तुम्हारे बच्चे तुम्हारे नहीं हैं…

हम हर साल 21 मार्च को विश्व कविता दिवस मनाते हैं। यह सुनकर जरा अजीब लगता है और सहज सवाल उठता है कि क्‍या कविता के लिए भी कोई एक दिन का उत्‍सव मनाया जाना चाहिए? असल में, यूनेस्को (संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक संगठन) ने तय किया है कि ” काव्यात्मक अभिव्यक्ति के माध्यम से भाषाई विविधता का समर्थन करने और लुप्तप्राय भाषाओं को सुनने के अवसर बढ़ाने के उद्देश्य से” कविता दिवस बनाया जाना चाहिए। जाहिर है, इस दिन को मनाने का उद्देश्य दुनिया भर में कविता के पढ़ने, लिखने, छपने और शिक्षण को बढ़ावा देना है। यह “राष्ट्रीय, क्षेत्रीय और अंतर्राष्ट्रीय कविता आंदोलनों को नई पहचान और प्रोत्साहन देना” की पहल है। इस दिन को हम अपनी पसंदीदा कविता साझा कर यादगार बनाना चाहते हैं। इस क्रम में पढ़िए हमारे स्‍तंभकार चैतन्‍य नागर की पसंद की कविता :

संसार के हर कोन में ख्‍यात, श्रेष्ठ चिंतक, महाकवि खलील जिब्रान दार्शनिक और चित्रकार भी थे। अपने विचारों के कारण उन्हें तत्‍कालीन पादरियों और अधिकारी वर्ग की नाराजगी झेलनी पडी। उन्‍हें जाति से बहिष्कृत करके देश निकाला तक दे दिया गया था। खलील जिब्रान ने जीवन संघर्ष में स्वयं को साहित्य और चित्रकला में इस तरह झोंक दिया कि वे साहित्य और चित्रकला का पर्याय बन गए। 1923 में प्रकाशित पुस्तक ‘द प्रोफेट’ के लिए सबसे ज्‍यादा मशहूर हुए खलील जिब्रान को लोकप्रियता के कारण शेक्सपियर और लाओ त्सू के बाद विश्व इतिहास में तीसरा सबसे ज्‍यादा बिकने वाला कवि माना जाता है।

बच्‍चे

तुम्हारे बच्चे
तुम्हारे नहीं हैं।

वे तो जीवन की अपनी ही बेकरारी के
बेटे और बेटियाँ हैं।

वे तुम्हारे माध्य्म से आते हैं पर तुमसे नहीं ,
हालांकि वे तुम्हारे पास हैं
फिर भी तुम्हारे नहीं।

तुम उन्हें अपना प्रेम दे सकते हो
पर अपने विचार नहीं
क्योंकि उनके पास खुद अपने विचार हैं।

तुम अपने घर में
उनकी देह को आश्रय दे सकते हो
परन्तु उनकी आत्मा को नहीं ,
क्योंकि उनकी आत्माएं
आगत कल के घरों में रहती हैं ,
जहां तुम नहीं पहुंच सकते ,
अपने सपनों में भी नहीं।

तुम उनकी तरह होने की कोशिश कर सकते हो
पर उन्हें अपनी तरह बनाने की
इच्छा मत करना।

क्योंकि ज़िंदगी न तो पीछे जाती है
और न विगत के साथ ही ठहरती है।

तुम वह धनुष हो
जिससे तुम्हारे बच्चे
सनसनाते तीरों की तरह आगे छूटते हैं।

धनुर्धर लक्ष्य साधता है
अनंंत के रास्ते पर ,
और अपनी शक्ति से झुकाता है तुम्हें
ताकि उसके तीर दूर तक जाएँ गति के साथ।

मुड़ने दो धनुर्धर के हाथों
खुशी के लिए;
क्योंकि उड़ते हुए तीर से
वह जितना प्रेम करता है
उतना ही प्रेम
वह एक स्थिर धनुष से भी करता है।

अनुवाद: मणि मोहन

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