एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-29

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
24 दिसंबर 2007
चक्की में खाना, चक्की में सोना, चक्की में संगीत का कार्यक्रम कुल मिलाकर अच्छा अनुभव रहा। नींद तो आ ही गई, हाँ ठंड बिल्कुल नहीं लगी। रात भर कोई-न-कोई आता रहता है-किसी को मशीन सुधारने के लिए औजार चाहिए तो किसी को हवा भरने के लिए पम्प, तो किसी को गुटका। मदन हर मर्ज की दवा है। एक फलिया में उसका घर है और दूसरे फलिया में ससुराल। घरजमाई है। पत्नी और ससुराल से ज्यादा नहीं पटती। बीवी-बच्चे घर में रहते हैं, मदन तो पूरे समय चक्की में ही रहता है। 8-9 महीने से यह चक्की गाँव का केन्द्र बन गई है। सब अपना सामान भी यहीं रख जाते हैं।
समझ में आ रहा है कि यहाँ काम के लिए एक स्थानीय सहायक पूरे समय साथ होना अनिवार्य है। थोडा शिक्षित, समाज के लिए सोचने वाला युवा आदिवासी जो सभी कुछ करे। उसके बिना मुश्किल होगा। यह तो है कि अपनी सारी व्यवस्था भी बनाए बिना काम शुरू नहीं हो सकता क्योंकि धार्मिक कार्य और इस तरह के कार्य में बड़ा अंतर है।
मदन ने कहा कि नारायण के घर चलकर नहा लो और चाय पी लो। नारायण का घर पास ही है, रोड से लगा हुआ। नहाने के लिए गरम पानी किया और फिर चाय पिलाई। नारायण के दादा ने अपनी अंधी पत्नी को दातून बनाकर दी और धीरे से बताया कि बाबा भोपाल से आया है, बड़ी दूर से, यहाँ बड़ा काम करेगा। मैंने सुना और समझ लिया। बूढा मुझे देखकर झेंप गया। बुड्डा-बुड्डी में बहुत प्रेम है-दोनों धूप में बैठे बतिया रहे हैं। बड़ा अच्छा परिवार है। नारायण का पिता भी बहुत प्रेमी व्यक्ति है। वह वैल सिंह के पिता का चचेरा भाई है। यहां आदिवासियों के नाम काफी अलग से होते हैं। नामकरण यहां बड़ा संस्कार है। बच्चे के जन्म के एक माह बाद, जिसे कामरिया कहते हैं, घर के देहरी पर हाथी या शीतला माता की स्तुति के बाद नाम रखते हैं। यहां अक्सर दोपण (नर्स) नाम रख देती है। नाम के कई आधार होते है जैसे सोमवार को पैदा बालक सोमा,सोम्या व बालिका सोमली,सुरली आदि। मंगलवार को हुआ बालक मंगल, मंगलू, बालिका मंगली, मंगती। बुधवार बुधा-बुधी, गुरुवार-गुमान-गुली शुक्रवार-शुक्या, सुकला-सुकली-सुरती शनिवार-सालक-सालु-शनी-शान्य रविवार-दिव्या, रतन-रुजन-रुमला लड़की रुमली, रतनी-रतिया। श्रावण में हुआ लड़का भादरू, भोल्य अकाल में पैदा हुआ अकालू, बरसात में बेसाती,बोरला आदि। काफी रोचक नामकरण होता है। वैल सिंह भी पहले यहीं पास रहते थे, अब खेतों के पास सड़क के दूसरी और घर बना लिए हैं। महुआ फलिया या खुदरा फलिया। बातचीत में पता चला कि यहाँ बोनी के समय जेवर गिरवी रखकर बीज व्यवसायियों से लेते हैं, और चार महीने बाद दुगना अनाज देकर अपने जेवर छुडाते हैं। यह लूटपाट सरेआम, बरसों से चल रही है, कोई बोलने वाला नहीं है।
थोड़ी देर नारायण के यहां बैठकर वापस चक्की पर आ गए। मदन से मैंने कहा “आज तो कनवाडा जाना है और हो सका तो रात वहीँ रुकना चाहूंगा, नहीं तो चक्की तो है ही। और कल सुबह धार निकल जाऊंगा।”
मदन ने पूछा “जोबट नहीं जाओगे?”
मैंने कहा “नहीं, वहाँ जाकर क्या करना है। यहीं से बस में बैठ जाउँगा।”
धूप में खटिया डालकर बैठ गया। वैल सिंह आज स्कूल चला गया, पहले ट्यूशन के लिए जाता है। मदन सिंह भी थोड़ी देर लापता रहे, फिर साथ में एक कचोड़ी, आलूबड़ा और चिप्स लेकर प्रकट हुए। बताया बाजार (जोबट) चले गए थे और मेरे लिए नाश्ता ले आए। कुछ और सामान भी लाना था। मदन ने कहा कि पास में कोसदूना गाँव है, वहाँ जा सकते हैं। मैंने कहा वहां तो जाउँगा, लेकिन कनवाडा भी हर हालत में जाउँगा, लेकिन कनवाडा करीब 7-8 किलो मीटर है। मदन ने कहा मोटरसाइकिल नहीं है। मैंने कहा बस से चलेंगे! तलाश जारी है!
जब कोई “ब्राह्मण” लड़की मिलेगी तो ही शादी करुंगा
थोड़ी देर में जोबट तरफ से साइकल पर एक युवक आया। मदन ने कहा यह पास के गाँव कोसदूना का है, आपको अपने गाँव ले जाना चाहता है। मैं उसके साथ पैदल निकल गया। उन्हें समझाया कि यदि कोई जोबट से मोटरसाइकिल पर आए तो रोकना, मैं कनवाड़ा जाउँगा। करीब डेढ़-दो किलो मीटर है। कोसदूना में हिम्मतजी का फलिया। रास्ते में बाते करते गए। उसका एक बड़ा भाई भगत हो गया है, शिवजी के पूजा-पाठ में लगा रहता है। शादी भी नहीं की है। कहता है जब कोई “ब्राह्मण” लड़की मिलेगी तो ही शादी करुंगा। मैंने पूछा ब्राह्मण? तो बोला हाँ ब्राह्मण मतलब उसके जैसे ही भगत। अच्छा, यानी ये भगत लोग अब अपने आपको भील समाज के ब्राह्मण बना चुके हैं। हिंदू समाज की विकृतियाँ, छुआछुत अब भीलों में भी इन भगतों के माध्यम से घुस गई है। ये वैष्णव उच्चजाति के हैं और बाकी सब निम्नजाति के शूद्र। यह नए पतन की शुरुआत ही तो है। कमोबेश जाति व वर्णहीन समाज में जातियां ‘जन्म’ ले रहीं हैं।
हिम्मत जी के घर तक के रास्ते में ज्यादातर खेत सूखे पड़े हैं। यहाँ पानी की बेहद कमी है। जहाँ-जहाँ कुएँ या नदी-नाले का पानी है, वहीं फसल दिखती है। इस मौसम की फसल लेना संभव नहीं होता और सब कमाने के लिए मजदूरी करने बाहर चले जाते हैं। अधिकतर गुजरात जाते हैं। यहां काफी सूखा दिखाई दे रहा है। हिम्मत अपने खेत पर ले गया। वहाँ एक बड़ा सा पक्का चबूतरा बनाकर शिवलिंग स्थापित किया है और वहीं खेत में कुएँ की खुदाई चल रही है। भगत जी खुदाई में लगे हैं। हमें देखकर भगत जी आ गए। शिवजी के साथ अपने अनुभव और वार्तालाप बताते रहे। एक सफ़ेद चूहे की महिमा का बखान किया जो सिर्फ उन्हें ही दिखता था, वहां एक पीपल जो अपने आप उग आया। वैसे अधिकांश स्थानों पर पीपल अपने आप ही ऊग आता है। कांक्रीट के मकानों में पड़ी दरारों में भी।
थोड़ी देर वहाँ बैठकर उनके घर चले। हिम्मत खुदाई में लग गया। घर में बूढी माँ है। वहाँ भी एक छोटा सा शिवलिंग स्थापित कर रखा है। बताया कि यह खेत में मिला था। इनका एक बड़ा भाई और है जो बाघ के पास रहता है। यहाँ जमीन कम है इसलिए इन लोगों ने यहाँ से करीब 35-40 कि.मी. दूर धार जिले में बाघ के पास कुछ जमीन ली है। बाघ को बौध्द गुफाओं और कपड़ों पर कलात्मक पारंपरिक छपाई के लिए जाना जाता है। हाल ही में यहां डायनासोरों के घोंसले बड़े पैमाने पर मिले हैं। वहाँ भी सिंचाई की उचित व्यवस्था नहीं है। मदन ने भी बतया था कि उसका एक भाई दमोह जिले में रहता है, वहाँ पिताजी ने एक गाँव में जमीन ली थी। पिता बीच-बीच में वहाँ जाते रहते हैं। पता नहीं इतनी दूर दमोह जिला कहाँ पहुँच गए? यहाँ झाबुआ में तो जमीन मिलती ही नहीं तो कम पड़ने पर और पैसे इकट्ठे होने पर लोग बाहर जाकर ही जमीन खरीदते हैं और कोई धंधा तो कर नहीं पातें। मदन, हिम्मत सब भिलाला हैं।
भगत ने कहा कल हिम्मत ने बताया था कि आप भोपाल से आए हैं और एक दिन हमारे यहाँ भी रुकेंगे।
मैंने कहा-अच्छा, कल बताया था?
पूछने लगा आप धर्म का ही काम करते रहे हैं या कोई दूसरा काम।
मैंने कहा धर्म का काम मैं नहीं करता और बहुत लोग करते हैं। मैं वो करना चाहता हूँ, जो कोई नहीं करता-कानून का काम।
कहने लगा- हाँ, इसकी भी तो बहुत जरुरत है आदिवासियों को, सब लोग लूटते तंग करते हैं-पुलिस, पटवारी सभी।
मैंने कहा अपन मिल-जुलकर कुछ जरुर करेंगे। इसके बाद मैं वापस चल दिया। भगत जी को भी काम पर जाना था।
चक्की पर आकर रुके तो मदन मेरा सामान निकालकर बाहर ले आया और कहने लगा अब जोबट निकल जाओ, वहीं से सुबह बस पकड़ना ठीक रहेगा। यहाँ सोने, खाने-पीने में आपको परेशानी होगी।
मैंने कहना चाहा कि मुझे कोई परेशानी नहीं है, लेकिन मौका ही नहीं दिया। कहने लगा पांडे जी ने कहा है जोबट भेज दो, वहाँ आराम कर लेंगे, तबियत भी ठीक नहीं है।
मैंने कहा ठीक हैं भाई, अब जब सबने तय कर लिया है कि गाँव में नहीं रुकना है तो चलता हूँ। हो सका तो फिर कभी मिलेंगे। मुझे तो अच्छा लगा।
इस अनुभव से यह अच्छी तरह से समझ आ गया-समझा हुआ तो था ही और पक्का हो गया-कि धर्म का नाम लेकर काम करने और धर्म का नाम लिए बिना काम करने में बड़ा अंतर है और यह काम बहुत ज्यादा कठिन है। इस समाज में अपने को स्वीकार योग्य साबित कर पाना टेढ़ी खीर है। भारत में अब तक जिसने भी काम किया है, धर्म का नाम लेकर ही किया है-चाहे वह महात्मा गांधी हों या समाजवादी मामा बालेश्वर दयाल। धर्म का नाम लिए बिना जो काम करता है वह नक्सलवादी कहलाता है! देखते हैं, अपनी नियति में क्या लिखा है।
25 दिसंबर 2007
आज क्रिसमस है। यहाँ काफी बड़ी चर्च और मिशन अस्पताल हैं। रात भर जश्न चलता रहा, आसपास के गाँवों के आदिवासी ईसाई नहीं बने हैं। अभी तक यहाँ के किसी भी गाँव में किसी ईसाई या मुस्लिम का होना जानकारी में नहीं आया है। वैसे जोबट कस्बे में मुस्लिम भी बड़ी संख्या में हैं और काफी प्रभावशाली भी हैं। राज के जमाने से ही यहां रह रहे हैं। सुबह जल्दी उठकर तैयार हो गया। पांडे ने बताया था कि 7:30 बजे इंदौर के लिए अच्छी बस जाती है। सात से पहले ही बसस्टैण्ड के लिए निकल गए।
रास्ते में बेटवासा देखते हुए निकले। मदन का चक्की का दरवाजा अच्छे से बंद है। इसका मतलब तान के सो रहा होगा। मेरी वजह से जल्दी उठना पड़ता होगा। पाण्डे के यहाँ सुबह से छह बजे से टीवी पर फिल्म चालू हो जाती है और जितनी देर बिजली रहती है, बस फिल्म चलती रहती है। सबका अपनी-अपनी व्यक्तिगत जिंदगी जीने का तरीका है। बाहरी आदमी से विघ्न तो पड़ता ही है। गाँवों में और किसी के बिना अकेले रहने का अनुभव बड़ा जबर्दस्त रहा। भविष्य में शायद काफी काम आए।
31 दिसंबर 2007
आज साल 2007 का आखिरी दिन है। और दिनों की तरह ही एक दिन, लेकिन फिर भी साल का आखिरी दिन अपना एक महत्व रखता ही है। बड़ा विकट था 2007! मेरे तो जीवन की धारा ही मुड़ गई, एक निर्णायक मोड़ आ गया। जो मेरी पहचान बन गई थी-जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे यानी वकालत, वह छूट गई। आज ऑफिस में ताला लगकर नाम पट्टिका हट जाएगी वहाँ से। सन् 1979 की जनवरी में जिस तरह से भोपाल रेलवे स्टेशन पर लगभग खाली हाथ उतरकर भोपाल में कदम रखा था, वैसे ही कल सन् 2008 की जनवरी में दोबारा भोपाल पहुंचूँगा। उस बार भोपाल को अपनाने के लिए और इस बार भोपाल से टूटा हुआ रिश्ता दोबारा नए रूप में जोड़ने के लिए। तब स्थाई निवास की दृष्टि से और अब केवल अस्थाई प्रवास की इच्छा से भोपाल जा रहा हूँ। कितना कुछ हो गया, कितना कुछ बदल गया और बीत गया इन सालों में! लेकिन पिछले छह महीने में जितना मैं बदल गया उतना शायद उतने सालों में भी नहीं बदला था। एक पूरा जीवन जीकर, भोगकर, सुख-दुःख सबसे निकलकर आज उस स्थिति में काफी हद तक पहुँच चुका हूँ जहां आकांक्षाएँ और अपेक्षाएँ लगभग समाप्त हो चुकी हैं। काम, क्रोध, मद, लोभ पर काफी हद तक नियंत्रण पा चुका हूँ। दंभ, द्वेष, मान और मोह बहुत हद तक त्याग चुका हूँ। मुझसे जुड़े हुए लोगों की भी मुझसे अपेक्षाएँ लगभग समाप्त हो चुकी होंगी। जैसे एक विचित्र अनुभव मेरी प्रतीक्षा कर रहा है !
कुछ न होकर कुछ हो पाना तो एक लंबी, अनवरत, संघर्षपूर्ण यात्रा है ही, जिसमें बहुत कम लोग मंजिल तक पहुँच पाते हैं; लेकिन ‘कुछ होकर’ फिर ‘कुछ न होना’ उससे भी दुष्कर, दुरूह और लगभग असंभव सा सफर है जिसे विरले ही पूरा कर पाते हैं। बहुत ही कठिन है यह राह- खुद को भुला देना, अपनी हस्ती को मिटा देना, अपने अहम को दरकिनार कर देना और अपने अतीत को अलविदा कह देना। एक ‘पहचानरहित’ व्यक्ति बन पाना और समाज का उसे उस रूप मे स्वीकार कर पाना- दोनों ही आसान नहीं है। अतीत और वर्तमान का यह द्वंद निरंतर है जिसमें अतीत हमेशा वर्तमान पर हावी होने और भविष्य की दिशा निर्धारित करने में लगा रहता है। बहुत ही सचेतन रूप मे ही इस द्वंद को सुलझाते हुए भविष्य की ओर अग्रसर हुआ जा सकता है। अतीत जहां एक ओर ज्ञान है, आत्मविश्वास है, अनुभव है; वहीं दूसरी और अवरोध, कंटक और अवलंबता भी है। इस विरोधाभास को समझ सकना और समझकर उससे गुजर पाना ही बहुत बड़ी चुनौती है- अतीत से वर्तमान का सामंजस्य; पूरी तरह से antagonistic को non-antagonistic contradiction (प्रतिपक्षी को गैर प्रतिपक्षी विरोधामास) बना पाना ही व्यक्ति की परख है!
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है

