे। यह घर गांव से जरा अलग हटकर ही है। हमने कहा आगे जो गांव है वहां जायेंगे। कहने लगी, वहां मत जाओं, गांव में खराब लोग रहते हैं,दारू पीते हैं। हम लोग मुस्कुराते हुए उठकर चल दिए। यह स्त्री भी भिलाला है। अब नए तरह का अभिजात्य वर्ग यहां भी विकसित होने लगा है। थोड़ा सा पढ़ लिया, शहरी रंग-ढंग, वेशभूषा बना ली तो सब आदिवासी खराब और गंवार हो गए। हम शहर से आए हैं, इसलिए अजनबी होकर भी अच्छे हैं। अजीब बात है।
यहां खेतों के बीच शिवलिंग स्थापित है। यह एक नई धार्मिक संस्कृति की पहचान है। साथ ही आदिवासियों को उनकी जड़ों से निष्कासित करने का प्रयत्न भी। वैसे यह इस तरह का कोई नया या पहला प्रयास भी नहीं है। बगल में एक भगत जी वेर सिंह का घर है, वही पूजापाठ करते हैं। अभी हैं नहीं। अलीराजपुर गए हुए हैं। हम लोग घूमते रहे, मंदिर में खूब सारे नारियल चढ़ाए हुए हैं। दो नारियल फोड़कर खाए और सबको खिलाए। इतने में भगत जी आ गए। करीब दस साल से दारू-मुर्गा छोड़कर भगत बन गए हैं। तीस-पैंतीस साल के अविवाहित। आसपास सब भाई,बंद के घर हैं, बूढ़े माता,पिता साथ रहते हैं। इस क्षेत्र में ऐसे बहुत से परिवार भगत बन गए हैं जो दूसरों को हेय दृष्टि से देखते हैं। दारू मुर्गा वाले घरों में आते,जाते भी नहीं हैं। इस तरह से दो नए वर्ग तैयार हो गए है। अजीब किस्म का विभाजन है। यहां नया विभाजन दारू मुर्गा खाने व न खाने वालों का हो गया है। भगत धारा मूलतः गुजरात से यहां आई है। शिवगंगा के साथ अधिकतर ये भगत लोग ही हैं। थोड़ी देर भगत जी के पास बैठे। अंधेरा हो गया। जिसके यहां सामान रखा है वह इनका चचेरा भाई है। हम लोग चल दिए।
माधो सिंह के घर पहुंचे। वह अभी तक आया नहीं है। सुमेर सिंह ने उसकी पत्नी को बताया कि खाना यहीं खाएंगे और सोएंगे भी यहीं। थोड़ी चिंतित हो गई। घर में छोटे-छोटे बच्चे हैं और बूढ़ी मां, पिता की मृत्यु हो चुकी है। बड़े भाई अलग रहते हैं। थोड़ी देर में माधो सिंह आ गए-लगभग तीस साल के युवक, नशे में मस्त। अलीराजपुर से आ रहा हैं। निरंतर बहकी-बहकी बातें करता रहा। पत्नी अंदर उसे झिड़कती रही। शकल से ही पक्का शराबी दिख रहा है। बीड़ी भी लगातार पी रहा है। पहली बार ऐसे व्यक्ति के घर महेश जी रूके हैं। एक बार इनके वर्ग में भी शामिल हो चुका है, इसलिए उसके घर आए हैं। पहली बार किसी को अपनी पत्नी को गंवार और छोटे घर की बताते सुना। पत्नी बहुत अच्छी है और बच्चे बहुत प्यारे हैं। धीरे-धीरे नशा थोड़ा कम हुआ। जिद कर-करके खूब खाना खिलाया। बताया कि कुछ दिन पहले जो धार रोड पर लूट की घटना हुई थी उसके आरोपी आज बगल के गांव से पकड़े गए हैं। वही गांव सोनगरा जहां से होकर हम आए थे और जहां जला हुआ चर्च दिखा था। माधो सिंह के पिता की लगभग दस पंद्रह साल पहले हत्या कर दी गई थी। दूसरे गांव में शादी का प्रस्ताव लेकर गए थे, वहां विवाद हुआ और उनको मार डाला। यहां हत्या जैसे बेहद सामान्य बात हो। तब माधो सिंह बहुत छोटा था। उसके भाई ने ही सब संभाला। इस इलाके में शादी को लेकर झगड़े और हत्या बहुत आम बात है। या तो लड़की को भगाकर ले जाने पर झगड़ा होता है या दहेज को लेकर। भिलाला लोग बड़े लड़ाकू हैं। ऐतिहासिक रूप से ए लड़ाकू जनजाति है। इस जाति ने भीलों के साथ मिलकर सात सौ वर्षों तक इस इलाके पर राज भी किया है।
खाने के बाद सोने की बारी आई तो बिस्तर कम पड़ गए। हम तीन लोग हैं। मेरे पास दरी-चादर है, बाकी दोनों के पास तो कुछ नहीं और ठंड भी है। घर के सारे बिस्तर निकालकर हमें दे दिए। गजब की विनयशीलता और सहजपन इस परिवार में दिखा। दोपहर में माधो सिंह की जो छवि बनी थी ठीक उसके विपरीत अब उसका आचरण था। बड़ी मुश्किल से उसकी पत्नी और बच्चों के लिए बिस्तर वापस दिए। वह खुद बिना कुछ बिछाए जमीन पर लेट गया। मैंने बहुत कहा कि एक रजाई खाली है और अलग रख दी लेकिन नहीं माना। वेर सिंह भगत जी भी आ गए। थोड़ी देर बातचीत चलती रही। कहने लगे माधो सिंह जैसा अच्छा यहां कोई नहीं है, बस पीना छोड़ दे यही इसकी कमजोरी है। हमेशा बोलता है, लेकिन छोड़ता नहीं। माधो सिंह ने एक बार फिर हम लोगों को साक्षी रखकर प्रण किया कि पीना छोड़ देगा। भगत जी थोड़ी देर में चले गए। लगभग ग्यारह बज गया होगा। हम लोग सो गए। माधो सिंह वैसे ही जमीन पर सो गया। महेश जी को लग रहा है कि शराब में भी गुण है, आदमी को दिलदार बना देती है।
सुबह जल्दी नींद खुल गई और अंधेरे में ही नदी चले गए। एकदम पास में ही है। आकर चाय पी और लोगों से मिलने लखावट गांव के होली फलिया गए। वेर सिंह भगत जी के यहां भी गए। माधो सिंह के बड़े भाई और चचेरे भाईयों के घरों में भी गए। वहां चाय पी। सब लोग बड़े सम्पन्न और आत्मीय हैं। माधो सिंह की चचेरी भाभी सरपंच है। सब खेतों में काम करते मिले। सरपंच भाभी मक्का बोते मिली, उसका पति हल से जुताई कर रहा है। यहां मक्का की दो फसलें होती हैं। सर्दी में मक्का का बीज अलग है। इतने सुंदर खेत, इतनी अच्छी जुताई और सबने सिंचाई के लिए जमीन के नीचे अपनी-अपनी पाइप लाइन बिछा रखी है और जगह-जगह वाल्व लगे हुए हैं। जुताई हल-बैल से ही करते हैं। ट्रेक्टर का प्रचलन यहां बहुत कम है। धान की फसल बहुत अच्छी है। इतनी सुंदर खेती और पूरे कुनबे में इतना प्रेम और आत्मीयता देखकर मन प्रसन्न हो गया। खेती, किसानी, और किसान को यहां एकाकार होते देखा जा सकता है। भारत के कृषि महाविद्यालय व कृषि वैज्ञानिक क्यों असफल होते रहे हैं वह यहां की खेती देखकर समझ में आ जाता है।
मैं सचमुच आश्चर्यचकित हूं कि कितना कुछ है इनसे सीखने के लिए। कितना कठोर जीवन है इनका और इसके बावजूद कितने प्रसन्न रहते हैं यह सब के सब। बाहरी दुनिया से बहुत ही कम संबंध है इन लोगों का। इतने सभ्य,सुसंस्कृत और मृदुभाषी। शायद अपने में रहने की वजह से यह भोलापन बचा हुआ है। सब आवभगत के लिए तैयार। यदि एक के यहां चाय पी तो दूसरा दूर से ही देखता रहता है और जब तक अपने यहां भी कुछ खिला पिला नहीं देता तब तक आगे जाने नहीं देगा। चाय पीते पीते हालत खराब हो जाती है। तमाम किस्मों की चाय हैं जैसे दूधवाली, बिना दूधवाली, खूब मीठी, कम मीठी। लेकिन इतनी आत्मीयता और इतना आग्रह कि मना करते ही नहीं बनता। महेश जी भी लगातार चाय पी रहे हैं, जबकि वे चाय नहीं पीते। लौटकर माधो सिंह के घर गए। लौटकर आए तब तक खाना तैयार था। खाना खाया और निकल पड़े। दस बजा होगा।
एक किलो मीटर दूर वेजा गांव में एक पुराने कार्यकर्ता के घर गए। इस गांव में एक दो ईसाई परिवार भी हैं। सब एकदूसरे के प्रति सशंकित रहते हैं। इन ईसाई आदिवासियों ने अपनी वेशभूषा भी बदल सी ली है और हैट लगाया हुआ है। महेश जी ने राम−राम कही तो मुस्कुराकर दोनों हाथ जोड़े, कुछ बोला नहीं। ये लोग भी बड़ी कुशंका और भय के साथ रहते होंगे। वैसे तो झगड़े कम ही होते हैं। संघ के हिन्दू सम्मेलन के बाद ही जगह-जगह झगड़े हुए थे। अब भाजपा की सरकार होने से वैसे ही ईसाई भयभीत रहते होंगे। इस समीकरण को भी समझना होगा। वेजा गांव में थोड़ी देर बैठकर फिर चाय पी और आगे बढ़ गए। थोड़ी दूर चलकर फिर नदी आ गई और सैंडिल भीग गए। करीब दो किलो मीटर चलकर दो मोटरसायकल वालों ने कट्ठीवाड़ा तक छोड़ दिया। प्रवीण का फोन आया और वह मिलने आ गया। अब तक न मिले पाने से शर्मिंदा लगा। ऐसा लगा कि वह मिलना तो चाहता है लेकिन किसी दबाव में है। अब सुमेर सिंह यहीं रह गया। तीन-चार दिन उमराली और कट्ठीवाड़ा क्षेत्र में बहुत अच्छा लगा और पिछले दिनों की मनहूसीयत दूर हो गई। आगे की राह के लिए कुछ रौशनी भी मिली। वापसी यात्रा शुरू हो गई है। परंतु यह सीधी यात्रा नहीं है। लौटते-लौटते बहुत से स्थानों और बहुत से लोगों से मिलना भी है।
झाबुआ जिला और विशेषकर आलीराजपुर तहसील के गांव और वहां रहने वाले लोग तो अद्भुत ही हैं। जैसी नैसर्गिक सुंदरता यहां की धरती की है वैसी ही यहां के निवासियों की प्रवृति भी। वीरता, साहस, लड़ाकूपन, परिश्रम, आत्मीयता, कला, संगीत सब में आगे हैं ये लोग। मेरा बस चलेतो इन्हीं के बीच रह जाऊं और कभी नगर की ओर न देंखूं। महेश जी के साथ पटरी बैठने का एक बहुत बड़ा कारण उनकी भी लगभग इसी तरह की सोच भी है। इनके बीच रहकर क्या किया जाए और क्या न किया जाए, इसे लेकर सोच और समझ में अंतर है। देखता हूं कि यह खाई भर पाती है या और चौड़ी होती जाती है?
क्रमशः…
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