
- चैतन्य नागर
स्वतंत्र पत्रकार
धीरे-धीरे देह की सीढियां चढ़ती है उम्र| आहिस्ता-आहिस्ता दीमक समय कुतरता है हड्डियों को। त्वचा सिकुडती है बगैर किसी शोर-शराबे के| आँखों की रोशनी बुझने लगती है| ऐसा नहीं होता कि अचानक कोई सुबह उठे और देखे कि वह बूढ़ा हो गया है| ऎसी ही है जीवन की सांझ—इसकी आहट किसी कैलेंडर की तारीख से नहीं, बल्कि आईने से झांकते उस खामोश सच से आती है जिसमें हमें अक्सर जेरंटॉफोबिया या बुढ़ापे का डर दिखाई देता है। यह डर वक्त के बीतने का नहीं, जितना कि अपने वजूद के धीरे-धीरे घुलने का है। घबराहट होती है कि व्यक्तिगत पहचान की जिस इमारत को हमने ताकत, सौन्दर्य और उपयोगिता की चट्टान पर बनाया था, वह कहीं भविष्य की धुंधली अनिश्चितता में ढह न जाए।
इस डर की गहराई को समझने के लिए उस ढांचे को देखना चाहिए जो हमने अपने अहंकार की नींव पर बनाया है। दुनिया हमें सिखाती है कि हमारे होने का अर्थ है लगातार कुछ करते रहना, कुछ न कुछ बनाते-बनाते जाना और लोगों को प्रभावित भी करना। जब देह के पहिये घिसने लगते हैं, तो मन में एक अजीब तरह का शोक उतरने लगता है। मनोवैज्ञानिकों के मुताबिक बुढ़ापे की चिंता अक्सर अपनी स्वायत्तता को खोने से जुड़ी होती है। बचपन में होने वाले भय का एक दिलचस्प और दर्दनाक विलोम है यह। एक बच्चा अंधेरे में खो जाने से डरता है; बुजुर्ग समाज की भीड़ में ओझल हो जाने से| वह अपनों पर ही बोझ बन जाने से डरता है। जिस दुनिया में सिर्फ नवीन, शक्तिशाली और गतिमान को पूजा जाता है, वहां पुराना अक्सर हाशिए पर धकेल दिया जाता है। उम्र का लिहाज पहले हमारी संस्कृति का हिस्सा था, वृद्ध लोगों की इज्जत करना बचपन से ही सिखाया जाता था| अब ऐसा नहीं रहा| पश्चिम की संस्कृतियाँ यौवन की तारीफ करते नहीं थकती| वृद्ध वहां अनुपयोगी हो जाता है| अर्थव्यवस्था पर एक बोझ और किसी काम के लिए अनुपयुक्त| अक्सर हम झुर्रियों से सिर्फ इसलिए नहीं डरते कि वे खराब दिखती हैं, बल्कि इसलिए कि वे समाज के लिए हमारी अनुपयोगिता का प्रतीक बन जाती हैं।
साहित्य ने हमारे इस डर बखूबी बयान किया है। ऑस्कर वाइल्ड के कालजयी उपन्यास ‘द पिक्चर ऑफ डोरियन ग्रे’ को याद करें। डोरियन का डर मौत से ज्यादा बदलाव को लेकर है। वह जानता है कि उसकी ताकत और आकर्षण उसकी शीशे जैसी चिकनी त्वचा में है। उसका लगातार बूढ़ा और बदसूरत होता चित्र इसी बात का प्रतीक है कि हम अपने भीतर के डर को चाहे कितना भी छिपा लें, समय की सुइयां किसी के लिए नहीं रुकतीं। शेक्सपियर के ‘किंग लियर’ की त्रासदी सिर्फ सत्ता को नहीं, बल्कि उस गरिमा को खोने में है जो उसे समाज में प्रासंगिक बनाए रखती थी।उसकी चीख दरअसल संज्ञानात्मक पतन और स्मृति के धुंधलाने का वह सार्वभौमिक डर है, जो हर इंसान को सताता है। अज्ञेय की कविताओं में बुढ़ापा अक्सर एक खाली घर की तरह आता है। वे लिखते हैं कि उम्र के साथ शब्द साथ छोड़ देते हैं और मनुष्य अपनी ही स्मृतियों के पिंजरे में कैद हो जाता है। कुँवर नारायण बुढ़ापे को एक ऐसी ‘किताब’ की तरह देखते हैं जिसे अब कोई पढ़ना नहीं चाहता। मुक्तिबोध की कविताओं में बुढ़ापा एक अंधेरे की तरह आता और यह समझौते का पर्याय है, जिससे वे सबसे ज्यादा डरते हैं। मंगलेश डबराल की कविताओं में यह डर ‘घर खो जाने’ के डर जैसा है|
जहाँ साहित्य हमारे जख्मों को दिखाता है, वहीं धर्मग्रंथ उन पर मरहम लगाते हैं। कई बार वे ढलते शरीर को एक ‘टूटते हुए मकान’ के रूप में नहीं, बल्कि एक परिपक्व होती आत्मा’ के रूप में देखते हैं। बाइबिल के ‘एक्लेसिएस्टेस’ में बुढ़ापे का वर्णन बहुत ही बेबाक और सच्चा है। वहां शरीर को एक ऐसे घर की तरह बताया गया है जिसके खिड़कियां धुंधली हो गई हैं और पहरेदार कांप रहे हैं। लेकिन, इसे दुख की तरह नहीं बल्कि एक ‘पवित्र उल्टी गिनती’ की तरह पेश किया गया है। ऐसे भी विचार हैं जो हमें शरीर के साथ होने वाले जुड़ाव से शायद मुक्त करते हैं। वृद्ध का दिखना राजकुमार सिद्धार्थ के लिए वैराग्य और नवीन अंतर्दृष्टि का कारण बना। बुढ़ापा उनके लिए ‘अनित्यता’ या ‘अनिक्क’ का संदेश लेकर आता है।
आज का मनोविज्ञान बुढ़ापे के बारे में एक सकारात्मक कहानी भी सुनाता है। जिसे हम ‘कमी’ समझते हैं, वह अक्सर एक बहुत बड़ी ‘उपलब्धि’ होती है। जैसे-जैसे लोगों की उम्र बढ़ती है, लोग उन रिश्तों को छोड़ देते हैं जो केवल औपचारिक या दिखावे मात्र के होते हैं। वे अपना समय और ऊर्जा केवल उन लोगों पर खर्च करते हैं जिनसे उन्हें सच्चा प्रेम मिलता है। बुढ़ापे में भले ही सीखने की गति कम हो जाए, लेकिन जीवन भर का संचित अनुभव एक ऐसी बुद्धिमत्ता को जन्म देता है, जो युवाओं के पास नहीं होती। यह समस्याओं को सुलझाने की वह जादुई क्षमता है जो केवल वक्त के साथ आती है। समाजशास्त्री लार्स टॉर्नस्टैम के अनुसार, बुढ़ापे में व्यक्ति भौतिकवादी दुनिया से ऊपर उठकर एक ब्रह्मांडीय नजरिया अपना लेता है। वह अब खुद को केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि इस अनंत ब्रह्मांड का एक हिस्सा मानने लगता है।
देखा जाए तो, बुढ़ापा सिर्फ बंद होते दरवाजों और खिडकियों का नाम नहीं, बल्कि एक नए नजरिए के खुलने का भी संकेत है। यह वह समय है जब हम नायक’ बनने की होड़ को एक तरफ सरका कर जीवन के द्रष्टा बन जाते हैं। अथर्ववेद की प्रार्थना “पश्येम शरदः शतम्” (हम सौ शरद ऋतुएं देखें) हमें सिखाती है कि लंबी उम्र एक सजा नहीं, बल्कि एक अवसर है| अगर जीवन एक उपन्यास जैसा है, तो बुढ़ापा उसका अंतिम अध्याय नहीं, बल्कि उसका सार है—वह क्षण जहाँ कहानी के सभी बिखरे हुए तार एक सुंदर पैटर्न में जुड़ जाते हैं। बालों का सफेद होना सिर्फ रोशनी का कम होना नहीं, बल्कि आत्मा का स्वच्छ होना भी है।
बुढ़ापा नए डर लाता है और नए अवसर भी| यह पूरी तरह हम पर निर्भर करता है कि हम चुनते क्या हैं| बुढ़ापा इस बात का सबूत है कि हमने दिन की तपिश को झेला है ताकि सांझ की शीतलता तक पहुँच सकें। भागदौड़ से निकलकर अब हम लहरों की उस लय में भी शामिल हो जाते हैं, जहाँ शांति ही संगीत है। झुर्रियों से भरी देह और क्लांत मन के पास भी शायद इस चयन की ऊर्जा तो बचती ही है| ऊंचे पहाड़ों पर चढ़ जाएँ तो साँसें तो फूलती हैं, पर पर्वतों का सौन्दर्य अपनी पूरी गरिमा के साथ दिखाई भी देता है| अंग्रेजी कवि एमर्सन कहता था कि सबसे बेहतरीन धुनें उन्ही वायलिन पर बजती हैं जो सबसे पुरानी होती हैं| संगीतकार भले ही इस बात पर बहस करें, पर बुढ़ापे की गरिमा को कायम रखने के लिए तो यह ख्याल तो बढ़िया है!

