युवा कविता

सुदर्शन व्यास
मध्यप्रदेश के युवा कवि एवं पत्रकार
मध्य प्रदेश के भोपाल के युवा पत्रकार और कवि सुदर्शन विश्वेश्वर प्रसाद व्यास के दो काव्य संग्रह ‘रिश्तों की बूंदें’ व ‘सुन रही हो न तुम’ तथा एक समीक्षा पुस्तक ‘सत्ता के दो दशक’ प्रकाशित हो चुके हैं। ग्राम्य जीवन के साथ रिश्तों और प्रेम की महीन गुंथन उनकी रचनाओं की विशिष्टता है। उनकी रचनाओं में शब्दों का आडंबर नहीं भाव की सादगी झलकती है। युवा कविता के तहत प्रस्तुत हैं सुदर्शन व्यास की चुनिंदा रचनाएं।
(1)
कच्चे खपरैल के मकान
जहाँ गाय के गोबर से लीपा फर्श,
उसकी सौंधी सुगंध मन को
शांति और ताज़गी से भर देती है।
यक़ीनन गांव में रेशम के
धागों से बने रिश्तों में
कितनी पवित्रता और
भावनाएं है,
महत्व है खून के रिश्तों से बढ़कर
मुंह बोले रिश्तों में..।
मेरे गांव में ऐसी ही
एक मुंह बोली बुआ रहती थी।
जिन्हें प्यार से हम
चक्की वाली बुआ कहते थे।
मन उदास होता था,
तो हक़ से चले जाते उनके घर।
कभी तो घर से चोरी-छिपे भी
मक्के, ज्वार और बाजरे की रोटियां खाने
चूल्हे पर कण्डों और
सूखी लकड़ियों से पकाया खाना
भावनाओं, प्यार और आत्मीयता के
लाजवाब मसालों से
मिलकर बनाया जाता है।
कितना विश्वास और
स्नेह होता है आज भी उन रिश्तों में,
जिन्हें मुंह बोला कहा जाता है।
अभी ज्यादा दिन नही गुज़रे,
कुछ ही दिनों पहले की तो बात है..
बस समय बदल रहा है।
खाने के स्वाद और
जायके के साथ आजकल
रिश्तों में भी हैसियत का
स्वाद देखा जाता है।
ज़रूरत का जायका देखा जाता है,
भावनाओं और अपनेपन की
मिठास रह गई है
राई के दाने समान।
(2)
किया था वादा लहरों ने साहिल से,
कि लाख कोशिशें हो जाए
हमें जुदा करने की,
लेकिन मैं हमेशा आऊंगा लौटकर
पास तुम्हारे..।
किया था वादा चंदा ने भी सुहानी रात से,
कि जिस सूरज की तपिश और
चकाचौंध से हमें बिछुड़ना पड़ा,
उसी दिनकर की रोशनी से
सुनहरी धरती और नीले अंबर को
अपने दुधिया रंग में सराबोर कर दूंगा..।
किया था वादा चातक से
जल की उस बूंद ने भी,
कि आउंगा स्वाती के साथ
अंबर से सीधे तुमसे मिलने,
बस खोलकर रखना मुख मंडल के द्वारा
ताकि रुह में समाकर
इंतज़ार की तड़प को महसूस कर सकूं..।
यकीनन, वादा हर उस प्रेमी की
भीष्म प्रतिज्ञा का प्रतिमान है,
जो अपने प्रियतम से हुए बिछोह को
दूर कर सकता है..।
वादा, प्रेम की शांत प्रतिज्ञा है,
ज़िद है, जुनून है, जैसे लहरे
साहिल से मिले बिना नहीं रह सकती,
जैसे चांद रात बिना नहीं रह सकता,
जैसे चातक स्वाती बिना नहीं रह सकता।
वैसे ही नहीं रह सकता
‘वादे’ के बिना ‘प्रेम’…।
(3)
धरोहर
जो प्रतीक है हमारी संस्कृति
और सभ्यता की,
जो मानक है हमारी विरासत की,
जो पहचान है हमारी अस्मिता की।
जो हमारे बचपन को मरने नहीं देती कभी
और नहीं मरने देती वे भीनी यादें भी,
जिन्हें महसूस कर ज़िन्दगी के
फ़लसफ़े सीखे कई हमने।
वो सहेजी जाती हैं,
ताकि गुफ़्तगू कर उनसे,
हम लौट सकें अपनी ज़िन्दगी में।
धरोहर सरीखे हमारे बुज़ुर्ग
हर घर में आज भी खड़े हैं अविरल से
नवेली और स्वार्थी (आत्ममुग्ध)
पीढ़ी से बात करने के लिए।
कुछ उनका सुनने के लिए
और कुछ अपना सुनाने के लिए।
यक़ीनन,
निर्जीव इमारतों (धरोहरों) को
निहारने का समय विशेष
हम पा लेते हैं लेकिन,
अपने घर मौजूँ जीती – जागती
‘धरोहरों’ संग मुस्कुराने का
सलीक़ा भी हम नहीं रखते।
(4)
सुनो न
बहुत बार पूछा है न मैंने
क्या हम मिल पाएंगे कभी?
और तुम हर बार कहती हो, बिल्कुल…
एक दिन जरूर
तुम्हारा ये आश्वासन
मेरा विश्वास बढ़ा देता है हर बार…
जानती हो,
तुमसे बातें होते ही सारे दिन की उदासी
मुस्कुराहट में बदल जाती है कुछ ही क्षणों में…
मन में आता है कि तुम्हे छूकर देखूं
जब विचलित हो हृदय
तो तुम्हारे कांधे पर उड़ेल दूं, दुःख सारा…
फिर याद आता है कि
तुम्हे छूकर महसूस करना
अपलक निहारना या तुम्हारे साथ चलना
संभव कहां है अभी
तुम दूर हो मुझसे
मीलों दूर…
हां, मगर प्रतीक्षा,धैर्य और विश्वास है कि
तुम मिलोगी जरूर…
सुन रही हो न तुम…
(5)
जानती हो…
जब शब्द नहीं पहुंचते तुम तक तो
चुप्पी पहुंचाने की कोशिश करता हूँ।
जैसे प्रार्थना के क्षणों में
कोई ईश्वर को याद करता है।
मेरा आस्तिक होना,
मेरे प्रेमी होने का सबूत भर है
और ईश्वर मेरे लिए,
तुम्हारे होने की परछाई भर है।
जब मैं कहता हूँ कि
हे ईश्वर, बारिश से नम करो।
पृथ्वी और मन प्यास से सूखा जा रहा है,
तो यह ईश्वर से
‘तुम्हारी याद आ रही है’
कहना भर ही है।
सुन रही हो न तुम…
(6)
मुझ जैसे लोग नहीं बदलते
कभी किसी और के लिए!
वो सहना जानते हैं हर दर्द
लेकिन कहना उन्हें पसंद नहीं होता अक्सर!
ऐसा नहीं कि वो भावनाएँ बाँटना नहीं चाहते,
बस वो समझ चूके होते हैं।
वे जानते हैं महाभारत का युद्ध जीतने की कला भी
परंतु ऐसा युद्ध वे जीतना ही नहीं चाहते
जिसमें अपनों और प्रेम की बलि शामिल हो।
मुझ जैसे लोग
पूरी निष्ठा से निभाते हैं
सभी रिश्तों की मर्यादा
लेकिन अक्सर ठगे भी जाते हैं।
ऐसा नहीं कि उन्हें मालूम नहीं होती सच्चाई,
सब जानते हुए भी बस
मुस्कुराकर माफ कर दिया करते हैं।
मुझ जैसे लोग
अपने हृदय पर बार – बार
तीखे आघात सहते हुए भी
देना नहीं भूलते प्रेम और सम्मान।
ऐसा नहीं है कि
उनके आत्मसम्मान पर नहीं लगती हैं चोटें
बस वो किसी को नफरत लौटाना नहीं चाहते।
मुझ जैसे लोग अक्सर
समझदार लोगों की नज़रों में
बेवक़ूफ़ होते हैं!