Women’s Day: एक सुकन्या मर्यादा व परंपरा की जमीन पर खड़ी है तो ‘हेती’ की नायिका स्व अस्तित्व के आधारतल पर
- टॉक थ्रू टीम
एक पौराणिक कथा है, ऋषि च्यवन की कथा। ऋषि के श्राप से भयभीत राजा द्वारा पुत्री सुकन्या के विवाह की कथा। सुकन्या के पतिव्रत की कथा। देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमार के सुकन्या पर मोहित होने की कथा। बूढ़े ऋषि च्यवन के यौवन प्राप्त करने की कथा। इस कथा के अनुसार च्यवन ऋषि अपनी पत्नी आरुचि की अकाल मृत्यु पश्चात विरक्त भाव में सरोवर के निकट तपस्या में लीन थे एवं उन की दीर्घकालीन तपस्या के कारण उनके शरीर को दीमक की बाम्बी ने ढंक लिया था। मात्र उनके नेत्र के स्थान पर दो सुराख थे। जहां से देखने पर उनकी आंखें चमकती दिखाई देती थी।
उस समय राजा शर्याति अपनी पुत्री सुकन्या, पुत्र अनार्त और रानी इत्यादि के संग भ्रमण पर गए थे। काफिला उसी जगह रूका जहां ऋषि च्यवन तपस्यारत थे। राजकुमारी सुकन्या की नजर बाम्बी पर पड़ी। बाम्बी के दो छिद्र से रोशनी आ रही थी। यह देखकर राजकुमारी को कौतूहल हुआ। सहज जिज्ञासा में चंचल राजकुमारी सुकन्या ने घास उठाकर उस छिद्र में डाल दिया। उस तिनके से ऋषि की एक आंख चोटिल हो गई। राजकुमारी सुकन्या वहां से चली गई लेकिन ऋषि ने उसे अहंकारी, दंभी व अभिमानी राजकुमारी मानते हुए अपनी इस पीढ़ा की सजा के रूप में सुकन्या को प्राप्त करना चाहा। ऋषि च्यवन के श्राप के भय से राजधर्म को पितृ धर्म पर वरीयता देते हुए राजा ने शर्याति ऋषि च्यवन की सुकन्या से विवाह की मांग को स्वीकार कर लिया।
बाद की कथा के अनुसार एक दिन देवताओं के वैद्य अश्विनी कुमारों की नजर सुकन्या पर गई और वह उस पर मोहित हो गए। इन्होंने सुकन्या के सामने विवाह का प्रस्ताव रखा लेकिन सुकन्या ने इनकार कर दिया। सुकन्या के पतिव्रत से प्रसन्न होकर अश्विनी कुमारों ने वरदान मांगने के लिए कहा। सुकन्या ने कहा कि आप देवताओं के वैद्य हैं इसलिए आपसे यही वरदान चाहती हूं कि मेरे पति को युवा बना दीजिए और दृष्टि लौटा दीजिए। अश्विनी कुमारों ने महर्षि को दिव्य सरोवर में स्नान कराया और जैसे ही महर्षि च्यवन जल से बाहर आए वह युवा नजर आने लगे। यहां भी अश्विनी कुमारों ने सुकन्या के पतिव्रत की परीक्षा ली। दरअसल सरवोर से निकलने के बाद ऋषि भी अश्विनी कुमार की तरह दिखने लगे थे। उन्होंने कहा कि तीन में से पहचानो तुम्हारे पति कौन हैं। सुकन्या ने पति को पहचान लिया। बाद में ऋषि च्यवन ने अपने तपोबल से देवताओं की भांति अश्विनी कुमारों को भी यज्ञ में सोमपान का अधिकार दिलाया।
हम बरसों से इस कथा को इसी दृष्टि से देखने-सुनने के आदि थे लेकिन इसी पौराणिक कथा को आधार बनाकर लेखक सिनीवाली ने एक उपन्यास लिखा है; ‘हेति- सुकन्या: अकथ कथा’। सिनीवाली का यह पहला उपन्यास है और उन्होंने पौराणिक कथा को अपनी दृष्टि से नया कोण दिया है।
‘हेति’ का अर्थ होता है, अस्त्र या आघात। सिनीवाली शर्मा के ‘हेति’ की नायिका सुकन्या आज्ञाकारी तो हैं लेकिन ‘मौन’ नहीं। उसके मुखर प्रश्न हैं जो आघात की तरह है। सुकन्या का आत्मबल, स्व-तेज और स्वाभिमान पिता और पति के लिए आघात ही है। सिनीवाली शर्मा अपने पहले उपन्यास में सुकन्या के अंतर्मन की पीड़ा को दर्ज करते हुए समकालीन स्त्री के संघर्ष और विजय की कथा रच देती हैं। यह सच है कि ‘हेति’ का कथानक वैदिक काल की पौराणिक गाथा पर आधारित है। लेकिन हमें अधिकांश उपन्यास में पंक्तियों के बीच में एक खास संदर्भ दिखाई देता है, वर्तमान पितृ सत्तात्मक समाज में स्त्रियों की स्थिति का रेखांकन। ‘हेति’ की सुकन्या स्त्री चेतना की नायिका बन कर उभरती है। वृद्ध होते हुए भी सुकन्या से विवाह को ऋषि च्यवन ने स्वयं को पहुंचे कष्ट के प्रतिशोध के रूप में देखा। यह भावना उन्हें संतुष्ट करती रही। लेकिन एक स्वाभिमानी स्त्री के लिए तो पिता का निर्णय अलग तरह के प्रश्न से जुड़ा था।
च्यवन ऋषि क्रोध से कांपते हुए पिताश्री के निकट आकर बोले, “हे औनिप दंभ के लिए क्षमादान नहीं दिया जाता। बल्कि उसे मर्दित किया जाता है।”
उनकी दुर्बल काया से विनाशकारी ध्वनि निकली। घमंड से उन्मत तुम्हारी पुत्री से मैं विवाह करूंगा। इसी में तुम सबका कल्याण है।
“विवाह…”
ये सुनते ही सहस्त्रों उल्का पिंड एक साथ मुझ पर गिर पड़े।
क्या विवाह शब्द इतना विस्फोटक, इतना विध्वंसकारी हो सकता है तो क्या विवाह करके मुझे दंडित करना चाहते हैं? क्या विवाह दंड का पर्याय है?
मुझे दर्पी कह रहे हैं जबकि स्वयं तपोबल के दर्प से चूर हैं। ये कैसे तपस्वी हैं जिनमें प्रेम, करुणा, क्षमा आदि मानवीय गुण भी नहीं वरन तामसी प्रवृत्ति की लपटें उठ रही हैं?
एक पौराणिक सुकन्या थी, जिसने सिर झुकाकर पुत्री धर्म तथा पत्नी धर्म का पालन किया और एक ‘हेती’ की सुकन्या है जो शाप से पिता के राज्य की रक्षा के लिए ऋषि से विवाह तो कर लेती है। वह उनकी सेवा-सुश्रुषा में किसी प्रकार की कमी भी नहीं होने देती है लेकिन खुद को ऋषि के सामने कभी समर्पित नहीं करती। ‘हेती’ की सुकन्या का ‘न’ कहने का साहस उसे सशक्त बना देती है। पत्नी धर्म को निभाते हुए भी वह अपने मान का मर्दन नहीं होने देती जबकि ऋषि क्रोध में कहते हैं कि, “घमंड से उन्मत्त तुम्हारी पुत्री से मैं विवाह करूंगा। इसी में तुम सब का कल्याण है।” और पिता राज्य कल्याण के लिए ऐसा करने को तत्पर हो जाते हैं तब ‘हेती’ की सुकन्या का आत्म प्रलाप, उसके प्रश्र मन को झकझोर देते हैं। वह सोचती है,
“पिता! मेरे जनयिता! महाराज शर्याती इस राज्य के दिनमणि हैं। उनका मुख ऋषि वाणी ने अवसन्न क्यों कर दिया? इस खल को उसकी धृष्टता का दंड क्यों नहीं देते? हे नरदेव, हे नृपाल, आप इनके इस दुस्साहस पर क्यों मौन हैं? आपसे ये जग क्या शिक्षा ग्रहण करेगा? आपका दंडालय, आपका न्याय यदि अशक्त रहेगा, इस घोर अनर्थ के पश्चात भी मौन रहेगा तो आप स्त्री जाति के अधिकार हनन के उत्तरदायी होंगे। क्या मात्र ऋषि हो जाना ही इनके पूजनीय होने के लिए यथेष्ट है?”
‘हेती’ की सुकन्या पिता के राज्य और उनके सम्मान की रक्षा के लिए अपनी बलि तो दे देती है किंतु आगे वह पिता को पिता नहीं मात्र राजा समझती है और वन में उनके द्वारा भेजे गए अन्न तथा दूसरी आवश्यक वस्तुओं को अस्वीकार करते हुए कहती है,
“महिपति की सेवा में ऋषि पत्नी सुकन्या का प्रणाम निवेदित कर कहिएगा, ये भेंट, ये कृपा विवाहित महर्षि स्वीकार नहीं कर सकते। इस कुटिया में राजभेंट को रखने योग्य उचित स्थान भी नहीं है कि मैं इन्हें सम्मानपूर्वक रख सकूं। महाराज से कहिएगा मुझे क्षमा करें।”
विवश राजकुमारी सुकन्या ने वृद्ध ऋषि के अधीन रहना स्वीकार किया लेकिन जीवन की विपरीत परिस्थितियों से संघर्ष किया, आश्रम में विभिन्न औषधियों के वृक्ष लगाए, रोगियों का उपचार किया। उसका सुख इन्हीं कायों में था। इन्हीं में वह धीरे-धीरे अपने स्व को ढूंढ रही थी। सुकन्या ऋषि के साथ वैवाहिक जीवन में प्रेम और काम की महत्ता पर इतनी प्रखरता से वार्तालाप करती है कि महर्षि के सारे तर्क धराशायी हो जाते हैं। ऋषि च्यवन विवाह कर संतुष्ट थे लेकिन सच तो यह है कि वे उस मानिनी राजपुत्री सुकन्या की काया को ही अपने संग ला सकने में सफल हुए हैं। उसका मन नहीं जीत पाए। वह संगिनी तो अवश्य बनी किंतु भार्या नहीं। अंत में एक प्रश्न उपजता है कि क्या पुरुष विवाह के बाद सचमुच स्त्री को पा लेता है? विवाह उपरांत ‘हेति’ की नायिका सुकन्या की दो यात्राएं शुरू होती हैं। एक पत्नी के रूप में तथा एक स्त्री के रूप में स्व की यात्रा।
लेखक सिनीवाली शर्मा ने पौराणिक कहानी को उसकी गुथन के साथ आधुनिक रंग में ऐसा रचा है कि यह हमारे समय की स्त्री चेतना और आत्माभिमान की नजीर बन जाती है। पौराणिक संदर्भ सुकन्या के चरित्र को सति तथा एक निष्ठा के साथ महिमामंडित करते हैं जबकि ‘हेती’ में सिनीवाली शर्मा अपनी सुकन्या को आत्म बोध व चैतन्यता के साथ प्रस्तुत करती है। दोनों कथानकों में नायिका तो सुकन्या है मगर दोनों के धरातल अलग हैं। एक मर्यादा और परंपरा की जमीन पर खड़ी है तो ‘हेती’ की नायिका स्व अस्तित्व के आधारतल पर।
उपन्यास की भाषा शैली विशिष्ट है। कहानी की मांग के अनुरूप सिनीवाली शर्मा ने संस्कृत निष्ठ भाषा अपनाई है। उपन्यास की कथा की ही तरह इसकी भाषा भी रोचक और जिज्ञासा जगाती है। नई हिंदी के दौर में इस भाषा को साधना और ‘हेति’ जैसा उपन्यास लिखा जाना किसी तपस्या से कम नहीं है। तप में बाधाएं, कष्ट न आए, ऐसा हो सकता है क्या? इस उपन्यास के लेखन के वक्त भी कई परेशानियां, दिक्कतें, संकटों ने घेरा होगा, इस सवाल का जवाब सिनीवाली शर्मा ही देती हैं वे लिखती हैं,
लेखक जब लिख रहा होता है तो ऐसा नहीं होता कि समय का कोई टुकड़ा निश्चिंतता से उसके पास आ जाए। कई सारी आज की जरूरी जिम्मेदारियों को किसी तरह कल पर टाल दिया जाता है। यह सोच कर कि बस यह कहानी पूरी हो जाए फिर देखते हैं…!
उपन्यास लिखते हुए उन सारे दर्द को अपनी आंखों में भींच लिया जो केवल और केवल आंख भरने आ जाते थे।
जब कलम रूकने लगती, पिताजी कहते,”लेखक योगी होता है। वो किसी का अपना नहीं होता। इसलिए जब लिखने जाओ सबको भूलकर जाओ।” फिर दृश्य रचने में डूब जाती थी। एक-एक शब्द, एक-एक दृश्य रचने का सुख-दुख ही लेखक के तलघर का खजाना होता है।
‘हेति’ महज एक कथा नहीं है। यह पौराणिक कथा के आगे एक विमर्श का आधार खड़ा करती है। कहानी खत्म हो जाती है पर इसके सवालों की गूंज देर तक पाठक के मन-मतिष्क में ठहरी रहती है। जैसे, सुकन्या का यह कहना:
“मेरा सौंदर्य! मेरे लिए हर्ष और मानका विषय था परंतु यह किंचित भी भान न था… मेरा हर्ष मेरा मान मेरा ही शत्रु बन जाएगा! तभी तो मेरे धर्मपति ने…! ज्ञात है मुझे धर्म एवं यह जग मुझे धर्मपति पर प्रश्न उठा करने की अनुमति नहीं देता परंतु अनुमति नहीं देने से प्रश्न समाप्त तो नहीं हो जाता?”
अहम् बात है कि इस कथा को हम दशकों से पढ़ते आए हैं, लेकिन सिनीवाली शर्मा ने इसे नई दृष्टि से देखा है। इस दृष्टि के लिए उन्हें बधाई।

पुस्तक का नाम: हेती- सुकन्या: अकथ कथा
लेखक: सिनीवाली शर्मा
प्रकाशन: रुद्रादित्य प्रकाशन समूह
कुल पृष्ठ: 191
मूल्य: 300 रुपए

