
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
पानीदार ज़मीन का आचमन करतीं भींगी शाख़ें
ज़मीं की गोद भरती है तो क़ुदरत भी चहकती है,
नए पत्तों की आहट से भी शाख़ें भीग जाती हैं।
ज़िन्दगी को एक अलग ज़ाविए से देखने और अपने आसपास को ख़ूबसूरती से अशआर में ढालने वाले लोकप्रिय शाइर आलोक श्रीवास्तव का यह शेर भीगे मौसम की नुमाइंदगी करते हुए क़ुदरत के क़रीब ले जाता है। इस शेर का आवरण देखकर जो रह जाता है, वह उससे आगे नहीं बढ़ पाता है मगर जो इस शेर का आचमन करता है वह इसके भीतर ज़िन्दगी के कई मोड़ पाता है। वह इंसानी जद्दोजहद और तमाम मुश्किलों के बीच एक सुकून का अहसास भी पाता है।
शेर के लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो यह शेर शादाब ज़मीं को देखकर क़ुदरत की ख़ुशी को व्यक्त करते हुए प्रकृति के श्रंगार की बात करता है। बहुत सादगी से कहे गए इस शेर में शाइर ने कई राज़ भी खोले हैं। कई आवाज़ों को स्वर भी दिया है। कई ख़ामोशियों को तोड़ा भी है। शाइर ने ज़मीं के शादाब होने को गोद भरने जैसे मुहावरे से ज़ाहिर करते हुए एक नई ज़िन्दगी की तरफ़ इशारा किया है। ‘ज़मीं की गोद भरना’ और ‘क़ुदरत का चहकना’ ये दो इश्तियारे ख़ूबसूरती से इस्तेमाल हुए हैं। एक स्त्री की जब गोद भरती है तो उसके जीवन में बहुत बड़ा परिवर्तन होता है। वह एक स्त्री से मां होने की तरफ़ अग्रसर होती है। ऐसे पलों में उस स्त्री से जुड़ा हुआ हर इंसान, उससे जुड़ा हुआ उसका परिवेश सबके भीतर एक परिवर्तन होने लगता है। रिश्तों के अर्थ बदलने लगते हैं। कई नए रिश्ते जन्म लेने लगते हैं। कितने ही दिलों के जज़्बात उथाले मारने लगते हैं।
शाइर इस मिसरे के ज़रिए एक स्त्री ही नहीं बल्कि समूची स्त्री जाति के उस अहसास को अभिव्यक्त करना चाहता है। एरिक फ्रॉम अपने उपन्यास ‘द आर्ट ऑफ लविंग’ में एक जगह कहते हैं:
जब हम किसी से अपने प्यार का इज़हार करते हैं तो इसका अर्थ यह नहीं होता कि हम केवल उस व्यक्ति से ही प्यार कर रहे होते हैं । ऐसा कहते हुए हम उस व्यक्ति से जुड़ी हर चीज़ से प्यार कर रहे होते हैं। उस व्यक्ति की अच्छाइयों, उसकी बुराइयों, उसकी आशाओं, उसकी निराशाओं सभी को चाहने लगते हैं।
यहां शाइर भी पूरी वसुंधरा को खिलते हुए देखना चाहता है। वह उसे ख़ूबसूरत बनाना चाहता है। क़ुदरत का मुस्कुराना दरअसल हर इंसान का मुस्कुराना है। ज़मीन के सूखने पर जितनी निराशा, जितनी चिंता ज़मीन को होती है, उतनी ही चिंता उस पर रहने वाले हर प्राणी को भी होती है। ज़मीन की गोद भरना एक नई आशा का संचार करता है। यह शाइर का सकारात्मक दृष्टिकोण है कि वह पूरी मनुष्यता को क़ुदरत की तरह मुस्कुराते हुए देखना चाहता है। इस पहले मिसरे में किए गए दावे को शाइर सानी मिसरे में अपनी दलील से साबित भी करता है। वह कहता है कि जब नए पत्तों के आने की आहट होती है तो शाख़ें भीग जाती है। ठीक उसी तरह जिस तरह एक स्त्री के भीतर गर्भ पालने लगता है तो वह खिल उठती है। उसके चेहरे पर एक नई ख़ुशी देखी जाती है। ज़मीन पर बारिश की बूंद गिरने की आहट से शाख़ें मुस्कुराने लगती हैं। उन्हें पता होता है कि अब किसी नए का आगमन होने वाला है। ज़िन्दगी में भी यही होता है। जब कोई ख़ुशी द्वार पर दस्तक देती है तो उसके आने की आहट से इंसान के भीतर उल्लास छा जाता है। उसे क़ुदरत का हर लम्हा प्यारा लगने लगता है। उस वक़्त उसे अपना दुश्मन भी दोस्त लगने लगता है। वह सबसे अपनी दुश्मनी भूल जाता है। वह यह सोचने लगता है कि जिसने जो किया उसे भूल जाएं और जो कुछ ज़िन्दगी में नया आ रहा है, उसका ख़ुशी से स्वागत करें। शाइर यही कहना चाहता है कि जब ज़िन्दगी में ऐसा कुछ नया प्रवेश करता है तो उसके आने भर की आहट से ही ज़िन्दगी दोबाला हो जाती है और अधिक ख़ुशी देने लगती है।
एक अलग आयाम से इस शेर को समझा जाए तो यह एक वैज्ञानिक शेर भी नज़र आता है। इसमें मौसम चक्र की गतिविधियां दिखाई पड़ती हैं। इसमें वनस्पति विज्ञान की बारीकियां महसूस की जा सकती हैं। प्रकृति का हरा-भरा होना, शाख़ों पर पत्तों का आना, ज़मीन का पानीदार होना ये सब मेटाफर प्रकृति के ज़रिए ज़िन्दगी को समझने का पैग़ाम देते हैं। इस शेर को तसव्वुफ़ के ज़ाविए से भी महसूस किया जा सकता है। यहां क़ुदरत रब्बेआलमीन की तरह ज़र्रे-ज़र्रे की ख़ुशी से ख़ुश है। अपने बंदों की ख़ुशी से ईश्वर भी ख़ुश होता है। बंदा कोई ग़लत काम करता है तो ख़ुदा को भी तकलीफ़ होती है। यहां क़ुदरत के रूप में आशिक अपने माशूक से बेहतरी की उम्मीद करता है। ईश्वर चाहता है कि हरेक ज़र्रा अपनी महक से उसे महकाता रहे। वह तभी ख़ुश होगा, जब उसका हर बंदा ख़ुश होगा। जब उसकी दुनिया में कोई नई आमद होगी तो उसे ऐसा महसूस होगा, जैसे उसकी शाख़ पर कोई नया पत्ता खिल रहा है। जैसे उसके बाग़ में कोई नया फूल महक रहा है। जैसे उसके आसमान में कोई नया सूरज उग रहा है। अपने बंदे की ख़ुशी से वह बहुत ख़ुश होगा।
इस लिहाज से यह शेर प्रकृति के ज़रिए परमात्मा तक भी पहुंचता है। इश्तियार के ज़रिए इंसान की रूह तक भी पहुंचता है और इशारों के ज़रिए क़ुदरत के इरादों तक भी पहुंचता है।
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