bhopal gas tragedy

ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है

समझ में आ गया साधु और भिखारी में यही अंतर है। वैसे हम दोनों ही बिना टिकट हैं। पर हम से होने वाला व्यवहार एकदम अलग-अलग है।

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वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया

बस, वृंदावन की गलियां में चलते चले गए। वृंदावन की गलियों का जिक्र तो कई गानों, भजनों में है, लेकिन प्रत्यक्ष देखने का मौका अभी मिला। वह अनदेखा जैसे अब साकार हो रहा है।

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‘कठघरे में साँसें’: क्‍यों पढ़ें यह किताब?

यह किताब इसलिए पढ़ी जानी चाहिए कि यह लेखक की आत्‍मकथा नहीं उस शहर भोपाल की आत्‍मकथा है जिसने अपने बाशिंदों को बदहवास सड़कों पर दौड़ते देखा है, जो आज भी उन्‍हें दम तोड़ते देख रहा है।

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