एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
बैकल्या : नया रोजगार
पांच-छह किलोमीटर चलता गया। यहां तो डोका खोई तक सड़क बन गई है। बाद में कच्चा रास्ता पांगरा तक तथा वहां से बरसाती नाले के बीचोबीच चलकर भोतपुर पहुंचा। फिर जंगल और पगडंडियों का साथ। सचमुच भंवरताल की याद आ गई। बचपन फिर सामने था। जंगल में नदी पार करके फिर चार-पांच किलोमीटर चलता रहा। लग रहा है कि पंद्रह किलोमीटर से कम का पैदल का रास्ता नहीं है। इतने अंदर जाकर मंदिर? कौन आता होगा? खैर साढ़े ग्यारह बजे के करीब एक मजार के पास पहुंचा। इसके बाद नाला और सागौन का जंगल। अचानक जंगल के बीच एक आश्रम सा बना दिखा। मुझे लगा यही मेरा नया आश्रय, नया निवास होगा। नीचे एक अधबना बड़ा सा मंदिर। उसके पास के टीले पर कुछ शेड और गौशाला बनी थी। बाहर दो लोग आसपास उगी घास छील रहे थे। मंदिर के अंदर हनुमान जी की विशालकाय मूर्ति है और बाहर बड़े से चबूतरे पर शिवलिंग।
काम कर रहे लोगों से मैंने पूछा “बैक्लया जी का स्थान यही है?” मैंने बताया कि शाहगंज से ठाकुर बाबा ने भेजा है। एक व्यक्ति ने कहा “अच्छा सियाचरण बाबा ने भेजा होगा, कैसे हैं? बहुत दिनों से इधर नहीं आए?”
मैंने कहा “यहां उनके चेले लक्ष्मण दास बाबा होंगे? कहां हैं?”
उसने बताया कि वे तो करीब एक साल पहले जा चुके हैं। मैं सोचने लगा कि स्थायित्व शायद बहुत से लोगों के लिए गैरजरूरी है। मैं भी तो भटक ही रहा हूं। तभी तंद्रा टूटी, उसने बताया “यहां कोई बाबा नहीं है। एक वरिष्ठ रामायण पाठी पंडित जी हैं शेखर जी, और एक नेता जी, वही कर्ता-धर्ता हैं। अभी कहीं गए हुए हैं।”
मैं कुछ कह पाता इसके पहले अंदर से शायद रसोई से एक गंजा काला युवक जो टावेल लपेटे हुए था, बाहर निकला और कहा “जगतगुरू शंकराचार्य जी आपका स्वागत है। जल लीजिए।”
मैंने कहा “आप जैसे चाहे व्यंग्य कर सकते हैं, मैं कुछ नहीं कहूंगा। यहां कुछ पाने ही आया हूं।”
वह “कुछ” क्या है यह अभी भी स्पष्ट नहीं था। अभी तो एक सप्ताह ही हुआ है। खैर, दूसरे ने बताया, यह व्यक्ति गांजे के नशे में धुत है। कुछ भी बोलता रहता है, बुरा मत मानना। रामायणपाठी मुस्कराता रहा। अब यह मेरा नया संसार है या परिवार? समय ही तय करेगा। देखा कि अंदर रसोई में एक बूढ़ा साधु बाबा रोटियां बना रहा है। मंदिर के आगे अधबने से निर्माण में आधी अधूरी छत, आसपास दीवारें भी नहीं। इनके बीच चार पांच लोगों के बिस्तरे तख्तों और पटों पर रखे हैं। समझ में आया सभी यहां खुले में सोते हैं। राधेश्याम नाम के व्यक्ति ने चाय पिलाई।
एक बूढ़ा कोरकू आदिवासी चरवाहा है। गंजेड़ी का नाम दिनेश परसाई है। राधेश्याम ने बताया, इसकी जवान बीबी मर गई तब से इसका दिमाग फिर गया है।
मैंने कहा “मर गई या मार दी? यह पागलखाना है क्या?”
यहां श्याम बैरागी नाम का दुबला-पतला मरियल सा एक पुजारी भी है। कहने लगा बस भोजन तैयार हो रहा है। खाओगे न?
मैंने कहा “अवश्य”।
क्या उसे बताता कि परसों रात के बाद भोजन नहीं किया है। तो ये उस नए आवास के सहवासी थे, जिनके साथ मुझे अगले कुछ दिन, सप्ताह या महीने बिताने थे। कितने ? अभी तो कुछ भी कह पाना कठिन ही है।
तभी मोटर सायकल पर दो व्यक्ति आए। एक धोती कमीज पहने गांव के पटेल टाइप का आदमी श्याम नेताजी और दूसरा भगवा धोती व कमीज पहने बुजुर्ग सा ब्राह्मण शेखर जी। आगे जो हुआ वह मेरे लिए सर्वथा अनपेक्षित था, लेकिन साधु बैरागी समाज के एक नये पक्ष को समझने में इसने बड़ी सहायता की। मैंने बड़े उत्साह से बताया, “शाहगंज से सियाचरण बाबा ने भेजा है।”
शेखर जी सशंकित होकर बोले “अच्छा, शाहगंज से आए हैं। सियाचरण बाबा ने क्या कह कर भेजा है।”
मैंने कहा “बोला है देख आओ कैसा है, और …”
शेखर जी कुछ फूट से पड़े बोले “अच्छा, जानकारी लेने को भेजा है कि वहां सारा काम कैसा चल रहा है उसकी रिपोर्ट लेकर आओ?”
मुझे समझ नहीं आ रहा था कि कहां गड़बड़ और गलतफहमी है। बाबा ने पूरी और सही बात मुझे नहीं बताई थी। यहां का वातावरण उनके प्रति तो विद्वेषपूर्ण है। बहरहाल] मैंने बात को संभालते हुए कहा “ऐसा नहीं है। मुझे कुछ करना है, भक्ति का मार्ग खोजना है। सियाचरण बाबा ने तो यहां का पता भर बताया है। आया तो अपनी मर्जी से ही हूं कि यहां प्रभु के पास रहकर रामायण पाठ करूंगा।”
शेखर बाबू संतुष्ट तो नहीं हुए पर थोड़े ठंडे पड़े। बोले यहां अभी कोई जगह खाली नहीं है। रामायणी हैं। कमेटी से बात करना पड़ेगी। इतनी दूर से आए हो। आज तो भोजन करो, फिर देखेंगे। इस बीच नेता अलग बैठकर सब सुन रहा था।
हैंडपंप पर हांथ मुह धोने जाने के दौरान गंजेड़ी फिर आकर अपमानित करने लगा और ऊंटपटांग बात करने लगा। मैंने अपने क्रोध को दबा तो रखा पर आवाज थोड़ी तेज हो गई। उस गंजेड़ी को लग रहा होगा कि मेरे आने से उसकी जगह छिन जाएगी। मुझे भगाना चाहता है। मुझे महसूस हुआ कि सियाचरण बाबा ने मुझे बेवजह यहां झोंक दिया। जाहिर है यहां का वातावरण मेरे प्रति सौहार्दपूर्ण तो नहीं ही है। शायद परीक्षा ली जा रही है। सिर्फ वह पतला सा श्याम पुजारी ही मित्रवत है।शेखर ने कहा, अरे इसकी बात मत सुनो, गुस्सा मत करो और भोजन करो। मैं देख रहा था कि यहां किसी की किसी से नहीं पटती। रामायण पढ़ने वाला उत्तराखंड का चंडीप्रसाद भी झक्की जैसा ही लगा। अधिकांश झक्की हैं और पीठ पीछे एकदूसरे की बुराई करते रहते हैं। बस बूढ़ा कोरकू ही मस्त है। बड़ा ज्ञानी आदिवासी है। हमारे भंवरताल के चतरू की तरह। फिर भंवरताल!
नेता और शेखर, विशिष्ट व्यक्ति हैं, इसलिए पहले भोजन के लिए चले गए। वे जब बाहर आए तो फिर मैं तीन चार लोगों के साथ गीले फर्श पर बोरी बिछाकर बैठ गया। सबसे पहले सबके सामने एक-एक माचिस की डिब्बी रखी गई। मैंने सोचा यह मेरे किस काम की है, तो हटाने लगा। किसी ने कहा रखी रहने दो, हटा दोगे तो खाओगे कैसे? बात समझ में नहीं आई। सबने एक-एक थाली और गिलास लिया। फिर थाली का एक कोना माचिस के ऊपर रखा, जिससे थाली टेढ़ी हो गई और उस हिस्से में दाल डाल दी गई। थाली का वह हिस्सा कटोरी बन गया। माचिस का रहस्य समझ में आया। खाने में बस दाल और मोटे-मोटे टिक्कड़। दो दिन से भूखे रहने के बावजूद मात्र एक टिक्कड़ खा पाया। दाल में पानी कम, मिर्ची ज्यादा है। बाकी लोग खाए चले जा रहे हैं। उठा, थाली धोई। अब स्वयं का कार्य करना सीख गया हूं। थाली-कटोरी का ऐसा संगम पहले कभी देखा नहीं था। लगा कितना वैज्ञानिक अविष्कार है और जरूरतों को सीमित रखने का एक तरीका भी। इस जगह आकर जेल जैसा लग रहा है, खुली जेल। याद आया आंदोलनों के दौरान जेल में बिताया गया वक्त। वहां भी ऐसा ही वातावरण और खाना मिलता था। एकाएक जेल की याद आई। काम करो और खाना खाओ। वैसे तीन बार जेल गया हूं। दो बार जवाहर लाल नेहरू विश्व विद्यालय (जेएनयू) में अध्ययन के दौरान हुए आंदोलनों में। इसमें से एक ईरान के शाह के दिल्ली आने के दौरान हुआ था। आखिरी बार यूनियन कार्बाइड विभीषिका को लेकर हुए आंदोलन के दौरान हुई गिरफ्तारी व जेल। इस दौरान आठ-दस दिन जेल में रहा था। पुरानी यादें पीछा नहीं छोड़तीं। बचपन और यादें लगातार ऊर्जावान बनाए रखती हैं। यूनियन कार्बाइड को भी तेईस साल बीत गए हैं। उफ़ वह मंजर!
वर्तमान में लौटा तो सोचने लगा कि यह अखंड रामायण का पाठ यहां कब से चल रहा होगा? सियाचरण बाबा ने बताया था कि उनके दादा गुरू जाट बाबा, जिनकी समाधि भी यहीं पर है, ने करीब पचास वर्ष पहले यहां अखंड रामायण का पाठ शुरू करवाया था। आधी शताब्दी से एक गतिविधि जिससे किसी भी तरह का कोई आर्थिक लाभ भी नहीं है और न ही प्रसिद्धि, क्योंकि इस सुदूर जंगल में वैसे ही बहुत ही कम आवागमन है, वहां इतनी निरंतरता से ऐसी गतिविधि का संचालन वास्तव में आश्चर्यचकित करता है। बहरहाल, यह एक अकाट्य सच्चाई तो है ही। सोकर उठा तो थोड़ी सी चाय मिल गई। चाय पीते-पीते बताया कि मैं मंडला से हूं। थोड़ी खेती किसानी है। नर्मदा जी के किनारे चलते-चलते शाहगंज पहुंच गया था। अब यहां आ गया हूं। आगे का कुछ तय नहीं है।
आइए, थोड़ा इस नए परिवार की जानकारी लेते हैं। चंडीप्रसाद इन लोगों के बीच विद्वान है। पंद्रहवीं तक पढ़ा है। अविवाहित है और तीन साल पहले रूद्रप्रयाग से अपना घर छोड़कर निकल आया है। दिनेश गंजेड़ी लोहारदा का है। पहले छोटा-मोटा व्यवसाय करता था। विजयदास भंडारी बाबा सीहोर जिले के श्यामपुर के पास का है। अभी एक हफ्ता पहले ही यहां आया है। श्याम नेता और राधेश्याम-दोनों पागरा के हैं। नेता बड़ा किसान है और राधेश्याम बिगड़ा किसान! शेखर बड़वाह का ब्राहमण है। परिवार त्यागकर यहां सात-आठ साल से रामायण पाठ करता चला आ रहा है। आश्रम और गौशाला चलाने के लिए एक समिति बनी हुई है। इसमें कांटाफोड और लोहारदा के कुछ व्यवसायी और आसपास के बड़े किसान शामिल हैं। नेता भी कमेटी में है और वही पूरे समय यहां लगा रहता है।
अब इस जगह का थोड़ा इतिहास भी समझ लेते हैं। मुझे लगता है कि घने जंगल में बने इस मंदिर या इस आश्रम के माध्यम से साधु समाज की कार्यपद्धति और परंपरा को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। जैसे ही हम विस्तार में जाते हैं, तो इस समाज की वास्तविकता भी परत दर परत खुलती जाती है। कहते हैं हनुमान जी की यह अति प्राचीन मूर्ति घनघोर जंगल में एक बेल (बिल्व) के पेड़ के नीचे रखी थी। एक त्यागी बाबा ने उसे एक छोटे से मंदिर में प्रतिष्ठित कर दिया। उन त्यागी बाबा को जाट बाबा कहते थे, और बाहर ही उनकी समाधि बनी हुई है। बाद में बाबा रामरूपदास ने यहां यह आश्रम बनवाया। सियाचरण दास उनके चेले हैं। जब यह आश्रम बन ही रहा था तभी महंत रामरूपदास कमेटी वालों से नाराज होकर यहां से पता नहीं कहां चले गए। उनके सारे चेले भी एक-एक करके यहां से संबंध तोड़ निकलते गए। अब कोई “त्यागी” साधु यहां नहीं आ रहा है।
परंपरानुसार यदि एक त्यागी महंत का अपमान होता है तो उसकी अनुमति के बिना कोई दूसरा उस स्थान को अपना ही नहीं सकता। अत : अब कोई साधु यहां नहीं आता। साधुओं में बड़ा एका है। इसी वजह से यह आश्रम अब साधु रहित हो गया है। सही प्रथा है या गलत, इस पर विवाद हो सकता है, लेकिन जिस तरह से पूरी निष्ठा से इस परंपरा का निर्वाह हो रहा है, उससे यह तो स्पष्ट है कि साधु समाज का एक वर्ग बेहद आत्मसम्मानी है।
परंतु किसी तरह से अखंड रामायण का पाठ चल रहा है। चौबीसों घंटे, सातों दिन, बारहों महीने यानी पूरे साल यह पाठ जारी रहता है। पाठ की कड़ी आज तक टूटी नहीं है। यहां के रामायणपाठियों को निर्धारित वेतन, भत्ता और भोजन व चाय मिलता है। पुजारी व भंडारी नए आए हैं। शेखर,चंड़ीप्रसाद और दिनेश परसाई रामायण पाठी हैं। शेखर रोज बारह घंटे और बाकी दोनों छः-छः घंटे पढ़ते हैं। कभी कोई बाहर जाता है तो दूसरे को रूकना पड़ता है। लोग धीरे-धीरे मुझसे खुल रहे हैं। गंजेड़ी अभी भी शक करता है। उसका कहना है कि कन्नौद से पैदल आ ही नहीं सकते। अपना सही परिचय नहीं दे रहे हो। कोई खतरनाक आदमी हो। मैं भी सोच रहा हूं कि खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना कोई जरूरी नहीं है? किसी की निगाह ही आपको खतरनाक ठहरा सकती है। मुझे व्यवस्था की सनक और गंजेड़ी की सनक या दोनों की सोच एक सी क्यों नजर आ रही है?
शाम को लोग जिस ओर “लोटा” लेकर जा रहे थे मैं उनके दूसरी ओर चल पड़ा। जंगल में चलने के थोड़ी देर बाद मैदान आ गया। दोनों तरफ पहाड़ हैं जो दूर से त्रिकोण की रेखा की तरह वहीं आकर मिल रहे हैं जहां पर एक नदी बहती है। पहाड़ी की चोटी पर कुछ झोपड़े बने दिखाई दिए। जहां आश्रम में निराशा की अनुभूति हुई थी वहीं यहां आकर जैसे आशा का संचार हो गया। लगा कि यह स्थान रहने लायक है। नदी में नहाया। आरती के बाद भोजन में वही टिक्कड़ और दाल साथ में पिसी लाल मिर्ची और राम रस अलग से। इस वक्त भी एक टिक्कड ही खाया। यहां नमक “रामरस” है। सोचा भोजन बिना नमक के स्वादहीन है, वैसे ही यह इलाका भी वास्तविक “रामरस” यानी राम की भक्ति से सराबोर है। बिना रामरस के यह आश्रम भी कमोबेश आत्माहीन ही हो जाएगा। भोजन के समय चंड़ी प्रसाद ने कहा “उत्तराखंड से हूं, नाम सुना है क्या?” मैंने उसे जैसे ही उत्तराखंड से परिचित कराया तो दंग रह गया। अब गंजेड़ी बोला, थोड़ी देर रामायण पढ़ोगे? मैंने कहा कल से पढूंगा। रात नौ से बारह बजे तक चंडिका और रात बारह से सुबह छह बजे तक शेखर को पढ़ना है। मैं एक तखत पर सो गया। किस्मत से गद्दा भी मिल गया। चादर तो पास में थी ही। मच्छरों का संगीत रात भर अनवरत चलता रहा।
आज छह जुलाई है। यहां यह अच्छा है कि घूमना शौच और स्नान एक साथ हो जाता है। इन प्रक्रियाओं में करीब तीन किलोमीटर आना जाना हो जाता है। सबकी तंदुरूस्ती का रहस्य!लौटकर चाय पी। देखा छह बज रहे हैं। गंजेड़ी दिनेश रामायण पाठ पर बैठ गया। समझ में आया रामायण पाठ में कोई गंभीरता, भक्ति भाव या आस्था नहीं है। यंत्रवत या मशीनी तौर पर पढ़ते हैं। वैसे पढ़ते भी नहीं हैं सिर्फ बुदबुदाते हैं और पन्ने पलटते रहते हैं। परंपरा कैसे रूढ़ि बनती है यह भी समझ में आया। वैसे बीच-बीच में गप्पें भी लगाते रहते हैं। महसूस हो रहा है कि जैसे यह बेकारों को रोजगार देने का एक साधन ही बन कर रह गया है। मन में सवाल उठ रहा है कि क्या मेरी गिनती भी इन्हीं में होना है? बीच में दिनेश को बीड़ी पीने और लघुशंका के लिए उठना था तो मैं पढ़ने बैठ गया।
देखा कि बहुत बड़ी रामायण है। अक्षर इतने बड़े हैं कि बिना चश्में के ही पढ़ता गया। शुरू में अटपटा लगा। याद करने लगा इससे पहले रामायण (रामचरित मानस) कब पढ़ी थी? फिर वही बचपन। बचपन में तो पढ़ता था। आखिरी बार शायद सन उन्नीस सौ सढ़सठ में जब बम्हनी हाईस्कूल में पढ़ता था, और अम्मा बीमार थीं, तब उनको रोज कुछ देर पढ़कर सुनाया करता था। चालीस बरस बीत गए। उसके बाद अब पढ़ी। अच्छा लगा। थोड़ी देर बाद नेता आया, कहने लगा तुम्हारे लिए फोन आया। मेरे मन का चोर जागा, कहीं सागर से बड़े भाई का तो नहीं आया। उसने कहा शाहगंज से सियाचरण बाबा ने पूछा है कि ठीक-ठाक पहुंच गए या नहीं। कुछ समय यहां रहेंगे।
नेता बोला “मैंने उनसे पूछा पागल तो नहीं हैं न?”
मैंने जवाब दिया “अगर थोड़ा बहुत पागल न होता, तो क्या यहां आता?”
वह हंसने लगा, बोला जब तक रहना हो रहो। बीच-बीच में रामायण पढ़ लेना और जो भी समझ में आए करते रहना। कमेटी वालों से बात कर लेंगे।
नेता से मेरा यह पहला वार्तालाप था। बाबा ने फिर प्रभावित किया। मैंने नेता को अपना नाम विभूदत्त मंडला बताया। अब से मेरी एक और पहचान जुड़ गई थी। सुबह ग्यारह बजे शेखर आए। पुजारी ने बताया कि मैंने आज रामायण पढ़ी। शेखर ने अच्छा कहा। बोले बीच-बीच में पढ़ लेना। बात करनी पड़ेगी कमेटी से। फिर बोले वैसे नर्मदा जी के किनारे बड़वाह में एक आश्रम है, मेरी जान पहचान है वहां भी भेज सकता हूं। मैंने नहीं बताया कि नेता से क्या बात हुई ही। वो बोले नेता के सामने पढ़ना। पुजारी ने कहा तब नेता जी थे। मुझे महसूस हुआ कि मेरे आचरण व व्यवहार से लोगों का मेरे प्रति व्यवहार मित्रवत हो रहा है।
पुजारी ने एक पुरानी पीताम्बरी लाकर दी। अभी सिर्फ एक गमछा है। पेंट और टी शर्ट धोकर डाल रखी है। मेरी निजी संपत्ति में इजाफा हुआ। दोपहर बारह बजे फिर वैसा ही भोजन बे-हिसाब मिर्ची वाला। भंडारी से दोस्ती जम गई। उसे पटाया, शाम को मूंग की दाल बनाना और मिर्ची कम डालना।
आज बारिश बहुत तेज है। बरसते मूसलाधार पानी में थोड़ी देर रामायण पढ़ी। भीगते हुए घूमने गया। सब यन्त्रवत चल रहा है। बीच-बीच में आपस में लड़ाई और जो मौजूद नहीं है, उसकी बुराई होती रहती है। यहां बिजली नहीं है। महज एक लालटेन है जो रामायण के पास रखी रहती है। यहां सांप बहुत हैं। बारिश इतनी कि गाय भी बाहर नहीं जा रहीं। यह जगह एकदम निर्जन। दूर-दूर तक कोई बस्ती नहीं। पहाड़ के ऊपर की बस्ती भी दो-ढ़ाई किलोमीटर दूर तो होगी।
आज सात जुलाई है, शनिवार है। बताया कि हर शनिवार को सात-आठ किलोमीटर दूर के गांव से लोग आते हैं और भंडारा होता है। यानी उनकी तरफ से सबको भोजन। इस तेज बारिश में भी सबकी आस उन पर लगी है। दाल रोटी बन गई और भोजन कर रहे थे, तभी ट्रेक्टर में भीगते हुए सात-आठ लोग आ गए। यहां सब प्रसन्न हो गए। चौका साफ हुआ और भंडारे का खाना बनने लगा। मैंने थोड़ी देर रामायण पाठ किया और सो गया। पांच बजे सब खाने बैठ गए। बारह बजे खाए लोगों ने पांच बजे फिर खा लिया। सबने दबाकर खाया। दाल-बाटी और लड्डू। मैंने नहीं खाया। भंडारा वाले जाते हुए सबको दक्षिणा भी दे गए दस-दस रुपए। मुझे भी मिली “पहली दक्षिणा”। अब तक अपने आप ही सबने मान लिया था कि मैं ब्राह्मण हूं। मैंने रात नौ बजे रखी हुई एक बाटी खाई और थोड़ा सा लड्डू। चंडिका प्रसाद ने फिर खाया। महाखाऊ है! बारिश लगातार हो रही है।
जारी…
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