सहज प्रवृति है: प्रतीक्षा करते रहना,मांग करते रहना सामर्थ्य से अधिक

हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्‍या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं। इस क्रम में पढ़िए हमारी स्‍तंभकार अनुजीत इकबाल की पसंदीदा कविता :

मैं विश्व कविता दिवस पर तिब्बत के महान तांत्रिक और अपने आराध्य मिलारेपा की कविता साझा करूंगी। वह तिब्बत के महान योगी, संत और कवि थे। वे अपने विचारों का प्रचार गीतों के माध्यम से करते थे और तिब्बती संस्कृति के आधार-व्यक्तित्व माने जाते हैं। उनकी लगभग एक हजार रचनाएँ ‘मिलोरेपा के सहस्र गीत’ के नाम से प्रसिद्ध हैं, जिनमें संसार की नश्वरता का बोध प्रमुख है। उनकी कविताओं का अनुवाद श्री वरयाम सिंह (जेएनयू) ने किया है। यहां उनके द्वारा अनुदित एक कविता पेश कर रही हूं:

प्रणाम, अनुवादक मार्पा को प्रणाम!
यहां एकत्र हुए हैं मेरे सब शिष्य और शिष्याएं-
अडिग आस्था की संतान-ये सब
प्रार्थना कर रहे हैं सच्ची निष्ठा के साथ।
 
यदि कोई आवश्यकता से अधिक समय तक
मित्रों के साथ रहता है
वे सब उससे ऊब जाते हैं,
ऐसी मित्रता में जीना घृणा और उपेक्षा की ओर ले जाता है
मानव सहज प्रवृति है: प्रतीक्षा करते रहना,
मांग करते रहना सामर्थ्य से अधिक की,
और साथ रहना आवश्यकता से अधिक समय त
क मानव स्वभाव में जुझारूपन
सिद्धांतों के उल्लंघन की ओर ले जाता है।

विनाशकारी होती हैं भले कार्यों के लिए बुरी संगत,
अशुभ वचन बुराई का कारण बनते हैं।
यदि उन्हें भीड़ के बीच कहा गया हो,
कौन दोषी है और कौन निर्दोष-यह विवाद
और वृद्धि करता है शत्रुओं की संख्या में।
संकीर्ण मतवाद और धर्मान्धता
और अधिक पापी, और अधिक दुष्ट बनाते हैं मनुष्य को।                                                                                                                                     
श्रद्धालुओं के उपहारों पर प्रतिक्रिया देने की अनिवार्यता
बुरे विचारों को जन्म देती है,
सांसारिकों के उपहार अशोभनीय होते हैं।
संगप्रियता स्वतः पैदा करती है अप्रेम
और अप्रेम में पनपती है अरुचि और घृणा 

जितने अधिक घरों के तुम मालिक बनोगे
उतने ही अधिक कष्टप्रद होंगे जीवन के अंतिम वर्ष 
कष्‍ट और रूदन सचमुच असहनीय होते हैं
विशेषकर एकांत में रह रहे योगी के लिए
 
मैं मिलारेपा, संन्यासी के शांत शरणस्थल की ओर जा रहा हूं
ताकि एकांत में जीवन बिता सकूं।
शिष्यो, आश्चर्यजनक हैं तुम्हारी तपस्या की सफलताएं
तुमसे, बार-बार मिलते रहने की
मुझे हमेशा बहुत इच्छा रहेगी।

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