
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
जहां कुछ नहीं, वहीं मौजूद है सब-कुछ
तमाम दरिया जो एक समुन्दर में गिर रहे हैं तो क्या अजब है,
वो एक दरिया जो रास्ते में ही रह गया है वो शा’इरी है।
दो मिसरों में कमाल करने का हुनर रखने वाले शाइर अहमद सलमान का यह शेर मुताअले और मुशाहिदे का फलसफा जान पड़ता है। बहुत सादगी से कहा गया यह शेर कई अर्थ ध्वनित करता है। लफ़्जी मआनी पर ग़ौर करें तो यहां कहा जा रहा है कि दरिया का समुन्दर में मिलना उतना ख़ास नहीं है जितना दरिया का रास्ते में ठहरना। मगर सिर्फ़ यही इसका अर्थ नहीं है। यह शेर अपने भीतर कई सारे अर्थों को लेकर आगे बढ़ रहा है।शाइर ने बहुत संजीदगी के साथ और गहराई में उतरकर इस शेर को कहा है।
इसके भीतर अगर हम जाएं तो एक अर्थ इस शेर से यह भी सामने आता है कि ज़िन्दगी का सफ़र ठीक वैसा ही नहीं है जैसा अमूमन होता है। जिसे जीवन मिला है उसे मौत आनी है। ज़िन्दगी का यह दरिया मौत के समंदर में एक दिन मिलना ही है। अगर ऐसा होता है तो इसमें नया क्या है? जो पैदा हुआ है, उसे मरना ही है, लेकिन शाइर यहां कह रहा है कि ज़िन्दगी और मौत के बीच जो ठहर गया वही याद रखने लायक होता है। यहां ठहरने से मुराद यह है कि जिसने ज़िन्दगी और मौत के बीच कुछ ऐसा काम किया है कि वह मरने के बाद भी ज़िंदा रहे। अपनी भलाइयों के ज़रिए लोगों के जेहन में ज़िंदा रहे। अपने अच्छे कामों के द्वारा समाज में ज़िंदा रहे। अपने क़िरदार के द्वारा आने वाली नस्लों के बीच ज़िंदा रहे। अगर ज़िन्दगी ऐसी होती है तो वही याद रखने लायक होती है। शाइरी ऐसी ज़िन्दगी को ही सलाम करती है।
एक दूसरे अर्थ में शाइर बनी बनाई लीक से अलग चलने की बात भी कह रहा है । यह प्रकृति का नियम है कि दरिया जब भी आगे बढ़ा है वह समुन्दर में ही जाकर ही मिला है। किसी दरिया ने कभी समुन्दर में मिलने से इनकार नहीं किया। न ही किसी ने दरिया को समुन्दर में जाने से रोका। सदियों से दरिया समुन्दर में मिल रहा है और मिलकर अपनी मिठास को खो रहा है। समुन्दर में मिलने से पहले तक दरिया मीठा होता है और समुन्दर में मिलते ही वह खारा हो जाता है। दरिया अपनी सारी मिठास समुन्दर को सौंपने के बाद भी समुन्दर के खारेपन को दूर नहीं कर पाता है। शाइर कहता है कि अपने आप को ख़त्म कर दरिया की तरह अगर कोई समुन्दर में मिले और मिलने के बाद भी वह उसे अपने जैसा नहीं बना सके, तो इससे बेहतर है कि वह अपनी उस मिठास को किसी ऐसी जगह छोड़ दे , किसी ऐसी जगह बिखरा दे , जिससे वहां की फिज़ा मधुर हो जाए। किसी ज़मीन को शादाब करे। किसी कुनबे को रवानी के गुर सिखाए।
यह सलीका अगर कोई दरिया रखता है तो वह उसके सही अर्थों में होने का सुबूत है। वह अपनी मिठास को छोड़कर जा रहा है। वह अपनी मधुरता से इस धरती को और इस धरती पर रहने वाले प्राणियों को मधुरता का संदेश दे रहा है। शाइर इस मधुरता के पैग़ाम में ही शाइरी की गुंजाइश बता रहा है। शाइर कह रहा है कि समाज में ऐसे किरदारों की तरफ़ शाइरी की नज़र होना चाहिए जिनसे यह समाज रोशन हो रहा है। जो अपनी मौजूदगी से बनी बनाई परंपराओं से अलग हटकर कुछ करने की कोशिश कर रहे हैं। जो अपने स्पर्श से, अपनी सोहबतों से कुछ नया रच रहे हैं। अगर वहां एक शाइर की नज़र जाती है और वहां से निकली शाइरी पूरी दुनिया तक पहुंचती है तो वह दुनिया के लिए एक सबक भी होगी और प्रेरणा भी।
शाइर यहां शाइरी के इत्तेफ़ाक़ से भी एक अलग ज़ाविए से इसे विस्तार दे रहा है। अमूमन जो कुछ भी आज कहा जा रहा है वह उसी का अनुवाद है जो कुछ सदियों या बरसों पहले हमारे असातज़ा कह चुके हैं। हम सिर्फ उन बातों को दोहरा रहे हैं , उसे अपने लफ़्ज़ों में ढाल रहे हैं। शाइर कहता है कि ऐसा करते हुए हम कुछ नया नहीं कर रहे। नया तो वहां होगा जहां हम अपनी शाइरी के सफ़र में कुछ देर रुकें, ठहरे और देखें कि कहीं कुछ ऐसा है जो अब तक कहे गए में भी अनकहा रह गया है। कहीं कुछ ऐसा है जो दिख रहे हैं में भी अभी तक अनदेखा रह गया है। कहीं कुछ ऐसा है जो सुने गए में भी अभी तक अनसुना रह गया है। कहीं कुछ ऐसा है जो चाहे गए में भी अभी तक अनचाहा रह गया है। उसे समझना, उसे पकड़ना, उसे अपनी शाइरी में ढालना और उसे सलीके से पेश करना , यही असलियत में शाइरी का तकाज़ा है। जो ऐसा करता है उसी की बात लोगों के दिलों तक पहुंचती है।
इस शेर को इस तरह भी समझना ज़रूरी है कि हमारे भीतर विचारों का प्रवाह निरंतर चलता रहता है। हमारा दिमाग़ कभी विचारों से खाली नहीं होता। एक विचार जाता है और उसके ठीक बाद दूसरा विचार आ कर या तो पहले विचार को विस्तार देता है या एक नए विषय के साथ मौजूद रहता है। जीवन भर विचारों का यह प्रवाह बना रहता है। यह प्रवाह उसी दरिया की तरह ही होता है जो निरंतर बहता है और बह कर ख़त्म हो जाता है। हमारे भीतर कितने ही विचार, आते हैं और ख़त्म हो जाते हैं लेकिन कुछ विचार ऐसे होते हैं जो हमारे भीतर हर समय मौजूद रहते हैं। वे बार-बार उभर कर आते हैं और हमें कुछ नया करने के लिए प्रेरित करते हैं। ये विचार ही दरअसल हमारे लिए एक ठहरे हुए दरिया की तरह होते हैं जो बार-बार सामने आकर हमारी वैचारिकता को और हमारे जज़्बातों को एक आधार प्रदान करते हैं। जैसा रोमेंटिक पोएट विलियम वर्ड्सवर्थ ने कहा भी है –
“Poetry is the spontaneous overflow of powerful feelings: it takes its origin from emotion recollected in tranquillity.”
यहां शाइर भी उस ठहरे हुए वैचारिक दरिया में एक मानीखेज़ कविता की मौजूदगी की बात करता है।एक अलग ज़ाविए से ग़ौर करें तो यहां शाइरी तसव्वुर और तसव्वुफ़ की राह से गुज़रती भी महसूस होती है। दरिया का राह में रुकना, उसका तालाब होना नहीं है। एक दरिया कभी अपनी रवानी को नहीं छोड़ता। यहां शाइर विस्तार और फैलाव की बात कर रहा है। जिस तरह हम अपनी पाकीज़ा किताबों को पढ़ते हैं। मंत्रों को उच्चारित करते हैं। श्लोक पाठ करते हैं। पूजा-इबादत करते हैं। यह सब कुछ ज़िन्दगी की उस रवानी की तरह है जो सदियों से चला रहा है। अगर हम कुछ ऐसा कर रहे हैं तो इसमें अनोखा कुछ नहीं है। इनके भीतर से गुज़रने पर जो हमारे जेहन में जो कुछ ठहर जाए, वही हमारा हासिल हो। नया तो तब हो तब कि हम किसी पाक़ीज़ा किताब के हर्फ़ों के भीतर जाकर उसे समझने की कोशिश करें। किसी मंत्र के मंतव्य को ख़ुद समझें और उसे औरों को समझाएं। किसी श्लोक के भीतर छुपे हुए सत्य को अपनी ज़िन्दगी में अपनाएं। पूजा को परमार्थ से जोड़ें। किसी इबादत को इंसानियत की शक्ल में महसूस करें। ऐसा करने पर हमारी ज़िन्दगी को सही अर्थ मिल पाएगा। ख़ुदा या भगवान के नाम को सिर्फ़ रटे जाना या उसके नाम पर कुछ भी करते जाना लाज़मी नहीं है।
शाइर कहता है कि ज़माने में भलाइयां बहुत कम हैं, उन्हें फैलाना ही आज की ज़रूरत है। जहां कहीं ऐसी ज़रूरत पूरी होती दिखाई दे रही है, वहीं शाइरी हो रही है। वहीं एक मुकम्मल शे’र हो रहा है। वहीं लफ़्ज़ अपने मआनी पा रहे हैं। वही अशआर दौलतमंद हो रहे हैं। ज़िन्दगी की एक हसीन इबारत को बहुत पाकीज़गी से लिखने की तालीम देता यह शेर यहां आकर एक बड़े अर्थ में तब्दील हो जाता है।
संपर्क: 9827084966

