
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
एक सार्थक जीवन की शुरुआत का पल
सुबू को, जाम को, ख़म को, शराब-ख़ाने को,
निगाहे-मस्त ने ठुकरा दिया ज़माने को।
शाइरी के ज़रिए ज़िन्दगी की हक़ीक़त बयां करने वाले शाइर रौनक बदायूनी का यह शेर बहुत सलीके से जीवन के अनेक रंगों की अहमियत का अहसास करवा रहा है। शेर के सामान्य अर्थ की तरफ़ और किया जाए तो यह सामने दिख रही चीजों के प्रति मोहग्रस्त होने और यहां से चलकर वास्तविकता की तह तक पहुंचने की बात कह रहा है। पहले मिसरे में ज़माने की चाहत मौजूद है तो दूसरे मिसरे में ज़माने को ठुकराने का जज़्बा। चाहत और हिम्मत के बीच बहुत कुछ ऐसा है जिसे बदलने में बहुत वक़्त लगता है। यह न होने को उम्र भर नहीं होता और होने को एक पल में हो जाता है।
शेर ज़िन्दगी में आने वाले इस परिवर्तनकारी पल की ही व्याख्या कर रहा है।शेर की परतें जब खुलती हैं तो यह एक सामान्य से अर्थ से कुछ अधिक ऊंचाई तक जाता प्रतीत होता है। इन दो मिसरों के बीच बहुत कुछ ऐसा है जो ज़ाहिर नहीं हो कर भी ज़ाहिर हो रहा है। उस बीच की सतह पर पहुंचने पर ही शेर की रूह तक पहुंचा जा सकता है। एक तरफ़ बहुत सी ख़्वाहिशें हैं जिन्हें हमने अपने जेहन में इकट्ठा कर रखा है। कभी किसी ख़्वाहिश को पूरा करने की चाहत में अपने जीवन को झोंक दिया करते हैं। जब इस ख़्वाहिश को पूरा करने में लगे होते हैं तो ख़्वाहिशों से भरा एक और पात्र दिखाई देता है। नई चाहतें उथाले मारने लगती हैं। नए अरमान जागने लगते हैं। इस तरफ़ से ध्यान हटता भी नहीं है कि एक पूरे के पूरे ख्वाहिशों के घर पर नज़र जाती है जहां ऐसी ख़्वाहिशें दिखाई पड़ती है जो और अधिक लुभाती हैं। यानी जीवन का एक बड़ा हिस्सा ख़्वाहिशों को देखने में ही बीत जाता है। एक समय महसूस होता है कि पूरा जीवन ही इन ख़्वाहिशों को देखते हुए ही गुज़र गया। कुछ हाथ लगा ही नहीं।
दूसरी तरफ इन इच्छाओं से परे हटकर देखना है। निगाहे मस्त ही इन इच्छाओं से परे देख सकती है। जिस दिन नज़र में यह तासीर पैदा हो जाती है वह ख़्वाहिशों के पात्र को ठोकर मार देती है। हाथों में आए इच्छाओं के प्याले को फेंक देती है। चाहतों के मटके को फोड़ देती है। और इच्छाओं के घर में क़दम रखना छोड़ देती है। यह शेर एक अर्थ यह भी दे रहा है कि इस ज़माने में कई तरह के नशे मौजूद हैं। दौलत का नशा , शोहरत का नशा, इज़्ज़त का नशा, चाहत का नशा और सबसे बड़ा अपने अहम का नशा। जब इंसान को ज़िन्दगी की हक़ीक़त समझ में आती है तो उस पर कोई नशा तारी नहीं होता। वह सब कुछ भूल जाता है। सब कुछ छोड़ना चाहता है। और यह तभी होता है जब वह हक़ीक़त से नज़रें मिला लेता है। सच्चाई से इंसान ज़िन्दगी भर रू-ब-रू नहीं हो पाता इसीलिए इधर-उधर भागता है। यहां वहां , कुछ न कुछ खोजता है। सब कुछ पाने के लिए बेताब रहता है। जिस दिन उसे सच्चाई का पता लगता है वह उसको साकार करने तरफ चल पड़ता है। वही उसे जीवन की वास्तविक मस्ती तक ले जाता है। बहुत आनंद देता है। जिस पल यह होता है, बस वही ज़िन्दगी का सार्थक पल होता है।
इस शेर को अगर तसव्वुफ़ के रंग में रंगा हुआ समझा जाए तो यह एक नए ज़ाविए की तरफ ले जाता है। यहां सुबु, जाम, ख़ुम और मयखाना इश्तियारे की तरह इस्तेमाल किए गए हैं। निगाहें मस्त भी ज़माने की तरह कुछ अलग संकेत ही करती है। दरअसल, यह सब जीवन के वे तत्व है जो इंसान को भटकाते हैं। जिस तरह हम काम, क्रोध , मोह, मद , लोभ को जीवन की वास्तविकता से दूर ले जाने वाले तत्व मानते हैं , उसी तरह इंसान को मदमस्त करते जीवन में कई कारण मौजूद होते हैं। कोई निगाह तभी निगाहे- मस्त कहलाती है, जब उसकी लौ अपने माशूक से लग जाती है। जिस दिन इंसान अपने महबूब को समझ लेता है , वह किसी और को समझना नहीं चाहता। फिर वह सब कुछ ठुकरा देता है। जिस पल इंसान की लौ उसके सबसे प्रिय से लग जाती है वह फिर कुछ नहीं चाहता। वह सिर्फ़ अपनी दुनिया में ही रहना चाहता है। लोग इस दीवानगी भी कहते हैं , पागलपन भी कहते हैं। मगर यही वास्तविक आनंद होता है जो भौतिकवादी दुनिया को भूलने पर विवश कर देता है।
एक सार्थक जीवन की शुरुआत इसी पल होती है।
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