एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है।विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
नई दिशा में बढ़ना
आज गुरु पूर्णिमा है। मुझे निकले हुए एक माह पूरा हो गया है। सुबह ही नाई आ गया। छोटू का मुंडन हो गया। बाबा सियाचरण ने छोटू को यज्ञोपवीत पहनाया, हीरा, दीक्षा दी। दूसरी ओर कल्याण शर्मा ने मुझे जनेऊ पहनाया और बाबा ने हीरा। इस दीक्षा संस्कार से नया विवाद खड़ा हो गया। बाकी के चारों साधु घूनी पर बैठे रहे और उन्हें इस कार्यक्रम में न तो बुलाया गया न ही वे स्वयं आए। छोटू जब उन सबसे आशीर्वाद लेने गया तो छविराम दास ने उसे यह कहते हुए दुत्कारा कि “ऐसे थोड़ी होता है।” छोटू मुंह लटकाकर लौट आया। इसके बाद सियाचरण उनके पास गए और दोनों में विवाद शुरू हो गया। छविराम दास का कहना था ऐसे चोरी से चुपचाप अकेले ही संस्कार क्यों कर दिया? जबकि सियाचरण का कहना था सबको तो मालूम था, कोई मंत्र नहीं दिया है। तकरार ने जोर पकड़ लिया और मोहनदास और कमलदास को अपने साथ लेकर छविराम दास चले गए। मुझे चेला न बना पाने का क्षोभ भी छविराम दास को था। वहीं दूसरी ओर सियाचरण दास अपनी पकड़ तनिक भी ढीली नहीं होने देना चाहते थे। समझ में आ रहा है कि चेला, संस्कार और दक्षिणा को लेकर साधुओं में घनघोर युद्ध हो जाता है। मेरे लिए यह अकल्पनीय ही था कि भौतिक संसार का मोह छोड़ चुके हैं साधु समाज इस सबको लेकर आपसी बैर पाल लेता है। वास्तव में यह मेरे लिए एकदम नई परिस्थिति थी। जाते हुए बाबा लोगों ने हम लोगों के अभिवादन का उत्तर तक नहीं दिया। वहां का माहौल एकदम खराब हो गया।
धीरे-धीरे अपनी नई अर्जित क्षमता का भान हो रहा हैं और नई दिशा में बढ़ने की जिज्ञासा और साहस भी बढ़ गया लगता है। साथ ही न्यूनतम में रहने की आदत भी बनती जा रही है। जब तक कुछ विकल्प व स्पष्टता नहीं उभरते तब तक तो बाबा लोगों के साथ ही रहना होगा। बहरहाल, धीरे-धीरे मन भरता जा रहा है। एक महीने की स्वयं की परीक्षा तो हो ही गई है और समझ में आ गया है कि किसी भी परिस्थिति में, कितने ही अभाव में और पूर्णतः अनजान लोगों के बीच भी अपना अस्तित्व बनाए रखा जा सकता है। सोचता हूं, यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। नर्मदा परिक्रमा के शुरू होने की प्रतीक्षा है। सोचना होगा इस बीच कहां और कैसे समय बिताया जाए। एक विचार यह है कि यहां से बाबा लोगों के साथ नहीं जाऊंगा। अभी सोचता हूं दीपक के पास जाऊं और उससे सलाह मशविरा करूं। अभी भ्रम की स्थिति है।
सियाचरण दास और छोटू ने गुरु पूर्णिमा के अगले दिन नया मिशन शुरू किया। वे कुंभराज गए और जो लोग कल नहीं आ पाए थे उनसे काफी कुछ बटोर कर लौटे। खूब दक्षिणा मिलने से छोटू भी बहुत खुश था। मैं देख रहा हूं कि जब से उसका संस्कार हुआ है, तब से वह ज्यादा उदद्ण्ड हो गया है और किसी की सुनता नहीं है। बस थोड़ा शैतान है, पर उसमें कोई बुरी आदत नहीं है। पहले पहल मुझे लगा था कि एक अनाथ बालक को शरण देकर बड़े परमार्थ का कार्य किया है, लेकिन अब समझ में आ रहा है कि ऐसे बेसहारा बच्चों को अपना चेला बनाकर अपने कब्जे में रखने के लिए साधुओं में होड़ मची रहती है। उन्हें जो दान-दक्षिणा मिलती है वह गुरु को भेंट हो जाती है और सेवा तो वे करते ही हैं। वैसे खुद बाल बच्चेदार साधु होने की वजह से सियाचरण दास का व्यवहार छोटू के प्रति काफी अच्छा है।
अगस्त शुरू हो गया। सुबह चाय पीते समय तय हो गया कि कल निकलना है। मैंने बता दिया अभी शाहगंज न जाकर धार जाऊंगा और वहां से पीठ व कमर का इलाज करवा के शाहगंज आऊंगा। बाबा को शंका हुई कि आऊंगा भी या नहीं। मैंने सोचा था निकलने से पहले दीपक को फोन करूंगा। अब लगता है बिना सूचना के ही पहुंच जाऊं। वहां कोई न कोई तो मिलेगा ही। सिर छुपाने की जगह तो मिल ही जाएगी। आज यहां आखिरी दिन है और जाने का उत्साह है। अभी तक मैं खाना बनाने में योगदान के नाम पर कभी-कभार सब्जी काट देता हूं। सोचा, आज रोटी सेंककर देखता हूं। मुकेश के साथ मिलकर चूल्हे के धुंए में आंसू और पसीना बहाते-बहाते दस बारह लोगों के लिए मोटी-मोटी रोटियां सेंक डालीं। जीवन में पहली बार इतनी रोटियां सेंकी। इसीलिए भोजन में भी कुछ ज्यादा ही स्वाद आया। सुबह सात बजे निकलना भी है। इस बीच इतने दिनों में यहां पहली बार तेज बारिश भी आई।
धार: सोच विचार 2 अगस्त, 2007
सुबह जाने के लिए जल्दी से तैयार हुआ। धीरे-धीरे बहुत सा सामान इकट्ठा हो गया है। अड्डू ने पुराना लाल बैग दिया है, उसमे एक दरी, एक ओढ़ने की चादर, एक बिछाने की चादर, एक लोटा और एक गिलास रखा। एक काला बैग बाबा मिश्रा ने दिया था। इसमें दो चड्डी बनियान, एक लुंगी एक कुर्त्ता, गमछा, रामायण का गुटका और एक छाता रखा। यह मेरी पिछले एक महीने में अर्जित संपत्ति हैं। करीब के गांव से कोई भगत जीप ले आया। इतने दिनों में पहली बार चार पहिया वाहन में बैठा। कुंभराज पहुंचे। छोटा स्टेशन है। बीना-उज्जैन पेसैंजर में बैठ गए। साफ सुथरी ट्रेन है। साढ़े बारह बजे मक्सी पहुंच गए। सियाचरण दास को यहां से भोपाल की रेल पकड़ना है। मैं इसलिए उतर गया क्योंकि बिना टिकट अकेले सफर नहीं कर सकता। यहां से इंदौर के लिए और इंदौर से धार की बस पकड़ी। गर्मी की वजह से पसीना-पसीना हो गया। बस पांच बजे धार पहुंची। सुबह से बस एक प्लेट पोहा खाया था। यहां स्टेंड पर एक कचौड़ी खाई, चाय पी और माण्डु रोड पर पैदल चल पड़ा। रास्ता करीब चार किलोमीटर का होगा। छह बज गया। सोचा दीपक होगा या नहीं? कैसे मिलेगा? अभी चार महीने पहले तो यहां रहकर गया था। परंतु आज परिस्थिति एकदम बदल गई थी। मैं एक नये परिवेश में वापसी कर रहा था। अंदर जाकर रास्ते के किनारे बैंच पर बैठ गया।
तभी एक कर्मचारी आया, बोला दीपक जी ऊपर है। मैंने कहा खबर कर दें मंडला से एक स्वामीजी मिलने आए हैं। तभी छगन आ गया। वन्या की शादी में वह एक हफ्ते साथ रहा था। मुझे अवाक देखता रह गया और रो पड़ा। बोला भैया आपने अपना कैसा हाल बना लिया। दीपक भी आ गया, बोला “मुझे लग ही रहा था कि आजकल में आओगे। दो दिन से बहुत याद कर रहा हूं और कोस रहा हूं।”
मैंने उससे कहा “बाहर मंदिर में या कहीं और रूकने की व्यवस्था हो सकती है?”
उसने कहा “अब आज तो कमरे में रहो, कल देखेंगे।”
अब मैं अपने नए और पुराने परिवेश के द्वंद में उलझ रहा था। खैर, अंदर चला आया। इतने दिनों में पहली बार साबुन आदि लगाकर नहाया। बाल भी धोए। बड़ा हल्का लगा। सोने की कोशिश की लेकिन नींद नहीं आई। इस तरह के सुविधाजनक बिस्तर पर सोने की आदत नहीं रही। किसी तरह सुबह हुई। उठकर घूमता रहा। चाय पर अब तक के अनुभवों पर बातें करते रहे। सोचते रहे कि आगे क्या किया जा सकता है। उसने बताया महेश्वर में कुछ लोग इकट्ठे होकर मुख्यत: खेती से संबंधित व गाय के उत्पादों पर आधारित काम कर रहे हैं। देशी-विदेशी सब शामिल हैं। वहां जाकर देखा जा सकता है। झाबुआ जिले में जल संरक्षण का काम बड़े स्तर पर काफी समय से चल रहा है। उसने बताया कि वैसे तो आरएसएस से जुड़े लोगों ने शुरू किया था, परंतु जाकर समझा जा सकता हैं। मैं पहले कभी झाबुआ नहीं गया था इसलिए जाने की इच्छा तो है। वैसे संघ से मेरा वैचारिक अलगाव तो है, लेकिन!
झाबुआ: आदिवासी अंचल
रात में सब तैयारी कर सुबह दीपक के साथ मेन रोड पर पहुंचा। वहां इंदौर-डूंगरपुर बस में महेश शर्मा मिले। पचास बरस के होंगे। सामान्य व्यक्तित्व धोती और हाफ शर्ट पहने हुए थे, मेरे लिए एक सीट रोक रखी थी। साथ में एक युवक और था। महेश जी भी शायद बहुत बातूनी नहीं हैं। महीने भर पहले ही एंजियोंप्लास्टि हुई है। भले आदमी लगे। दतिया के रहने वाले हैं। साथ वाला युवक भी पहली बार झाबुआ जा रहा है। ये लोग झाबुआ जिले में ‘शिवगंगा अभियान’ के नाम पर कार्य करते हैं। इनका कार्य जल संरक्षण है। इसके अन्तर्गत इनके कार्य हैं जनसहयोग से छोटे-छोटे बांध-कुंए आदि खड़े करना और उसके साथ ही गांव के स्तर पर संगठन तैयार कर गांव का सर्वागीण विकास करना। वैसे ये मुख्य रूप से वनवासियों के साथ काम करते हैं।
मैं भी किसी नए उद्देश्य की तलाश में हूं। महेश जी ने बताया कि बीमारी की वजह से काफी दिनों बाद झाबुआ जा रहे हैं। आज यहां विभिन्न स्थानों से आए प्रतिनिधियों की बैठक है। दीपक ने उन्हें मेरा थोड़ा परिचय दिया है, जैसे कि मैं लंबे समय से सामाजिक कार्यो से जुड़ा रहा हूं, भोपाल गैस कांड में मुआवजा दिलाने में मेरी महत्वपूर्ण भूमिका रही है और सबकुछ छोड़कर केवल सामाजिक कार्य में ही जुटना चाहता हूं इसीलिए कुछ तलाश रहा हूं।
महेश जी को यहां के चप्पे-चप्पे की जानकारी है। जिला-तहसील-गांव और वहां की आबादी। माछलिया घाट आया। यहां से एक छोटी नदी निकलती है ‘सुनार’। यहां फिर बचपन याद आया! झाबुआ जिले में घुसते ही मंडला जिले जैसे गांव और पथरीले पहाड़ी बरो में मक्के के खेत दिखते हैं। बहुत दूर तक बिल्कुल जबलपुर मंडला रोड की तरह के गांव व खेती दिखाई देती है। वैसे झाबुआ काफी उजाड़ सा दिखाई पड़ा। हरियाली भी नही दिखी और यहां की जमीन भी बहुत उपजाऊ नहीं है।
सुबह दस बजे झाबुआ के सिविल लाइंस में इनके दफ्तर पहुंच गए। कार्यालय छोटा ही है। अंदर वनवासी कल्याण परिषद और शिवगंगा के पोस्टर लगे हैं और एक आलमारी में आरएसएस का साहित्य रखा है। कुछ कार्यकर्ता यहां स्थायी रूप से रहते हैं। अधिकांश कार्यकर्ता आसपास के गांवों के पढ़े-लिखे आदिवासी है, साथ में आया आकाश भगत खंडवा का है। कई सालों से प्रचारक रूप में संघ से जुड़ा है। अब शिवगंगा से जुड़ने महेश जी के पास आया है। इस बीच मालवा, निमाड़ के जिलों के कार्यकर्ताओं ने आना शुरू कर दिया। मैं उठकर पीछे के कमरे में चला गया लेकिन महेश जी ने सबसे परिचय कराने के लिए बुला लिया। करीब पच्चीस युवा आदिवासी हैं। कुछ गैर आदिवासी। मैंने और सबने अपना-अपना परिचय दिया। मेरे परिचय में महेश जी ने थोड़ा और जोड़ा। यहां मुझे अपनी बिल्कुल विपरीत वैचारिक पृष्ठभूमि यानी एसयूसीआई के दिनों की याद ताजा हो आई। इसी जोश-खरोश से और उत्साह के साथ सबकुछ भूल भालकर ‘क्रांति के रास्ते’ में भिड़े रहते थे। इन्हें देखकर भी महसूस हुआ कि ये सुविधाविहीन समर्पण की भावना से जुटे हुए हैं।
इनकी आपसी अनौपचारिक बातचीत से यह उभरा कि संघ के जनसंगठन वनवासी कल्याण परिषद ने मुख्यतः ईसाई मिशनरियों का प्रभाव कम करने के लिए शिवगंगा अभियान वरिष्ठ प्रचारकों को जिम्मेदारी देकर शुरू किया था। झाबुआ जिले में यह अत्यंत सफल रहा तो यहां के अनुभवी कार्यकर्ताओं को अन्य जिलों में यह कार्य करने के लिए भेजा गया। वस्तुतः इस अभियान के प्रमुख कार्यकर्ता महेश जी और इन्दौर के हर्ष चौहान हैं। हर्ष चौहान बुद्धिजीवी हैं और महेश जी मैदानी कार्यकर्ता। ये दोनों अपने तरीके से अभियान चलाना चाहते हैं, परंतु संघ का अत्यधिक हस्तक्षेप होने लगा। संघ में प्रदेश स्तर पर जबरदस्त गुटबाजी भी शुरू हो गई। गुटबाजी इतनी बढ़ी कि संघ ने अभियान को सहयोग देना बंद कर दिया। यह सब अखबारों में भी छप गया। संघ ने महेश जी को प्रचारक के पद से निलंबित कर दिया। अन्य कई जमीनी कार्यकर्ताओं को भी संघ ने निकाल दिया। महत्वपूर्ण यह है कि महेश जी करीब तीस साल पहले घर बार छोड़कर संघ के प्रचारक बन गये थे और अविवाहित हैं। टकराव इतना बढ़ा कि अब बीजेपी सरकार भी इनके कामों में अडंगा डालने लगी है। अतएव यह तय हुआ कि अब सारा ध्यान झाबुआ जिले पर ही दिया जाएगा। संघ प्रचारक भी अब इन्हें क्षेत्रों में जाने से रोक रहे हैं। मैं सोच रहा था, यदि इनका संघ से मोह भंग और विरोध हो रहा है, तो मेरे लिए तो यह सुखद स्थिति ही होगी।
मेरी इच्छानुसार महेश जी ने बजाए शहर के गांव में रात बिताने का तय किया। इसी बीच एक प्रमुख कार्यकर्ता की पत्नी अस्पताल में भर्ती हो गई तो वे उसे देखने अस्पताल गए। वैसे पत्नी भी कार्यकर्ता है। निकलने को हुए तो एक मास्टर जी का फोन आ गया तो बोले उनसे मिलकर चलेंगे। मास्टर जी मोटरसायकल पर आए। गैर आदिवासी लग रहे थे। यहां वनांचल में आदिवासियों की मुख्यतः तीन उप-प्रजातियां हैं-भील, भिलाला और पटैलिया। भील सबसे पिछड़े और अशिक्षित तथा गरीब हैं। भिलाला लड़ाकू किस्म के और अपेक्षाकृत शिक्षित एवं सम्पन्न हैं। पटैलिया काफी हद तक हिंदू समाज से जुड़े हुए हैं। पढ़-लिखकर छोटी-मोटी नौकरी और व्यवसाय में लगे हुए हैं, तथा स्वयं को आदिवासी बताना पसंद नहीं करते। इसके अलावा लावेनिया जाति के लोग हैं जो गांवों में रहते हैं और अधिकतर नौकरी-पेशा हैं। ये लोग मूलतः गुजरात के हैं और ओबीसी. में आते हैं। जो मास्टर जी आये हैं उनका नाम लक्ष्मण सिंह नायक है, लावेनिया हैं और मेघनगर से थोड़ी दूर गुजरात बॉर्डर पर रहते हैं। यहां के आदिवासियों की अपनी कोई अलग भाषा नहीं है। जिसे भीली कहते हैं वह गुजराती ही है। क्षेत्र के अनुरूप उसमें मराठी, राजस्थानी या हिंदी का मिश्रण हो जाता है। मध्यप्रदेश, गुजरात, राजस्थान, महाराष्ट्र इन चार राज्यों में भील फैले हुए हैं-करोड़ों की संख्या में। लक्ष्मण सिंह भी साथ चलने को तैयार हो गए।
हम अपने मेजबान के यहां पहुंचे। एक चालनुमां पक्का मकान। अहाते में एक कार और तीन-चार मोटरसाइकलें खड़ी हैं। अंदर मास्टर जी का मकान है। एक ही छत के नीचे चार भाइयों के घर हैं। महेश जी बेरोक टोक अंदर प्रवेश कर गए। लक्ष्मण सिंह का पूरा परिवार इकट्ठा हो गया। महेश जी यहां परिवार के बुर्जुग सदस्य की तरह आत्मीय हैं। यहां अच्छा लग रहा है। जल्दी-जल्दी खाना बना। दाल,रोटी, भाजी। महेश जी बिन तेल-मिर्च का खाना खाते हैं। लक्ष्मण गुरू जी की पत्नी संतोष भी बराबरी से बातचीत में हिस्सा लेती हैं। चर्चा का मुख्य विषय वही संघ की गुटबाजी और शिवगंगा के कार्यकर्तां को प्रताड़ित किया जाना।
इस जगह का नाम गढूली रम्भापुर है। रात में बजाय तखत के मैं जिद करके जमीन पर ही सोया। सवेरे घर पर निगाह डाली। रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह बना है। एक के पीछे एक कमरा। बाहर के कमरे में कतार से सजाकर रखे चमकीले बर्तनों से ऐसा लगता है कि शायद बर्तनों के आधार पर परिवार की सम्पन्नता का आकलन किया जाता होगा। महेश जी ने दिनभर का कार्यक्रम बनाया। एक बड़ी नदी के कगार पर जो दूसरा बांध बनाया है, वह देखने जाना है। इस परिवार में आकर ऐसा लगा ही नहीं कि पहली बार आया हूं। कार से चलने लगे तो मैंने कहा पैदल चलने का अवसर नहीं आएगा? महेश जी बोले आगे आएगा।
कच्ची पक्की सड़क पर गुरुजी अपनी एक साल पुरानी आल्टो बेरहमी से चलाते चल पड़े। एक संकरे कच्चे पगड़ंडी वाले रास्ते में गाड़ी फंस गई और गुरु जी से निकल नहीं रही थी। तब स्टेयरिंग पर मुझे अपनी कला दिखानी पड़ी। समझ में आया अभी कार चलाना भूला नहीं हूं। अंततः धादनियां गांव पहुंच ही गए। यह भीलों का विशुद्ध आदिवासी गांव है। बल्लू भूरिया यहां के नेता हैं। यहां घर अलग-अगल टोलों में होते हैं और खेतों के बीच भी घर होते हैं। एक खानदान वालों के घरों को मिलाकर एक टोला (मोहल्ला) बनता है, इसे फलिया कहते हैं। इसमें कुनबे से बाहर का कोई व्यक्ति नहीं रहता। शानदार व्यक्तित्व वाला बल्लू भूरिया अपेक्षाकृत सम्पन्न किसान है। गोरा नारा बदन और उसमें शक्ति टपकती हुई। आज खाने में पानिया बनेंगे। नई चीज है, मैंने पहले कभी नहीं खाई। नाले के किनारे मकान हैं, आसपास भुट्टे की बाड़ी और कुछ साग-सब्जी भी लगी है। मिट्टी की दीवालें और खपरैल। मकानों में लकड़ी का काफी उपयोग होता है। यहां सागौन के जंगल हैं। परछी में एक तरफ बकरियां और मुर्गे-मुर्गियों का निवास स्थान है। सामने बीचोंबीच पुरूषों के बैठने के लिये दो खाट डली हुई हैं। परछी के दूसरे कोने में घर की बुजुर्ग महिलाओं और बच्चों के सोने का स्थान और ओढ़ने-बिछाने के कपड़े रस्सी बांधकर उस पर लटके हुए हैं। लगभग मंडला के गोंड़ों की तरह की ही घर की परछी। जवान महिलाएं परछी के अंदर के कमरे में रहती हैं।
महेश जी मुझे अंदर ले गये। बड़ा-सा एकदम अंधेरा कमरा। अनाज रखने की बड़ी-बड़ी कुठिया, एक बड़ी सी पत्थर की चक्की, खाना बनाने का स्थान, चूल्हा आदि और लगभग एक-तिहाई कमरा दुधारू और खेतिहार जानवरों से भरा हुआ। सोने का स्थान मवेशियों के बंगल में! आज तो बारिश हो रही है, इसलिये मवेशी, बकरियां, मुर्गियां सब अपने अपने स्थान में घर में ही हैं। मवेशियों के रहने की इस तरह की व्यवस्था देखकर मैं एकदम हैरान रह गया। ऐसा तो मैंने पढ़ा या सुना भी हो तो ध्यान नहीं पड़ता। गौड़ लोग तो मवेशी अलग से घर से लगी हुई सार में बांधते हैं। चर्चा करने से दो तथ्य उभरकर आये-भीलों के लिये जानवर अत्यन्त पूजनीय हैं और परिवार के सदस्यों के समान हैं-एक तो यह, और दूसरा यह कि भीलों में मवेशी चुरा कर ले जाना आम प्रचलन में है, जिससे बचने के लिए इन्हें घर के अंदर परिवार के साथ ही रखना पड़ता है। जो भी हो, मेरे लिये तो एकदम नया अनुभव है। मवेशी के गोबर और पेशाब से किस तरह दूर भागते है ‘सभ्य’ लोग और ये लोग उसी में रहते हैं। मच्छरों का तो नामो-निशान नहीं है। हां, बाहर परछी में बेहद मक्खियां हैं।
यह सचमुच में बेहद रोमांचित कर देता है कि यह समाज पशुओं से कितना स्नेह करता है। यह भी पता लगा कि यह नई फसल का पहला दाना अपने बैल को खिलाते हैं, उसके बाद देवता को चढ़ाते हैं और फिर स्वयं उपयोग में लाते हैं। यह अनूठा और सर्वोतम सामंजस्य भी है मनुष्य व प्राणी जगत का।
दोपहर बारह बजे हम तीनों लोग निकल पड़े। पास ही एक बड़ी ‘अनास नदी’ अभी उफान पर है। पुल के इस पार मध्यप्रदेश और उस पार गुजरात। एक बड़ा नाला आकर नदी में मिलता है। उसके मुहाने पर इसे बांधा गया है। पानी लबालब भरा हुआ है। तेज बहाव के चलते लोग जाने को मना कर रहे थे। मगर महेश जी और मैं अड़ गए और पुल पार कर गुजरात पहुंच गए। बाद में छाती तक पानी में नदी पार की। किनारे के गांव का नाम भाजी-डोंगर है। पास ही पानी से घिरा टिटलीखेड़ा गांव है। यहां बहुत आनंद आया। जब लौट रहे थे तो बल्लू भूरिया ने बताया कि घर से निकलते हुए उसके पास झाबुआ से भाजपा कार्यालय से फोन आया था, किसी मीटिंग के लिए और उसे ये भी सूचित किया कि महेश जी किसी महात्मा को लेकर झाबुआ जिला आए हैं और दोनों घूम-घूम कर उमा भारती की पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, जरा सावधान रहना। मैं हंसते-हंसते लोट-पोट हो गया और पेट में दर्द होने लगा। ये राजनीतिक दल वाले कितने खोखले और असुरक्षित होते हैं।
हँसते, बतियाते बल्लू के घर पहुंच गये। खाना तैयार। भूख भी अच्छी लगी है। बल्लू इस गांव का तड़वी है। यानी मुकद्दम। वह भाजपा के आदिवासी किसान मोर्चा का भी वरिष्ठ पदाधिकारी है। सब लोग खाने अंदर बैठ गए। मक्के के आटे को बाटी की तरह गोल करके छिवले या खाखरे के पत्तों में एक-एक बाटी को बंद करके घंटों गरम राख में दबाकर सेंकते हैं, इसे ही पानिया कहते हैं। पानिया भी खाये, मक्के की रोटी भी, दाल और चटनी, महेश जी की भाजी। पानिया और अच्छी बनती। कहते हैं, उसमें समय अधिक लगता है। खाना खाकर परछी में मक्खियों के बीच लगभग पांच-पांच फीट की खाटों पर थोड़ी देर लेटे। इनकी खाट इतनी ही लंबी होती है। रात में देवता लंबी कर देते हैं, या पैर मोड़कर छोटे कर देते हैं!
थोड़ी देर आराम करके थांदनिया से निकल पड़े। वहां से दुंदका गांव पहुंचे। बाबा रामदेव का मंदिर है। इससे पहले भी बाबा रामदेव के मंदिर दिखे थे, लेकिन मैं समझा था कि वह टीवी वाले धूर्त का प्रभाव यहां भी हो गया। ये बाबा रामदेव तो लोक-कथाओं में हैं और राजस्थान की किसी रियासत में राजा रहे हैं। इन्हें भगवान राम का अवतार माना जाता है। सभी धर्मावलम्बी इन्हें मानते हैं। इनके मानने वाले कबीरपंथी की तरह हैं और इकतारा लेकर भजन करते हैं। साधु ने काली चाय पिलाई। फिर गांव के अंदर गए तो रसिया भाई और सकला भाई मिले। ये दोनों इस क्षेत्र के प्रभावशाली भिलाला युवक हैं। थोड़ी देर बैठकर चाय पी। महेश जी ने आज मेघनगर में किसी बाफना परिवार में भोजन और विश्राम रखा है। मैंने कहा मैं तो किसी आदिवासी के यहां रूकना चाहूंगा। मेघनगर फोन लगाया। भोजन बन चुका है, जैनी हैं न। वैसे इंदौर से दवाइयां लेकर भी कोई मेघनगर आ रहा है, इसलिये जाना तो है ही। तय हुआ भोजन मेघनगर में और रूकेंगे कहीं और।
मेघनगर चल दिये। कोई खाते-पीते व्यवसायी हैं, बाफना लोग। बड़ा-सा पक्का घर है। कई तरह के पकवान बनाकर रखे हैं। बाफना जी की स्त्री ने बड़े प्रेम के साथ सबको भोजन कराया। महेश जी आदि नेताओं ने ऐसे सुविधाजनक अड्डे भी बना रखें हैं, जहां आकर अच्छे से भोजन और विश्राम कर सकें। कम्युनिस्ट नेताओं के भी यही रंग-ढंग होते थे। अब तो खैर, उनके पास सुविधा ही सुविधा है। इस बीच इंदौर से सुशील शर्मा भी दवाई लेकर आ गया। लगभग पच्चीस वर्ष का झाबुआ जिले का निवासी युवक है जो इंदौर कार्यालय में रहकर एमए पढ़ रहा है। महेश जी से काफी नजदीक से जुड़ा हुआ है।
मेघनगर से निकलते-निकलते रात का दस बज गया। मेरा आग्रह था किसी आदिवासी के यहां रात गुजारने का। अंधेरे में दो किलोमीटर चल घोसलियां गांव के भील आदिवासी युवक गब्बू सिंह के घर पहुंचे। परिवार में पत्नी और दो बच्चे हैं। बच्चा लगातार खांस रहा है। परछी के एक कोने में एक काली मुर्गी अंडा सेती बैठी है। जैसे ही उधर जाओ कुटकुटाती है। मैं तो जमीन पर ही सोया। महेश जी लगातार मोबाइल पर बतियाते रहे। रात ग्यारह बजे फोन पकड़ाते हुए बोले आकाश भगत बात करना चाहता है। थोड़ी देर बाद बोले बैगलोर से सौरभ मारू जो होनहार न्यूक्लीयर साईटिस्ट हैं बात करेंगे, मंदसौर का रहने वाला हैं। मैं परेशान हो गया। समझ में आ रहा था कि महेश जी और उनके अनुयायियों को मोबाइल पर बात करने का रोग है। बारह बज गया था।
क्रमशः…
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