कोई कभी वापस लौटता नहीं, सो लौटने का मार्ग ही न बनाया

हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्‍या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं। इस क्रम में पढ़िए हमारे स्‍तंभकार राघवेन्द्र तेलंग की पसंदीदा कविता :

विश्व कविता दिवस पर रूपांतरण के उद्देश्य को समर्पित हमारे लोकप्रिय स्तंभ “फिलामेंट एलिमेंट: हंसध्वनि’ के लेखक राघवेन्द्र तेलंग ने खलील जिब्रान की कविता ‘Fear’ (भय) का चयन किया है।  यह कविता क्यों पसंद है पूछे जाने पर राघवेन्द्र तेलंग ‘राग’ ने कहा कि रूपांतरण प्रकृति का शाश्वत सत्य है। सतत इवॉल्यूशन प्रकृति के पहिए का ही एक नाम है,इसे उल्टा नहीं किया जा सकता। खलील जिब्रान इसी सत्य को अपनी कविता ‘ फियर’ में नदी के भय के माध्यम से समझाते हैं और यह समझाना कुछ इस तरह होता है कि कविता पढ़ चुकने के बाद अंदर का भय करीब-करीब जाता रहता है। और यह तो होता ही है कि यह कविता स्मृति में हमेशा के लिए जगह बना लेती है।

वे लिखते हैं, प्रकृति की रचना ही ऐसी है कि वह स्वयं को निरंतर रचने के लिए प्रतिनिधि रचनात्मक पात्रों का चुनाव करती है,वे जो प्रकृति के गर्भ की रचना-प्रक्रिया को फूलों के जैसे सुंदर और सुगंधित शब्दों में बयान कर सकें। फूल कैसे फूल बनता है यह फूल कभी नहीं बता सकता। फूल की भाषा तो सुगंध की भाषा है,यही उसकी ज़ुबान है। फूल को ध्यान से देखने पर फूल भी आपके भीतर उतरता है। यह एक अभी-अभी खिला हुआ फूल है। खिलने का यह सफर खिलने के दौरान बहुत लंबा लगता है,इस दरम्यान इसकी राह में चट्टानी रास्ते और पहाड़ दर पहाड़ भी आते हैं और पहाड़ आते हैं तो सुरंगें भी तो रास्ते में मिलेंगी। हां !सुरंगें,आग से लगातार धधकती हुईं ,भयाक्रांत करतीं, दमघोंटू सुरंगें, अंतहीन-सी लगतीं अंधियारी सुरंगें। सुरंग अगर धरा पर क्षैतिज है तो फैला हुआ विशाल रेगिस्तान है जहां यह प्यास बुझाने की यात्रा है,अगर ऊर्ध्व है तो यह सर्वोच्च चोटी एवरेस्ट है ,जहां आग की चाहत है। अगर यह गहराई की दिशा में है तो यह अथाह समुंदर है जहां श्वास की तड़प है,खोज है। एक बार सुरंग की गिरफ़्त में आ जाने पर फिर आगे का ही रास्ता बच रह जाता है। 

Fear

It is said that before entering the sea,
a river trembles with fear.

She looks back at the path she has traveled,
from the peaks of the mountains,
the long winding road crossing forests and villages.

And in front of her,
she sees an ocean so vast,
that to enter,
there seems nothing more than to disappear forever.

But there is no other way.
The river can not go back.

Nobody can go back.
To go back is impossible in existence.

The river needs to take the risk
of entering the ocean
because only then will fear disappear
because that’s where the river will know
it’s not about disappearing into the ocean,
but of becoming the ocean.

खलील जिब्रान की कविता ‘Fear’ (भय) का भावानुवाद अपने विलक्षण अंदाज में स्‍वयं राघवेन्द्र तेलंग ने किया है:

भय

समुद्र में उतरने के ठीक पूर्व
हरेक नदी थरथर कांपने लगती है
ऐसा हर कोई है मानता-जानता

कस्तूरीमृग-सी चंचल वह तरंगिणी
देखती है बारंबार पीछे मुड़कर
उस मार्ग की ओर
जिस पर की है उसने
अब तक यह दुर्धर्ष यात्रा

पर्वतों के शिखरों से होते हुए
उन लंबे कुंडलाकार पथ पर
आते वे
दुर्गम अरण्य
और
सुशांत वास करते उनमें वन ग्राम
अहा!
क्या मौज रही ऐसे जीवन की
सोचती जलमाला शैलजा

और अब हठात् होकर देखती
साक्षात् यह असीम महासागर समक्ष
जिसमें विलीन होना
अब तो ठहरा अपरिहार्य

ओ!
असंभव
तो तुम हो यह

कैसा यह भयावह विचार!
कैसा यह समय!
यह काल!

मगर
हर संकल्पित अग्रसर की डगर भी तो
होती आई सदा से
ऐसी ही विकल्पहीन

तभी तो
नदी के पास भी
पीछे जाने का
कोई विकल्प ही नहीं

कोई कभी वापस लौटता नहीं
लौट सकता भी नहीं
लौट सकता ही नहीं

हे पाठक सुनो!
सुनो हे पाठक!

अस्तित्व ने सतत
फलते-फूलते रहने के पथ को ही है चुना
सो लौटने का मार्ग ही न बनाया

अब नहीं है कोई दूजा विकल्प
सिवाय
महासागर रूपी आसन्न
इस अज्ञात में छलांग का

और सोचो!
तब ही तो होगा न अंत
अनंत से भय का

इसी समय में
ठीक यही वह विनिर्दिष्ट स्थान है
इस अस्तित्व में
निर्भय सलिला होने के बोध का

जानेगी जहां वह अपने को आज अभी कि
यह खोना
अपना सर्वस्व खोना नहीं
एक तरह का पाना है
स्व को पा जाना

वस्तुत: यह तो
असीम हो जाना है
अपनी एक इकाई मात्र की पहचान के बदले

अंतिम ज्ञात द्वंद्व के साथ-साथ
संकल्प प्रणीत
अनहद नाद स्वर की
सुनाई देती गूंज

ऐसे ही समाहित होते हुए अज्ञात में
समझा जाता कि
कैसे अनंत ही होता
हर उद्गम की यात्रा का अंत।

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