एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
आठ जुलाई
जल्दी उठकर नदी गया। वहां नहा रहे आदिवासियों से परिचय हुआ। उनसे आसपास के भूगोल की जानकारी ली। पता चला कि यहां भील जनजाति के लोग रहते हैं। अधिकतर किसान मीणा हैं, जो देशवाली कहलाते हैं। साहू भी बहुत हैं। बड़े गांवों में कुछ ब्राह्मण व बनिया लोग भी हैं। मंदिरों में बैरागी लोग पूजा का काम करते हैं और पहाड़ों पर कोरकू जनजाति के लोग रहते हैं। कोरकू मैदानों में नहीं रहते। खेती के साथ पशुपालन पर जोर है। कपास और सोयाबीन की फसल होती है। तो यह यहां का भौगोलिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और कृषि आधारित आर्थिक ढांचा है। आज इतवार है। बारिश भी रूकी हुई है। शाहगंज फोन करना है। और चिट्ठी भी डालना है। पुजारी ने बताया लोहारदा बड़ी बस्ती है। चार-पांच किलोमीटर की दूरी पर। वहां जाना ठीक रहेगा। छाता ले जाने को कहा। एक बजे लोहारदा पहुंच कर चिट्ठी डाली। सामने पीसीओ दिखा। एक छोटी सी किराने की दुकान में स्त्री बैठी थी, परंतु लड़का फोन चालू करने आया। बड़ी देर में फोन लगा। पहले शून्य से लगाया तो लड़के ने टोका जबरन में आठ रुपए लग जाएंगे। पच्चानवे से तीन रुपए में काम चल जाएगा। लड़के ने पूरे पांच रुपए की बचत करवा दी। उसका कमीशन भी मारा गया होगा।
पता लगा शाहगंज में भी बहुत बारिश हो रही है। बाबा से बात नहीं हो पाई। इन्दौर रोड पर चाय की दुकान पर चाय पी और अखबार पढ़ता रहा। न जाने कितने दिन हो गए हैं, अखबार पढ़े। सड़क पार शेखर जी दिखाई पड़े, वे भी आए हुए थे। साथ चलने का बोले तो मैंने कहा पांच बजे तक जाऊंगा। पूछा, सियाचरण बाबा से बात हो गई? मैंने कहा नहीं। पांच बजे फिर उसी पीसीओ पर गया। बाबा से बात हुई। मैंने बताया स्थान तो अच्छा है, पर वातावरण दूषित है। शेखर बड़वाह जाने को कह रहे हैं। बाबा बोले, दो चार दिन तो रह लोगे? मैंने हामी भरी। बाबा बोले, एक हफ्ते के अंदर या तो स्वयं आएंगे या अड्डू को भेजेंगे। तब कहीं और चले जाना या शाहगंज लौट आना। मैंने कहा ठीक है। आज ही चिट्ठी भी डाली है शायद भोपाल से कोई शाहगंज आए। दिन भर का हिसाब लगाया चौदह रुपए फोन में, दो रुपए चाय में और एक रुपए की माचिस भंडारी के लिए ली। दक्षिणा के पैसे काम आ गए।
बैक्लया लौटने पर शेखर ने पूछा सियाचरण बाबा से बड़वाह के बारे में बात हुई क्या? मैंने कहा हां, वे कह रहे थे, शाहगंज आ जाओ। यहीं तय करेंगे। शेखर बोले “अरे अब यहीं रहो। अब तो ठीक लग रहा है, न? मुझे चार-पांच दिन का काम है। कल से रामायण पाठ का काम संभाल लो।”
मैंने कहा “ठीक है जब तक आपका काम है, यहीं रहूंगा।”
शेखर ने कहा अगले इतवार पंद्रह को उनकी तरफ से भंडारा है तब तक तो रूकना ही है। मैंने हामी भर दी।
अब मुझे अपना लिया गया है। मेरी ‘ड्यूटी’ तय हो गई। दोपहर तीन से छह और रात्रि में तीन बजे से सुबह छह बजे तक रामायण पाठ करना होगा। मुझे काफी प्रसन्नता हो रही थी कि एकदम विपरीत परिस्थिति में मैं अपने लिए स्थान बना पाया। साथ ही अपनी उपयोगिता सिद्ध कर पाया और सम्मान भी मिला। ऐसा लगा दो-तीन दिन में बहुत बड़ी सफलता हासिल कर ली है। सोच रहा था भारतीय ग्रामीण परिदृश्य में पढ़े-लिखे व्यक्तियों का सम्मान है। अब कल से ‘ड्यूटी’ करना है। बदले में शायद ‘पारिश्रमिक’ भी मिले। नई जिंदगी, नया रोजगार। वाह!
आज नौ जुलाई है। रोज की तरह दिनचर्या शुरू की परंतु बारिश बंद होते ही मच्छरों ने भयंकर आक्रमण कर दिया। मैं राणासांगा जैसा घायल हो चुका हूं। खुजाते-खुजाते पूरे शरीर पर निशान पड़ गए हैं। अधिकांश शरीर तो खुला ही रहता है। आज नदी में जहां स्नान करने आया वह ‘रामघाट’ कहलाता है। यहां केवल आश्रम के साधु ही स्नान को आते हैं। मुझे यह स्थान बताया तो नहीं गया था, पर मैंने खोज लिया। मैं भी साधुओं की श्रेणी में आ गया हूं। वैसे स्थान है बड़ा रमणीक। आरती के बाद छत साफ करवाई। अब पानी टपकना बंद हो गया है। आज कमेटी के अध्यक्ष चंदू सेठ के पिता की तेरहवीं है तो अधिकांश वहां गए हैं। शेखर वहीं से गांव चले जाएंगे। पुजारी भी थोड़ी बहुत रामायण पढ़ लेता है। भोजन के बाद विश्राम कर तीन बजे मैं पढ़ने बैठ गया। रामायण के पास एक मोटी फ्रेम वाला खूब पुराना चश्मा रखा रहता है। शेखर ने कहा था जिसको भी पढ़ने में तकलीफ होती है, लगा लेता है। मुझे हंसी आई थी कि ऐसा कैसे हो सकता है नंबर के हिसाब से चश्मा बनता है। पढ़ने बैठने पर लगाया तो लगा जैसे मेरे लिए ही बनाया गया है। कमाल है! रामायण पढ़ने में बड़ा मजा आता है। बस मच्छर बहुत तंग करते हैं। शाम छह बजे रामायण पढ़कर उठा और घूमने-नहाने निकल गया। लौटा तो देखा नेता आ गया है। और बुराई का दौर चल रहा है। मैं नौ बजे के बाद सो गया। ढ़ाई बजे किशन ने जगा दिया। रात या सुबह जो भी कहें, तीन बजे मैं पढ़ने बैठ गया।
दस जुलाई
छह बजे रामायण पाठ से उठकर घूमने व स्नान करके लौटा, चाय पी। आरती हुई। पता चला नेता नाराज हो रहा है कि चंडिकाप्रसाद बिना सूचना के गायब है, और भी ढ़ेर सारी चुगलियां। नौ बजे चंडी लौट आया पर नेता ने उसे पढ़ने से मना कर दिया। इसके बाद दोनों में विवाद शुरू हो गया। नेता ने चंड़ी को बाकायदा मां-बहन की गालियां दीं। कहा, चुपकर नहीं तो ठीक कर दूंगा। चंडी बुदबुदाता रहा और अंदर ओढ़कर सो गया। माहौल बोझिल हो गया। नेता की बात सही थी, पर आचरण गलत था। चंडी भले ही गलत हो पर उसके साथ ऐसा व्यवहार अपेक्षित नहीं था। मुझे लगा अब चंडी चला जाएगा। मगर शाम तक सब सामान्य हो गया और चंड़ी ने रात नौ से बारह बजे तक रामायण पाठ किया। मैं समझ गया कि चंडी की पढ़ने की जिद के पीछे सिर्फ आर्थिक कारण है। अगर उसने नहीं पढ़ा तो कट कर पैसे उसे मिलेंगे जिसने पढ़ा है। गौर करिए पढ़ने के बदले मिलता कितना है? महीने का छह सौ रुपए यानी बीस रुपए रोज। यानी तीन घंटे के मात्र दस रुपए। इसके अलावा सूखी रोटी, पानी वाली दाल या सब्जी और दो टाइम चायनुमां पेय और गालियां। इसके बावजूद पड़े हैं एक ऐसे बियाबान जंगल में जहां न बिजली है, न पानी, न बस्ती, न कोई बाजार और न कोई सड़क। कोई अपनी श्रद्धा या भक्ति भाव से पड़ा हो तो बात अलग है। ये रामायणी लोग यहां सिर्फ आजीविका के लिए ही हैं।
यही हाल पुजारी का है। उसे मात्र सात सौ रुपए महीना मिलता है। यह भारत में विद्यमान बेरोजगारी व शोषण का ज्वलंत उदाहरण है। मेरे सामने बेरोजगारी की पीड़ा और बेचारगी साक्षात आ खड़ी हुई। यहां शिक्षित लोगों को दैनिक वेतनभोगी श्रमिक से भी आधा मिलता है। वहीं शेखर सोच रहा है कि मैं यही काम पाने के लिए आया हूं। दिखाने की कोशिश कर रहा है कि जगह न होने के बावजूद वह मुझे रखने का प्रत्यन करेगा। क्या पता इसके लिए भी कमीशन की अपेक्षा रखता हो! पुराना पुजारी किशन लगातार नए पुजारी श्याम को निकलवाना चाहता है। सामने रिश्तेदारी और पीठ पीछे उसकी गलतियां बताता रहता है। श्याम भी आतंकित है। नौकरी छूटने का भय जो है। बीबी-बच्चे ससुराल में रह रहे हैं। ससुर ने किसी तरह नौकरी लगवाई है। नौकरी छूट गई तो क्या होगा?
इस छोटी सी जगह, छोटे से संस्थान ने जिस व्यापक समस्या की ओर मेरा ध्यान खींचा, वह वास्तव में गौर करने लायक है। कैसी असुरक्षा में हैं हमसब ! सोचता हूं अपनी पुरानी भूमिका को नये सिरे से सवारूं। अगर यहां रहा तो रामायणपाठियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत करूंगा। नौकरी तो नौकरी है, फिर वह पूजा करने की ही क्यों न हो? मुझे लगा शेखर सबसे धूर्त है, नेता के साथ मिलकर षड़यंत्र करता रहता है। पैसे बनाता है, सबका शोषण करता है। सोचिए बीस रुपए रोज की नौकरी में भी भ्रष्टाचार। यहां अब सब लोग मेरी बात ध्यान से सुनने लगे हैं। रामायण सिर्फ मैं ही ध्यान से पढ़ता हूं। मैं नौ बजे सो गया और सुबह तीन बजे फिर पढ़ने बैठ गया। याद नहीं पड़ता कि जीवन में कभी इस तरह की दिनचर्या का पालन किया हो। समझ में आ रहीं हैं नए जीवन की नई चुनौतियां।
आज मंगलवार है। सबको उम्मीद है कि आज बजरंगबली के भक्त आएंगे। पुजारी को तनख्वाह देने की जिम्मेदारी कांटाफोड के शराब ठेकेदार सरदार जी की है। है न मजेदार बात! हनुमान भक्त एक सिख और व्यवसाय शराब का। धर्म के नाम पर सब चलता ही है। सब उम्मीद लगाए हैं कि उन्हें आज आना ही चाहिए। मुझे बताया कि सरदार जी बजरंग बली के बड़े भक्त हैं, आज चोला चढ़ाएंगें। इसलिए सुबह से तैयारी चल रही है। दोनों पुजारी जुटे पड़े हैं। नेता भी आ गया है। यहां लोगों के नेता को लेकर दो मत हैं। नेता के शरीर पर कोढ़ (ल्युकेडर्मा) के दाग कहीं कहीं हो गए हैं। एक जवान बेटा मर गया है। उससे सहानुभूति रखने वालों का कहना है, ‘बेटे के मरने के बाद सांसारिक जीवन छोड़कर यहां भगवान के चरणों में पड़ा रहता है।‘ उसके विरोधियों का कहना है, ‘भगवान के साथ धोखाधड़ी की, भ्रष्टाचार किया, बाबा लोगों को अपमानिता किया। उसका फल मिला और जवान बेटा चला गया।‘ पर सोचने की बात यह है कि भगवान का निर्णय क्या इतना अदूरदर्शिता भरा हो सकता है कि अपराध पिता करें और दंड वह भी मृत्युदंड बेटे को मिले? बहरहाल, नेता जबान का बहुत कड़वा है, पर शेखर जैसा कुटिल तो नहीं है। व्यवस्था तो उसी से चलती है। नेता भी सरदार जी के स्वागत की तैयारी में लगा हुआ है। उसने फोन करके बताया कि आज कार नहीं आ पाएगी मोटरसाइकल से ही आएं। मैं भी खूब रस ले रहा हूं। परंतु शहर से किसी के आने की खबर आते ही चिंता सताने लगती है कि कोई पहचान का न निकल आए। वैसे इस इलाके में इसकी संभावना न के बराबर है। पर धुकधुकी तो बनी रहती है।
करीब दोपहर बारह बजे दो मोटरसाइकलें आकर रूकीं। बिल्कुल फिल्मी स्टाइल में एक मोटरसाइकल के पीछे से एक सरदार जी उतरे। उम्र होगी, यही कोई पैतीस साल, काला चश्मा लगाए। उनके उतरते ही बाकी तीन लोग तेजी से उनके आगे पीछे हो गए। उनके अंगरक्षक या बाउंसर जो भी आप कहना चाहें। अब सरदार जी ने मंदिर की तरफ बढते हुए जोर से हाँक लगाई “बलबीर”। मैंने वह हांक सुनी, पर ठीक से समझ नहीं पाया। तभी वे आगे बढ़े और मंदिर के अंदर पहुंच कर जोर से पुकारा “ओए बलबीर”! मत्था टेका और फिर कहा “बलबीर”। अब मेरी समझ में आया कि वे हनुमान को बलबीर पुकार रहे है। “ओए बलबीर”! सुना तो लगा जैसे हनुमान जी से उनका दोस्ताना हो। मेरे लिए यह नामकरण एकदम नया था। मैं हनुमान जी के बहुत से नाम जानता हूं। उनके नौ-दस नाम तो प्रचलन में हैं हीं। पर यह एकदम अनूठा था। लगा कि यह भारत में ही संभव है कि एक सिख न केवल हनुमान भक्त हो, बल्कि उन्हें अपने मनचाहे नाम से पुकारे भी।
मोटर साइकल आते ही मैं तो रसोई में घुसकर बैठ गया था। सरदार जी और उनके साथ आए लोगों ने परिक्रमा की। पुजारी को तनख्वाह दी और कहा सबको बुला लो। जितने भी लोग वहां थे, सब इकट्ठा हो गए। साधू और ब्राह्मणों के लिए आसन बिछा दिए गए। बाकी खड़े रहे। मुझे भी ब्राह्मणों में शामिल कर लिया गया। सरदार जी ने हमारे पास आकर सबको पचास-पचास रुपए दिए और चरणस्पर्श किए। सबने सरदार को मन से आर्शीवाद दिया। मैंने सोचा, वाह पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे। सोचा आज तो तगड़ी दक्षिणा मिली है। क्या करेंगे इसका? तभी तंद्रा टूटी क्योंकि सरदार जी ने फिर जोर से हॉक लगाई “बलबीर” और चल दिए। “बलबीर” का वह नाद मैं आज भी भूला नहीं हूं।
अगला दिन यानी बारह जुलाई शुरू हो गया। बारिश बंद हो गई और धूप निकलने लगी। घूमने में मजा आने लगा। उस शाम दूर तक घूमने चला आया। यहां की जंगली पगडंडिया तो भूलभुलैयां हैं। भंवरताल जैसी। भंवरलाल यानी बचपन। रह-रहकर लौट आता है। मन से निकलता ही नहीं। पैतृक घर! बचपन! सब अंदर स्थायी रचा बसा रहता है। कुछ भी अच्छा सामने आता हैं तो उसकी तुलना बचपन से होने लगती है। कुछ भी विशुद्ध, पवित्र या मनमोहक अनायास बचपन का पर्याय हो जाता है। भूलभुलैया यानी जहां से निकलो वहीं पहुंचो। कुछ वैसा ही हुआ, शाम के अंधेरे में। यहां कई छोटी-छोटी नदियां-नाले बहते हुए आपस में मिलते हैं। करीब दो-ढाई किलोमीटर जाकर एक बड़ी नदी में नहाया और अनायास एक दूसरी ही नदी का किनारा पकड़ लिया और चलता गया। काफी देर में समझ में आया कि गलत रास्ता पकड़ लिया है। वैसे हम कई बार भरी दोपहर भी गलत रास्ता पकड़ लेते है। हमेशा अंधेरे को दोष देना भी शायद ठीक नहीं। बहरहाल भटक तो गया ही था। सवाल यह था कि इस बियाबान जंगल में पूंछूं तो पूछूं किससे? अचानक दो आदिवासी दिखे। वे रात में मछली पकड़ने जा रहे थे। फिर कौंधा कि मैं अंधेरे में भटक गया हूं और ये! खैर उन्होंने इशारे से बता दिया कि मंदिर बहुत दूर है। मुझे ध्यान आया कि आरती होने वाली होगी। चुपचाप खड़ा हो गया। थोड़ी देर में घंटा नगाड़ा बजने की आवाज आई। उसी को पकड़कर चल पड़ा। नया और अनूठा दिशासूचक! एक किलोमीटर कीचड़ में लथपथ होने के बावजूद पहुच गया। आरती में शामिल भी हो गया। सोच रहा था कि क्या शोर भी सहायक हो गया? मंदिर की घंटी मुझे मुकाम तक ले आई। वैसे शोर और संगीत में फर्क है। जो कान में पड़ा वह तो संगीत ही था।
अभी यहां एक परिवर्तन आया है। नेता अब मुझसे सम्मानजनक ढंग से बात करने व सलाह-मशविरा भी करने लगा है। अब मुझे दत्त साहब पुकारता है। सियाचरण बाबा का घोर विरोधी है। उसका कहना है बाबा अच्छा तो है, मगर तामसी प्रवृत्ति का है। किसी की सुनता नहीं है। मनमानी करता है। यहां से कसम खाकर गया है कि अब नहीं आयेगा। हम उनके गुरु को ढूंढ लाएंगे। उन्होंने ही अखण्ड रामायण शुरू की थी। चंडीप्रसाद भी गाली पड़ने के बाद मुझसे काफी बातें करना लगा है और ज्ञान देने के बजाए ज्ञान पाने की अपेक्षा रखने लगा है। दिनेश गंजेड़ी भी समझ गया है, कि मैं उसकी रोजी रोटी छीनने नहीं आया हूं। भंडारी बाबा का कहना है कि अब बरसात भर यहीं रहो। आप रहोगे तो मैं भी यहां रहूंगा वरना गुरुपूर्णिमा के पहले कहीं चला जाऊंगा। कुल मिलाकर सबकुछ मेरे अनुकूल होता जा रहा है, थोड़ा डर भी लगने लगा है, इससे।
तेरह जुलाई
कोरकू बाबा बैठकर किस्से कहानियां सुनाता रहता है। अच्छी बात करता है। आपसी लड़ाई झगड़े भी कम हो गए हैं। शेखर लौट आए हैं। आकर अच्छे से मिले। मैंने बड़वाह के आश्रम के बारे में पूछा तो बोले जा नहीं पाया। फिर कहा बरसात भर यहीं रहो। कहीं जाने की जरूरत नहीं है। उसके बाद देखेगे। पंद्रह यानी दो दिन बाद शेखर का भंडारा है। उसे लेकर बात होती रहीं। शेखर के अनुसार कुछ अधिकारी और एमएलए आ सकते हैं। एमएलए, दीपक जोशी! पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी का बेटा। अरे! मुझे पहचानता होगा! सोचकर घबराया। सोचा देखेंगे, कुछ न हुआ तो बीमार पड़ जाऊंगा। सोच रहा था कि भंडारा करके सोलह की सुबह शाहगंज लौट जाऊंगा। शेखर ने शुरू में ही कहा था कि जाते समय पचास रुपए दे देंगे। पचास रुपए सरदार ने दिए हैं। इतने में तो पहुंच ही जाऊंगा। मन में आ रहा था कि वर्तमान परिस्थिति में यह मेरी दीनता है या समाज पर निर्भरता का सकारात्मक प्रतिफल। न्यूनतम से कम पर गुजारा करना मेरी विवशता भी नहीं थी, पंरतु यह अनुभव मुझे भारत के आमजन की विवशता भरी परिस्थिति का भान करा रहा था। हर हाल में यह एक दुःखद अनुभव तो था ही।
शाम के पांच बजे होंगे। एकाएक दो मोटरसाइकलें आकर रूकीं और उसमें से चार लोग उतरे। तिवारी और मुकेश ने आकर मेरे पैर छुए। तिवारी दफ्तर में मेरा सहायक है और मुकेश ड्राईवर है। मैं रामायण पढ़ता रहा पर मन में आया कि ये लोग अचानक यहां कैसे आ धमके? अड्डू या बाबा ने पता बता दिया? पैसे पाकर फिसल गए? मुझे याद आया कि मैंने दफ्तर के लोगों से मंदिर की आर्थिक मदद करने को कहा था। शायद पानी की मोटर लगाने के लिए। बहुत नीचे से पानी लाना पड़ता है। वहां दफ्तर के लोगों को पता चला होगा कि ‘अज्ञातवास’ के दौरान अड्डू ने मेरी काफी मदद की है तो शायद उसे अलग से कुछ कर दिया होगा। खैर। किसी ने देखा कि सब मुझसे मिलने आए हैं, तो आकर धीमे से मेरी जगह ले ली। मैं उठ गया और सामने चबूतरे पर बैठ गया। मैंने अड्डू को थोड़ा झिड़का। वह कहने लगा कि क्या करें ये लोग पीछे ही पड़ गए और रोने लगे, इसलिए साथ लाना पड़ा। मैंने कहा, मैं तो आ ही रहा था किसी को आने की क्या जरूरत थी? अब तो आ ही गए थे। मैंने सबके हाल-चाल पूछे। अड्डू रूक गया, बाकी के दोनों चले गए। देर रात में शाहगंज पहुंचेंगे। मैं सोच रहा था कि सिर्फ मुझसे मिलने इतनी दूर तक आए। कहीं अंदर अच्छा भी लगा।
मैं नहाने गया और बाद में अड्डू। इनके साथ एक बाबा भी शाहगंज से आए हैं। यहां का रास्ता दिखाने। सियाचरण बाबा के गुरू भाई हैं। नाम है बाबा हंसदास। पैंतीस चालीस साल का हट्टा कट्टा बुंदेलखंडी साधु। मुझे तो लंपट सा लगा। पहले भी यहां रह चुका है, अब शाहगंज के आगे बम्होरी के किसी आश्रम में है। यहां के पुराने लोग उसे पहचानते हैं। एक तखत पर अपना आसन जमा कर बोला गुरु महाराज का स्थान है, सबको ठीक कर दूंगा। आरती भी उसी ने कराई। इस दुनिया में बाबा लोगों का बड़ा रूतबा है। आते ही सब पर अधिकार। एक पुराना भक्त पैर दबाने लगा। इनके आने से माहौल बदल सा गया है। भोजन के बाद शेखर ने बाबा के पैर छुए और कल भंडारे में रूकने का आग्रह किया। बाबा ने उनसे कहा सुबह निकलना जरूरी है। और दूसरी ओर मुझसे कहा कि यहां गुरु का अपमान हुआ है, इसलिए भंडारे में नहीं रूकुंगा। मैंने कहा कि मैंने तो शेखर जी को भंडारे में रूकने का कहा है इसलिए परसों ही निकलूंगा।
अगले दिन यानी पंद्रह जुलाई को एक बेहद जटिल परिस्थिति मेरे सामने आई। जो कुछ हुआ वह सर्वथा अकल्पनीय ही था। मैं रात तीन बजे पाठ करने बैठा और सुबह छह बजे उठ गया।
नहा के लौटा तो देखा कि हंसदास बाबा और अड्डू जाने को तैयार हैं। बाकी लोगों ने बाबा से रूकने का आग्रह किया, पर बाबा अड़ा रहा। इसके बाद का घटनाक्रम वास्तव में दु:खी करने वाला था। बाबा बोला यहां मेरी लड्डू गोपाल की मूर्ति, घंटी और गिलास सब मंदिर में रखे हैं। मैंने ढाई हजार रुपए में मूर्ति उज्जैन से खरीदी थी, अब मैं उसे ले जाऊंगा। नेता ने कहा मूर्ति प्रतिष्ठित है, फिर भी जैसी आपकी मर्जी। बाबा ने नेता से एक कोरा कपड़ा मांगा और मूर्ति उसमें रख ली। वह यही नहीं रूका बोला घंटी, आरती, सब उसके हैं। अब तक शेखर जी भी आ गए थे। नेता और उनके बीच कुछ खुसुर-पुसुर हुई और बाबा से कहा कि छोटी आरती तो मत ले जाओ। ले जाओगे तो पूजा कैसे होगी? बाबा ने गिलास उठाकर रख लिया। इतना सब हो जाने के बाद भी शेखर ने विदाई के पचास रुपए दिए। बाबा ने रुपए भी रख लिए। पूरा वातावरण विषाक्त हो गया था। सब लोग जैसे स्तब्ध थे। मैंने तो उसे जाते हुए नमस्कार भी नहीं किया। बड़ा खराब लग रहा था और महसूस हो रहा था कि जैसे किसी ने मेरी आंखों के सामने डाका डाल दिया हो। साथ ही यह भी समझ में आया कि ये लोग बाबाओं से कितना डरते हैं।
बाबा के जाने के बाद सबने गालियां देना शुरू की। सबके गुस्से का केंद्र बिंदु मैं ही था। ये लोग कहने लगे, तुमसे ही मिलने आया था, तुम्हारे सियाचरण बाबा ने भेजा था। सब योजना पहले से ही बनी हुई थी। मैं तो जैसे दुश्मनों के बीच घिर गया। इतने दिनों में जो सद्भावना और अपनापन मैंने अर्जित किया था, वह सब एक ऐसे साधु ने एक क्षण में छिन्न-भिन्न कर दिया जिससे मैं सर्वथा अपरिचित था। मैंने भी हंसदास बाबा के कृत्य की खूब निंदा की और कहा कि उसे मूर्ति ले जाने का कोई अधिकार ही नहीं था। पर कोई मेरी बात मानने को तैयार नहीं था। मैंने फिर कहा आप लोगों ने मूर्ति ले ही जाने क्यों दी? नेता ने जवाब दिया “अरे हम चाहते तो जबरदस्ती छुड़ा लेते, लेकिन साधुओं से कौन लड़े।” शेखर ने कहा, इससे लड़ते तो सारे साधु इकट्ठा हो जाते। मेरे सामने अब साधुओं का आतंक और उनका अधार्मिक आचरण दोनों ही थे। समझ में आया कि इनका बड़ा संगठन है। बात खत्म करते हुए मैंने कहा “इन बाबाओं की अच्छी दादागिरी है। कहीं भी घुस जाएं और कुछ भी ले जाएं!”
परंतु इन बातों का अनुकूल प्रभाव नहीं पड़ पा रहा था। अधिकांश ने मुझसे पहले जैसी बात करना बंद कर दी थी। चर्चा का यही विषय रह गया था। मुझे महसूस हुआ कि मेरा यहां से पहले चला जाना ही ठीक रहता। इन लोगों ने आकर सब गड़बड़ी कर दी। इसी दौरान एक और गड़बड़ हो गई। मुझे लगा कि मैं अब यहां आखिरी बार रामायण पढ़ रहा हूं तो अनजाने ही बालकांड पढ़कर सीधे लंकाकांड पर आ गया। इसकी एक वजह यह थी कि मैं जो पढ़ना चाहता था, वह अभी तक पढ़ नहीं पाया था। सुबह पढ़ने वाले ने यह चूक पकड़ ली और शेखर को बताया। मुझे मालूम ही नहीं था कि यह अनुचित है। आपस की खुसुर-पुसुर मेरे कान में पड़ी। मैंने पूछा और जानने पर कहा कि मुझसे अज्ञानतावश भूल हुई है, जानबूझकर नहीं। बात खत्म हो गई। दिन भर भंडारा चला। दो-ढ़ाई सौ लोगों ने भोजन खाया होगा। साधुओं और ब्राह्मणों की पंगत जिसमें मैं भी शामिल था, सबसे पहले बैठी। शेखर ने दस रुपए दक्षिणा भी दी।
अजीब सी पसोपेश में पड़ गया हूं। दोपहर में कमेटी का सचिव महेश सेठ भी आया। कहने लगा आप जैसे पढ़े लिखे लोगों की यहां आवश्यकता है। कम से कम बरसात तक तो रुकिये। मैंने कहा अभी तो कल निकल जाऊंगा, बाद में फिर कभी आऊंगा। उसने फोन नंबर देते हुए कहा कि अबकी बार आएं तो दो-चार महीने रूकें।
रोज की तरह उस दिन भी तीन से छह बजे तक रामायण पाठ किया। स्नान के बाद शेखर से कहा कल सुबह निकल जाऊंगा। बोला ठीक है। यहां तो अभी जगह नहीं है। रखना भी मुश्किल है, कमेटी वाले तैयार नहीं होंगे। जाहिर है हंसदास वाली घटना के बाद से उसका रूख बदल गया है। सचिव वाली बात मैंने उसे नहीं बताई। हंसदास की भूल और अवांछित हरकत से मुझे ग्लानि व अपराध बोध हो रहा है। शेखर से मैंने फिर कहा सुबह का रामायण पाठ करके चला जाऊंगा, उसने कहा, बड़ी अच्छी बात है। मैंने कहा आप लोगों का साथ बहुत अच्छा रहा। शेखर ने कहा सुबह मिल कर जाना। वह ज्यादा बात किए बिना चला गया।
जारी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता

