एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1

विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
विभूति झा से मेरा परिचय कुछ इस तरह का है कि वे पहले एक नामी वकील थे। अब आदिवासियों को साथ लेकर संघर्षरत हैं। ग्रामसभा को लेकर जनजागरण जैसा कुछ कर रहे हैं और उसके सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं। अभिन्न मित्र देवीलाल पाटीदार को मेरे द्वारा संपादित एक पुस्तक ‘नर्मदा घाटी से बहुजन गाथाएं’ का संपादकीय बहुत अच्छा लगा और उन्होंने विभूति दा को इन डायरियों के संपादन का कार्य मुझसे करने के लिए सुझाया। विभूति दा इन्दौर आए। बात हुई। मैंने स्वयं पर शंका करते हुए, कि क्या वह कार्य कर पाऊंगा? सहमति दे दी। उनकी डायरी “एक लक्ष्यहीन यात्रा” को लंबी कहानी में बदलना जोखिम भरा काम है। यह एक विलक्षण दस्तावेज है। यह एक ऐसी गाथा है जो बताती है कि सिर्फ महत्वाकांक्षा को छोड़ देना भर काफी नहीं होता। ऐसा तो तमाम लोग कर सकते हैं। विभूति दा महत्वाकांक्षा के त्याग से बहुत आगे जाते हैं और अपना स्वअर्जित यश भी समाज से विस्मृत करा देते हैं। समाज जब उनकी यश और कीर्ति को भी भूल चुका होता है, तब अपनी यात्रा के करीब पंद्रह बरस बाद, वे अपने इस कथोपकथन पर जमी धूल झाड़ते हैं और उसे सबके सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस लंबी कहानी में एकाध जगह अनायास उस अर्जित यश का यशोगान सामने आता है तो वह बहुत कठोरता से उसे विलुप्त कर देते है।
यह असाधारण होते हुए भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतांत। यह एक व्यक्ति के “लौटने” की गाथा है।
इस पूरी गाथा में कुछ भी उपदेशात्मक नहीं है। यह नैतिकता का पाठ भी नहीं पढ़ाती। यह एक ऐसी रचना है, जो सिखाती है, कि बिना किसी को दुखी किए कैसे अपना जीवन जिया जा सकता है और उसे सकारात्मक बनाया जा सकता है। इस गाथा की सिर्फ एक विशिष्टता है कि यह सच कहती है। याद रखिए कीट्स ने कहा भी था, ’’जो सुन्दर है, वही सत्य है, जो सत्य है वही सुंदर हो सकता है। गांधी ने भी “सत्य ही ईश्वर है” कहा था। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। – चिन्मय मिश्र
नया जन्म, भोपाल, 29 जून 2027
बस एक ही इच्छा कि नर्मदा जी के तट पर पहुंचना है। नया जन्म वस्ततु : एक नया बचपन भी तो लाएगा। पहला बचपन तो नर्मदा किनारे ही बीता था। शायद इसलिए इस नए जन्म या पुनर्जन्म की तासीर भी वही थी। नर्मदा किनारे नए सिरे से विकसित होने की थी। पर उस बचपन और इस बचपन में काफी फर्क था। समय के हिसाब से देखें तो करीब 55 बरस का! तो सोचा आगे क्या? बाद में क्या होगा? ये भविष्य के प्रश्न थे। अभी तात्कालिक क्या होगा? सोचा, हम कथित सभ्य समाज में हैं, इसलिए बिना तन ढके तो निकला नहीं जा सकता। बेहतर तो वैसे यही होता कि निकलते वक्त शरीर पर कपड़े भी नहीं डालता। बहरहाल अंडरक्लोथ्स के ऊपर एक पेण्ट और टी शर्ट पहनी और पैरों में स्पोर्ट्स शूज डाले, और ? और निकल पड़ा। पैन, चश्मा, घड़ी, मोबाइल या पर्स, कुछ भी साथ नहीं लिया। जेब में एक भी पैसा नहीं। एक ही विचार घुमड़ रहा था, कि पैदल ही चलना है, और ऐसी जगह पहुंचना है जहां मुझे पहचानने वाला कोई न हो। या यूं कहें:
ऐ दिल मुझे ऐसी जगह ले चल जहां कोई न हो,
अपना पराया, मेहरबाँ-ना मेहरबाँ कोई न हो।
भरी दोपहरी, चिलचिलाती धूप में अरेरा कालोनी से हबीबगंज रेल्वे अडंरब्रिज से मीरा नगर झुग्गी बस्ती से होते हुए रेल्वे ट्रेक पर पहुंचा। मिसरोद पहुंचने तक गला सूखने लगा। हैंडपंप पर एक बच्ची ने पानी पिलाया। मेरा बचपन और उसका बचपन एकाकार से हुए! एकाएक ध्यान आया दांत, उससे अभी थोड़ा-थोड़ा खून निकल रहा है। कल रात ही तो एक दांत निकलवाया था। तीन दिन दवा लेनी थी। दर्द भी काफी था, तो सोचा था कि आज आफिस और कोर्ट नहीं जाऊंगा। आराम करूँगा। पर क्या हुआ? एकाएक मैं तो बचपन की ओर उल्टा चल पड़ा। मिसरोद छोटा सा मगर सुंदर सा स्टेशन है। पहली बार देखा। एकाएक बम्हनी (मंडला) का स्टेशन, अपने बचपन के स्टेशन,बचपन की याद लौट आई। वैसा ही सुनसान है यह भी। इक्का दुक्का रेल्वे कर्मचारी मुझे घूरे जा रहे हैं। धूप तेज है और थकान बेतरह हावी हो चुकी है। मैं वहीं किनारे एक पेड़ की छांव में पड़ गया और आती जाती रेलगाड़ियों को देखता रहा। पंद्रह-बीस मिनट बाद आगे बढ़ गया। इस रेल मार्ग पर बहुत से नदी नाले हैं। एक खेत की मेढ़ पर अचानक एक विशाल काले नागदेवता रास्ता रोके नजर आए। मैं हाथ जोड़कर खड़ा हो गया। दो मिनट तक हम एकदूसरे को देखते रहे। फिर वह रास्ता छोड़ नीचे चले गए। आगे एक डंडी मिली। उठा ली। पहले एक बीमार कुत्ता पीछे आया फिर तमाम कुत्ते पीछे लग गए। बड़ी मुश्किल से पीछा छुड़ाया। ये ट्रेक के किनारे पड़ी जूठन खाने जमा रहते हैं। सेवाय सावन से लगे रेल्वे ट्रेक पर पहुंचा। हमसब पहले यहां दो तीन बार-पिकनिक मनाने आए हैं। पंरतु आज का सफर उससे बिल्कुल अलग। एक ऐसा सफर जिसकी न कोई शुरूआत है, न कोई अंत। पर सफर तो है!
अब मंडीदीप दिखाई देने लगा। भोपाल से लगा औद्योगिक क्षेत्र। थकान भी बढ़ गई। कलियासोत और कोलार नदी के ऊपर बने रेल्वे पुलों से आगे बढ़ता गया। थकान अब हावी हो गई। खेत में लगे पेड़ के नीचे लेट गया। आवाज हुई तो देखा जन शताब्दी (रेल) निकल रही है। यानी करीब साढ़े पांच बज गए हैं। मंडीदीप गंदा सा स्टेशन है। वहां नल से ढेर सारा पानी पिया। बैंच पर बैठा ही था कि ध्यान गया कि लोग मुझे घूर रहे हैं। मंडीदीप भोपाल से करीब चौबीस किलोमीटर है। अंधेरा भी होने लगा। थोड़ी देर रेल्वे ट्रेक पर और चला। अंधेरा बढ़ गया था। अब इस ट्रेक पर चलना कठिन हो गया। रेल्वे ट्रेक के साथ-साथ चलने के पीछे शायद यह भी रहा होगा कि सड़क पर चलूंगा तो जान पहचान के लोग मिल जाएंगे। सवाल-जवाब की लंबी प्रक्रिया शुरू हो सकती है। जबकि वस्तुतः तो मैं स्वयं ही एक किस्म की शून्यता महसूस कर रहा हूं।
अब मैं मंडीदीप इंडस्ट्रियल एरिया में घुस गया। पानी गिरना भी तेज हो गया। थकान भी बढ़ गई। कारखाने के गार्ड और कर्मचारी भी मुझे घूर-घूरकर देख रहे है। सोचा चलते रहना ही ठीक है। अंधेरा घटाटोप हो गया। मैं चलता रहा। मेन रोड पर आया तो लगातार चलते ट्रकों की हेडलाइट की रोशनी ने अंधेरे का एहसास ही खत्म कर दिया। मैं पैरों को घसीटता चलता रहा। जूता भी टाइट लगने लगा है। महसूस हो रहा है कि पैरों में छाले पड़ गए हैं। कपड़े तो भीग ही चुके हैं। छींके आनी भी शुरू हो गई। दांत से खून अभी भी निकल रहा है। मगर पैरों का दर्द उससे भी ज्यादा है। इसलिए दांत के दर्द की ओर कम ध्यान जा रहा है। मिर्जा गालिब ने कहा भी तो है,
इशरत-ए-कतरा है दरिया में फना हो जाना
दर्द का हद से गुजरना है दवा हो जाना।
इशरत-ए-कतरा। आनंद सी इन बरसती बूंदों के बीच मैं दरिया यानी नर्मदा जी से मिलने, चलता-चला जा रहा हूं। और मेरे दर्द एकदूसरे पर हावी होकर मुझे हल्का करते जा रहे हैं। गालिब भी कभी मेरी जैसी स्थिति से गुजरे थे क्या? जिस्मानी दर्द परस्पर पूरक बनते जा रहे हैं। क्या सुंदर संयोग है दर्दों का!
मैं चलता रहा। ओबेदुल्ला गंज पहुंचने से पहले एक जगह बैठ गया। पानी बहुत तेज हो चला है। भीगते-भीगते ओबेदुल्ला गंज पहुंचा। अब तक करीब पैंतीस किलोमीटर का सफर हो गया है। बाजार बंद हो चुका है। एक जगह शादी या अन्य किसी समारोह का भोज चल रहा है। पानी बंद है। भूख बहुत तेज हो चली है, लगा अंदर चला जाऊं। रात भी चढ़ चुकी है। लोगों ने अजीब तरह से देखना शुरू कर दिया है। शुक्र है किसी ने कुछ पूछा नहीं। एक चाय की दुकान पर जाकर पानी पिया। अब मैं होशंगाबाद रोड पर आ गया। वृंदावन या विध्यांचल ढाबे पर पहुंचा। वहां की घड़ी में रात के ठीक बारह बजे हैं। सरदारजी के इस ढाबे पर पहले एक-दो बार रूक भी चुके हैं। पर अबकी बार? क्या कहें! एक गिलास पानी पिया और खाली खटिया पर बैठ गया। लोगों को खाना खाते-चाय पीते देखता रहा। उम्मीद थी कि कोई तो पूछेगा, कुछ खाओगे या चाय पियोगे? पर किसी ने नहीं पूछा। हुलिया देख लोग सशंकित भी हो रहे होंगे। सोचते होंगे यह कोई सामान्य व्यक्ति नहीं है। शायद भगोड़ा या पागल हो!
पूरा दिन हो गया। तारीख बदल गई। तीस जून आ गई। खाली पेट। अब तो टांगों ने भी बोझ उठाने से मना कर दिया। ढाबे में भी अच्छा नहीं लग रहा था । तेज पानी के बावजूद निकल पड़ा। थोड़ी देर में भीमबैठका के बोर्ड तक पहुंच गया। भीमबैठका, यानी आदिम मानव का बसेरा। कई साल बाद यहां तक आया। विचार तो आ रहा था, यहां आने का। आज विषम मनस्थिति है। इस आधुनिक युग में मैं अपना बसेरा त्यागकर इस आदिस्थान पर हूं। घुप्प अंधेरा। वहां पास ही एक बड़ा सा पत्थर है उस पर लेट गया। ठीक अपने आदिम पितर की तरह! उसी पहाड़ की तलहटी में! भीगते हुए भी नींद आ गई। नींद खुली तो देखा बारिश रूक गई। रेल्वे फाटक का चौकीदार पटरी पर खड़ा मुझे ध्यान से देख रहा है। मुझे लगा, काश कोई चाय का तो पूछ ले। गांव के कुत्ते भी डरते-डरते भौंक रहे है। अब घसिटता सा चल रहा हूं। नींद से कुछ जान आई। लगा रात भर में मुंह में खून-इकट्ठा हो गया है। बाहर निकाला। खून तो बंद है पर दर्द कायम है।
बिनेका गांव तक पहुंचते-पहुंच टांगें जवाब दे गईं। लगा कि भूख, नींद और थकान से अब गिर ही पडूंगा। गांव के पास रेल्वे ट्रेक के पार एक मढ़िया दिखी। सुबह के सात बजे होंगे। निकले हुए करीब बीस घंटे हो गए। वहां बाबा की छोटी सी कुटिया के आसपास छोटा सा मंदिर व पेड़ पौधे। सुंदर सी जगह पहाड़ियां, जंगल, खेत सब साथ-साथ। बाबाजी नहाकर भजन गुनगुना रहे थे। मैंने उन्हें नमस्कार किया और पूछा, क्या यहां थोड़ा विश्राम कर सकता हूं। बाबा ने इशारे में बैठने को कहा। उनसे पानी का पूछा, उन्होंने कुंए बाल्टी की ओर इशारा कर दिया। कुंए से निकालकर ढेर सारा पानी पिया। जूते उतारे। लेटा तो नींद आ गई।
उठा तो देखा साधू चाय पी रहा था। उठते देख उसने पूछा, चाय पियोगे? उसने स्टील के ग्लास में काली चाय दी। बेहद मीठी। जब से घर से निकला था तब से पहली बार किसी ने कुछ कहा था और कुछ दिया था। साधू आदिवासी लगता है। उसके तमाम सवाल थे, जैसे कहां से और कैसे आए? साथ में कौन-कौन है? वगैरह-वगैरह। मैं भी छोटे-छोटे जवाब देता रहा। अंततः साधु मुस्कराकर बोला “घर से नाराज होकर निकले हो? नर्मदा जी तक जाने का प्रण अच्छा है, लेकिन वहां से लौट जाना!” तभी गांव से कोई दूध ले आया। साधु यहां अभी महीने भर पहले आया है। उजाड़ को रमणीय बना दिया है। खेतों में बोनी हो रही है। गांव से कुछ लोग आए। नारियल फोड़ा। मैंने कल से पहली बार कुछ खाया। आंख बंद कर लेट गया। हाथ मुंह धोये। देखा साधु तैयार हो रहा है। बोला बुदनी तक जाना है। ट्रक से चलेंगे? मैंने कहा पैदल ही चलूंगा। बुदनी नहीं, शाहगंज जाऊँगा। साधु भीतर गया पीतल की थाली में मोटी रोटी और दाल लेकर आया। बोला ये खा लो। कल से भूखे होगे? मैंने अपने लिए रखी थी। गांव वाले भी बोले, “खा लो बाबूजी, खा लो।” पेट में कुछ गए चौबीस घंटे हो गए हैं। मैंने चुपचाप दाल रोटी खाई। पूरे जीवन में शायद खाना कभी इतना अच्छा नहीं लगा होगा। मंदिर में माथा टेका। सबको नमस्कार किया और निकल पड़ा। साधु के प्रति मन में कृतज्ञता थी। तभी साधु ने कहा, जूतों की वजह से पैर मे तकलीफ हो रही है। इससे तो चप्पल पहनकर या नंगे पांव चलना ही ठीक रहता। मैंने कहा कि आगे देखेंगे। लगा अनजाने ही किसी ने पहले-पहल बंधन मुक्ति का पहला रास्ता सुझाया। बिनेका गढ़ी की हनुमान जी की मढ़िया और यह साधु हमेशा याद रहेगें।
चलते हुए रातापानी अभयारण्य के गेट तक पहुंच गया। वहां चाय की गुमटी पर कोई झरने का पानी लाया था। पानी पिया, खाट पर थोड़ी देर बैठा। गार्ड से बात करता रहा। वह चाय पीता रहा। मुझसे नहीं पूछा। मैंने शाहगंज और नर्मदा जी का सबसे नजदीकी किनारा पूछा और चल दिया। आगे घना जंगल मिल गया। यह रास्ता सीधा शाहगंज जाता है। उस पर आगे बढ़ा। तभी तेज पानी आ गया। इतना तेज कि दोपहर में भी रास्ता दिखना बंद हो गया। इस घनघोर जंगल में कोई गांव भी नहीं है। पहाड़ की चोटी से नीचे पूरी वादी व गुफाएं दिखाई दीं। बियाबान जंगल के इस सुंदर घाट पर मैं चलता चला जा रहा था। एकदम नीचे पहुंचते ही मंदिर दिख गया। भीतर एक युवा बाबा चिलम पी रहे थे। मरम्मत का काम चल रहा था। जीप में कुछ लोग आए। उन्होंने दान पेटी में धन डाला, नारियल फोड़ा। साधु ने उन्हें बुलाया। प्रसाद भी दिया। मुझे प्रसाद नहीं मिला! भेट न चढ़ाने के कारण ? खैर, मैं डोहटा घाट में आगे बढ़ गया।
पैरों में बहुत तकलीफ हो रही थी। पानी भी तेज हो गया। एक बड़े गांव खटपुरा के पास एक बड़ा सा मंदिर और आश्रम जैसा कुछ दिखा। शाम के साढ़े पांच बज चुके होंगे। शाहगंज यहां से अभी करीब दस बारह किलोमीटर दूर होगा। पता चला भोपाल के गुफा मंदिर वालों का ही स्थान है। एकतरह से मठ है। चौकीदार ने चाय पिलाते हुए कहा कि इंचार्ज बाबा बहुत रूखा है। हम तो चाहते हैं कि आप यहां ठहरें पर वह रूकने नहीं देगा। गांव में एक छोटा मंदिर है उसमें एक भला सा बूढ़ा साधु रहता है, वहीं चले जाईये। एक लड़का साथ कर दिया। उसने दूर से मंदिर दिखा दिया और मैं घिसटता-घिसटता सा उस ओर चल पड़ा। सोच रहा था कि अजीब बात है, जिसके पास जितनी बड़ी जगह है, उसके पास ठहरने की उतनी ही कम गुंजाईश क्यों होती है?
अंधेरा और बारिश दोनों बढ़ते जा रहे हैं। थकान से अब पैर सुन्न से हैं। उस छोटे से मंदिर के पास एक टूटी-फूटी छोटी सी कुटिया है। प्लास्टिक की छत वाली दीवार व छत अलग से नहीं है। कुछ संटियों का आधार। एक तखत भर है जिस पर साधु बैठा जाप कर रहा है और साथ में धूना जल रहा है। नमस्कार कर अंदर घुसा। साधु ने बैठने का इशारा किया। मैं जमीन पर बैठ गया। जूते उतारे तो देखा पांव की ऊंगलियों और अगूठे के नीचे तलवे में एक-एक इंच मोटे फफोले पड़ गए हैं। पैरो की ऊंगलियों के नाखून काले पड़ गए हैं। सारा खून जैसे पैरों में उतर आया हो। भूख की व्याकुलता भी बढ़ रही थी। थकान से आँखे भी मुंदी जा रहीं थी। साधु बाबा का जाप रूका। मैंने भी साहस जुटाया और पूछ लिया।
मैं : रात्रि विश्राम कर सकता हूं?
बाबा : अवश्य, लेकिन सोओगे कहां और कैसे? कोई कपड़े हैं?
मैं : नहीं, कुछ भी नहीं है। न कपड़े, न पैसे। बस ऐसे ही।
बाबा : मेरे पास तो कुछ भी नहीं है। बस एक कंबल और चादर है। मैं बूढ़ा हूं, इसलिए तख्त पर सोना पड़ेगा। ठंड है, इसलिए कंबल ओढ़ना होगा। तुम्हें देने के लिए कुछ भी नहीं है। लगता है एकदम भूखे हो। मैं तो दिन में एकबार बनाता हूं। एक टिक्कड़ शाम के लिए बचा लेता हूं। अभी-अभी पाया और जाप करने बैठा। थोड़ी देर पहले आते तो आधा दे देता। आटा-दाल दे सकता हूं। चाहे तो बना लो। अच्छे घर के दिखते हो, चेहरे से ब्राह्मण दिखते हो। लगता है घर से क्रोधित होकर निकले हो। रात भर रूको, सुबह लौट जाना। कहां से आए हो?
मैं : बाबा मैं नर्मदा जी तक पैदल चलने का प्रण करके निकला हूं। आपकी आज्ञा होगी तो इस पत्थर पर सो जाऊंगा। आटा दे दें तो रोटी बना लूंगा। थोड़ा नमक दे दें। दाल तो नहीं बना पाऊंगा। सुबह सुबह चला जाऊंगा।
जब बारिश थोड़ी कम हुई तब बाबाजी मंदिर तक गये। ताला खोलकर दिया जलाया और आटा, नमक निकाल कर लाए। साथ ही चिमटा, एक थाली और गिलास दिया। मुझे आटा माढ़ते और मोटी रोटी बनाते देखते रहे। फिर तख्त पर से एक बोरी निकाल कर दी और कहा इसे बिछा लेना, पत्थर ठंडा नहीं लगेगा। यह भी बोले, आग अच्छे से जला लेना। और वह सो गए। मेरे कपड़े पूरे भीग चुके थे। उनसे पानी टपक रहा था। पैंट-टी शर्ट उतार कर चड्डी-बनियान पहने रहा। मैंने रोटी खाई, बर्तन धोए और आग तेज करके सो गया। कपड़े आग के पास फैला दिये। रात में फिर तेज पानी गिरा। तुअर की संटी के बीच से बौछारें अंदर आने लगीं थीं। नींद खुली। कपड़े कुछ सूख से गए थे। फिर से पहने। फिर बेहोशी की नींद में चला गया। सुबह-सुबह नींद खुली। सोच रहा था कि जिसके पास न्यूनतम है, वह अपना सबकुछ देने को तैयार हो जाता है। उस बड़े मठ और इस टूटी कुटिया के बीच में जो अंतर था, वह करूणा और आत्मीयता का ही तो था। यहां फिर समृद्धि और सादगी का फर्क समझ में आया।
मैं बाबा की अंर्तदृष्टि के बारे में भी सोच रहा था। इस अंधेरे में भी मैं उसे ब्राह्मण कैसे नजर आया? सवाल यह है कि मेरी जातिगत पहचान को उसने कैसे भाँपा? मैंने तो उसे अपना नाम तक नहीं बताया था। वह कैसे समझा कि मैं क्रोधित हो घर से निकला हूं? क्यों उसने घर लौट जाने की सलाह दी? ये सवाल मेरे सामने थे। तभी देखा बाबा एक टूटे डब्बे को लेकर शौच गए थे, लौट आए हैं। ध्यान आया मैं भी दो दिन से शौच गया ही नहीं हूं। कुछ खाया ही नहीं तो आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। मुंह से खून निकलना भी बंद हो चुका था। दर्द अभी है। शौच और दातून की जरूरत महसूस हुई। बाबा ने जल्दी से काली चाय बनाई ढेर सारी शक्कर वाली। पीने में खूब मजा आया। ब्लडप्रेशर और डायबिटीज तो खो से गए। चाय पी और नाले की ओर गया। गांव के लोग मुझे अजीब निगाह से देखे जा रहे थे।
लौटा तो बाबा ने कहा : स्नान कर लो!
मैंने कहा : अब नर्मदा जी में ही करूँगा। (बदलने को कपड़े भी नहीं हैं, असली बात तो यही है।) बाबा, अब निकलता हूं।
बाबा बोले : कुछ खाकर जाओ। जल्दी से रोटी बना देता हूं। जूते उतारकर हाथ में ले लो। वरना चल नहीं पाओगे।
बाबा बताते रहे कि वे राजस्थान के पालीवाल ब्राहमण हैं। एक महीने पहले इस उजाड़ जगह आए हैं। गांव के लोग इससे खुश हैं। गांव में ज्यादातर कोरकू आदिवासी हैं। संपन्न सिख और मुसलमान भी हैं। एकमात्र सिख परिवार उनका बड़ा ख्याल रखता है। वो पहले राजस्थान में रामलीला मंडली में काम करते थे। टी वी के बाद रामलीला खत्म हो गई। घर बार छोड़कर अमरकंटक में रहने लगे। वहां महसूस हुआ कि यह तो नौकरी जैसा हो गया। अब घूमते रहते हैं। मेरे बारे में पूछा। जितना कम हो सकता था, मैंने उतना ही बताया। बाबा ने साथ बैठकर दाल रोटी खिलाई। कहा वो बाद में “पाएंगे”।
मैंने जूते वहीं छोड़े। उनसे कहा “बाबा जी, जीवन रहा तो एकबार फिर आऊंगा।” वे बोले “अवश्य, किन्तु ब्राह्मणी को साथ लेकर आना। अभी नर्मदा जी के दर्शन कर घर लौट जाना।”
मैं चल दिया। प्रवास पर निकलने के बाद यह पहला आश्रय था। महसूस हुआ कि अभी भी समाज पर निर्भर रहा जा सकता है। संन्यासी बाबा को मेरी गृहस्थी का कितना ध्यान है। वह पत्नी के बिना शायद मुझे पूर्ण नहीं मान रहा है। मेरे सुखद परिवार के लिए लालायित है। मैं भी सोचता रहा सामाजिक पारिवारिक बंधनों के बारे में, कि क्या यह बाध्यता है, विवशता है, आवश्यकता है या सामाजिक विशिष्टता? बहरहाल, बाबा ने एक छड़ी दे दी थी। छड़ी जैसे सामाजिक सत्कर्म की प्रतीक हो! जूते का बंधन छोड़ मैं छड़ी का सहारा ले आगे बढ़ा। सभ्य समाज की पहचान की निशानी जूता अब मेरे साथ नहीं था। मैं धरती के सीधे संपर्क में था। गांव के दूसरे कोने पर ‘सामाजिक वानिकी केंद्र’ का बोर्ड दिखा। बेटी वन्या की याद आ गई।
ये खटपुरा था! खट से याद आया बाबा ने छड़ी देते हुए कहा था “इसे टेककर चलना, दर्द कम लगेगा।” ऐसा ही हुआ। बाबा ने यह भी बताया था कि शाहगंज में पाटीदार समाज का जगदीश मंदिर है, वहां के बाबा के पास एक दिन के रहने की व्यवस्था हो जाएगी। निकलते-निकलते सुबह के साढ़े नौ बज गए थे। नंगे पांव व छड़ी टेकते चलना राहगीरों के लिए कुतुहल का विषय था। नंगे पांव चलने में असुविधा थोड़ी कम हो रही थी। सड़क पर पानी भरा था। कंकड़ गिट्टी सब पानी में डूबे थे। बीचों-बीच ऊंचा होने से चलने में आसानी हो रही थी। जब कोई गाड़ी गुजरती तो असुविधा होती, क्योंकि कीचड़ पानी उछलता और किनारे के गिट्टी कंकड़ कांटों की तरह चुभते।
तीन-चार किलोमीटर चला होऊंगा कि फिर तेज पानी आया। जिस पेड़ के नीचे रूका था, वहां एक चरवाहा भी आ गया। परसवाड़ गांव का कुर्मी, बाबूलाल। वह बोला “आप तो बहुत पढ़े-लिखे आदमी लगते हैं, कोई बड़े अफसर हैं।” वह यहीं रूका नहीं, बोलता रहा “आप बहुत दुखी हैं। घर से दुखी होकर सब छोड़ छाड़ कर निकल पड़े हैं। आप कुछ करने की सोच रहे हैं? यह ठीक नहीं है। मैं तो अनपढ़ आदमी हूं लेकिन आपका जीवन बहुत काम का है। मैं भी आपके साथ शाहगंज तक चलता हूं। फिर साथ लौट आएंगे।” फिर साथ लौट आएंगे? पिछले कुछ घंटों में यह दूसरा व्यक्ति था, जिसे अपनी अंतदृष्टि से मेरे बारे में अनुभूति हो रही थी। एक साधु था और एक चरवाह। दोनों का समाज से सीधा संपर्क और संबंध है। चरवाह तो पशुओं के बीच रहता है इसलिए भाव समझ पाने की उसकी क्षमता वाणी या भाषा पर अधिक निर्भर भी नहीं है। मुझे एकाएक उपनिषद की वह गाथा याद हो आई जिसमें ऋषि गुरू अपने शिष्य से कहते हैं कि जब गायें दस गुनी हों जाएं तो ही लौटना। इस प्रक्रिया और अवधि में वह शिष्य स्वयं आचार्य हो गया और उसके द्वारा अर्जित ज्ञान आज मानवता की धरोहर बन गया। मुझे लग रहा था कि एक अन्जान के द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन कितना मनोहारी हो गया है। वह कुछ दूर तक साथ चला। अपने नए जीवन के इस पहले सहयात्री को बहुत मुश्किल से समझा-बुझाकर वापस लौटने को राजी किया। मैं आगे बढ़ गया, वह कुछ देर वहीं खड़ा मुझे देखता रहा। मैं आगे बढ़ रहा था वह वहीं खड़ा था। हमारी दूरी बढ़ती जा रही थी। चलते-चलते दोपहर का बारह-एक बज गया था। घड़ी तो पास नहीं थी। अंदाजा लगाया। दो दिन की यात्रा प्रकृति से जोड़ने सा लग गई है।
जारी…

