एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
9 अगस्त 2007
सुबह जल्दी उठा। टहला, हैंडपंप पर नहाने गए। गब्बू सिंह गरीब आदिवासी है, उनका छोटा-सा मकान है। मवेशी नहीं है, शायद खेती भी नहीं हैं। बच्ची को पढ़ा रहा है। थोड़ी देर बच्ची के साथ बैठकर उसे पढ़ाता रहा। खुश हो गई। चाय बन गई, न न करते हुए भी। गुरूजी का इंतजार करते रहे। वह तो नहीं आये, एक जीप भेज दी। आज तय किया है कि घोसलिया से काफी दूरी पर तीसरा बांध देखने जाएंगे जो इसी साल पूरा हुआ है और जिसमें पहली बार पानी भरा है। महेश जी ने भी इसे नहीं देखा है, बनने के बाद। अब तो जीप है, कहीं भी घुस सकती है। महेश जी ने बताया, इस क्षेत्र में जो संघ के प्रचारक थे और बड़े लोकप्रिय थे तथा जिन्हें अब संघ ने मुक्त कर दिया है, वे मेघनगर आये हुए हैं मिलते हुए चलेंगे। किसी सेठ के घर के सामने रूके। प्रचारक महोदय वैभव जी मिले। लगभग 40 वर्ष के गौर वर्ण, लिपे-पुते, साफ-सुथरे कपड़ों में ऊपर खंडेलवाल सेठ के संगमरमर से ढ़के हुए, भद्दे ढंग से बने हुए सोफों से सजे कमरे में विराजमान हैं। यजमान कोई नवयुवक है, जो सो रहे हैं। नवविवाहिता पत्नी नकचढ़ी-सी है और चाय रखकर गायब हो गई। वैभव का चेहरा जाना-पहचाना लगा। उसके चेहरे पर लिजलिजापन और अहंकार एकसाथ दिखाई दिया। वहां से जल्दी रवाना हो लिए। तो, इन सब प्रचारकों ने अपनी सुख-सुविधा के लिए एक-एक सेठ को पकड़ रखा हैं और वहां ऐश्वर्य भोग करते रहते हैं।
महेश जी से दो दिन में बड़े अनौपचारिक संबंध हो गये हैं। रात की भड़ास तो अंदर थी ही। मैंने कहा आप लोग मोबाइल का बड़ा दुरूपयोग करते हैं। जितनी देर मोबाइल पर बात करते हैं-और खूब-खूब देर करते हैं, उतनी देर के लिये अपने आसपास से कट जाते हैं। यह उचित नहीं है। नितांत आवश्यक होने पर ही मोबाइल का उपयोग होना चाहिये। महेश जी ने कहा ठीक कह रहे हैं। आदत बिगड़ गई हैं। अब सुधारूंगा। थोड़ी आगे पहाड़ी पर महेश जी बोले एक फोन कर लेता हूं। आगे सिग्नल नहीं मिलेगा। जेब मे हाथ डाला तो मोबाइल गायब। कहीं गिर गया था। मुझे हंसी आ गई। महेश जी बोले आपकी बात लग गई।
खेड़ा मंदिर पहुंचे। यहां इनका एक ‘हार्ड कोर’ कार्यकर्ता रामचंद्र रूपला भगत रहता है। तय हुआ कांकड़ कुआं बांध देखेंगे। पाल (पाट) थोड़ी बैठ गई है। पानी के निकास के लिए जेसीबी आई है, किसी सेठ ने यह दान में दी है। इससे शिवगंगा की पैठ का भी अंदाजा हो जाता है। सुंदर स्थान है। आदिवासी दोपहर को खेत पर जाते हैं। घर पर बच्चे और बूढ़े ही रहते हैं। पर महेश जी सबसे संबंध बना लेते हैं। लौटते हुए मैंने पूछा कि अभी कल और कोई बांध देखना है क्या? महेश जी ने कहा, नहीं। जहां-जहां का काम चल रहा है, दो-तीन जगह कल जायेंगे। मैंने कहा अभी तक जहां भी गये जंगल, पहाड़ कहीं नहीं है। वे बोले वह तो अलीराजपुर के आसपास हैं। घनघोर जंगल। मैंने कहा दूर होगा, अगली बार जायेंगे। उस तरफ आपका काम नहीं होगा। उनका जवाब था अरे ऐसा नहीं है, कल वहीं चलते हैं कट्ठीवाड़ा को झाबुआ का कश्मीर कहते हैं। मैं भी तो बस यही चाहता था। खेड़ा आकर रामचंद्र भगत जी के यहां शानदार भोजन किया। मक्के की रोटियों का जवाब ही नहीं। पचती भी आसानी से हैं। इनका भी पूरा खानदान एक फलिया में रहता है। यह मां का घर है। पिता घर जमाई हैं। गोंड़ों में जैसे लमसना होते है। यहां मां की सत्ता है। डोकरी बड़ी स्मार्ट है। इन आदिवासियों में स्त्रियों का बड़ा आदर-सम्मान देखने को मिलता है। ये लोग मां को आया और पिता को बा कहते हैं।
महेश जी के वर्णन से लग रहा था कि शायद मैं अपने गंतव्य पर पहुंच पाऊंगा। कट्ठीवाड़ा को निकल पड़े। रास्ते में चलते-चलते महेश जी तीन जगह रूके-कोई मर गया, कोई बीमार है, कोई पैदा हुआ है। सबसे मिलते चले। रास्ते में एक बड़ा गांव कंजावानी आया और अच्छा घुप्प अंधेरा होने पर सेजावाड़ा पहुंच गये। गांव के बाहर गाड़ी खड़ी की, आगे सकरी गली है। इस तरफ बिजली रहने का रिवाज तो बहुत ही कम है। वैसे कहने को तो गांव-गांव में बिजली है। गांव के मुहाने पर ही एक नया पक्का मकान बन रहा है। गाड़ी वहीं रोकी। सुमेर मिल गया। वह झाबुआ से पहले ही यहां आ चुका है कांवड़ यात्रा की तैयारी के लिए। सब जगह से कांवड़ यात्राएं निकल रही हैं। यही इनका शक्ति प्रदर्शन है। झाबुआ की बैठक भी इसीलिए थी। थोड़ी दूर पर सरजन सिंह के घर पहुंचे। लंबा-चौड़ा लगभग पचास वर्षीय भील। सहज ही हाथ में फरसा लिए परशुराम के चित्रों पर ध्यान गया। ईसाई मिशनरियों को आतंकित करने में इसकी बड़ी भूमिका रही होगी। कांवड यात्राओं की भरमार बता रही है कि किस तरह हिन्दुत्व की पैठ यहां कराई जा रही है।
बहरहाल, अंदर गए। खाना बनना शुरू हुआ। सरजन सिंह ने सब्जी बनाई। पत्नी ने मक्के की रोटी और बेटी ने गेंहू की रोटी और चावल। ये आदिवासी लोग विशिष्ट अतिथियों को गेंहू की रोटी और चावल अवश्य परोसते हैं। गप-शप चलती रही। अब सभी काफी घुल-मिल गये हैं। हंसी-मजाक भी होता है और बीच-बीच में ज्ञान की बातें। अच्छी भूख लग आई। खाना लगा। सरजन सिंह ने पता नहीं कौन-कौन सी सब्जी मिलाकर पतली साग बनाई है। बेहद स्वादिष्ट और मिर्ची इतनी कि कोई शहराती खाने का सोच भी न पाये। मैं तो खाता चला गया। गमछे से आंसू और नाक पोंछता और खाता। बचपन की याद आ गई, जब कक्काजी ऐसा ही मिर्ची वाला बेहद स्वादिष्ट गोश्त बनाते और हम लोग आंसू, नाक बहाते हुए खाते चले जाते। मैंने आज शायद सबसे ज्यादा खाया अब कल जो हो, देखेंगे।
बचपन रह-रहकर लौटता आता है। आज जहां मैं हूं, वह बचपन की मेरी कल्पना से सर्वथा भिन्न है, लेकिन न मालूम क्यों वह भिन्नता अपने आप खत्म सी होती जा रही है। जीवन का प्रवाह नदी का जल तो नहीं होता कि रोज नया हो जाए। वह तो दोहराव में भी स्वयं को खोजता है। खैर आज दस अगस्त हो गई है। सुबह बहुत जल्द नींद खुली। मिर्ची ने जोर मारा, जंगल भागा। एक-दो-तीन बार पूरी सफाई हो गयी। ये सरजन सिंह जिन्हें देखकर परशुराम का स्मरण हो आया था, वास्तव में भोले बाबा हैं। सुबह से क्षमा प्रार्थना में लगे हुए हैं, रात की मिर्ची के लिये। मुझसे बहुत मित्रवत हो गये हैं। जल्दी-जल्दी सब तैयार हुए। तय हुआ, चाय रास्ते में कही पियेंगे और नहायेंगे भी किसी नदी, नाला या झरने में। मेरा आज इनके साथ आखिरी दिन है। तीन दिन पता नहीं कैसे बीत गये। कल धार जाना है। महेश जी ने कहा आज दिन भर कट्ठीवाडा में बिताकर रात झाबुआ के आसपास किसी गांव में रूक जायेगें, जिससे मैं सुबह झाबुआ से धार के लिये बस पकड़ सकूं।
तीन दिन के साथ के बाद महेश जी अब मुझे भाई साहब कहकर संबोधित करने लगे हैं। कहने लगे कि “दीपक जी ने कहा था साथ रहकर कुछ अनुभव प्राप्त करेंगे लेकिन है उल्टा ही। आपके साथ रहकर इतना सीखने को मिल रहा है। आपका ज्ञान, अनुभव जीवनशैली और सौम्यता। इतने कम समय में मुझे इतना प्रभावित किसी ने नहीं किया। लगता है, बरसों से आपके साथ जुड़ा हुआ हूं।”
मैंने कहा, “आप शार्मिंदा कर रहे हैं। यह सब परस्पर है। जमीन से जुड़कर कैसे काम किया जाता है, यह सब सिद्धांत रूप में खूब जाना है और काफी कुछ किया भी है। लेकिन आपके जैसा संगठनकर्ता मुझे कभी नहीं मिला। मैंने सोचा भी नहीं था कि इतने कम समय में सब लोग इतने अपने लगने लगेंगे। यद्यपि दीपक ने कहा तो था, लेकिन मैं सशंकित था।”
महेश जी ने कहा, “दीपक जी की समझ बहुत स्पष्ट है और उनका व्यक्ति का आंकलन बहुत तथ्यपरक और सही होता है”। इस संगठन में दीपक का काफी सम्मान और पैठ है। वैसे पहले भी कई बार दीपक ने शिवगंगा अभियान की चर्चा की है।
तमाम वैचारिक भिन्नताओं के बावजूद महेश जी का साथ काफी उपयोगी और ज्ञानवर्धक रहा है। साथ ही यह भी समझ में आ रहा है कि अंततः सामाजिक संबंधों की नींव विनम्रता और सहिष्णुता पर ही डाली जा सकती है। यह तय है कि ये लोग जो कर रहे हैं, वह काफी विरोधाभासी भी लग रहा है। पानी की संरचनाएं बनाकर ये समाज को जोड़ रहे हैं, लेकिन दूसरी ओर धर्म को लेकर इनके पूर्वाग्रह समाज के हित में नहीं हैं। खैर, मैं तो इस नए तरह के अनुभव का लाभ ही ले रहा हूं और आंनद भी उठा रहा हूं। साथ ही दीपक को मन ही मन धन्यवाद भी दे रहा हूं।
सुबह सात बजे निकलकर भाबरा पहुंचे। यह महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की जन्मस्थली है। नाश्ता किया। इतने दिनों में मैंने पहली बार अपनी जेब से पैसे दिए। पैदल ही जन्मस्थली पर गया तो इसे बंद पाया। साथ ही इसे एकदम जर्जर और उपेक्षित हालत में पाया। मन दु:खी हो गया। जिन लोगों ने देश के लिए जुनून में जवानी और जीवन दोनों कुर्बान कर दिए, क्या हम उनकी याद भी संजोकर, संभालकर नहीं रख सकते? याद किया कि एक गरीब ब्राहमण शिक्षक के यहां ‘चंद्रशेखर तिवारी’ ने जन्म लिया और उनका अंत ‘चंद्रशेखर आजाद’ के रूप में हुआ। काकोरी कांड के बाद भी वे कुछ दिन यहां छुपकर रहे थे। स्मारक की चाबी नगर पंचायत के किसी कर्मचारी के पास रहती है। वह दिन में घंटे दो घंटे को खोल देता है। मैंने बाहर से प्रणाम किया और सोचा यही हमारे असली तीर्थ हैं। सार्वजनिक धन के करोड़ो रुपए मंदिरों की सजावट में लग रहे हैं और शहीदों के स्मारक? गाड़ी के पास लौटे। थोड़ी देर तक बात करने की इच्छा ही नहीं हुई।
थोड़ा आगे चलने पर चढ़ाई शुरू हो गई। जंगल पहाड़ दिखने लगे। कट्ठीवाड़ा गांव अभी लगभग पंद्रह-बीस कि.मी. दूर है। यह गांव का नाम भी है, और इस क्षेत्र को भी कट्ठीवाड़ा कहा जाता है, जैसे बस्तर गांव भी है और क्षेत्र भी। बिल्कुल ऐसा लगने लगा, जैसे बस्तर में प्रवेश कर रहे हैं। केशकाल घाटी से ऊपर चढ़ते हुए जैसा लगता है, वैसा ही यहां लगा। लगभग वैसे ही पेड़, पौधे, मिट्टी का रंग और पहाड़, चट्टानें। ये है ‘असली झाबुआ’। आदिवासी भी वैसे ही पिछड़े डरे हुए दिखाई दिये।
महेश जी ने कहा “पुलिस और फॉरेस्ट विभाग का बड़ा आतंक है।”
मैंने कहा “इनकी खिलाफत के लिये दूसरे आदिवासी क्षेत्रों में तो लोग संगठित हो रहे हैं, बड़ा आंदोलन खड़ा हो गया है। क्या यहां ऐसा कुछ नहीं है?”
महेश जी ने कहा “अरे नहीं, यहां भी एकदम अंदर के जंगली इलाकों में राष्ट्र विरोधी तत्वों ने आदिवासियों को संगठित करना शुरू किया था। हमसे टकराव हुआ। अभी उदयगढ़ क्षेत्र में तो सक्रिय हैं। हमारे कार्यकर्ताओं को धमकाते रहते हैं। ईसाई मिशनरी उनका साथ देती हैं, उन्हें धन भी देती हैं।”
मैंने पूछा “कौन, नक्सलवादी?”
“हां, वही राष्ट्रद्रोही।”
“लेकिन ईसाई मिशनरी उनका साथ क्यों देने लगी?”
“हमारे दुश्मन उनके दोस्त, दोनों राष्ट्रविरोधी।”
मैंने कहा “अच्छा। फिर कभी चर्चा करेंगे।”
अब इस समूह का वास्ताविक मनतव्य और भी स्पष्टता से सामने आने लगा था। धीरे-धीरे यह भी समझ में आ रहा था कि सबकुछ अंततः ईसाई मिशनरी के खिलाफ ही था और कमोबेश नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया जा रहा था।
क्रमशः…
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