देखना वह नहीं है जो आप देखते हैं

राघवेंद्र तेलंग, सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता

फोटो: आशु चौधरी ‘अर्शी’

हमेशा से ही यही होता है कि हम वही देखते हैं जो दीख रहा है लेकिन वह जो हो रहा है हम देखते ही नहीं। चूंकि हमारा देखना संज्ञा केंद्रित और पदार्थ आधारित होता है सो हम क्रिया या ऊर्जा के घटने को देखने से चूक जाते हैं। एक कलाकार या साधक दूसरे साधक की साधना की बारीकी को, शैली को देखता है। फोकस करने और फोकस्ड होने के अनेक कोण हैं, तरीके हैं। हमारे देखने में होता यह है कि दूसरों का देखा हुआ अनुभव हमारे देखे हुए में आ जाता है। इसीलिए हमारा वह देखना कभी मौलिक नहीं होता।

देखने के पहले और बाद में अपने अंदर देखकर और रूककर खुद से पूछना कि देखे हुए में मेरा अपना अलग देखना दिखा या नहीं! यह विश्लेषणात्मक देखना कहा जा सकता है। हालांकि यही सही देखना है। विश्लेषणयुक्त देखने के लिए ही हम बने हैं, ऐसा देखना यदि हमारे देखने में हो जाए तो कोई पूर्वाग्रह, कोई अफवाह, कोई विभ्रम हमारे देखने को मैला नहीं कर सकता। यह देखने की क्रिया को पवित्र करने की ओर का पहला कदम है, इसके आगे चलकर शुभ्र को, निष्पाप को देखने की काबिलियत या योग्यता विकसित होगी। देखते हुए अपना दिखना भूल जाना और देखने के बाद दृश्य को अपनी हथेली में लेकर तौलते हुए देखना फिर अपने-आप में लौटना यह देखने का एक सबसे अच्छा और रचनात्मक तरीका है। देखना एक ऊर्जा का नाम है। चूंकि यह ऊर्जा देखने की है,सो चाहे कोई भी हो देखने वाला या दिखाई देने वाला, वह अधिक से अधिक देखना या दिखाई देना चाहेगा। यह दृश्य और दर्शक की बात है जिसे दृष्टा के नजरिए से समझा जा सकता है। आपने नोट किया यहां दर्शक और दृष्टा शब्द अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त किए जा रहे हैं। ठंड के दिनों में आप धूप में बने रहना चाहते हैं, वहीं गर्मी के दिनों में आपको सीधी रोशनी के बजाय छांह में बैठकर रोशनी का आनंद लेना भाता है। बारिश के दिनों में जब धूप का मिलना कम हो जाता है,आप चीजों को सीलन से बचाने के लिए धूप दिखाने के बारे में सोचते हैं।

यह देखना-दिखना आखिर है क्या? कभी सोचा है? देखना या दिखाई देना एक तरह से एक आदिम भूख या कह लें प्यास का नाम है, यह आग जैसी तासीर की है। बचपन में आई मेरे माथे के बांयीं ओर इसलिए डिढौना (एक काला बिंदु रूपी टीका) इसलिए लगाती थी कि किसी की नजर न लग जाए। इस तरह वह ब्रह्मांड की रचयिता अपने लिए एक चांद का निर्माण या आविष्कार कर लेती थी। उस काले बिंदु का शाब्दिक अर्थ एक ट्रक के पीछे लिखा जाने वाला अमर वाक्य ‘बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला ‘ से समझा जा सकता है।

यह देखना-दिखना कहीं एक तरह से हजारों-हजार साल तक आदि मानव के जमाने की तड़प तो नहीं, जब हम गुफाओं में रहा करते थे, सीलन भरी, बदबू से लबरेज वो घुप्प अंधियारी गुफा। हा रे वो दिन! तब के दिनों में सूरज की रोशनी की चाह रखना यानी असुरक्षा को गले लगाना जैसा होता था। उन दिनों में जंगली जानवरों की कैद में हुआ करती थी रोशनी, रोशनी की कीमत पर बाहर निकलना तब मौत होती थी। रोशनी की चाह में कितने शहीद हुए क्या पता, बस इतना अंदाजा है कि तब गिनती नहीं हुआ करती थी।

आज की जद्दोजहद पहले जैसी ही है। आज का आलम कुछ ऐसा है कि यह देखना-दिखना वाले काम में जो लोग लगे हैं वे दिखने और देखने वालों की गिनती करते फिरते हैं, यह लेखक भी इनमें कहीं है जो यह लिखने के बाद देखेगा कि कितने लोगों ने आखिर यह सब देखा। पढ़ने की बात यहां नहीं की जा रही क्योंकि बात देखने-दिखाने की जो हो रही है। यह देखना-दिखना अंतहीन है। यह देखना-दिखना आगे चलकर दिखाना वाली संस्कृति में परिणत हो जाता है। मिल-बांटकर खाने-रहने वाली साझा संस्कृति लौट चुकी अपने ठिकाने,अब यह सब पढ़ लेने के बाद किसी की नींद न खुले सो अभी एक विज्ञापन दिखेगा और आपको देर तक देखेगा,घूरेगा,फिर आपकी पहले वाली सोच गायब हो जाएगी,जो कि इस बात की उपज थी कि सारा देखना-दिखना व्यर्थ का है,असल बात है गुनना-बुनना। वही काम जो गुफा के दिनों में रहते हुए किया जाता रहा। रोशनी की चाह अपनी कीमत वसूलती है,देखना-दिखना मुफ्त या निरुद्देश्य करने की चीज नहीं। अब तो वही होना चाहिए जो हम देखना चाहते हैं या वैसे ही हमें दिखाई देना है,जैसे हम अपने को देखना चाहते हैं।

मस्तिष्क या ब्रेन शरीर के लिए बना है, शरीर से जुड़े इंद्रियजनित कार्यकलाप के लिए और साथ ही उसकी भावना के स्तर पर उछाल, गर्त, ठहराव की विभिन्न दशाओं की साज-संभाल के लिए भी उसका अभी तक व्यापक उपयोग समझा जाता रहा है। न्यूरांस का विशाल नेटवर्क मस्तिष्क में इस कार्य को अंजाम देता है। न्यूरांस इलेक्ट्रिकल इम्पल्सेस पर एक्टिवेट होकर कम्युनिकेट करते हुए निर्णय का नेटवर्क बनाने में निर्णायक की भूमिका में होते हैं। लेकिन जरा ठहरिए! यहां यह मत भूलिए कि माइंड या आत्मन यहां उपस्थित नहीं है। सामान्यतया यह आत्म या माइंड कुल निर्णायकता की इस्टेट या स्थिति आ जाने के बाद अधिकांश परिस्थितियों में निर्णायक परिस्थितियों की दिशा में लुढ़कते जाता है। परंतु सजग माइंड में यह क्षमता होती है कि निर्णय के पल के दौरान तत्क्षण उस रस की चंद बूंदें वह अपने फील्ड में सोख ले। यह होते ही फील्ड वर्तुल वेणिसमूह बनकर पुष्पाकार आकृति-सा ले रससिक्त होता-होता (एक तरह से समझें तो ट्युब्युलर) समग्रत: एक तरह की अनूठी मीठी आर्द्रता की अनुभूति पाकर प्राणमय हो उठता है। यहीं से चैतन्यता एक्टिवेट होना शुरू हो जाती है,यह इन्स्टेंटेनियस प्रक्रिया है जिसे शरीर में माइक्रो लेवल के कंपनों और ताप के माध्यम से चीन्हा जा सकता है।

प्रकाश की प्रकृति की ही तरह चैतन्य ऊर्जा क्वांटा फॉर्म में यात्रा करती है, पैकेट्स के बीच में स्पेस की एक अलग भूमिका होती है,यह सतत ऊर्जा नहीं है यह स्मरण रहे। प्रकाश जैसी प्रकृति और प्रवृत्ति होने से ही इस ऊर्जा से देखने की क्रिया को दिव्यचक्षु योग कहा जा सकता है। इस आंख के नेटवर्क का विस्तार ब्रह्मांड से संबद्ध है, जिससे अंतरानुभूति द्वारा हमेशा से आकाश में देखा जाता रहा है। भारतीय दर्शन और ज्ञान के ग्रंथ इसके साक्षात् प्रमाण हैं। यही इंटीट्यूव ज्ञान है। जो मस्तिष्क की क्रियाप्रणाली के कारण उपजा है अतः तर्क पर भी खरा है और आस्था पर भी।

जिसे आप खोने नहीं देना चाहते उसे आप हमेशा नज़रों के सामने रखें, बिल्कुल खुद की तरह,जो आपको ठीक आपकी ही तरह लगता/दीखता है, वह मिल गया है ऐसा जानें रहें, उसे पल-प्रतिपल निहारते रहें, ऊर्जा मिलेगी, जैसा मैंने शुरु में कहा कि देखना ऊर्जा है जिसका परिष्कृत नाम निहारना है, देखने में जब भक्ति और प्रेम जुड़ जाए तो वह ऊर्जा में रूपांतरित हो जाता है, व्यक्ति कृष्णमय हो जाता है, असीम से जुड़ जाता है।

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