
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
एक नए अर्थ को ध्वनित करता हुआ बुलंदी पर पहुंचा शेर
वो मेरी सांवली सूरत को तो देखे हैं मगर,
आईनों रूह का चेहरा भी दिखा दो उनको।
तरक्कीपसंद शाइरी के ज़रिए ज़िंदगी के मुख़्तलिफ़ ज़ावियों को अपने कहन के सांचे में ढालने का हुनर रखने वाले शाइर सिद्दीक़ रतलामी का यह शेर बहुत सादगी के साथ गहराइयों की तरफ़ ले जाता शेर है। लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो यह शेर बनावटी चेहरों, सजावटी चेहरों, दिखावटी चेहरों और मिलावटी चेहरों की भीड़ में दबे असल चेहरे को पहचानने की वकालत करता है।
यहां दृश्य और अदृश्य के बीच एक द्वंद्व की तरफ़ इशारा किया गया है। वह सब कुछ सच नहीं होता जो दिखता है और उसे नकारा भी नहीं जा सकता, जो नहीं दिखता है। ज़िंदगी में कई सारे पहलू बहुत सीधे नज़र आते हैं मगर जब उन्हें गहराई से समझा जाता है तो उनके भीतर कई अन्य पहलू भी दिखाई देते हैं। यहां भी जो कुछ है उसके पीछे की पड़ताल की जा रही है। सूरत सभी को नज़र आती है, सीरत किसी को नज़र नहीं आती। सूरत के पीछे ज़माना दीवाना होता है लेकिन सूरत के पीछे छुपी असली सूरत कोई देखने नहीं चाहता। शेर यह कहता है कि जो बाहरी स्वरूप देखकर किसी के व्यक्तित्व का आंकलन कर रहे हैं उन्हें भीतर उतरने की ज़रुरत है। नदी में उतरे बिना नदी की गहराई का अंदाज़ा नहीं होता। सूरत को देखकर किसी की सीरत का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सकता। मगर सवाल यह है कि इस असली सीरत को बताए कौन? क्योंकि जो भी देखने वाले हैं, वे सूरत के सांवलेपन को देखकर किरदार को भी वैसा समझ लेते हैं। ऐसे में सिर्फ़ आईना ही होता है जो असली सूरत बताता है। शेर ऐसे आईनों से दरख्वास्त करता है कि वे ज़माने को इंसान का वह असली चेहरा बताए जो इस नुमाइशी चेहरे के पीछे छुपा हुआ है।
एक अलग दृष्टि से इस शेर को समझा जाए तो यह शेर दो मानी पैदा कर रहा है। यहां इंसान का बाहरी सांवलापन भीतर के स्वरूप को लेकर संदेह ज़ाहिर कर रहा है। यह भी संभव है कि जो बाहर सांवला दिख रहा है, वह भीतर से सांवला भी न हो और बेहद काला हो। दूसरी तरफ़ यह भी संभव है कि जिसे बाहर सांवला समझा जा रहा है वह भीतर उजला हो। यानी बाहरी आवरण देखकर भीतरी आचरण की कल्पना नहीं की जा सकती। आचरण को समझने के लिए उस आईने की ज़रूरत होती है जो हमें हर वक़्त परखता है। ऐसा कहा जाता है कि कोई व्यक्ति कितना ही सज-धज कर सामने खड़ा हो लेकिन वह जैसे ही बोलता है उसकी असलियत सामने आ जाती है। यानी किसी इंसान की हक़ीक़त, उसके बोलने के अंदाज़ और उसके सलीके से ज़ाहिर हो जाती है। शेर इसी परख की बात कह रहा है। जो सामने दिख रहा है उसे कभी सही मत मानो। उसे अपने दिल के आईने से देखो तब उसकी हक़ीक़त समझ में आएगी। ज़िंदगी में कई लोग मिलते हैं जो अपनी मीठी बातों से बहलाते हैं मगर उनके भीतर पाप छुपा होता है। यह शेर भलाई के भीतर छुपी बुराई को पहचानने की गुज़ारिश कर रहा है।
यह शेर तसव्वुफ़ के रंग में रंगा भी नज़र आता है। देह और आत्मा यानी जिस्म और रूह के अंतर्संबंधों की व्याख्या यह शेर कर रहा है। कई पौराणिक संदर्भ इस व्याख्या को अपने तरीके से करते हैं मगर यहां देह की स्वीकार्यता और आत्मा की उपेक्षा की तरफ़ ध्यान आकर्षित किया गया है। अमूमन व्यक्ति की पहचान उसकी देह से ही होती है। आत्मा की तरफ़ कभी नहीं देखा जाता। जबकि हक़ीक़त में आत्मा के बिना देह का कोई औचित्य नहीं। जिस्मानी रिश्तों की उम्र अधिक नहीं होती और रूहानी रिश्तों की उम्र की कोई सीमा नहीं होती। शेर यह कहता है कि जो जिस्म को ही सब कुछ मान कर बैठा है उसे यदि रूह तक नहीं लाया गया तो वह ज़िंदगी के फलसफे से परिचित नहीं हो पाएगा। इस सफर में जिस्म से रूह तक लाने वाला आईना और कोई नहीं वह इंसान का मुताला और मुशाहिदा है। जब तक चिंतन और अध्ययन रूपी आईने इंसान की आंखों के सामने नहीं आएंगे वह रूह के स्वरूप को नहीं पहचान पाएगा और सिर्फ़ जिस्म के दायरे में सिमट कर रह जाएगा। इस दृष्टि से शेर बहुत बुलंदी पर जाकर एक नए अर्थ को ध्वनित करता है।
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