जीवन महज एक अनुभव है, हमें जिसे केवल देखना है

राघवेंद्र तेलंग

सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता

अपने अंदर भरे हुए द्वंद्व, खलबली, बेचैनी, उद्वेग को उलीचने के लिए जरूरी होता है कि विचारों के झंझावात से मुक्ति पाई जाए। विचारों की धूल झड़ जाने पर आप पाएंगे कि उनके रहते इस दुनिया का असली सौंदर्य आपके सामने कभी आ ही नहीं सकता था। सोचने वाली बात यह है कि ऐसा क्या किया जाए कि इस दर्पण में दिखाई देता दुनिया का अस्पष्ट, धुंधला, उदास, झुर्रीदार चेहरा साफ-सुथरा ताजा दिखाई दे। इसके लिए सतत प्रश्नों की बुहारी, झाड़ू से काम लेना होगा। सारे दृश्य में अस्तित्व के उत्तर हैं, उन्हें देखते हुए और लगातार अपने-आपसे प्रश्न करते रहने से एक दिन तस्वीर की सारी शिकन, सिलवटें दूर हो जाती हैं। फिर अंतत: आप उस एक सवाल पर आ टिकते हैं जिसके हर उत्तर पर सवाल ही सवाल उठते चले जाते हैं। ऐसा सवाल फिर सवाल नहीं रह जाता जीने का सलीका बन जाता है, अनुभव बन जाता है। अपने बारे में सराहना, एप्रीसिएशन, वेरीफिकेशन, प्रामाणिकता, मान्यता के सुर बाहरी दुनिया के शोर में मत ढूंढिए। आपकी वह आवाज आपके ही भीतर है उसे सुनिए, पहचानिए। जिंदगी जब तक अनुभव में नहीं आती तब तक वह सवाल ही बनी रहती है यह तथ्य भलीभांति फिर समझ आ जाता है।

ऐसे में ही प्रेम बरस पड़ता है। जो रोशनी में संभव है वह प्रेम ही है। प्रेम से ही दुनिया में सारे काम हो रहे हैं। हां! प्रेम मगर काम नहीं है, वासना नहीं है, वह तो खुद रोशनी है। तभी तो जब प्रेम होता है तो आंखें खोल देता है। जागने-जगाने का नाम है प्रेम। याद रहे प्रेम में जागरण हो जाता है। जागा हुआ व्यक्ति ही प्रेम कर सकता है। प्रेम जगाकर रोशन कर देता है। प्रेम में चेहरा नूरानी हो जाता है। एक सितारे के साथ दिल मिल जाना यूनिवर्स की तरंग को छू लेना है, जहां प्यार की तरंग के सहारे हर दिशा की ओर सवारी की जा सकती है। प्यार की यह तरंग जिसमें भी है उसके भीतर तरंग बनकर ही प्रवेश किया जा सकता है। यह अपने भीतर भी प्रवेश करने का सूत्र है, बशर्ते आपको अपने आप से प्रेम हो। एक कण और एक और कण के बीच एक ही रासायनिक बंधन की उर्जा काम करती है। अगर आप हैं तो आपके भीतर एक और दूसरे प्रकार के ध्रुव का कण है। दोनों की आकृति आईडेंटिकल या एक समान हो जाए तो फिर मिलन की परिणामी ऊर्जा अपने आप उत्पन्न हो जाती है। हां! यही प्यार है। हां…!, हां…!, यही प्यार है! सारा मामला अपने से मिलने का है, फिर उनसे मिलने का है जो प्राकृतिक रूप से सौ प्रतिशत आपके हैं। फिर पूरे सौ के वातावरण में सदा बने रहने का है। अपनी तलाश का प्रश्न अपने नाभिक की ऊर्जा तक ले जाता है।

ऊर्जा का मौलिक गुण होता है कि वह स्वतंत्र रहना चाहती है, बंधकर रहना उसे भाता नहीं। मनुष्य के अंदर की बेचैनी दरअसल ऊर्जा के स्वतंत्र होने की इच्छा की तड़प का ही नाम है। ऐसा हर कण यानी पार्टिकल के अंदर मौजूद ऊर्जा का स्वभाव है वह मुक्त होकर ही रहना चाहती है। दो ऊर्जाओं का आंतरिक स्वभाव एक-दूसरे के साथ सामंजस्य बैठाते हुए अंतत: आपस में विलीन होना, मर्ज हो जाना है। ठीक दो एक तरह की सुगंध के मेल के जैसा।

जब भी किसी कण में टूटन या विखंडन जैसी परिस्थितियां निर्मित होती हैं, तो वह टूटकर अन्य नए ऊर्जा से भरे छोटे-छोटे कणों में बिखरता है। बिखराव की यह ऊर्जा ही कण के छोटे-छोटे टुकड़ों से विस्तार का कारण बनती है और फिर यह ऊर्जा उस घटना-क्षेत्र की धुंध को भी प्रकाशित कर देती है। इस टूटन या विखंडन के दौरान जहां कण (पुराने) के बिखराव की प्रकृति स्थिरता पा जाती है, वहीं ठीक उसी समय नए तरह के कणों का जन्म भी गतिशीलता के गुण के साथ होता है। कण और तरंग के आपसी संबंध अटूट होते हैं। सापेक्षता सिद्धांत के अनुसार स्पंदित यूनिवर्स में कण स्पेस को बताता है कि उसे उसकी खातिर कहां और कितना वक्रीय होना है। वहीं ठीक इसी के बरक्स स्पेस कण को गाइड करते हुए उसे बताता चलता है कि उसे इस अनंत की यात्रा में आगे कैसे, कहां और किस ओर बढ़ना है।

इस बार हंसध्वनि के मंच पर हम फूल की तरह निर्झर होकर भीतर के सुख से भर जाने के अहसास को शब्दों से छूकर देखने की कोशिश कर रहे हैं।

हर सवाल आपको परिमार्जित करने के लिए उपजता है। हर सवाल आपको रूपांतरित करने के लिए है, म्यूटेट करने के लिए है। हर सवाल अपने मौसम में पैदा होता है। वह प्रकृति का संकेतक होता है। प्रकृति आपकी जिज्ञासा, प्रश्न के माध्यम से आपको अपने पास बुलाती है, आपसे संपर्क साधती है। और फिर वह एक दिन भी आ ही जाता है जब आप इन सारे प्रणय संकेतकों को बूझ लेते हैं। फिर तो प्रकृति, यूनिवर्स, ईश्वर स्वयं अपने अंदर के सारे ज्ञान का कीमिया आपके भीतर उड़ेल देते हैं। एक दिन सारा धुंधलका साफ हो जाता है। उस एक दिन के बाद आप पाते हैं कि ज्ञान की सत्य अनुभूति-अनुभव ही वास्तविक ज्ञान की किताब है। समझ आता है कि किताबी ज्ञान के जरिए अनुभव के वास्तविक रूप का स्वाद मिल पाना असंभव है। आप पाते हैं कि सत्य का सही स्वरूप जीवन के नित नव प्रवाह में और उसके अनुभव में है। अब तक जिन भी शब्दों, वाक्यों और अर्थों से आपका पाला पड़ता आया वे नितांत पुरातन थे या फिर कहते ही पुराने, बासे पड़ जाते थे। आप समझ जाते हैं जीवन सहित आसपास का यह सब वास्तव में वर्तमान का अनुभव है केवल। बाकी भूत और भविष्य का कहीं अस्तित्व नहीं है वे सिर्फ संकल्पनाएं हैं मन को बहलाने के वास्ते। यह तथ्य समझ आते ही आप जीवन दुख क्यों है के प्रश्न का उत्तर पा जाते हैं।

जबकि आप जानते ही हैं कि शरीर हर पल नई कोशिकाओं के जन्मने और पुरानी कोशिकाओं के मरने की कंटीन्युअस कार्यप्रणाली का नाम है। हमें इसी नित नए स्वरूप के मुताबिक नूतन अनुभवों से संपृक्त होते चलना है। पुरानेपन पर आधारित जो भी होता है डेड होता है, निष्प्राण होता है। सारी सूचनाएं, भावनाएं, तर्क भूतकाल में से आए हुए अनुभव हैं। हर कहा हुआ कहते ही पुराना है। समय का, जीवन का, अस्तित्व का अनुभव सिर्फ वर्तमान में है। ऊर्जा हमेशा वर्तमान को ही अनुभव के रूप में वरदान स्वरूप मिलती है। इस तरह जीवन महज एक अनुभव भर है, हमें जिसे देखना भर है। तभी तो इस देखने की प्रक्रिया में रहकर उस माध्यम में डूबकर, प्रवाह में शामिल बने रहकर आपको साइलेंस में बने रहना होता है, चुप्पई-चाप! जीवन के बहाव को दम साधे हुए ही देखा जा सकता है। वर्तमान के इस दर्शन को जो समझ ले वही असली दर्शक है, साक्षी है।

यह जीवन प्रणाली मनुष्य को अपने मुताबिक सुपरकंडक्टर बनाने के लिए इसलिए नित प्रयासरत रहती है क्योंकि उसका बिहेवियर नेचुरल नहीं है, वह प्रकृति से सतत झूठ बोलकर जीता है। जबकि यह नकली जीवन प्रकृति के साथ उसके ही एक जीव द्वारा की जा रही उसके साथ हिंसा है। अपने विरूद्ध कार्य करने वाले कार्यकर्ता को कोई भी सिस्टम जीवन या संरक्षण नहीं देता। प्रकृति का चक्र अहिंसा पर आधारित है यानी इवोल्यूशन के जरिए जीवन के संरक्षण और संवर्धन की एक कार्यप्रणाली। यह इवोल्यूशन सतत् एंटीग्रेविटी की दिशा की ओर अग्रसर रहता है, कह सकते हैं वर्टिकली अपवर्ड के डायरेक्शन में। तो विकास की यह दिशा जो स्पेस की ओर है यह दरअसल शून्यता की ओर अभिमुख किए हुए है यानी अनंत की ओर। इस प्रक्रिया में मानस के भी साथ-साथ विकसित होने के पहलू जुड़े हुए हैं जिसकी अनुभूति इवोल्यूशन में शामिल जीव को भी सतत बनी रहती है।

फूल के होने के लिए एक इंसान के अंदर परागण की दोनों जरूरी अवस्थाएं निर्मित होना जरूरी हैं, जो देर-सवेर जागृत हो ही उठती हैं। ये दोनों अवस्थाएं दरअसल सटीक परिस्थितियों की उपस्थिति में आवेशित और ऊर्जस्वित हो जाने के लिए होती हैं। दोनों ध्रुवीय अवस्थाओं के बीच जब संतुलित सहसंबंध निर्मित हो जाता है तब फिर यह चाहे सूर्य के अंदर घटित हो या सूरजमुखी के भीतर या फिर इंसान के डीएनए में, एक विशिष्ट क्षण में यह घटित होता ही है, हो ही जाता है। तब तक वह हो सकने वाला फूल अपने होने के लिए, अपने फूल हो सकने के लिए एक तलाश की यात्रा जारी रखता है।

यूनिवर्स में बिखराव की यह प्रक्रिया निरंतर घटती रहती है। उनमें से ही किसी एक तारे के ह्रदय में से छिटका हुआ ऊर्जा का कोई एक कण बरास्ते पृथ्वी हम तक आकर हममें ही आ समाता है और हमारी किसी एक कोशिका के नाभिक से अपना रासायनिक संवाद शुरू कर देता है। जी! यही है अस्तित्व, प्रकृति द्वारा जीन एडिटिंग का विचार। फिर भले ही वह एक विचार को ही क्यों न जन्म देता हो। हां! एक फूल के होने का विचार, उसके खिलने और सुगंध फैलाने का विचार! यह दिल से दिल तक पहुंचने वाली बात का मामला है।

रातों में तारों को हमारा निहारना कहीं हमारे होने की दिशा से हमारा बतियाना ही तो नहीं! एक फूल जब झरता है तो अंततः वह अपनी ही जड़ों के सबसे निकट होता है। जड़ें जहां से वह चला था। जड़ों के निकट ही तो बने रहते हैं सोते, झरने, जो अस्तित्व के हर हाल में होने, होते रहने की ओर एकमात्र इशारा हैं।

raghvendratelang6938@gmail.com

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