एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह एक अनमोल दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें बताया गया है कि सिर्फ शेयरों को छोड़ना काफी नहीं होता है। ऐसा तो लॉग इन कर सकते हैं। विभूति दा मौलिक के त्याग से बहुत आगे जाते हैं और अपना स्वअर्जित यश भी समाज से विस्मृत करा देते हैं। समाज जब उनकी यश और कीर्ति को भी भूल चुका है, तब यात्रा के करीब करीब बार, वे अपने इस कठोपथन पर जमी हुई सफाई करते हैं और उसे सबके सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस लंबी कहानी में एकाध जगह अनायास उस सूर्योदय यश का यशोगान सामने आता है तो वह उसे बहुत ढूंढता है।
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है।
इस संपूर्ण गाथा में कुछ भी उपदेशात्मक नहीं है। यह डॉक्यूमेंट्री का पाठ भी नहीं पढ़ा गया। यह एक ऐसी रचना है, जो सिखाती है, कि बिना किसी को अपनी जिंदगी से दुखी किया जा सकता है और उसे सकारात्मक बनाया जा सकता है। इस कथा की एक विशेष विशेषता यह है कि यह सच है। याद रखें किट्स ने भी कहा था, ”जो सुंदर है, वही सत्य है, जो सत्य है वही सुंदर हो सकता है।” गांधी जी ने भी “सत्य ही ईश्वर है” कहा था। विभूति दा की ये डायरी अब साउदी सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। -चिन्मय मिश्र
उनका कहा बेहद क्रांतिकारी लगा
कुंभराज से आए दोनों लड़के लौट गए। बाबा गुरूपूर्णिमा पर वहां जाएंगे। बाबा सुलझा व्यक्ति लगा। न तो ढोंगी है न कट्टरपंथी। पत्नी अधिक सांसारिक है। जो भी यहां आता है बाबा का उनसे हंसी मजाक चलता रहता है। बाबा ने बताया, भ्रमण के दौरान दक्षिणा इक्ट्ठा कर यहां का खर्च चलाते हैं। परिक्रमावासियों को और तीर्थयात्रियों को रहने का स्थान, भोजन सामग्री और आवश्यकता पड़ने पर बर्तन और ओढ़ने बिछाने के कपड़े भी निःशुल्क देते हैं। मैं भी इस सबका लाभार्थी हुआ हूं। कई परिक्रमावासी चातुर्मास यानी बारिश के मौसम में जब यात्रा संभव नहीं होती तो चार महीनों तक लगातार यहां बने रहते हैं अर्थात देवशयन एकादशी से देव उठावनी एकादश तक परिक्रमा रूकी रहती है। इस दौरान परिक्रमावासी समीप के नगर/बस्ती में जाकर भीख मांगते हैं अपना काम चलाते हैं और भजन पूजन करते रहते हैं। गौरतलब है इस पूरी अवधि में परिक्रमावासियों का कोई पैसा खर्च नहीं होता। बल्कि कुछ तो अतिरिक्त मिला दान बेचकर धन भी कमा लेते हैं। मेरे मन में भी इस यात्रा को लेकर काफी जिज्ञासा थी।
बाबा ने कहा कि “परिक्रमा के दौरान स्वयं की भोजन सामग्री लेकर चलने में भी कोई हर्ज नहीं है।”
आगे जो उन्होंने कहा वह बेहद क्रांतिकारी लगा। उनके अनुसार “आखिर जो दान में लेते हैं, वही कौन सा बड़ा पवित्र है। बनिये-साहूकार ही तो अधिक दान देते हैं, जिनकी कमाई पुण्य की कम पाप की ज्यादा होती है। लोगों का खून चूसकर और बेवकूफ बनाकर ही तो पैसा जोड़ते हैं, और वही तो दान करते हैं।”
बाबा जी के यहां एक तीस-पैंतीस साल का अड्डू नाम का युवक नियमित रूप से आता है। सुबह उसने मेरे प्रति विशेष लगाव दिखाया और घर से चाय भी बनवाकर लाया। मेरे यह बताने पर कि मंडला का हूं और नर्मदा परिक्रमा करना चाहता हूं, सुनकर बोला कि उसे मंडला और अमरकंटक से खास लगाव है। थोड़ा पढ़ा लिखा भी है। व्यवहार में अपनापन भी है। उसका असली नाम कुछ विजयवर्गीय है। बाबा खाली नहीं बैठते। हमेशा व्यस्त बने रहते हैं। पत्नी जो शायद थोड़ी बीमार रहती हैं और स्थायी रूप से यहीं बनी रहकर यहां का काम संमालती है, उनसे बाबा का हंसी मजाक और नोकझोंक चलती रहती है। बाबा तो भ्रमण पर रहते हैं। उन्होंने बताया कि वे वैष्णव संप्रदाय के बारामासी महात्यागी खालसा-अखाड़ा से ताल्लुक रखते हैं। वे स्वयं क्षत्रिय हैं और 15 वर्ष पूर्व गृहस्थाश्रम त्याग चुके हैं। उनके दो विवाहित लड़के हैं। बाकी भाईबंध भी शाहगंज में ही रहते हैं। भारत में साधु संतों के अखाड़ों और मठों की विशाल और जटिल परंरपरा विद्यमान है। साथ ही यह भी कि इनमें हर कोई दूसरे से श्रेष्ठ हैं!
दोपहर में बारह बजे खाना खाया। बर्तन मांजे। जमीन पर पालथी मार कर बैठने की आदत ही नहीं रही। परंतु अब तो यही चलेगा। बाबा तुलसी की लकड़ी से मनके बनाते रहे और मैं उनसे बात करता रहा। सोचा सदैव क्रियाशील बने रहने के लिए कितने कम साधनों की जरूरत है। तभी ‘शंकालू’ शर्मा आ गया। काफी प्रभावशाली है। बातचीत करते रहे। पर मुझे लगा ये दोनों एकदूसरे को नापसंद करते हैं। बाबा ने बताया कि जब सवेरे आया था तब उनकी पत्नी से मेरे बारे में कह रहा था कि ऐसे अनजान आदमी को नहीं रूकने देना चाहिये, इसका न मालूम क्या इरादा हो? पुलिस को खबर करनी पड़ेगी। अजीब सी सोच है इसकी। मैं खाने के बाद फर्श पर ही सो गया। रिटायर्ड मास्टरों का वही समूह आ गया। बातचीत हुई। फिर मैं शौच को गया और नर्मदा जी में नहाकर लौटा। नर्मदा जी का पानी बारिश की वजह से एकदम गंदला सा है। यहां वही पीते हैं, उसी से नहाते हैं, पर कुछ नहीं होता।
लौटा तो अंधेरा हो गया था। थोड़ी चाय मिली। दो एक लोग आए तो बाबा की गांजे की चिलम चली। मुझसे भी पूछा गया। लेकिन जवाब बाबाजी ने दिया “अरे, ये कोई नशा नहीं करते। न गांजा न भांग, न बीड़ी न सिगरेट, न गुटका और न तम्बाखू।”
बाबा एक हद तक ठीक ही थे। उन्होंने नशे के जितने स्वरूपों का नाम लिया था, उनसे मेरा रिश्ता नहीं था। परंतु क्या मैं वास्तव में कोई नशा नहीं करता? क्या कोई चार दिनों में पुरानी बसी बसाई दुनिया से पूर्ण पृथक हो सकता है? क्या वास्तव में मैं अब कोई नशा नहीं करता? स्वयं से भी मुक्त होने की आकांक्षा में घर छोड़ देना क्या एक तरह का नशा या जुनून नहीं है? ध्यान बंटा तो सुना बाबा मुझे बता रहे थे, कि वे बस शाम को एक बार गांजा पीते हैं, और उनकी पत्नी भी इसमें उनका साथ देती है। यहीं दिखी इस तरह की जेंडर इक्विलिटी, लैंगिक समानता!
खैर, चिलम के बाद आरती हुई और उसके बाद पुन : बातचीत का दौर। अड्डू आरती के समय आ गया। मुझे महसूस हुआ कि बाबा कह तो रहे हैं कि मुझे किसी की फिक्र नहीं, लेकिन मेरे रहने से अंदर ही अंदर कुछ घबराने लगे हैं। उनका पुराना अनुभव सुन लगा कि उनका डर वाजिब ही है। हुआ कुछ यूं था कि एक पढ़े लिखे व्यक्ति से अपनापन हुआ। और उन्होंने बाबा के परिचय से बैंक से एक ट्रेक्टर फाइनेंस करवा लिया। बैंक को नकली ड्राफ्ट देकर ट्रेक्टर बेच दिया और गायब हो गया। अब कोर्ट में जो मुकदमा चल रहा है बाबा उसमें मुल्जिम है। जाहिर है उनका घबराना वाजिब है।
मुझे महसूस हुआ कि बिना वजह किसी को मुसीबत में डालना ठीक नहीं है। मैंने कहा “बाबा जी मैं कल कहीं निकल जाऊंगा।”
बाबा थोड़ा बिफर से गए, बोले “अरे, ऐसे कैसे चले जाओगे? मुझे किसी का डर नहीं है। वैसे अपने पास ऐसे कई स्थान हैं जहां कोई पूछेगा भी नहीं कि कौन हो और कहां से आए हो।”
अड्डू को साथ लेकर मेरे भविष्य का निर्धारण होने लगा। मैं अजीब पसोपेश में था। मैं इन लोगों को समझ नहीं पा रहा था, कि ये मेरे मात्र दो दिन के परिचित कितने अधिकार से मेरे बारे में तय कर रहे हैं। इसमें वे मुझसे सलाह करने की आवश्यकता भी महसूस नहीं कर रहे हैं। मेरे अवचेतन में यह चल रहा था कि इतना विश्वास तो शायद मेरे माता-पिता ने भी मुझ पर नहीं रखा होगा कि वे जो तय करेंगे मैं उसे मान लूंगा। परंतु आज परिस्थिति सर्वथा भिन्न हैं। मैं जिस नईदुनिया में अकस्मात पहुंच गया था, वहां शायद साधारण संसार के नियम लागू नहीं होते हैं। कहीं अनजाने ही मैं इस बाबा का शिष्य तो नहीं बन गया? मैंने अपने इस भ्रम को नकारा और ‘घटनास्थल’ पर पहुंचा।
उन दोनों ने तय किया कि मैं देवास जिले के घनघोर जंगल में बैकल्या नामक जगह पर स्थित हनुमान जी के प्राचीन मंदिर में चला जाऊं। वहां अखण्ड रामायण का पाठ सतत चलता आ रहा है। बाबा ने कहा वहां तब तक रहो जब तक बरसात है, तत्पश्चात नर्मदा परिक्रमा में पुन: जुड़ जाना। बाबा बोले वहां तक जाने का किराया हम दे देंगे। उन्होंने बताया अड्डू बस स्टेंड का टिकिट क्लर्क है। बस में बैठा देगा। उस स्थान का विवरण सुन मैं भी आकर्षित हो गया और जाने को एकदम तैयार हो गया। लालच यह भी था कि वहां मेरी पहचान का कोई नहीं होगा और शायद मुझे कोई खोज भी नहीं पाएगा। इस दौरान अड्डू से थोड़ी घनिष्टता भी हो गई थी। मैंने उससे कहा “अगर हो सके तो मुझे कोई पुराना गमछा या टावेल दे दो जिससे सुबह नहां सकूं।”
जीवन में शायद पहली बार किसी से कुछ मांगा था। इतना कह पाया या अनायास मुंह से निकल गया? परंतु स्वयं को इस तरह सुनकर बहुत अच्छा लगा। दरअसल, इसका अर्थ हुआ कि मैंने अपने ‘दंभ’ पर पहली विजय प्राप्त की है। पहली बार कुछ मांगने का संकोच और उसके बाद मांगने से मिली आत्मसंतुष्टि वास्तव में रोमांचित कर रही थी। मैं कमोबेश स्तब्धता की स्थिति में था।
तभी बातों-बातों में पता चला कि यहां से पांच-छह मील पर बांद्राभान नाम का सुंदर स्थान है। यहां तवा नदी और नर्मदा जी का संगम होता है। मैं बोला सुबह वहां चला जाऊंगा शाम को लौटकर अगले ही दिन सुबह बैक्लया के लिए निकल जाऊंगा। अड्डू ने सुबह-सुबह गमछा लाने को कहा, नये जीवन का पहला दान! घर से निकले अभी तो चार ही दिन हुए हैं और इतना कुछ घट गया है। शारीरिक व मानसिक दोनों स्तर पर। मैं हतप्रभ-सी मनोदशा से अभी पूरी तरह से उभर नहीं पा रहा हूं। तभी एक मूर्ख सा दिखने वाले बाबा ने एक दस-बारह बरस के लड़के साथ प्रवेश किया। बाबा का नाम दुर्गादास है। संदीप नाम का जो लड़का उसके साथ है वह उसे खंडवा रेल्वे स्टेशन के प्लेटफार्म पर भटकता हुआ मिला था। इलाहाबाद (तब तक यह प्रयागराज नहीं बना था) के पास से अपने भाइयों की मार के डर से भागकर आ गया था।
अब वे भी यहां जम गए। बाबा खाना बनाने और खिलाने के बेहद शौकीन हैं। कभी अकेले नहीं खाते। भोजन या चाय के समय कोई बिना पाये नहीं लौटता। भोजन के बाद सब सो गए। बाबा और मैं तख्तों पर और दुर्गादास बाबा, संदीप जमीन पर। माता जी अंदर सोती हैं। रात में शोर-शराबा हुआ। पता चला पास के शिव मंदिर में रहने वाला पंडित शराब पीकर हो-हल्ला कर रहा है। बाबा ने उसकी पिटाई की और उसका सामान भी बाहर फेंक दिया। पहली बार महसूस हुआ कि बाबा काफी खुंखार है। मैं नींद में सब सुनता रहा। थकान के कारण उठने की हिम्मत भी नहीं हुई। मैं सोता रहा
आज तीन जुलाई है। रोज की तरह अलसुबह उठा। शौच को गया। वही पुरानी कहानी कि बैठने की आदत नहीं है, शौच के लिए। वैसे नीचे बैठकर खाने की आदत भी नहीं है। परंतु अब तो यह सीखना और अपनाना ही होगा। अड्डू सुबह ही एक पुराना गमछा दे गया था। याद आया आज मंगलवार है। बजरंगबली के मंदिरों में काफी भीड़ रहेगी। सुबह से ही प्रसाद मिलना भी शुरू हो गया। इधर बाबा के यहां भी चाय तैयार हो गई। बाबा ने कहा, “बालभोग” करके निकलना। सुबह का नाश्ता यानी बालभोग। कितना सुंदर नाम या उपमा है। यह नामकरण क्यों हुआ होगा, शोध का विषय है। बाबा बोले, पोहा बन जाएगा। हरी मिर्ची और आलू “अमनिया” करने के लिए “प्रेम कटारी” दे दी। ये दोनों शब्द बहुत आकर्षित कर रहे थे। वैष्णव संप्रदाय कमोवेश “काटना” शब्द का प्रयोग नहीं करता। इससे संभवतः हिंसा का बोध होता होगा। अतएव उन्होंने “अमनिया” शब्द अपनाया। वहीं जैन समुदाय भी सब्जी “सुधारना” कहता है। वहां भी काटने शब्द से निषेध है। दूसरा शब्द “प्रेम कटारी” यह चाकू का पर्यायवाची है। सवाल मूलतः सहिष्णुता का है, और व्यवहार में नरमाई का है। प्रेम कटारी सुनकर लगा जैसे कोई नया सा, कुछ अलग सा उपकरण होगा। मगर है तो सब्जी काटने वाला सामान्य चाकू! बस नामकरण में प्रेम आ गया। आपसी रिश्तों को लेकर तो “प्रेमकटारी” बहुत प्रचलित भी है। परंतु बाबा ने कहा “चाकू” से मुसलमान काटते हैं और वही “खाते” हैं। हम तो “भोग” लगाते हैं और “पाते” हैं। मैं तो इस तरह से सोच ही नहीं पाता हूं। पर यह तो नया संसार है, बहुसंख्यकों के आदरणीयों का संसार है।
बहरहाल, आरती हुई बाबा हवन के लिए बैठ गए। उन्होंने चंदन-बंदन और भभूत से श्रृंगार किया। एक छोटा सा आईना श्रृंगार के लिए मुझे भी दिया गया। मैंने आईना नहीं देखा। सोचा कि एक महीने तक आइने में मुंह नहीं देखूंगा, कंघा नहीं लगाऊंगा और साबुन तेल का भी प्रयोग नहीं करूंगा। थोड़ा सा चंदन माथे पर और हाथों में लगा लिया। वह छोटा लड़का संदीप भी साथ में बैठ गया। चलता पुर्जा है। ट्रेन में घूमता रहता है। पर है बड़ा मजेदार। उससे बातचीत करना अच्छा लगता है। इतने में अड्डू आ गया। मैंने उससे कहा कि यदि हो सके तो शाम तक एक पैन,कागज, एक लिफाफा और एक-दो टिकट ला देना। विचार हो रहा है कि दो चार दिन बाद एक चिट्ठी लिख दूंगा। शायद मन में यह भी है कि जब तक यह चिट्ठी मिलेगी, तब तक नए अन्जान स्थान पर पहुंच जाऊंगा। चिट्ठी लिखने की बात शायद इसलिए भी मन में उठी है कि मैं चाहता हूं कि बिनैका, खटपुरा और यहां के मंदिरों में कुछ भेंट चढ़ाऊं, जिससे कि इनकी कुटियाओं में कुछ सुधार हो सके और भविष्य में मेरी तरह के अजनबी, मुसीबतजदा और बेसहारा लोगों को आश्रय मिलता रहे। अपनी इस यात्रा में मेरी समझ में आया हमारे देश में आज भी धर्म और धार्मिक स्थानों का न केवल बहुत महत्व है, बल्कि उनकी उपयोगिता भी है। इन बाबा-बैरागियों में अभी भी सह्दयता, सहिष्णुता और निडरता देखने को मिलती है। यह भी समझ में आया कि साधु-संन्यासियों का भी समाज में कुछ योगदान हो सकता है। ये छोटे-छोटे मंदिर और आश्रम सचमुच में आश्रय स्थली हैं। लगा ये बाबा लोग बड़ा कठिन जीवन जीते हैं!
कल सुबह ग्यारह बजे की बस से निकलना है। बाबा ने एक दो स्थानीय फोन नंबर भी दे दिए, साथ ही बैक्लया तक का रास्ता भी समझाया। बताया वहां उनका एक चेला लछमन दास मिलेगा। वही वहां का कर्ता-धर्ता है। अड्डू ने कहा बस में बैठाल के फोन के लिए दस-बीस रू. भी दे देगा। उसने समझाया कि बस कन्नौद तक जाएगी। वहां से करीब दस-बारह किलोमीटर पैदल जाना होगा। वैसे तो खातेगांव से एक बस लोहारदा तक की मिल सकती है। वहां से भी पांच कि.मी. तो पैदल चलना ही होगा। लेकिन इस बस में बीस रू. लग जाएंगे। मेरे नए जीवन में बीस रू. बहुत ज्यादा महत्व रखते हैं। मैंने कहा कन्नौद से पैदल ही चला जाऊंगा। पास में बीस रू. होने भी तो चाहिए!
4 जुलाई 2007
आज चार जुलाई है। एक नए सफर की शुरूआत का दिन। मैंने लिफाफा बंद करके उस पर दो रू. का टिकट लगा दिया। कम टिकट लगाने से पत्र के पहुंचने की सुनिश्चितता हो जाती है। चाय पी। “बाल भोग” में एक रोटी मिल गई। मंगलवार को ढेर सारा प्रसाद चढ़ाया गया था। बाबा ने उससे कुछ दिया। साथ ही सत्तू भी बांध दिया, बोले “कहीं कुछ न मिले तो खा लेना।” मैं मंदिरों के दर्शन कर व सबको प्रणाम कर चल दिया। अड्डू किसी की मोटरसाइकल ले आया था। उसने एक चप्पल खरीद दी, एक पुरानी चादर और बीस रू. भी दिए। अब मैं धनवान भी था और नंगे पैर भी नहीं था! उसने ग्यारह बजे की बस में बैठाया और बस चल दी।
मुझे याद ही नहीं आ रहा था कि पिछली बार कब किसी बस में बैठा था। दस बरस-बीस बरस या इससे भी ज्यादा ? याद नहीं आ रहा। निजी बस खचाखच भरी थी। अड्डू की वजह से बस में टिकट भी नहीं लगा था। बेहद गर्मी में बरास्ता बुदनी, होशंगाबाद, फिर वापस बुदनी, रेहटी, नसरूल्लागंज होती हुई फिर देवास जिले में पहुंची। खातेगांव जो बड़ी जगह है, से कन्नौद पहुंची। तब तक शाम का पांच बज गया था। उतरकर चाय पी व कचौड़ी खाई। पांच रू. खर्च हो गए। चाय वाले से ही बैकल्या का पता पूछा। उसे भी थोड़ी बहुत ही जानकारी थी। लेकिन बोला पैदल नहीं पहुंच पाओगे। मैं उससे दिशा समझ उस ओर चल पड़ा। इंदौर के रास्ते। पांच कि.मी. बाद पता किया तो बोले वापस पीछे जाकर दूसरी दिशा में जाओ। वहां एक मंदिर दिखा तो मैं वहां पहुंच गया।
अब यह एक और नए सफर की शुरूआत थी। देखा तो वहां एक किसान मोटरसाइकिल लिए खड़ा था और बोअनी करवा रहा था। उससे नर्मदे हर कर पूछा, कि यहां मंदिर में कोई है?
उसने कहा यहां पुजारी तो आएगा, पर रात में नहीं रूकेगा। मुझसे एक दो सवाल पूछे फिर कहा, यहां तो रात में नहीं रूक पाओगे, चाहो तो घर चलो! एक अनजान के लिए इतनी सह्दयता और विश्वास ? हम शहरियों को सामान्यतया असंभव सा लगता है। फिर बोला गांव करीब तीन किलोमीटर दूर है। वहां नदी के दूसरी तरफ एक मंदिर है चाहो तो वहां छोड़ दें। वहां एक बाबा रहता है। मैं मोटरसाइकिल पर बैठ गया। देखा तो समझ में आया कि यहां की काली मिट्टी वाली जमीन बहुत उपजाऊ है। कपास और सोयाबीन की खेती है। संपन्न किसानों का इलाका है।
मैं पुराने मंदिर पहुंचा। देखा किसान कपास की बोअनी कर बैलगाड़ियों से वापस घर लौट रहे हैं। मैं पैदल मंदिर की ओर चल पड़ा। तभी एक अधेड़ उम्र का किसान “जयराम जी” कहकर रूक गया। बातें करते मंदिर तक साथ गया। बीड़ी “ऑफर” की। उसका गांव रतवया करीब दो-ढाई किलोमीटर दूर है। उसने बताया बाबा शहर गया है, पर लौटगा जरूर। जरा रूखा है, पर आपको भोजन मिल जाएगा। उसने यह भी कहा कि बोलो तो गांव से भिजवा दूं, या गांव चलो। अपरिचित जगह, अपरिचित लोग, मगर इतना अपनापा?
मैंने कहा बाबा तो आ ही जाएगा मैं यहीं रूकुंगा। किसान ने कहा वह सुबह जल्दी आ जाएगा। अब मैंने स्थान पर गौर किया। इस बेहद प्राचीन मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति है। एकतरफ का चबूतरा बाबा ने घेर लिया है। सामने चबूतरे पर धूना जलाने का स्थान है। एक मटके में पानी और लोटा रखा है। जंगली पेड़ पौधों के बीच में सुंदर सी मगर छोटी नदी। तभी एक लड़का आया और उसने मंदिर में दिया जलाया और बिजली के खंबे को बांस से हिलाकर एक बल्ब भी जला दिया। वह जितेन्द्र प्रजापति था। पढ़ा लिखा है और खेती करता है। जो किसान यहां से गए थे उनका भांजा है। मैंने उससे पूछा कुम्हार हो, तो बोला नहीं हम प्रजापत हैं, उनसे ऊंचे। खेत में ही घर बना है, बुआई चल रही है। बोला अगर बाबा न आएं तो पौन किलोमीटर पर घर है, वहां चले आना। अंधेरा हो गया। मैं भी नदी में नहा धो आया। इस बीच सियार इक्ट्ठा हो रोने लगे।
उन्हें भी बाहरी आदमी की उपस्थिति खटक रही होगी। लाईट भी चली गई। भूख भी लगने लगी। बाबा नहीं आया। कहीं दूर लाइट जलती दिखी तो अपने यहां भी जलाने की कोशिश की। जबरदस्त करंट लगा। हिल सा गया। बहुत बड़े-बड़े चीटें दिखे। मैंने अपने चारों ओर राख की लकीरें डाल दीं। शायद बजरंग बली पर चढ़े प्रसाद खाने आ रहे हों। शाहगंज में बाबा का दिया सत्तू निकालकर मटके से पानी लेकर लोटे में घोला और पी लिया। अच्छा लगा। अडडू की चादर काम आई। उस घेरे में सो गया। रातभर बूंदाबादी होती रही।
अगली सुबह उठा। ठंड ज्यादा लगने लगी थी। सुबह का चार बजा होगा। नहाया। नदी का पानी बड़ा स्वादिष्ट था। खूब सा पानी पिया। तीन छोटी नदियां यहां आकर मिल रही थीं। शाहगंज में बाबा द्वारा दिया प्रसाद खाया और चल पड़ा। कल वाला किसान आज बैलों के साथ मिला। पूछा “जा रहे हो क्या?” मैंने कहा “हां अब चलते हैं।” उसने देखा मंदिर वाला बाबा नहीं है तो पूछा “रात में क्या खाया, कहां सोए?” मैंने कहा “बाबा तो आया नहीं। कुछ खाने की इच्छा भी नहीं थी। नहा-धोकर पानी पीकर यहीं चबूतरे पर सो गया था। अब निकलता हूं।”
न जाने क्या हुआ कि उस किसान ने मेरे पैर छुए और कहा “बाबा अब कहीं मत जाओ। यहां हम लोगों को तुम जैसे महात्मा की ही जरूरत है। तुम्हारे रहने, खाने-पीने का सब इंतजाम हम लोग करेंगे। दो तीन दिन में कुटिया भी बना देंगे। अब बैक्ल्या जाकर क्या करोगे? यहीं रहो। बाद में वहां घूमने चले जाना।”
उस भोले-भाले किसान की बात सुन बहुत अच्छा लगा। अंदर ही अंदर हंसी भी आई। गाइड फिल्म और मेरे लेखक मित्र मंजूर एहतेशाम की बात याद हो आई। वे हमेशा कहते थे कि एक दिन तुम्हारे साथ भी वही होगा, जो गाइड में हुआ था। तुम्हें देखकर वह फिल्म याद हो आती है। यानी मैं जबरन साधु बना दिया जाऊंगा। जाहिर है स्थिति तो वैसी ही बन रही थी। हरि कुम्हार नाम के उस किसान को समझा बुझाकर भेजा। वह फिर भी घर पर नाश्ता करने की जिद करता रहा। पर मैं चल पड़ा। उस किसान से मिलकर बहुत ‘सुख’ मिला। चलते हुए एक बड़े से गांव रतवाया पहुंचा। देखा एक घर में कुछ लोग एक मशीन पर कुछ काम कर रहे हैं। शायद लोहार हैं। मैं आगे निकल गया तभी पीछे से एक बच्चा दौड़ता आया और बोला “बुला रहे हैं, बाबा” मैं उस लोहार के यहां गया। उसने खाट पर बैठाया और बोला “बाबा यात्रा कर रहे हो? चाय पीकर जाओ।” उसने चाय पिलाई, सुपारी खिलाई। पूछता रहा “कहां से आ रहे हैं? कहां जा रहे हो। बैक्लया तो अभी बहुत दूर है। जल्दी से खाना बना देते हैं। खाकर जाओ।”
मैं नर्मदे हर कहकर चल पड़ा। विचार करता रहा कि लोग गलत कहते हैं कि हमारे यहां भले आदमी बहुत कम हैं। वास्तविकता तो यही है कि बुरे आदमी बहुत कम हैं और जो हैं वह बहुत बुरे हैं। लोहार ने पूरा रास्ता समझाया। रास्ते में मैंने देखा कि इस इलाके में मुसलमान भी बहुत हैं और उनके मोहल्ले थोड़े अलग हटकर ही बने हैं।
जारी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा

