Kavita Shukla

मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!

मैंने कई तरह की अपनी शारीरिक, मानसिक व बौद्धिक सीमाओं को तोड़ा। तार्किकता को एकतरफ रख मैंने परस्पर विश्वास के सहारे जीवन जीने की कोशिश की।

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ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है

समझ में आ गया साधु और भिखारी में यही अंतर है। वैसे हम दोनों ही बिना टिकट हैं। पर हम से होने वाला व्यवहार एकदम अलग-अलग है।

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मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…

करीब बीस-पच्चीस मिनिट की चढ़ाई के बाद झरने तक पहुंच गए। बेहद रमणीक स्थान है। मैं तो खड़ा देखता ही रह गया। यहां से हटने का मन ही नहीं कर रहा था।

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नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया

आज तय किया है कि घोसलिया से काफी दूरी पर तीसरा बांध देखने जाएंगे जो इसी साल पूरा हुआ है और जिसमें पहली बार पानी भरा है।

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दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना

झाबुआ जिले में जल संरक्षण का काम बड़े स्तर पर काफी समय से चल रहा है। मैं पहले कभी झाबुआ नहीं गया था इसलिए जाने की इच्छा तो है।

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भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…

अब मैं केवल भविष्य की बातें करता हूं। अतीत की नहीं। एक माह में यह बड़ा परिवर्तन आया प्रतीत हो रहा है। महसूस हो रहा है कि मुझमें अब काफी स्पष्टता आती जा रही है।

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जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!

अब मैं केवल भविष्य की बातें करता हूं। अतीत की नहीं। एक माह में यह बड़ा परिवर्तन आया प्रतीत हो रहा है। महसूस हो रहा है कि मुझमें अब काफी स्पष्टता आती जा रही है।

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‘ना’ कहने का साहस: पौराणिक नायिका सुकन्‍या आज की हेति

‘हेति’ महज एक कथा नहीं है। यह पौराणिक कथा के आगे एक विमर्श का आधार खड़ा करती है। कहानी खत्म हो जाती है पर इसके सवालों की गूंज देर तक पाठक के मन-मतिष्‍क में ठहरी रहती है।

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वेट…! सर को आ जाने दीजिए, वहीं बताएंगे ना

इन अनुभवों में नया कुछ भी नहीं है। हम सभी ऐसी बातों के इतने आदी हो चुके हैं कि इन पर ध्यान भी न जाए। क्योंकि ध्यान जाना चाहिए इसलिए ऐसे अनुभवों पर बात होना बहुत जरूरी है।

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मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता

इस जगह आकर जेल जैसा लग रहा है, खुली जेल। याद आया आंदोलनों के दौरान जेल में बिताया गया वक्त। वहां भी ऐसा ही वातावरण और खाना मिलता था। वैसे तीन बार जेल गया हूं।

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