मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…

उस जीप में कम से कम 30 लोग तो रहे ही होंगे। यह समझ नहीं आ रहा था कि ड्राइवर अंदर है या बाहर? वह आगे देख कैसे पा रहा होगा?

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सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी

इन आदिवासियों की नैसर्गिक प्रतिभा और सौंदर्य दृष्टि को लेकर मैं जरूर सम्मोहित हो रहा था। स्पष्ट कहूं तो सम्मोहित हो गया था।

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घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं

मैं नैतिक और अनैतिक की दुविधा से गुजर रहा था। मगर यहां का आदिवासी समुदाय इसे जिस सहजता से स्वीकार और अंगीकार कर रहा है, वह वास्तव में शोध का विषय हो सकता है।

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मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…

वैसे देखा जाए तो पिछले लगभग दो महीने में, जब से मैं सम्पर्क में हूं, शिवगंगा ने कांवड़ यात्रा और गणेश उत्सव आयोजन में ही सारी शक्ति झोंक रखी है।

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अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…

सोचता हूं पिता का न रहना, हमें एकाएक वयस्क से प्रौढ़ बना देता है। उनके रहते हम हमेशा निर्णय लेने की प्रक्रिया में बहुत सक्रिय नहीं रहते।

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मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!

मैंने कई तरह की अपनी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक सीमाओं को तोड़ा। तार्किकता को एकतरफ रख मैंने परस्पर विश्वास के सहारे जीवन जीने की कोशिश की।

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ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है

समझ में आ गया साधु और भिखारी में यही अंतर है। वैसे हम दोनों ही बिना टिकट हैं। पर हम से होने वाला व्यवहार एकदम अलग-अलग है।

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वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया

बस, वृंदावन की गलियां में चलते चले गए। वृंदावन की गलियों का जिक्र तो कई गानों, भजनों में है, लेकिन प्रत्यक्ष देखने का मौका अभी मिला। वह अनदेखा जैसे अब साकार हो रहा है।

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कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…

लो तो अब हम पिताजी भी हो गए इस बतीस साल के लड़के की मां और छह साल की पोती की दादी के पिताजी! अब यहां से दण्ड-कमण्डल समेटने का समय आ गया है।

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मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…

करीब बीस-पच्चीस मिनिट की चढ़ाई के बाद झरने तक पहुंच गए। बेहद रमणीक स्थान है। मैं तो खड़ा देखता ही रह गया। यहां से हटने का मन ही नहीं कर रहा था।

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