
आलेख एवं फोटो- पूजा सिंह
स्वतंत्र पत्रकार
महंगी होती शिक्षा देश के गरीब, वंचित, निम्नमध्यवर्गीय परिवारों की राह को मुश्किल कर रही है। वे अपने बच्चों को पढ़ाना तो चाहते हैं लेकिन शिक्षा का लगातार महंगा होना उनकी राह रोक रहा है।
स्कूल खुल गए हैं। कॉपी-किताबें और ड्रेस बेचने वाली दुकानों पर पैरेंट्स की भीड़ लगी हुई है। एकदम पेशेवर अंदाज में काम हो रहा है। आप दुकान पर जाते हैं। दुकान के ढेर सारे कर्मचारियों में से किसी एक को बताते हैं कि आपको ‘अमुक स्कूल की तमुक कक्षा’ की किताब कॉपी चाहिए। दुकानदार आपको एक टोकन पकड़ा देता है। टोकन लेकर अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हैं। टोकन नंबर पुकारे जाने पर पेमेंट काउंटर पर जाते हैं, भुगतान करते हैं और कॉपी-किताब का बंडल ले लेते हैं। सब कुछ एकदम सरल-सहज और पारदर्शी। परंतु क्या वाकई ऐसा है?
यह सवाल मेरे मन में इसलिए उठा क्योंकि कक्षा दो में पढ़ने वाली अपनी बेटी के कॉपी-किताब खरीदने के लिए मैं भी इस प्रक्रिया में शामिल हुई। दरअसल, इस पूरी प्रक्रिया के मूल में कई समस्याएं हैं और वे समस्याएं शिक्षा के निजीकरण और व्यावसायीकरण की देन हैं। मैं वहां खड़ी-खड़ी देख रही थी। छोटे-छोटे बच्चे अपने माता-पिता का हाथ थामे उत्साहित से खड़े थे। एक-एक कर नाम पुकारे जा रहे थे। हर माता-पिता औसतन तीन से पांच हजार रुपये की किताबें और कॉपी खरीद रहे हैं। उनके चेहरे पर अलग-अलग भाव हैं। कोई खुश है तो कोई चिंतित। कोई पशोपेश में नजर आ रहा है। ऐसा होना स्वाभाविक भी है। महीने के आखिरी दिनों में पांच हजार रुपये की रकम कोई कम तो नहीं।
मैं सोचने लगी कि देश के लाखों-करोड़ों गरीब, वंचित और निम्नवर्गीय परिवार जिनकी यह आकांक्षा है कि उनके बच्चे-बच्चियां शिक्षा हासिल करके उन्हें उस जिंदगी से एक बेहतर जिंदगी की ओर ले जाएंगे, उनकी पढ़ाई लिखाई का क्या होगा? क्या वे इतनी महंगी शिक्षा वहन कर पाने की स्थिति में हैं। केवल वही नहीं मध्यमवर्गीय परिवार जिनकी जिंदगी नौकरी और ईएमआई के बीच संतुलन कायम करने में खर्च हो जा रही है। अगर उनकी नौकरी चली जाए तो क्या वे भविष्य में अपने बच्चों को इस स्तर की शिक्षा दे सकेंगे जो वे अभी दे रहे हैं।
शहरों में ऐसे कामगार बहुत बड़ी संख्या में रहते हैं जो दूसरे शहरों और प्रदेशों से एक बेहतर जीवन की तलाश में महानगरों में आते हैं। उनकी एक ही इच्छा है कि उनकी संतानों को वैसा जीवन न जीना पड़े जैसा उन्होंने जिया है। समाजविज्ञानियों द्वारा ऐसे वर्ग के लिए एक जुमला गढ़ा गया है- ‘आकांक्षी वर्ग’ यानी एस्पिरेशनल क्लास। इस शब्द से आपका पाला भी हाल में जरूर पड़ा होगा जब मध्य प्रदेश की सरकार ने विधानसभा में बेरोजगारों से जुड़े एक प्रश्न के उत्तर में कहा कि वह बेरोजगारों का नहीं बल्कि ‘आकांक्षी युवाओं’ के आंकड़े रखती है।
आकांक्षी वर्ग से तात्पर्य ऐसे लोगों से है जो शिक्षा, व्यवसाय या जीवनशैली के मामले में अपने जीवन को लगातार बेहतर बनाने के लिए प्रयत्नशील हैं। यह वह वर्ग है जो अच्छी तरह समझ चुका है कि उनकी और उनके बच्चों की बेहतरी अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पर निर्भर है। आश्चर्य नहीं कि अच्छे माने जाने वाले स्कूल कॉलेजों में इनका पंजीकरण लगातार बढ़ रहा है लेकिन इन बातों के बावजूद बढ़ती फीस और अन्य खर्च उनकी राह रोक देते हैं।
नेशनल सैंपल सर्वे ऑर्गनाइजेशन के आंकड़े बताते हैं कि जैसे-जैसे हम प्राथमिक शिक्षा से माध्यमिक और उच्च शिक्षा की ओर बढ़ते हैं, वैसे-वैसे गरीब, कामगार और निम्न वर्ग के परिवारों के बच्चों की संख्या कम होती जाती है। जाहिर है जब निजी स्कूलों की प्राथमिक शिक्षा पर ही सालाना 50-60 हजार रुपये का खर्च आ रहा है तो फिर माध्यमिक और उससे आगे की शिक्षा के खर्च के बारे में आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है।
इसके साथ ही उच्च शिक्षा की ओर बढ़ने पर कोचिंग एक अनिवार्य जरूरत हो चुकी है। डॉक्टर-इंजीनियर बनने की इच्छा पालने वाले बच्चों को स्कूल की फीस के अलावा लाखों रुपये की फीस कोचिंग में भी देनी पड़ती है। एक आंकड़े के मुताबिक देश के सबसे गरीब राज्यों में शामिल बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश में क्रमश: 72, 45 और 24 फीसदी बच्चे पढ़ाई के दौरान निजी ट्यूशन लेने पर मजबूर हैं। यहां तक कि कामगार वर्ग के लोग भी अपनी मामूली आय में बचत करके बच्चों को ट्यूशन पढ़वा रहे हैं ताकि वे पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन कर सकें।
इसके अलावा लैंगिकता का प्रश्न तो हमेशा से हमारे समाज का सच रहा ही है। ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ जैसे अभियानों के बावजूद भारतीय परिवारों में शिक्षा के मामले में बेटियों की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। खासकर निम्नवर्ग की बच्चियों को उनकी मांओं द्वारा बहुत कम उम्र से ही चौका-बरतन का प्रशिक्षण देने या अन्य कामों में लगा देने के कारण उनकी शिक्षा अधूरी रह जाती है।
शिक्षा पर काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन प्रथम फाउंडेशन की शिक्षा की स्थिति संबंधी वार्षिक रिपोर्ट भी इस मामले में जानकारीपरक आंकड़े मुहैया कराती है। वर्ष 2024 की उसकी रिपोर्ट कहती है कि स्मार्ट फोन की पहुंच अब सर्वव्यापी हो चुकी है। सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत लड़के-लड़कियों ने बताया कि उनके घरों में स्मार्ट फोन है। परंतु इन स्मार्ट फोन के मामले में लैंगिक अंतर एकदम स्पष्ट है। एक ओर जहां 36.2 फीसदी लड़कों के पास स्मार्ट फोन है वहीं केवल 26.9 फीसदी लड़कियों के पास ही स्मार्ट फोन है। एक और चिंतित करने वाला निष्कर्ष यह है कि स्मार्ट फोन का इस्तेमाल शिक्षा के लिए कम और सोशल मीडिया के लिए अधिक किया जा रहा है। प्रथम के मुताबिक केवल 57 फीसदी किशोर बच्चे स्मार्ट फोन का प्रयोग पढ़ाई के लिए करते हैं जबकि 76 फीसदी इसका उपयोग सोशल मीडिया के लिए करते हैं।
निरंतर महंगी होती शिक्षा के कारण अनेक गरीब परिवार अधर में लटक रहे हैं क्योंकि वे किसी तरह पैसे जुटाकर प्राथमिक शिक्षा तो पूरी करवा लेते हैं लेकिन उसके आगे की पढ़ाई के लिए उनके पास पैसे नहीं होते। भारत दुनिया का सबसे अधिक युवा आबादी वाला देश है ऐसे में यहां के युवाओं में शिक्षा की यह कमी भविष्य में त्रासद परिणाम लाने वाली साबित हो सकती है। शिक्षा की कमी और अत्यधिक आकांक्षी होने के कारण पैसे कमाने के शॉर्टकट अपनाने के दुष्प्रभाव हमें पहले ही सोशल मीडिया पर नजर आने लगे हैं, जहां कम उम्र के लड़के-लड़कियां फूहड़ और अश्लील कंटेंट तैयार करके वायरल होने की आकांक्षा के साथ लगातार सक्रिय हैं। महंगी होती शिक्षा के कारण पढ़ लिख कर आगे बढ़ने का उनका स्वप्न टूट चुका है लेकिन वे कामयाब होना जरूर चाहते हैं। उसका परिणाम इस फूहड़ता के रूप में सामने आ रहा है।
देश के नीति निर्माताओं को इस विषय में गंभीरता से विचार करना होगा। यह केवल महंगी शिक्षा का विषय नहीं बल्कि एक व्यापक सामाजिक-मनोवैज्ञानिक समस्या है जिसे समय पर हल करना होगा वरना आकांक्षी युवाओं से भरा हमारा देश बहुत खराब दिनों की ओर बढ़ रहा है।