
- असीम तिवारी
हम रामायण पढ़ते हुए जानते हैं कि राम लौटेंगे, भरत को यह सुविधा नहीं थी। बस, इतना सा अंतर रखकर कथा को फिर से पढ़िए, चौदह वर्ष अचानक बहुत लंबे हो जाएँगे।
हमारे लिए वनवास के बाद अगला प्रसंग है। अगले पृष्ठ पर कोई मिलेगा, कोई सहायता करेगा, कोई संकट आएगा और उसका समाधान होगा। भरत के जीवन में अगला पृष्ठ नहीं था। वहाँ अगली सुबह थी, और उस सुबह भी राम अयोध्या में नहीं थे। जिस कथा को हम उसके सुखद अंत की रोशनी में पढ़ते हैं, भरत उसे बिना अंत जाने जी रहे थे।
और भरत चाहते तो यह कहानी अपने लिए बहुत आसान कर सकते थे। राम के वनवास में उनका कोई हाथ नहीं था। उन्होंने माँ से राज्य नहीं माँगा था, पिता से कोई आग्रह नहीं किया था। वह उस समय अयोध्या में भी नहीं थे। उनके पास सिंहासन स्वीकार करने के इतने निर्दोष कारण थे कि उन्हें कोई झूठ तक नहीं बोलना पड़ता। माँ ने माँगा, पिता ने दिया, बड़े भाई ने भी राज्य सँभालने को कहा। जिन राम के अधिकार की चिंता थी, स्वयं वही भरत को राजधर्म निभाने के लिए समझा रहे थे।
कभी-कभी मनुष्य की सबसे कठिन परीक्षा तब होती है जब उसे गलत ठहराने वाला कोई नहीं बचता है।
भरत के सामने यही क्षण था। वह राजा बन जाते तो अपने बचाव में राम का नाम तक ले सकते थे। कह सकते थे कि भैया की आज्ञा है। लेकिन उनके भीतर केवल भाई की आज्ञा सुनने वाला मन ही नहीं था। भाई की अनुपस्थिति महसूस करने वाला मन भी था। राम उन्हें राज्य दे सकते थे, अपने बिना उसमें सुखी रहने की क्षमता नहीं दे सकते थे।
यहीं कैकेयी की भूल का सबसे करुण पक्ष खुलता है। वह भरत को इतना चाहती थीं कि उनके लिए सबके विरुद्ध खड़ी हो गईं, लेकिन यह जानना भूल गईं कि भरत स्वयं किसके साथ खड़े हैं। उन्होंने पुत्र के लिए संसार से लड़ने की तैयारी कर ली थी, पुत्र का मन समझने की नहीं। जिस राम को उन्होंने भरत के सुख के रास्ते से हटाया, भरत के सुख में उन्हीं राम का सबसे बड़ा हिस्सा था।
कैकेयी ने सोचा था कि राम चले जाएँगे तो भरत के लिए जगह बन जाएगी। भरत लौटे तो पता चला कि राम के बिना इतनी बड़ी अयोध्या में उनके लिए रहने लायक जगह ही नहीं बची है।
पिता नहीं रहे थे, भाई वन में थे, और माँ सामने बैठी थीं, अपने प्रेम के ऐसे परिणाम के साथ जिसे अब वापस नहीं लिया जा सकता था। भरत के लिए यह जानना कितना कठिन रहा होगा कि जिसने उनका सबसे अधिक भला चाहा, उसी ने उनके जीवन का सबसे असह्य दुःख तैयार कर दिया।
किसी शत्रु का किया हुआ अनर्थ समझना आसान होता है, माँ के प्रेम से निकले अनर्थ को मन कहाँ रखे?
चित्रकूट जाते हुए भरत के पास फिर भी एक उपाय था। वह राम को मना लेंगे, उनके चरण पकड़ लेंगे, अयोध्या लौटा लाएँगे, लेकिन लौटते समय वह उपाय भी साथ नहीं था। राम ने वनवास स्वीकार किया था और भरत को लौटना था। अब उनके सामने दो काम थे जो भीतर से एक दूसरे के विरुद्ध लगते थे। उस राज्य को सँभालना जिसके मिलने का उन्हें दुःख था, और उस भाई की प्रतीक्षा करना जिसके बिना उन्हें कुछ भी स्वीकार नहीं था।
पादुकाएँ लेकर लौटने में यही कठिन सहमति थी। अयोध्या को असहाय नहीं छोड़ेंगे, लेकिन राम की अनुपस्थिति को अपना राज्याभिषेक भी नहीं बनने देंगे। इसके बाद हम कथा के साथ वन की ओर बढ़ जाते हैं, भरत वहीं रह जाते हैं।
हमें राम के समाचार मिलते रहते हैं, हम जानते हैं कि वह कहाँ पहुँचे, किससे मिले, किस संकट में हैं, भरत को समझने के लिए कुछ देर यह जानकारी अपने पास से हटानी पड़ेगी। भूलना पड़ेगा कि समुद्र पार होगा, लंका में युद्ध होगा, राम विजयी होंगे। उनके पास भविष्य की हमारी कोई जानकारी नहीं थी। उनके पास भाई से हुई अंतिम भेंट थी, उनकी पादुकाएँ थीं और एक अवधि थी, चौदह वर्ष।
लेकिन अवधि बीत जाना और किसी का सकुशल लौट आना एक ही बात नहीं होती। हम भरत की प्रतीक्षा को अक्सर इतना सुंदर बनाकर प्रस्तुत करते हैं कि उसमें से उसका भय निकल जाता है। लक्ष्मण राम के निकट थे, संकट आए तो धनुष उठा सकते थे। राम थकें तो देख सकते थे। मौन हों तो पूछ सकते थे। भरत के प्रेम को यह छोटी सी सुविधा भी नहीं थी कि वह भाई का चेहरा देखकर जान ले, आज वह ठीक है।
दूर रहने वाले का दुःख कई बार घटना से नहीं, संभावना से बनता है। एक बादल यहाँ बरसता है और चिंता वहाँ की झोपड़ी तक चली जाती है। अपने सामने भोजन रखा जाता है और मन में किसी दूसरे की भूख उठ खड़ी होती है। रात अपने शरीर को ठंड लगती है और ध्यान उस व्यक्ति के ओढ़ने पर चला जाता है जो वहाँ है ही नहीं।
भरत के तप में नियमों से पहले उस भाई को देखना चाहिए जिसे अपने आराम के बीच दूसरे के कष्ट का अनुमान सताता होगा। और इसी प्रतीक्षा में उन्हें काम भी करना था। अयोध्या के लोगों के दुःख चौदह वर्ष के लिए स्थगित नहीं हो सकते थे। किसी का न्याय रुका था, किसी की आजीविका संकट में थी। भरत केवल अच्छे भाई बने रहकर अपने दायित्व से मुक्त नहीं हो सकते थे। उन्हें उस नगर के लिए उपलब्ध रहना था जिसके बीच वह स्वयं किसी और की अनुपस्थिति जी रहे थे।
यही उनके जीवन का सबसे कम दिखाई देने वाला श्रम है। सुबह उठकर फिर वह सब करना जिसे करते हुए मन कहीं और चला जाता हो। अपने दुःख को झुठलाए बिना किसी दूसरे की बात पूरी सुनना, और दिन ढलने पर फिर उसी प्रतीक्षा में लौट आना जिसे दिन भर का काम समाप्त नहीं कर सका।
रामायण सुनाते हुए हम उस स्थान पर जल्दी पहुँच जाना चाहते हैं जहाँ राम लौटते हैं, भरत के लिए जल्दी पहुँचने का कोई उपाय नहीं था।
फिर वह दिन आया होगा जब प्रतीक्षा के स्थान पर सचमुच राम खड़े थे। उस मिलन की कल्पना में मुकुट, पुष्प और जयकार थोड़ी देर पीछे कर दीजिए, पहले भरत की आँखों को अपने भाई का चेहरा देख लेने दीजिए। इतने वर्षों के अनुमान के बाद एक निश्चित चेहरा। इतनी आशंकाओं के बाद एक परिचित आवाज़। अब यह सोचने की आवश्यकता नहीं कि वह कैसे होंगे, वह सामने हैं।
और उस दिन कैकेयी ने भी अपने पुत्र को देखा होगा। जिसे राजा बनाने के लिए उन्होंने राम को वन भेजा था। वह राम को राज्य लौटाकर प्रसन्न था। चौदह वर्ष पहले माँ ने उसके लिए जो सुख चुना था, उससे मुक्त होकर पुत्र के चेहरे पर सुख लौटा था।
अयोध्या में राम का स्वागत हो रहा था, कैकेयी के सामने भरत का मन खुला पड़ा था। जिस बेटे के लिए उन्होंने दो वर माँगे थे, उसे खुश करने के लिए केवल इतना चाहिए था कि वे दोनों वर कभी न माँगे गए होते!

