
- चैतन्य नागर
स्वतंत्र पत्रकार
प्रसिद्ध इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा राहुल गांधी और कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व के बारे में काफी आलोचनात्मक रहे हैं। वे राहुल गांधी को एक भले और शालीन व्यक्ति के रूप में देखते हैं, लेकिन एक राजनेता और प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में वह उनकी कड़ी आलोचना करते हैं। वरिष्ठ पत्रकार करण थापर को हाल ही में दी गई एक भेंटवार्ता में गुहा ने राहुल गाँधी के बारे में अपने कांग्रेस विरोधी विचार फिर से व्यक्त किये।
गुहा मानते हैं कि राहुल गांधी पांचवीं पीढ़ी के परिवारवादी वंशज हैं। उनका तर्क है कि एक लोकतांत्रिक और युवा भारत में वंशवादी राजनीति अस्वीकार्य होनी चाहिए। वह पहले भी कहते आये हैं कि गांधी परिवार को कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व से पीछे हटना चाहिए ताकि नए, सक्षम और जमीनी नेताओं को आगे आने का मौका मिल सके। गुहा का मानना है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मुकाबले राहुल गांधी में प्रशासनिक अनुभव और राजनीतिक अनुशासन का भारी अभाव है। उनके अनुसार, नरेंद्र मोदी एक जमीनी स्तर से उठकर आए ‘सेल्फ-मेड’ नेता हैं, जबकि राहुल गांधी के पास ऐसा कोई ठोस अनुभव नहीं है।
रामचंद्र गुहा अक्सर कांग्रेस को एक राजनीतिक दल न मानकर एक ‘फैमिली फर्म’ की संज्ञा देते रहे हैं। उनके अनुसार, राहुल गांधी का राजनीतिक कद और शक्ति उनकी अपनी मेहनत से ज्यादा उनकी पारिवारिक विरासत पर निर्भर करती है। राजनीतिक और नेतृत्व संबंधी आलोचनाओं के बावजूद, गुहा ने कई मौकों पर यह स्पष्ट किया है कि उनकी कोई व्यक्तिगत दुश्मनी या दुर्भावना नहीं है। वे राहुल गांधी को एक ‘सभ्य, सुसंस्कृत और अच्छे दिल वाले इंसान’ के रूप में देखते हैं।
रामचंद्र गुहा ने इसे पहले भी कई बार राहुल गांधी को अपनी छवि सुधारने और कांग्रेस को मजबूत करने के लिए व्यावहारिक सलाह दी है। उदाहरण के लिए, जब 2024 के लोकसभा चुनावों में कांग्रेस को 99 सीटें मिलीं, तो गुहा ने सुझाव दिया था कि राहुल गांधी को स्वयं उत्तर प्रदेश की रायबरेली से सांसद बने रहना चाहिए और अपनी बहन प्रियंका गांधी को वायनाड से चुनाव नहीं लड़ना चाहिए था। उनके अनुसार, दोनों भाई-बहनों का एक साथ सुरक्षित सीटों से चुनाव लड़ना जनता के बीच ‘परिवारवाद’ की पुरानी धारणा को और मजबूत करता है।
अमेरिका के 44 वें राष्ट्रपति बराक ओबामा ने राहुल गांधी के बारे में लिखा है कि उनमें में एक “अनगढ़पन और घबराहट है, मानों वह ऐसे छात्र हों जिसने अपना पाठ पूरा कर लिया हो और शिक्षक को प्रभावित करने की चेष्टा में हो, लेकिन विषय में पारंगत होने के लिए जज़्बे और प्रतिभा दोनों की ही उसमें कमी हो।”
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति की पुस्तक ‘अ प्रॉमिस्ड लैण्ड’ में यह लिखा है। आम कांग्रेसी राहुल की इस परिभाषा और ओबामा के वक्तव्य से बौखलाया हुआ था हालांकि पार्टी ने औपचारिक तौर पर इस पर चुप्पी साध रखी। ओबामा ने अपनी किताब में सिर्फ राहुल गांधी के बारे में ही नहीं लिखा। डॉ मनमोहन सिंह के बारे में भी अपनी बात कही। उनका कहना है कि डॉ सिंह एक भावशून्य ईमानदारी वाले व्यक्ति हैं।
कांग्रेस पर ओबामा के बयानों का कोई ख़ास असर नहीं पड़ा। कांग्रेसी संस्क्रृति में हमेशा से गहरी आत्ममुग्धता रही है। गांधी परिवार को कांग्रेसी पूरी तरह से दोषमुक्त और निर्विवाद रूप से पवित्र मानते हैं, उसके आभामंडल से खुद को मुक्त करने की न ही उनमे न कोई इच्छा है, न ही हिम्मत। दो बार राष्ट्रपति रहे ओबामा ने अपने गहरे अवलोकन की क्षमता को दर्शाया है। यह एक बहुत ही लोकप्रिय और विश्व के सबसे बड़े नेताओं में से शुमार किये जाने वाले, नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित एक सुलझे हुए नेता का बयान था जो अपने व्यक्तित्व, संजीदगी और अपने देश की जनता के साथ अच्छे संबंधों के कारण न सिर्फ अपने देश में बल्कि पूरी दुनिया में विख्यात रहे हैं। ओबामा सस्ती लोकप्रियता और नाटकीय तौर तरीकों से कोसों दूर रहने वाले नेता रहे हैं।
2014 चुनावों के बाद आत्मनिरीक्षण शब्द भारतीय राजनीति में बड़ा प्रचलित हुआ। यह शब्द हर पराजय के बाद हारे हुए दल में अचानक बड़ा लोकप्रिय हो जाता है। 2014, 2019 और फिर 2024 में पराजित योद्धा, चाहे वो वामपंथी हों, या मध्यममार्गी, सभी तथाकथित आत्मनिरीक्षण के अभ्यास में लग गये थे। राजनीतिक आत्मनिरीक्षण का वास्तविक अर्थ है है चुनाव परिणाम, विपक्षियों और निंदकों के विचारों के आईने में खुद अपनी मौजूदा स्थितियों को गौर से निहारना। आईना दिखाता है कि आप वास्तव में कैसे हैं। यदि आप आईने से झूठ बोलने की अपेक्षा करें, तो यह तो भयंकर बेईमानी होगी। आत्मनिरीक्षण में एक निर्ममता और निर्लिप्तता होनी चाहिए, एक कठोर और स्पष्ट दृष्टि। खुद को जस का तस देखने का साहस होना चाहिए। ओबामा और अब गुहा के बयान को क्या कांग्रेस कभी भी ईमानदारी से समझने की कोशिश कर सकती है, क्योंकि इसमे बहुत कुछ ऐसा है जिसकी ईमानदार समझ पार्टी में किसी तरह जान फूंक सकती है।
दोनों के बयानों को एक दर्पण की तरह से देखा जाना चाहिए। राहुल राजनीति में अभी भी एक छात्र के समान ही हैं। अभी वे पारंगत नहीं हुए हैं। गौरतलब है कि जो छात्र अपने टीचर्स को प्रभावित करने की कोशिश करते हैं वे या तो अपने सबक को ठीक से नहीं समझ पाते या फिर उनमें आत्मविश्वास की कमी होती है। उनमें एक तरह की नर्वसनेस या घबराहट देखी जाती है, असुरक्षा का भाव होता है कि यदि टीचर प्रभावित नहीं हुआ तो उसे फेल कर देगा। जिस छात्र को अपनी पढ़ाई और समझ पर पूरा भरोसा होता है, उसमे ऐसी प्रवित्ति नहीं देखी जाती। सवाल उठता है कि राहुल किस सबक को लेकर घबराए हुए हैं। क्या उनकी राजनीति की समझ अभी भी परिपक्व नहीं हुई? उनके टीचर कौन हैं? सोनिया गांधी, या पार्टी के वरिष्ठ सदस्य जो कभी उनके खिलाफ खड़े हो सकते हैं, या सत्तासीन दल और खास तौर पर उसके प्रधानमंत्री? क्या राहुल मोदी की उपस्थिति से नर्वस हैं क्योंकि अभी भी भारतीय राजनीति से उनके पांव उखड़ते दिखाई नहीं देते। न सिर्फ राहुल जैसे युवा और कम अनुभवी नेताओं को बल्कि मंझे हुए बुजुर्ग सियासतबाजों को भी मोदी में एक अविजेय नेता दिखाई दे रहा है। यह स्थिति लंबे समय से बनी हुई है और विपक्ष धीरे-धीरे पर लगातार मुरझाता जा रहा है। यह भी सच है कि पार्टी का एक बड़ा हिस्सा राहुल के अलावा किसी को अपना नेता मान ही नहीं सकता। किसी और के नेता बन जाने की स्थिति के वास्तविक दुःख से पार्टी अभी तक अपरिचित है। एक अकुशल, अपरिपक्व और अनिच्छुक नेता के कारण होने वाला दुःख जाना-समझा हुआ है। जब परिचित और अपरिचित दुखों के बीच चुनाव का प्रश्न हो तो फिर व्यक्ति हो या संगठन, परिचित दुःख को ही पसंद किया जाता है।
कांग्रेस सचाई से मुंह चुराने की कला में पारंगत है और फिर भी इस मुग़ालते में है कि वह आत्मनिरीक्षण में लगी हुई है। देखा जाए तो रामचंद्र गुहा ने कांग्रेस को आत्मनिरीक्षण की ही सलाह दी है पर कांग्रेस के लिए आत्मनिरीक्षण सिर्फ एक शब्द रहा है। कांग्रेस को 2014 के लोकसभा चुनावों में भी जो पछाड़ मिली थी, उसके विश्लेषण का जिम्मा उसने सौंपा था अपने वरिष्ठ, वफादार नेता एके एंटनी को। कांग्रेस को वफादारी शब्द पर गहरा विचार करना चाहिए। वफादारी किसके प्रति? नेहरू-गांधी कुनबे के प्रति या देश और इसकी जनता के प्रति? बदलती सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्थितियों के प्रति? कांग्रेस को अपना निरीक्षण इसी शब्द के निहितार्थों को समझने के साथ शुरू करना चाहिए क्योंकि वफादारी की इसकी परिवार-केन्द्रित परिभाषा एक पत्थर की तरह रही है जिसके नीचे जो कांग्रेसी जितना अधिक दबा रहे, उसे उतना ही वफादार माना जाता है। कांग्रेस को यह भूलना नहीं चाहिए कि राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी पराजय का शतक पूरा करने से बस थोड़ी ही दूर है। कांग्रेस नेहरू-इंदिरा-राहुल-सोनिया-प्रियंका का जाप करने वालों की पार्टी बनी रह गयी है। इसमें नेतृत्व की क्षमता किसी में पनपी ही नहीं। जिस तरह भाजपा ने पार्टी से जरासत्ता ख़त्म की ठीक उसी तरह कांग्रेस को अपनी पार्टी की बासी, व्यक्तिवादी, नेहरू-गांधी-परिवारवादी परंपरा को त्यागना होगा। युवा पर अपरिपक्व एवं अकुशल नेतृत्व से खुद को मुक्त करके ही कांग्रेस को शायद अपना राजनीतिक भविष्य साफ़-साफ़ दिखाई देगा।
“यू टू ब्रूटस” का क्या अर्थ है?
लैटिन वाक्यांश “Et tu, Brutus?” का अंग्रेजी अनुवाद “You too, Brutus?” होता है। ये जूलियस सीज़र के अंतिम शब्द थे जब अन्य रोमन नेताओं ने उन्हें चाकू मारकर घायल कर दिया था। यह प्रसिद्ध पंक्ति विलियम शेक्सपियर के मशहूर नाटक “जूलियस सीज़र” (Julius Caesar) में दर्ज होने के बाद सबसे ज्यादा लोकप्रिय हुई। नाटक में, जब सीज़र देखता है कि उस पर हमला करने वालों में ब्रूटस भी शामिल है, तो उसके मुंह से आश्चर्य में यह शब्द निकलते हैं।

