पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
झाबुआ से धार आते हुए मैं सोच रहा था कि लगातार विरोधाभासी रहवासी परिस्थितियों में रह पाना कितना सार्थक हो पाएगा। जब तक आगे के कार्य की स्पष्टता तक यह चलाया जा सकता है।
पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं… जारी >










