उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ, तुम जैसे महात्मा की जरूरत है

  • विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता

संपादन: चिन्‍मय मिश्र

यह एक अनमोल दस्तावेज़ है। यह एक ऐसी कहानी है जिसमें बताया गया है कि सिर्फ शेयरों को छोड़ना काफी नहीं होता है। ऐसा तो लॉग इन कर सकते हैं। विभूति दा मौलिक के त्याग से बहुत आगे जाते हैं और अपना स्वअर्जित यश भी समाज से विस्मृत करा देते हैं। समाज जब उनकी यश और कीर्ति को भी भूल चुका है, तब यात्रा के करीब करीब बार, वे अपने इस कठोपथन पर जमी हुई सफाई करते हैं और उसे सबके सामने लाने की कोशिश करते हैं। इस लंबी कहानी में एकाध जगह अनायास उस सूर्योदय यश का यशोगान सामने आता है तो वह उसे बहुत ढूंढता है।
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है।
इस संपूर्ण गाथा में कुछ भी उपदेशात्मक नहीं है। यह डॉक्यूमेंट्री का पाठ भी नहीं पढ़ा गया। यह एक ऐसी रचना है, जो सिखाती है, कि बिना किसी को अपनी जिंदगी से दुखी किया जा सकता है और उसे सकारात्मक बनाया जा सकता है। इस कथा की एक विशेष विशेषता यह है कि यह सच है। याद रखें किट्स ने भी कहा था, ”जो सुंदर है, वही सत्य है, जो सत्य है वही सुंदर हो सकता है।” गांधी जी ने भी “सत्य ही ईश्वर है” कहा था। विभूति दा की ये डायरी अब साउदी सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है।
-चिन्मय मिश्र

जारी…

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