Kavita Shukla

सरल,सहज है अस्तित्व के विज्ञान को समझना

अभी तक विज्ञान फंतासी साहित्य प्रो-एडवेंचर प्रवृत्ति के हुआ करते थे मगर भारतीय परिवेश की सौंधी सुगंध में पगी यह कृति अहिंसा के मौलिक और निरपेक्ष स्वाद की महत्ता को अप्रत्याशित रूप से प्रमाणित कर जाती है।

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अरे बदरा, ये बहक कर जाने का नहीं, झूम कर बरसने का मौसम है

बारिश की बूंदें हों और जीवन का संगीत जम जाएं फिर क्या कहने? इन दिनों बरसोंगे तो कोई शिकायत भी नहीं होगी कि क्यों बरस रहे हो?

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रिश्तों की चाशनी में पगी मावे की जलेबियाँ

बहरहाल, जबलपुर की मावे की जलेबी की बात ही कुछ और है। यह केवल मिठाई नहीं, शहर की पहचान है। जब भी कोई परिचित जबलपुर से लौटता है, मन अनायास पूछ बैठता है, ‘जलेबी तो लाए होंगे?’

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दुनिया के तमाशे में फुर्सत खोजता हूं, आपके पास है क्या?

दिल अक्सर फुर्सत ढूंढ़ता है। किसी ऐसे को खोजता है जो जरा फुर्सत में हो। कोई ऐसा जिसके पास चांद देखने की फुर्सत हो। ऐसा जिसके पास यूं ही बेबात बतियाने का समय हो। जो यूं ही साथ चल पड़े कि फुर्सत में है उस वक्त। मगर फुर्सत है कि हमें मिलती नहीं है।

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मोटरसाइकिल यात्रा जिसके बाद एक डॉक्टर ने बंदूक उठा ली

चे ग्‍वेरा ने भी बाइक यात्रा खत्‍म कर ली थी लेकिन अंदर जो यात्रा शुरू हुई थी वह तो अपने असली पडाव पर पहुंचनी बाकी थी।

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ठाकरे जी और दवे जी के कुनबे का रजनीश

राज्यसभा सीट पर बीजेपी ने तीन का चयन कैसे किया इस पर फिर कभी बात करेंगे। आज मैं यह बता सकता हूँ कि रजनीश अग्रवाल का चयन क्यों उपयुक्त है।

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मैं तिरी खोज में तुझ से भी परे जा निकला…

किसी राह पर चलने से पहले हर राहगीर यह तय करता है कि उसे कहां पहुंचना है। उसकी निगाहों में उसकी मंज़िल होती है। वह हर पड़ाव को तय करने के बाद मंज़िल की ओर देखता है।

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कांग्रेस रामचंद्र गुहा से कहना तो चाहती होगी- यू टू ब्रूटस!

पत्रकार करण थापर को हाल ही में दी गई एक भेंटवार्ता में प्रसिद्ध इतिहासकार और राजनीतिक विश्लेषक रामचंद्र गुहा ने राहुल गाँधी के बारे में अपने कांग्रेस विरोधी विचार फिर से व्यक्त किये।

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बशीर बद्र की यादों के उजाले: प्यार के एहसास को ओढ़ना, सलीके से गुजरना

अल्फ़ाज़ से मोहब्बत सीखाने वाले, एहसासों को शायरी में ढाल देने वाले बशीर बद्र साहब को अलविदा। आपकी शायरी हमेशा हमारे दिलों में जिंदा रहेगी। उनकी शायरी की खासियत को रेखांकित करते एक खास शेर की बात-

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बशीर ब्रद से वह मुलाकात… जब चेहरा किताबी था सामने  

पद्मश्री बशीर बद्र को देखकर इस बात का इत्‍मीनान हुआ कि आज भी हिंदुस्तान में उर्दू की एक अजीम हस्ती मौजूद है। हालांकि मुलाकात एक तरफा ही थी। डॉ. साहब अपनी ही दुनिया में खोए हुए थे। 

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