एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-26

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
17 दिसंबर 2007
आज के दिन का मेरे जीवन में बड़ा महत्व है। आज 17 दिसंबर 2007 से ठीक बीस साल पहले इसी दिन अचानक मैं एक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया था और उसके बाद से आज तक वही छवि किसी न किसी रूप में मुझसे जुडी हुई रही है। आज से ही इसके साथ ही मेरे पारिवारिक जीवन में एक नया मोड़ आया था और एक व्यक्तिगत त्रासदी के बीज अंकुरित हुए थे। एक ओर समाज में, व्यवसाय में, निरंतर प्रतिष्ठा बढ़नी और ऊपर उठनी शुरू हुई तो साथ ही साथ दूसरी ओर अपने छोटे से परिवार में नीचे खींचना और अपनी जीवनसंगिनी से अलगाव होना भी शुरू हुआ। शायद ऐसा लगने लगा कि अचानक ही मेरा इतना विशाल रूप हो गया कि घर की सीमा में रह पाना मुश्किल हो गया। यह विशालता, प्रतिष्ठा, सम्मान यदि था तो मेरे अकेले का नहीं बल्कि हमारे घर का था, यह शायद समझ में नहीं आ पाया या अपनी कमजोरियों की वजह से मैं महसूस नहीं करा पाया। इसके बाद से तो अनवरत परस्पर घात-प्रतिघात, संदेह, अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा, कुण्ठा और अवसाद की लंबी दास्तान चलती रही। बहरहाल…।
18 दिसंबर 2007
आज नए जीवन की शुरुआत हो सकती है। 17 दिसंबर 1987 से 17 दिसंबर 2007 तक का बीस साल का अध्याय पूरी तरह से समाप्त हो गया। एक नई पहल, नई शुरुआत करने की कामना और मानसिक तैयारी करके आज निकल रहा हूँ। क्या हो पाता है? यह तो भविष्य ही बताएगा। यह संभव हो पाया तो जीवन में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होगा।
महेश जी कल तो आ नहीं पाए। आज सुबह इंदौर से निकले और उसी बस पर मैं धार से बैठ गया। लगभग डेढ़ महीने बाद झाबुआ की ओर जा रहा हूँ। इतना अंतराल स्वयं की इच्छाशक्ति और लगन की परख के लिए और जिन्हें साथ में काम करना है, उनके दृष्टिकोण में भी स्पष्टता के लिए जरुरी था। इस स्तर पर जितनी स्पष्टता संभव है, वह हो गई है। अब समय के साथ धीरे-धीरे काम की प्रकृति और कार्यविधि में स्पष्टता आएगी। अभी तो महेश जी बहुत प्रसन्न हैं।
दोपहर में मेघनगर पहुँचे। डेढ़ महीने बाद। इस बीच महेश जी ने इस उजाड़ स्थान को बगीचा बना लिया है। वह मेहनत और लगन में तो बहुत आगे हैं। अभी काम चल रहा है। लगता है कि आजकल शिवगंगा की आर्थिक स्थिति काफी अच्छी है। शायद संघ से दूरियां भी कम हो रही हैं। दो पुराने निष्कासित वैभव जी और अनिल जी अब खुलकर शिवगंगा के लिए काम करेंगे।
जोबट: नई पहल 20 दिसंबर 2007
सुबह रोज की तरह ही जल्दी उठ गया। महेश जी भी उठ चुके थे। स्वभावत: महेश जी ने अचानक कहा कि अभी जोबट निकल चलते हैं; उन्हें शाम को लौटना है। डेरा-डंडी समेटकर बस स्टैंड चल पड़े। वहीं चाय पी। मेघनगर से जोबट 70 किलो मीटर के करीब है। 9 बजे करीब वहां पहुँच गए। जोबट अच्छी-खासी बड़ी जगह है। यहाँ नगर पंचायत, तहसील, सिविल कोर्ट और कॉलेज सभी कुछ है। इंटररनेट-फैक्स की सुविधा भी उपलब्ध है। झाबुआ जिले में काम करने के लिए यह उचित जगह है- लगभग बीचोंबीच। झाबुआ यहां से 50 और आलीराजपुर 40 किलो मीटर है, कुक्षी भी 35-40 किलो मीटर है। यह झाबुआ के बजाय आलीराजपुर के सांस्कृतिक और भौगोलिक रूप से ज्यादा करीब है। वैसे तो यहाँ मैं पहली बार ही आया हूँ। इस क्षेत्र में एकता परिषद् का काफी काम है। शिवगंगा के लोग इन्हें ‘नक्सलवादी’ कहते हैं। थोड़ी देर में महेश जी वापस चले गए। मैं उनके एक परिचित युवा भूरू के साथ हो लिया।
इंदौर रोड पर ही नदी पार करके थाने के बाद प्रधानमंत्री ग्राम सड़क कदवाल जाती है। उस पर करीब ढाई-तीन किलो मीटर दूर देहदला गाँव है। यहीं भूरु का घर है-दावरिया फलिया। छोटा-सा घर है जिसके आसपास छोटे-छोटे खेत हैं। भूरु के पिता सरदार सिंह चोहान और उनके दो छोटे भाई हैं। सबके घर एक-दूसरे से लगे हुए हैं। भाइयों में प्रेम दिखता है। सभी छोटे किसान हैं। इस समय सब लोग खेतों में काम करने में लगे हुए हैं। कुछ समय पहले कपास कटी है और अब खेत जोतकर, उसमें पानी छोड़कर गेहूँ और चना बोने का काम चल रहा है। सरदार सिंह हल चला रहा है और उसकी पत्नी गेहूँ की बोनी कर रही है। दूसरे क्षेत्रों में केवल पुरुष ही यह सब काम करते हैं- जैसे हल चलाना, बोनी करना, मवेशी चराना, गाय-भेंस दुहना आदि। स्पष्ट है यहाँ स्त्रियों को अपवित्र नहीं माना जाता जैसा कि हिंदू समाज और अधिकतर जनजातियों में होता है। दक्षिण भारत मे नीलगिरी की टोडा जनजाति में तो स्त्रियों को उस स्थान में घुसना भी मना है, जहाँ पशु रखे जाते हैं। टोडा जनजाति मुख्यत: पशु-पालक है। वास्तव में बेहद विचित्र है।
सरदार सिंह के तीन पुत्र है। भूरु सबसे छोटा है लेकिन इसी की शादी सबसे पहले हुई। मवेशी चराता तथा घूमता-फिरता था इसलिए एकदम अनपढ़ हैं। बड़ा बेटा झाबुआ के कॉलेज में पढ़ता है और उसकी पत्नी वहीँ फ़ॉरेस्ट विभाग में नौकरी करती है। दूसरा बेटा एम.एस.सी. कर रहा है, उसकी शादी नहीं हुई है। सबसे बड़ी बेटी है। उसकी शादी हो चुकी है। अमुआ के पास। बेटी की एक बेटी यहीं नाना-नानी के पास रहती है- बड़ी लाड़ली है। भूरु भाई और उसकी पत्नी अलग रहने लगे हैं। तीन साल हुए उनकी शादी को। भूरु के पिता उससे खासे दु:खी हैं, कोई काम नहीं करता, बस मोटरसाइकल उठाकर घूमता रहता है और सबसे लड़ता रहता है। बाकी सब अच्छे हैं। बहु भी अलग रहना चाहती है। वैसे जो बताओ काम कर देती है। भाइयों से भी नहीं बनती उसकी।
यहाँ कुत्ते बहुत हैं। मैंने भूरु से पूछा कि इतने कुत्ते क्यों हैं? तो उसने कहा कि यह जरुरी है। पास में भीलों का गाँव है, वहां सब चोर बसते है। देहदला भिलालों का गाँव है। मैं सोच में पड़ गया क्योंकि भीलों ने तो इस क्षेत्र पर लंबे समय तक शासन किया है। फिर इस पूरे समाज को चोर कहे जाने का क्या अर्थ है? खैर! लगभग डेढ़-दो किलो मीटर दूर कोकाती फलिया में छोग सिंह भाई के यहाँ पहुँचे। वह बाजार गया हुआ था। घर में स्त्रियाँ काम पर लगी हुई थीं। उन्होंने दूध पिलाया। थोड़ी देर में छोग सिंह भी आ गया। बैठकर थोड़ी देर बातचीत की और टहलते हुए भूरू भाई के यहाँ वापस आ गए। पिता और परिवार के लोग अब तक खेत में काम करके लौट चुके हैं। थोड़ी देर पिता से बातचीत होती रही। पिता बहुत मेहनती और भला व्यक्ति है। परंतु भूरू को लेकर बड़ा दुःखी है। थोड़ी ही देर में पिता फिर चलने के लिए तैयार हो गया। अब वह रात भर मोटर चलाकर खेतों में पानी देता रहेगा। नातिन को साथ ले जा रहा है। यहां बिजली का कोई ठिकाना नहीं इसलिए मोटर के पास ही सोना पड़ता है। बार-बार बिजली वापस आने पर मोटर को चलाना पड़ता है। भूरू तो घर में जाकर सो जाता है।
सरदार सिंह और उसके दोनों भाई आपस में सहयोग करके सबके खेतों में पानी देते हैं। यहाँ सबसे बड़ी समस्या जमीन के बँटते जाने की है। परिवार बढता जाता है और उसी के साथ जमीन भी बँटती जाती है। जमीन तो बढ़ती नहीं और न ही झाबुआ जिले में कोई अतिरिक्त जमीन मिलती है। अपना रोजगार भी नहीं जम पाता। अंत में बस एक ही रास्ता बचता है, पूरा का पूरा परिवार गुजरात में मजदूरी के लिए महीनों के लिए चला जाए। शायद इसीलिए यहाँ शिक्षा पर ज्यादा जोर नहीं है और जो शिक्षित हैं उन्हें भी नौकरी नहीं मिलती। इतनी प्रतिकूलता के बावजूद ए लोग अपना घर-परिवार स्थाई रूप से छोड़कर शहर में जाकर रहना नहीं चाहते। बच्चे बहुत होते हैं। सोच वही है कि काम करने वाले हाथ भी उतने ही बढेंगे। यहाँ सारे बच्चे कुछ न कुछ काम करते दिखते हैं। एक मुख्य बात यह है कि लड़कियों का पैदा होना तो बिलकुल भी खराब नहीं माना जाता। वे भी जी तोड़कर काम करती है और फिर शादी के समय दहेज लेकर आती हैं।
भूरू की माँ ने ज्वार की गरमा-गरम रोटी और गोभी-टमाटर की रसे वाली बहुत स्वादिष्ट सब्जी खिलाई। साथ में घर का घी भी। इन लोगों ने 3-4 भैंस पाल रखी हैं। बकरियाँ, मुर्गे और गाय-बैल तो हर घर में हैं ही। अभी तक कोई भी घर-परिवार ऐसा नहीं मिला जिसके पास बिलकुल भी जमीन न हो, और जिसके यहाँ कोई न कोई सदस्य मजदूरी के लिए बाहर न जाता हो। भूरू की अपनी माँ से खूब पटती है। माँ का लाड़ला होगा। वैसे पिता की नज़रों में माँ के लाड़ में बिगड़ा हुआ है। उन्होंने सोचा होगा संभल जाए, घर में काम करने वाली आए इसलिए सबसे पहले शादी भी की। भारत भर में बेकार-आवारा लड़कों को “लाइन” पर लाने का यह अनूठा रिवाज है। 9 बजे खाट पर सोए। ओढ़ने को मिला।
21 दिसंबर 2007
सुबह जल्दी उठकर सड़क पर घूमने निकल गया। दो-ढाई किलो मीटर चलकर वहीं सड़क किनारे एक पेड़ के नीचे बड़े से पत्थर पर बैठकर आसन किया। बड़ा अच्छा लगा। कैमरे के लिए अच्छा मसाला रहा होगा-एक बियाबान जगह पर कच्ची सड़क के किनारे छोटी सी पहाड़ी पर पेड़ के नीचे आसन लगाए एक साधुनुमा पढ़ा-लिखा दिखने वाला व्यक्ति
लौटा तो सरदार सिंह दूध लेकर जोबट जाते हुए मिले। रोज सुबह पत्नी भैंस दुहती है और पति दूध बेचने कस्बे में जाता है। भूरु भाई सोते हुए मिले। माँ और पत्नी खेत में काम करते हुए दिखे। मुझे देखकर माँ ने आकर चाय बनाकर पिलाई और भूरु को उठाया। सरदार सिंह भी थोड़ी देर में आ गए और सब लोग खेत में काम करने में जुट गए। भूरु को भी पाइप फ़ैलाने के काम में लगना पड़ा। मैं बैठा रहा। थोडा व्यायाम कर लिया। आज ईदुज्जुहा है। ईद की मुबारकबाद का मैसेज किया। आज दूसरे गाँव ले जाने के लिए जोबट से किसी को आना था, लेकिन कोई नहीं आया।
कुछ लिख लिया और फिर ऐसे ही घूमता-टहलता रहा। बहुत जोर से भूख लगने लगी। सब अपने काम में लगे हुए हैं। यूँ तो किसी ने भी सुबह से कुछ नहीं खाया है और जी तोड़ कर मेहनत भी कर रहे हैं। मुझे कुछ भी न करके भी भूख सता रही है। अंतत: 1 बजे के करीब भूरु की माँ ने आकर रोटी बनाई। सब्जी तो रात की ही रखी हुई है। चटनी भी मिल गई। खाना खाकर जान में जान आई। सरदार सिंह भी कुछ देर बैठकर मेरे साथ बातचीत करते रहे। मैंने उन्हें थोडा-सा बताया कि मैं क्या करना चाहता हूँ, तो उन्हें विचार बड़ा अच्छा लगा। कहने लगे यहां कर्ज की सबसे बड़ी समस्या है और उसी को लेकर आदिवासी बहुत ज्यादा परेशान रहते हैं। अज्ञानता की वजह से सबकी मनमानी सहनी पड़ती है। इतने में भूरू आ गया कहने लगा चलो। मुझे किला जोबट जाना है-जालम सिंह के यहाँ। भूरु के साथ निकल पड़ा।
किला जोबट पहुँच गए, जालिम सिंह बाबा के यहाँ। जोबट का पुराना किला कस्बे से करीब 3 किलो मीटर दूर पहाड़ी की ढलान पर बना हुआ है। उसके आसपास जितने फलिया हैं, उन्हें मिलाकर किला जोबट गाँव बना है। किले तक रोड जाती है। बीच में बहुत बड़ा मिशनरी अस्पताल और ईसाईयों का केन्द्र है। रास्ते से कोई आधा किलो मीटर हटकर जालम सिंह का घर है। नाले के एकतरफ यह अकेला घर है और बाकी सारे घर नाले के दूसरी तरफ हैं। अच्छी शांत जगह है। बाबा तो भगत है। शिवलिंग भी घर में ही स्थापित है। घर में दुबला-पतला, लंबी दाढ़ी-बाल वाला जालम सिंह बाबा और उसकी थोड़ी भारी-भरकम विशुद्ध भील पत्नी रहती है। उनके छोटे से घर में मुर्गियाँ, कबूतर और बकरियाँ हैं। इस क्षेत्र में कबूतर पले हुए पहली बार किसी के घर में देखे। बहुत थोड़ी-सी खेती है। बकरी, मुर्गे और कबूतर आमदनी में मदद पहुँचाते हैं। इसके अलावा भगतजी की आय का अतिरिक्त साधन ताड़ी है। आसपास नाले में खजूर के बहुत से पेड़ हैं, उनमें से सुबह-शाम बाबा नीरा निकलते हैं और रोज सुबह ताड़ी के रूप में बेचते हैं। तो इस तरह विशुद्ध शाकाहारी, माँस-मदिरा से दूर भगत जी को पेट पालने का साधन माँस और मदिरा बेचना ही है। जीवन जो कराए कम है।
जालम सिंह 6-7 साल से सेवा भारती से जुड़े थे। अभी 2 साल से शिवगंगा में पूरी तरह साथ हैं और तभी से भगत बन गए हैं। आसपास किसी से भी बोलचाल या संबंध नहीं हैं, क्योंकि सब शराबी हैं। सगे, चचेरे सब भाई नाले के उस पार रहते हैं, लेकिन उनसे संबंध नहीं रखते न ही उनके घर आते-जाते हैं। क्योंकि सब माँस-मदिरा, खाते-पीते हैं। यानी भगत जी खुद भगत बनकर समाज से और सब लोगों से कटकर यहाँ घर में शिवलिंग स्थापित करके अलग-थलग अपने को रखकर और दूसरों को माँस-मदिरा बेचकर उदर-पोषण करते हैं। इस तरह इस भगतीकरण ने भील-भिलालों में एक नया वर्ग खड़ा करके उन्हें बाँट दिया है। शिवगंगा के साथ ज्यादातर ए भगत ही जुड़े हुए हैं।
जालम सिंह बाबा बेहद सौम्य, स्वाभिमानी और भला इंसान है। उसकी पत्नी भी बहुत स्नेही और खुशमिजाज है। शायद लड़ाकू भी है। एक छोटा सा 8-10 साल का बेटा मुकेश साथ है जो पढता-लिखता नहीं है। उससे बड़ा सुनील है, वह भी नहीं पढ़ता। उससे बड़े कैलाश की शादी हो गई है ओर पत्नी को साथ लेकर काठियावाड़ में मजदूरी कर रहा है। तीन बैटीयां हैं, वे तीनों भी मजदूरी करके कमाने के लिए काठियावाड़ गई हुई हैं। दो साल पहले बड़े बेटे की शादी के लिए साठ हज़ार रुपए कर्ज लिए थे, उसी को उतारने में सब लगे हुए हैं। एक खेत गिरवी रखा जो साहूकार ने दो साल तक ब्याज में जोता-बोया। इसके अलावा एक किलो चाँदी जमानत के तौर पर रखी और कर्ज लिया। जिसका ब्याज 20 % प्रतिवर्ष दिया। यानी जमीन अपने आप में गिरवी की वस्तु नहीं है। इसे गिरवी रखने के बावजूद चाँदी की जमानत? यह तो शोषण की पराकाष्ठा है। अब यह भी समझ में आ रहा है कि यहाँ के आदिवासी समाज में चांदी को लेकर इतना आकर्षण क्यों है। अब जाकर खेत छुटा है और अभी चाँदी छुडानी है। अगर पढाई-लिखाई में लग गए होते तो जिंदगी भर कर्ज नहीं उतर सकता था। शादी का खर्च बहुत बड़ा है और इसी में,कर्ज में डूब जाते हैं। कोई कोई ऐसे लोग भी मिल जाते है जो मांग नहीं करते।
पुलिस के डर से बेटे की शादी करनी पड़ी
भूरु के पिता सरदार सिंह ने बताया था की बड़े लड़के की शादी ऐसे ही यानी बिना दहेज़ के हुई। लड़की और लड़का झाबुआ में पढ़ते थे। लड़की का पिता पुलिस में हेड-कांस्टेबल है। शादी के लिए पीछे पड़ गया। साल भर पहले ही भूरु की शादी के लिए कर्ज लिया था, इसलिए बड़े लड़के की शादी करने की स्थिति में नहीं थे। फिर भी लड़की का बाप जल्दी शादी के लिए पीछे पड़ गया और कहने लगा कि कोई भी दहेज़ नहीं चाहिए, बस शादी कर दो। आमतौर पर लड़काऔर उसका पिता लड़की के लिए खुशामद करते हैं लेकिन यहाँ उल्टा था। लड़की का बाप पुलिस में होने से मुझे डर भी लगा कि मना करने से कहीं फँसा न दे। इसलिए लड़के की शादी करनी ही पड़ी। उसने नहीं मांगा तो क्या, हमने तो उतना ही खर्च किया जितना छोटे की शादी में किया था। लोग क्या कहते अगर खर्च न करते। अब लड़का-लड़की बहुत खुश हैं, एक बच्चा भी है। लड़की नौकरी करती है और वही पति की पढ़ाई पर खर्च उठाती है। दोनों बहुत सुखी हैं और उनकी तरह से बेफिक्री है। कर्ज की कोई फ़िक्र नहीं, वह तो मेहनत करके उतर ही जाएगा। बच्चों की ख़ुशी असली बात है। जब सरदार सिंह उस साल शादी करने से मना कर दिया था तो लड़की अपना घर छोड़कर उनके यहाँ आ गई और वापस जाने को तैयार ही नहीं हुई-कहने लगी अब तुम्ही मेरे माँ-बाप हो, रखो या भगाओ। मैं तो आ गई। वह थी तो पुलिस वाले की लड़की, सरदार सिंह घबरा गया। उसके 3-4 दिन बाद पुलिस की गाड़ी में बैठकर बाप आया और दबाव में आकर डर के मारे सरदार सिंह को तुरंत शादी के लिए तैयार होना पड़ा। अब तो वह हँसते-हँसते चटखारे लेकर यह किस्सा सुनाता है। सरदार सिंह अब बहुत खुश है, लेकिन तब बुरी तरह घबरा गया था।
लड़की अपनी मरजी से आई है, दंड नहीं दूँगा
यहाँ जालमसिंह की कहानी अलग है। बड़ा बेटा कैलाश और वह लड़की एकसाथ मजदूरी करने गुजरात गए थे, वहीँ एक-दूसरे को पसंद कर लिया। लड़की के माँ-बाप शादी के लिए तैयार नहीं हुए तो लड़का उसे भगाकर ले आया। लड़की भी आने के लिए तैयार बैठी ही हुई थी। फिर पंचायत बैठी, दंड लगाया गया। बाबा ने कहा लड़की अपनी मरजी से आई है, कोई दंड नहीं दूँगा। वह अड़ गया था तब समझौता हुआ। जो भी दहेज़ गाँव में प्रचलित है उतना ही देंगे। शादी अपने तरीके से करेंगे और दंड मानो तो सिर्फ दो बकरे दे देंगे, नहीं तो जो करना हो कर लो। चाहो तो समाज से निकाल दो। इसके बाद भी बाबा पूरी तरह से कर्ज में डूब गया और उसके सारे लड़के-लड़कियाँ मिलकर कर्ज उतार रहे हैं। वहीँ दूसरी ओर बहू साथ रहना नहीं चाहती, खेती में लाभ बाटना नहीं चाहती, लड़के को बरगला लिया है और अब दोनों अलग रहकर काठियावाड़ में मजदूरी करके कमाते हैं। जो मिलता है उस पर सिर्फ अपना हक़ समझते हैं। बड़ी मुश्किल से नखरे करके उसमें से कुछ देते है। बहू-बेटे से बहुत दुखी है- बाबा और उसकी पत्नी। यह आदिवासी जीवन का एक दुखद पहलू है। व्यक्तिगत स्वार्थ अब सामान्य होता जा रहा है।
जालम सिंह के घर बिजली नहीं है। बाहर बहुत सुंदर चाँदनी खिली हुई। एक-दो दिन में पूर्णिमा होगी। सारे कबूतर उनके लिए रखे घड़ों में घुस गए और मुर्गे-मुर्गियाँ ही नीचे रहीं। बकरियाँ कमरे के अंदर चली गई। उनके यहां एक गाय है, वह भी अंदर। चूल्हा बाहर आँगन में ही है। बहुत स्वादिष्ट उडद की दाल और मक्के की रोटी बनी। खूब सारी दाल खा गया। बड़े प्रेम से खिलाई। दोनों बच्चे भी बड़े प्रसन्न है। बड़ा लड़का खेत में पानी छोड़ने रात भर खेत में रहेगा। परछी में मुर्गियों, चूजों से जगह खाली कराके मेरे लिए छोटी सी खाट बिछाई, लेकिन मैंने कहा जमीन पर ही सोऊँगा। पहली बार इन मूक पक्षियों को बेघर करा।
क्रमशः…
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