Kavita Shukla

वेनिस पहुँचा भारत का वो दर्द जो हर उस इंसान का है जो घर से दूर है…

यह मंडप हमें बताता है कि घर कोई स्थायी पता नहीं है। घर वो तड़प है जो पता मिट जाने के बाद भी बची रहती है।

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कविता की क्यारियों के बीच मोहब्बत का दरिया और इंसानियत का जल

कवि की चिंता इस समाज में हो रहे परिवर्तन, आम आदमी के प्रति बढ़ती जा रही उपेक्षा से है। रतन चौहान अपनी कविताओं में कठपुतलियों में बदलते समाज के प्रति चिंतित हैं।

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विहान की ‘खोंगचट’: परस्परता से दमका रंगकर्म का क्षितिज

मणिपुरी भाषा में ‘खोंगचट’ का मतलब होता है ‘यात्रा’ या ‘मोर्चा/रैली’। यह नाटक एक तोते ‘मिजाओ’ की जीवन यात्रा की लोककथा पर बुना गया था। ‘स्वप्नयान’ की यह प्रस्तुति वास्तव में विहान और उसके रंगकर्म की ‘खोंगचट’ है।

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कॉकरोच: अपमान के लिए उपयोग होने वाला शब्द नया राजनीतिक सत्य

कॉकरोच जनता पार्टी के गठन के साथ दिखाई दे रहे आलोड़न से इतना साफ है कि भारत का दमित राजनीतिक सत्य अपने नए ऐतिहासिक रूप को पाने के लिए आकुल-व्याकुल है।

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जो इच्छा से बंधा हुआ नहीं है,वह मुक्त है,जो स्वतंत्र है वही निर्भय है…

जीवन में संतुलन का नाम शून्यता है,संतुलन बिन्दु ही निर्भयता का केन्द्र है,यही निर्भय बनाता है,यहीं ऊर्जा लहर का उच्चतम शिखर है।

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अब तो ले दे के वही शख़्स बचा है मुझमें…

यहां सवाल यह भी कि जिसे दुनियावी इश्क़ ऐसी नौबत तक लाने में नाकाम हो जाए उनका क्या? यहां आ कर यह शेर एक नए ज़ाविए के साथ सामने आता है।

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वो एक दरिया जो रास्ते में ही रह गया है…

इसके भीतर अगर हम जाएं तो एक अर्थ इस शेर से यह भी सामने आता है कि ज़िन्दगी का सफ़र ठीक वैसा ही नहीं है जैसा अमूमन होता है।

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मैंने सीखा, रास्ते चलने के लिए बनाए जाते हैं, इंतजार के लिए नहीं

कट्ठीवाड़ा से तो अब समेटना ही होगा। बहुत भारी मन से यह स्वीकारना होगा, यह एक बड़ी हार है। सम्मान और प्रेम तो यहाँ भी है लेकिन सिर्फ इसके साथ काम कर पाना संभव नहीं है।

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टर्निंग पाइंट आ ही गया, नारे लगे− बाबा, हम तुम्हारे साथ हैं…

मैं अंततः अब जीवन के अपने संभवतः सबसे रचनात्मक काल में प्रवेश कर रहा हूँ। देखते हैं, कितना क्या संभव हो पाता है!

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