
- आशु चौधरी ‘अर्शी‘
कविताएं और चित्र
अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर विशेष
सुनो लड़कियो,
बाज़ के गुण सीखो।
प्रेम को उठा
रख दो परे,
लड़कियो
भड़को नहीं,
विचार करो।
प्रेम के इंतज़ार में
गुज़ार देती हो
ज़िंदगी।
प्रेम भी कर लेना
वक़्त आने पर,
ये राह देखता होगा
तुम्हारी।
सुनो लड़कियो,
बाज़ के गुण सीखो,
लक्ष्य बनाओ,
एकाग्रता लाओ,
साहस से करो
शक्ति का अर्जन,
और आत्मबल की
सामर्थ्य से बींध
डालो शिकार की
तरह लक्ष्य को।
सुनो, पढ़ो तुम
मनोविज्ञान और
जानो अस्तित्ववाद,
कि फैशन के भिन्न
तरीक़े नहीं दे सकते
तुम्हें अलग पहचान।
छोटे बड़े कपड़ों में
मत उलझो,
गढ़ो स्वयं को।
सुंदर, असुंदर में
भी मत उलझो।
दुनिया भर में
सम्मान पाने वाली
महिलायें निरी सामान्य
रही हैं चेहरे से
गढ़ो व्यक्तित्व।
सशक्तिकरण माँगती
क्यूँ हो?
करती क्यूँ नहीं
स्वयं को सशक्त?
बहाने परिस्थितियों
के मत गढ़ो।
यदि एक भी
उदाहरण है तो
तुम्हें बहाने गढ़ने
का अधिकार नहीं।
अब शक्ति नहीं
सिद्धि करो और
फिर तुम्हें तो
सत्ता का भी लोभ
नहीं,स्नेह और
सम्मान की भी
चाहत मत रखो।
वह तुम्हें
स्वतः ही मिलेगा।
बस लड़कियो
बाज़ के गुण सीखो।
छोटे-छोटे सुख
वह मेढ़ों को पार कर
पहुँचता है गाँव के
बाहर की सड़क पर,
कि प्रतीक्षा करता है
स्कूल बस की धूल की,
अब घर आता है और
बैठा लेता है मार पालथी,
दो चोटी गुथी लड़की को
गोद में,
डालता है पानी कुछ यूँ सिर पर,
कि धार पड़ती है चोटियों के
बीचों बीच माँग पर,
चहक जाती हैं नन्हीं हथेलियाँ
छोटी-छोटी पलकों को बंद कर
और पसर जाती है चहकती
मासूम हँसी की आवाज़।
तैयार है सलोनी अब भोजन के बाद
सीने पर सिर टिका
खेल कर सो जाने को
खत्म हो गयी ये कविता!
जहाँ स्नेह और समानता मिलती है
पिता से, भाई से या पति से,
स्त्रियों की कविता छोटे-छोटे
चित्रों पर ही संतुष्टि पा कर निपट जाती हैं।
यही शब्द।

