हम तरसते ही, तरसते ही, तरसते ही रहे…
यह जीवन दर्शन से जुड़ा शेर है। जो हमारे भीतर होता है उसे हम देख नहीं पाते और जो सामने दिखता है उसे सही समझ कर ज़िन्दगी भर तड़पते रहते हैं।
हम तरसते ही, तरसते ही, तरसते ही रहे… जारी >
यह जीवन दर्शन से जुड़ा शेर है। जो हमारे भीतर होता है उसे हम देख नहीं पाते और जो सामने दिखता है उसे सही समझ कर ज़िन्दगी भर तड़पते रहते हैं।
हम तरसते ही, तरसते ही, तरसते ही रहे… जारी >
शहर की इस आर्थिक तंगी और एकाकी जीवनशैली के बीच, सोशल मीडिया और न्यूज प्लेटफॉर्म पर कुछ नए ट्रेंड तेजी से उभर रहे हैं। ऐसा ही एक रिश्ता है होबोसेक्सुअलिटी।
होबोसेक्सुअलिटी: महंगी सिटी में रहने की जुगाड़! जारी >
धर्म और राजनीति को मिलाना खतरनाक है। इस्लाम भी कहता है कि किसी पर धर्म थोपना गुनाह है। नीतीश कुमार का टोपी न पहनना उनका व्यक्तिगत अधिकार है। इसे चुनावी हथियार बनाना न तो बिहार के मुसलमानों के हित में है और न ही लोकतंत्र के लिए सही संदेश है।
मुख्यमंत्री को मुस्लिम टोपी पहनाने की कोशिश क्यों हुई? जारी >
हमारे विनम्र अभिमत में भगवान श्रीकृष्ण के प्रादुर्भाव से लेकर उनके चरित्र और लीलाओं पर किसी अलग ढंग से विचार करना ना तो समीचीन कहा जाएगा और ना ही उचित।
सोचिए, माखन चोर नाम में क्या रखा है? जारी >
‘महिलाएं क्या कर सकती हैं?’ से आगे हमें यह देखना होगा कि हम उनके बारे में अपनी सोच को कितना बदल सकते हैं और उनके साथ कितना समतापूर्ण व्यवहार कर सकते हैं।
‘हार्ड डिस्क के बारे में बात करनी है? किसी मेल कलीग को फोन दीजिए’ जारी >
सितार को समर्पित यशस्वी कला गुरू उस्ताद सिराज खान के मेवाती स्कूल ऑफ सितार के वार्षिक प्रतिष्ठा आयोजन पर हंसध्वनि। यह संगीत समारोह ऐसे पवित्र विचार की अनुभूति दे गया,जिसे उपलब्धि ही कहना उचित होगा।
कॉस्मिक ऑर्केस्ट्रा और मेवाती घराने का संगीत जारी >
पति-पत्नी का रोज एकसाथ सोना जहां पश्चिमी अवधारणा थी उसी तरह ‘स्लीप डिवोर्स’ या ‘स्लीप एलायंस’ भी पश्चिमी अवधारणा है।
स्लीप डिवोर्स: अलग बिस्तर, रिश्ते बेहतर जारी >
इंसान को अपनी दिनचर्या जागने की तरफ तो ले आती है लेकिन जागने के बाद एक इंसान ऐसा कुछ नहीं कर पाता कि वह ज़िंदा भी महसूस हो।
मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ, ज़िंदा क्यूँ नहीं होता… जारी >
‘कुछ दस्तकें, कुछ दस्तख़त’ के केनवस पर उड़ान के पंख की कलम से लिखे गए चमकीले सुवर्ण हर्फ-हर्फ इस तरह महसूस किए जा सकते हैं जैसे ब्रेल लिपि के पाठक करते हैं।
ताकि संगीत-संस्कृति से हमारा रिश्ता पहले जैसा जरूर हो जारी >
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला पिछले कार्यकाल में जिस तरह विपक्षी सांसदों पर सख्ती दिखाते थे, वैसा इस बार देखने को नहीं मिल रहा है। जहां पहले निष्कासन का डर था, वहीं अब केवल समझाने-बुझाने की कोशिश होती है।
आखिर क्यों बदले बदले से ओम बिरला नजर आते हैं… जारी >