Kavita Shukla

सिनेमाई क्रूरता के इस दौर में कला से ही उम्मीद: प्रो. गोहिल

भारतीय सिनेमा की यात्रा पर संवाद का आयोजन हुआ। इस अवसर पर दो सशक्त और समकालीन विषयों पर आधारित फिल्मों ‘प्यास’ और ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ का प्रदर्शन किया गया।

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बिना गोलियों का युद्ध और वैश्विक शांति की तलाश

शांति को केवल युद्ध की अनुपस्थिति के रूप में नहीं देखा जा सकता। आर्थिक स्थिरता, राजनीतिक समावेशन और संस्थागत विश्वसनीयता भी शांति के अनिवार्य तत्व हैं।

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मैं भंवर में तैरने का हौसला रखने लगा…

जीवन हमेशा अपने भीतर के हौसलों और इच्छाशक्ति के बल पर ही जिया जाता है। जो लोग किसी के सहारे जिंदगी गुज़ारते हैं वे कभी अपने पैरों पर खड़े नहीं हो पाते।

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गुरुजी…कोमल गौरैया कुंज में श्‍वान की आक्रामकता

मैं गुरुजी के रचना संसार में खोया था। तभी एक सवाल से मेरी तंद्रा टूटी। उप्‍पल सर ने मुझसे पूछा कि क्‍या आप कभी गुरुजी से मिले हैं?

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शब्दों के ऑर्केस्ट्रा में साइंस एक म्यूजिकल स्ट्रिंग

इस पुस्तक को पढ़कर महसूस होता है कि इंसानी भावनाओं और बातचीत का डायनामिक्स हमारी ज़िंदगी में बहुत कुछ मायने रखता है।

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मां की याद हरी है,पेड़ सूख गया है…

पहली बार जब उसको गले लगाया था तो उसकी और से मुझे उत्‍तर मिला था। लेकिन अब नहीं। पेड़ का शरीर तो खड़ा था लेकिन उसके प्राण निकल गए थे।

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DU में PhD विवाद: क्‍या बोलना भी जुर्म है और पारदर्शिता मांगना गुनाह?

पीएचडी की चयन प्रक्रिया पर सवाल उठे हैं तो उनका उत्‍तर भी आना चाहिए। आखिर, विद्यार्थी अपने शिक्षकों और विश्‍वविद्यालय प्रबंधन से ही उम्‍मीद नहीं करेंगे तो किससे करेंगे? क्‍या प्रवेश के लिए, चयन के लिए, नौकरी पाने के लिए विद्यार्थियों को मोर्चा निकालना होगा, हड़ताल करनी होगी, विधिक प्रक्रिया अपनानी होगी? और यदि वे यही करेंगे तो पढ़ेंगे कब?

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