पुस्तक चर्चा

- पंकज शुक्ला
समीक्षक
बोलते रहना क्यूँकि तुम्हारी बातों से
लफ़्ज़ों का ये बहता दरिया अच्छा लगता है…
कुछ आवाजें ऐसी ही होती है, जिनके बारे में हमेशा दिल यही दुआ करता है कि लफ़्ज़ों का ये दरिया बहता रहे, हम इन आवाज़ों के जादू में खोए बस, इन्हें सुनते रहें। ये आवाजें कौन सी हैं? कुछ आवाज़ों का चेहरा उनकी गायकी से बनता है, कुछ की संवाद अदायगी हमें उनकी आवाज़ चिन्हने का गुण दे देती है। ये आवाजें हमारे जीवन में सूरज, चांद, आग, हवा, पानी, धरती की तरह घुलीमिली होती हैं। इन आवाज़ों को सुन कर हमारी सुबह उजली होती है, दिन खुशगवार, शाम सुहानी और रात्रि शुभ होती है। इन आवाज़ों से ही तो जाना जाता है कि देश-दुनिया में क्या घटित हो रहा है। यही हमारे जीवन में मिठास घोलती हैं, हमारे दु:ख में संवेदना का हाथ बढ़ाती हैं। हमें आदत है, एक खास अंदाज में कुछ वाक्य सुनने की, गर आवाज़ बदल जाए तो इन वाक्यों की रूह खो जाती है। जैसे, अब आप देवकीनंदन पांडे से समाचार सुनिए या अमीन सायानी का बहनों-भाईयों का संबोधन या महाभारत में हरीश भिमानी का कहना… मैं समय हूं।
निदा फाजली साहब ने लिखा था-
मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन,
आवाज़ों के बाज़ारों में ख़ामोशी पहचाने कौन?
मगर यहां तो आवाज़ों की भीड़ में भी कुछ खास आवाज़ों को पहचाने की बात है। आवाज़ों के जुगनू-दि वॉइस मास्टर्स ऑफ इंडिया ऐसी ही एक कोशिश है। हमारी चिर-परिचित आवाज़ों को और करीब से जानने का, उनके जीवन, उनके संघर्ष, उनकी सफलताओं को महसूस करने का। यह पुस्तक पन्नों पर लिखी गई गाथाएं नहीं हैं बल्कि उन रोशन किरदारों से रूबरू होने का दस्तावेज़ है जिन्होंने केवल अपनी आवाज़ से हमारी दुनिया में रंग भरे हैं। यह उन कलाकारों का सफरनामा है जिनकी आवाज़ सुनते ही जेहन में एक पूरा दौर ज़िंदा हो जाता है। ‘आवाज़ों के जुगनू’- यानी समाचार वाचक, प्रस्तोता, कमेंटेटर, वॉयस-ओवर आर्टिस्ट, डबिंग कलाकार, आरजे (रेडियो जॉकी) और पॉडकास्टर।
इन्दिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केन्द्र ने किताब आवाज़ों के जुगनू को प्रकाशित किया है और अवधारणा व साक्षात्कार का कार्य डॉ. शेफाली चतुर्वेदी ने किया है। इसका लेखन कार्य व स्वरूप शेफाली पांडेय तथा प्रबल पोद्दार ने किया है। शोध व संयोजन डॉ. आशीष कौल व चित्रा चतुर्वेदी का है। देवकीनंदन पांडे, सुरजीत सेन, अमीन सायानी, तबस्सुम, हर्षा भोगले, शम्मी नारंग, हरीश भिमानी, कुलविंदर सिंह, सोनिया नायर, रिनी खन्ना, नरेंद्र जोशी, रघुवीर यादव से लेकर सायमा, ऋचा निगम, सोनम कौशल सहित 31 शख्सियतों के जीवन और अनुभवों को शामिल किया गया है।
इस किताब के स्वरूप पर चर्चा करते हुए इसकी संयोजक डॉ. शेफाली चतुर्वेदी लिखती हैं कि पिछले करीब 22 साल से मैं आवाज़ों की इस दुनिया को ऑडियो और रेडियो इंडस्ट्री का भाग बनकर हर पल जी रही हूँ। एक तरह से, ये किताब आप तक दो तरह के लोगों से मुलाकात का ज़रिया है- एक जिनका सिर्फ नाम, जिक्र और कहीं आवाज़ तो कभी चेहरा आपने सुना या देखा और दूसरे, वो जो बीते तीन-चार दशक से लगातार सुनाई दे रहे हैं या फिर जुड़ते गए हैं। ये सिर्फ इन लोगों और आवाज़ों की यात्रा न होकर उस काल और परिस्थिति की यात्रा भी है, जिनमें ये आवाजें बुलंद होने की यात्रा कर रही थीं।
ये किताब उन आवाज़ों के दस्तावेज़ीकरण की कोशिश है, जिनमें से कुछ के चेहरे भले ही इस दुनिया में नहीं हैं, पर आवाज़े जिंदा हैं और हमारे बाद भी रहेंगी। इस किताब के ज़रिए पाठक ज़्यादातर उन लोगों की जीवन यात्राओं और मील के पत्थरों को समझेंगे, जिन्होंने पहली बार आवाज़ की दुनिया में वो स्थान हासिल किया, जो अपनी तरह का पहला था। फिर चाहे वो जाने-माने पहले रेडियो न्यूज रीडर रहे हों, मेट्रो की आवाज़, मोबाइल कंपनियों की आवाज़, टीवी इंटरव्यू कार्यक्रम की आवाज़ हो या फिर फोन पर स्वास्थ्य सेवा की आवाज़ हो या फिर एफएम इंडस्ट्री या लोकप्रिय कार्यक्रम को लोकप्रिय बनाने वाली आवाज़ ही क्यों न हो।
जैसा कि डॉ. शेफाली चतुर्वेदी बताती हैं, यह किताब हमारी जानी-पहचानी आवाज़ों के जीवन के बहुत से जाने-अनजाने पहलुओं से हमारा साक्षात्कार करवाती है। जैसे कि, हर ख्यात आवाज़ ने ऊँचा मकाम पाने के लिए संघर्ष की पथरीली राह पार की है। लगभग हर आवाज़ को आकाशवाणी, युवा वाणी ने मंच दिया। किसी की प्रतिभा एक चौकीदार ने पहचानी तो किसी की राह एक चायवाले की सलाह पर निखर गई। किसी के लिए पिता से मिला प्रशंसा का एक वाक्य आवाज़ की दुनिया में आमाद का जरिया बना गया तो कोई लोकप्रिय आवाज़ों का मुरीद बन कर इस दुनिया में चला आया।

जैसे, हैदराबाद में जन्मे हर्षा भोगले जब कक्षा 12वीं थे, तब इंटर स्कूल डिबेट कॉम्पीटिशन के सिलेक्शन के दौरान हर्षा भोगले के नाम के आगे प्रिंसिपल ने लिखा था “गुड वॉइस”। यही पहला अहसास था, जब हर्षा को खुद का भान हुआ। यह तसल्ली का वक़्त था। ख़्वाब देखे जा सकते थे और इसी “गुड वॉइस” के बूते पर उन्होंने ऑल इंडिया रेडियो में जाना शुरू किया।
रेडियो से ही अपनी आवाज़ का सफर शुरू करने वाले श्रीगंगानगर में जन्मे कुलविंदन सिंह कंग के लिए कॅरियर की दो राहें खुली थीं। वे आवाज़ की दुनिया का रुख कर सकता था या कॉलेज में इतिहास पढ़ा सकता थे। जब कुछ समझ में नहीं आया तो चाय वाले से पूछ लिया, “भाई जी, मरकाने नौकरी रा कागज है, थे बताओ मैं कठे जाऊँ।” चाय वाले ने भी मारवाड़ी में जवाब दिया, “अठी ना जाओ” यानी कॉलेज ना जाओ, आकाशवाणी जाओ। चाय वाले की सलाह से जिंदगी रोशन होगी या नहीं, यह तो वह नहीं जानता था, लेकिन चाय वाले ने एक ग्राहक पक्का कर लिया था।
प्रख्यात अभिनेता रघुवीर यादव को कौन नहीं जानता है? मध्यप्रदेश के जबलपुर में जन्मे रघुवीर का परिवार मूल रूप से किसानी करता था। खेतों के पास से गुज़रते हुए एक पापड़ बेचने वाला सुरीले अंदाज में पुकार लगाता था, ‘पापड़ लेलो, पापड़’। बालक रघुवीर के दिल में इस पुकार ने गहरी छाप छोड़ी। उस आवाज़ ने इतना प्रभावित किया कि बालक रघुवीर ने खुद भी सुरों की दुनिया में कदम रखने का फैसला कर लिया। फिर पारसी थिएटर के दिनों में, जब वे एक फिल्मी गाना गा रहे थे और सब लोग उनकी तारीफ कर रहे थे, तब एक सिक्योरिटी गार्ड ने उन्हें कहा कि अगर गाने का हुनर है, तो दूसरों की आवाज़ में नहीं, अपनी आवाज़ में गाओ। उसकी इस टिप्पणी ने रघुवीर जी को अपनी आवाज़ को तराशने और उसे अपनाने का फैसला करने के लिए प्रेरित किया। वे नई पीढ़ी को भी वे यही सलाह देते हैं कि किसी की कामयाब आवाज़ की नकल मत करो, अपनी खुद की आवाज़ पहचानो।
दुनिया जिन्हें खुराफाती नितिन के नाम से जानती हैं, जोनाथन नितिन ब्रैडी का जीवन एक फोन कॉल से बदला। एक बार नितिन ने अपनी एक दोस्त को फोन लगाया। फोन दोस्त की मां ने उठाया। मां ने उनकी आवाज़ सुनी और तुरंत कहा कि उनकी आवाज़ इतनी अच्छी है कि उन्हें तो रेडियो में जाना चाहिए। खुराफाती नितिन ने सलाह को बहुत संजीदगी से तो नहीं लिया, मगर बात ने दिल में कहीं घर तो कर लिया था। साल 1999 में उन्हें ऑल इंडिया रेडियो में ऑडिशन की खबर मिली। यहीं से शुरू हुआ खुराफात और आवाज़ का एक अनोखा गठजोड़।

प्रख्यात आरजे सायमा को बचपन में जोर-जोर से अखबार पढ़ना भी खूब भाता था। करीब छठी-सातवीं क्लास में उनके कानों में आकाशवाणी के न्यूज़ ब्रॉडकास्ट की आवाज़ ऐसी गूँजी कि एक दिन खुद रेडियो पर बोलना ‘दिस इज ऑल इंडिया रेडियो एंड न्यूज इज प्रेजेंटेड बाय सायमा रहमान’ सायमा का जुनून बन गया था। इसी बीच घर में कैरेओके सिस्टम आया और एक दिन सायमा ने माइक उठाया और अपनी आवाज़ रिकॉर्ड की। पिताजी ने जब रिकॉर्डिंग सुनी तो बोले कि न्यूज का प्रोग्राम बीच में बंद नहीं करते, पूरा सुनते हैं। हिचकिचाते हुए सायमा ने बताया कि ये न्यूज़ का प्रोग्राम नहीं है, उनकी आवाज़ है। पिताजी एक पल रुके और फिर बोले, ‘नॉट बैड’। तारीफ के मामले में अक्सर कंजूसी करने वाले पिता के मुँह से निकले ये शब्द तारीफ से कम नहीं थे। सायमा के जुनून को नए पंख मिल चुके थे। उन्होंने इसी उत्साह में ऑल इंडिया रेडियो के दफ्तर में फोन लगाया और कहा कि वो रेडियो पर अपनी आवाज़ देना चाहती हैं।
वे आवाजें जो रोज हमारे संग होती हैं, उनके पीछे की यात्रा को जानना बेहद दिलचस्प है। आवाज़ की दुनिया के सितारों के संघर्ष में जीवन का फलसफा दिखाई देता है। उनके अनुभव में भविष्य की योजना के गुर मिलते हैं। गुजरे जमाने की प्रख्यात न्यूज एंकर रिनी खन्ना कहती हैं-
मैं हमेशा कल्पना करती हूँ कि अगर मेरी आवाज़ नहीं होती तो क्या होता?
उनकी इस बात पर ठहर कर बहुत देर तक सोचता रहा कि वाकई में ये आवाजें नहीं होती तो हमारा क्या होता? तब शायद सबकुछ होता, लेकिन हमारी दुनिया में कुछ चमकदार रंग नहीं होते। और अगर यह पुस्तक नहीं होती तो हम इन रंगों की चमक की पृष्ठभूमि जानने से वंचित रह जाते।
किताब अमेजन पर उपलब्ध है।

