
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
हर इक उम्मीद को लाज़िम है इक जरख़ेज़ मायूसी
उजाला रात में होता है जुगनू में नहीं होता।
इश्तियारों के ज़रिये बहुत साधारण सी बात को फ़िक्र की ज़मीन पर उतारने में माहिर शाइर शाहिद ज़की का यह शेर सुलझाने का सलीका उलझाकर बताता है। सोचने और सोचकर समझने की ताईद करता यह शेर बार-बार पढ़े जाने के लिए मजबूर भी करता है। लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो यह शेर नाउम्मीदी में उम्मीद जगाने की बात करते हुए कहता है कि हर आशा निराशा में ही मौजूद होती है। उसे पहचानने की ज़रूरत है। हर उम्मीद के पीछे एक गहन और उपजाऊ मायूसी का होना ज़रूरी है। जब रात घनी होती है तो यह अहसास हो पाता है कि उजाला क्या है। रात न हो तो जुगनू का भी महत्व नहीं रह पाता है।
इस शेर को यहीं तक महदूद भी नहीं किया जा सकता। इस शेर को चिंतन के धरातल पर समझा जाए तो इसके बड़े आकर्षक अर्थ खुलते हैं। शाइर कहता है कि जीवन में संघर्ष और निराशा ही सफलता और आशा को जन्म देते हैं। जब तक आप गहरे अंधकार से नहीं गुज़रते, तब तक आपको उम्मीद के उजालों का सही अंदाज़ा नहीं होता। रोशनी की राह पर चलने से पहले अंधेरों के अवरोधों को पार करना होता है। शाइर ने शेर को लफ़्ज़ों के उलटफेर से बड़ा बना दिया है। यहां मायूसी उपजाऊ है। सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि मायूसी में संभावनाएं कहां से आ सकती है? शाइर कहना चाहता है कि संभावना हर उस जगह मौजूद होती है, जहां उसके होने की उम्मीद नहीं की जाती है। मायूसी में उपजाऊपन होना ही रात के भीतर मौजूद रोशनी का होना है।
यह शेर रिफ्लेक्ट करता शेर भी है। अमूमन होता यही है कि अपनी ख़ूबसूरती, अपनी ख़ूबी ख़ुद को नहीं पता चलती है लेकिन जब किसी मुख़ातिब के मुंह से सुना जाता है तो उसका अहसास होता है। यह रिफ्लेक्शन ही रात नहीं समझ पाती है। उसे अपने अंधकार पर क्षोभ होता है। वह ख़ुद को उजाले के साथ सम्बद्ध नहीं कर पाती है। वह समझती है कि उसके घने अंधकार से बेहतर एक जुगनू है जो इतनी तीरगी में भी चमक रहा है। हक़ीक़त में जुगनू में मौजूद रोशनी रात से ही आती है। जुगनू दिन की रोशनी में अगर चमके तो उसका जुगनू होना कोई मतलब नहीं रखता। ठीक उसी तरह आशाओं में किसी अच्छाई को तलाश लेना कोई महत्व नहीं रखता, लेकिन निराशा के भीतर एक छोटी सी आशा की किरण भी उस जुगनू की भांति होती है जो सदैव चमकती रहती है। यहां मायूसी को जरख़ेज़ बताकर शाइर ने निराशावादियों को अपने ही भीतर मौजूद आशा को पहचानने की सलाह दी है।
इस शेर को एक अलग ज़ाविये से महसूस किया जाए तो यह शेर यह भी कहता नज़र आ रहा है कि जो बेहतर है उसे अपनी कमतरी के भीतर भी किसी अच्छाई को ढूंढने की कोशिश करना चाहिए। जो बुरा है उसे अपने अंदर की बुराई के बीच भी किसी भलाई को पहचानने की कोशिश करना चाहिए। जो ख़राब है उसे अपनी ख़ामियों के भीतर भी किसी ख़ूबी को ढूंढना चाहिए। शेर कहता है कि कोई बेहतर है इसका मतलब यह नहीं की वह सिर्फ़ बेहतर ही है। उसमें भी कुछ कमी तो मौजूद रहती ही है। जब इंसान अपनी बेहतरी को सब कुछ मान ले और अपनी कमियों को नज़र अंदाज़ कर दे तो वह मुकम्मल नहीं हो पाता है। कोशिश यह होनी चाहिए कि जो कुछ बेहतर है, उसे एक तरफ़ रखकर जो कुछ बेहतर नहीं है उसे उपजाऊ बनाकर रखा जाए। ऐसा करने से वहां से भी कुछ बेहतरी सामने आ सकती है।
कामयाबी मिलने पर उस पहलू को नज़र अंदाज़ न किया जाए। जहां कामयाबी है उसे नाकामियों वाले हिस्से को अपनी सोच के ज़रिए उपजाऊ बनाकर रखना पड़ता है। तभी वह नाकामी कभी कामयाबी में तब्दील हो पाती है। जो कामयाबी ऊपर नज़र आती है वह मुश्किल दौर में बौनी साबित होती है और एक पल के लिए महसूस होता है कि ज़िंदगी रात के घने अंधकार की तरह हो चुकी है। ऐसे में अगर नाकामियों के बीच मौजूद कामयाबी को अपनी सोच और चिंतन का खाद-पानी देकर उपजाऊ बनाए रखा जाए तो उस काले दौर में वह एक नाकामयाबी भी किसी जुगनू की तरह चमक कर कामयाबी का एहसास करवाएगी।
किसी रात का जुगनू में तब्दील हो जाना ही रात की कामयाबी है।
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