बुद्ध पूर्णिमा: जड़ें हमेशा आंखों के सामने बनीं रहें

राघवेंद्र तेलंग, सुपरिचित कवि,लेखक,विज्ञानवेत्ता

बुद्ध पूर्णिमा की पूर्व संध्‍या पर मैं आज एक ऐसी चित्रकृति से गुजरा हूं जो रूहानी ख़्यालों और एक अलग किस्म की मदहोशी छा जाने पर साधक की तरंगित भौतिक स्थिति के साथ-साथ उसके अंदर घटती और रूपांतरित करती जाती कीमियागरी का सटीक चित्रण करती है। इस कृति को देखते ही उस कीमिया की गंध मुझ तक भी पहुंचती है और मैं आज की हंसध्वनि का मूल विषय और फिर सुंदर-सा एक शीर्षक भी पा जाता हूं। संलग्न यह चित्र जो आप देख रहे हैं वह देहरादून में निवासरत अंतरराष्ट्रीय ख़्याति की चित्रकार विदुषी अंतरा श्रीवास्तव की तप साधना से बना है और पहली बार यहां हंसध्वनि कॉलम पर शाया हो रहा है। आज हम इस दिव्य चित्र की रसानुभूति और हंसध्वनि के शब्दों की जुगलबंदी के सुरूर में तैरेंगे।

मोहन राकेश लिखित नाटक आषाढ़ का एक दिन के अंतिम दृश्य में वापस लौटा हुआ पात्र कालिदास कहता है कि मल्लिका तुमने सब बदल दिया सब कुछ, सब कुछ! तब प्रत्युत्तर में मल्लिका कहती है मैंने कुछ नहीं बदला, बदलने वाला जो भी है यह समय है, ऐसा ऑब्जर्वर जो किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, इसीलिए वह सबसे बलवान है। यह समय ही है जो नियति के द्वारा तैयार एक से अधिक वास्तविकताओं के उपलब्ध संयोजनों में से एक को ऑब्जर्वर को चुनने के लिए उपलब्ध कराता है बिना उसके जाने। हालांकि चुनाव को डिलेड या कुछ देर के लिए स्थगित, लंबित करने के परिणाम ऑब्जर्वर के लिए लाभदायी और सिस्टम के लिए क्षरण वाले भी साबित होते हैं या इसका उल्टा भी होता है, कभी-कभी सिस्टम के अबूझ डायनामिक्स के होने से। रोजमर्रा के जीवन में डिलेड च्वाइस प्रक्रिया को सब्जी-भाजी के वक्त मोलभाव की क्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। जब आपका तेजी से बदलने वाले सिस्टम (यानी अगले ही पल चीजों के महंगे हो जाने या अनुपलब्ध या शरीर के मृत हो जाने जैसे डर से भयादोहन, ब्लैकमेल करने के मार्केट फोर्सेस के यत्न) से साबका पड़ता है तब आपको इतना मौका ही नहीं दिया जाता कि आप निर्णय को डिलेड करें बल्कि उस समय सिस्टम आपकी उपेक्षा का अभिनय, नाटक कर आपको उस समय सिस्टम द्वारा उपलब्ध कराए गए निर्णय की वरमाला अपने गले में अपने ही द्वारा डलवाने पर मजबूर करता है। ऐसा ऑब्जर्वर इज री-ऑब्जर्वड के होने से होता है। इस नजरिए से देखा जाए तो विंडो शॉपिंग एक खतरनाक खेल है जो आप अपने ही ख़िलाफ खेलते हैं। अपने भीतर के मूल्यवान खालीपन में बाजार की चीजों के विचार भरने की बजाए ऊर्जा देने वाले विचारों का संगीत गुंजाएं,यह नुस्खा आखिरी समय में काम आएगा।

आप अब समझ रहे होंगे कि ऑब्जर्वर की जब अनुपस्थिति थी तब सिस्टम या दृश्य की यात्रा अज्ञात की ओर थी अब ऑब्जर्वर के हो जाने से ऑब्जर्वर के लिए यह वेल इन्फॉर्म्ड यात्रा है। अब आपका ऑब्जर्वर शरीर, मन, आत्मा यानी बॉडी, माइंड, स्पिरिट के संयोजन के साथ चल रहा है, ड्राइव करते हुए। सोचो तो यह साक्षी, ऑब्ज़र्वर कितना अफ्रेश है, हरदम तरोताजा, नहाया हुआ, कोई उम्र नहीं है इसकी, भूतकाल ही नहीं कोई इसका, आपके ही लिए अभी-अभी पैदा किया है इसने आपको।
इस नैसर्गिक जीवन चक्र में सिर्फ इवॉल्यूशन या सतत परिवर्तन ही निश्चित है बाकी सब अनिश्चितता के कारणों से जुड़ी हुई बातें हैं। यहां अनिश्चितता के सिद्धांत से कंट्रोल होने वाली क्रियाओं पर निगरानी के लिए ऑब्जर्वर को पैदा करना पड़ता है। ऑब्जर्वर के अभीष्ट में स्थिरता का कॉन्सेप्ट होता है। इस घूमते चक्र के डायनामिक्स के साथ स्थिर मनोवृत्ति को साधकर ही संतुलन बैठाया जा सकता है।

ओशो ने जिस साक्षी भाव के पैदा करने पर जोर दिया है वह यही सब है। यह ठीक वही बात है कि यह जीवन हमारी जो परीक्षा ले रहा है उसमें विद्यार्थी भी हम हैं और हमारे गुरू-परीक्षक भी हम स्वयं ही हैं। जे.कृष्णमूर्ति का सार रूप में यही आशय है।
जीवन के विविध प्रसंगों और दूसरों के अनुभवों से सीख लेकर ही ऑब्जर्वर यानी साक्षी का जन्म होता है या कहें पीढ़ियों की यात्रा से ही। विचार जब तक स्वतंत्र हैं वे तरंग होकर भी पदार्थ जैसे हैं, बेजान-से। जब तक वे शरीर में उतरते नहीं उनमें प्राण नहीं उतरते। बहुधा ये बिना ऑब्जर्वर के उतरते हैं तब ये माया का पार्ट/भाग/हिस्सा होते हैं और भौतिकता से कनेक्टेड रहते हैं, इन्हें आसुरी शक्तियां नियंत्रित करती हैं, यहां विचार तरंग होकर भी पदार्थ रूप बने रहते हैं। वहीं जब ये विचार ऑब्जर्वर या ड्राइवर के साथ शरीर में इम्प्लांट होते हैं, कॉस्मिक इम्पल्स के जरिए, तब ये उच्चतर बोध की फ्रिक्वेंसी या आवृत्ति के साथ तरंग रूप में ऑपरेट करते हैं।

मनुष्य जीवन में अमूमन तीन पीढ़ियों में आब्जर्वर इज़ऑब्जर्वड की कालावधि होती है। आप पाएंगे जिन परिवारों में आब्जर्वर की पीढ़ीगत उपस्थिति रहती है वे जीवन के प्रति स्थिरता की आशावादी दृष्टि से भरे रहते हैं या कहें वे जीवन अक्ष (एक्सिस) के निकट बने रहते हैं। आज का समय वापस अपनी जड़ों की ओर पीछे मुड़कर देखने का समय है। अब से पहले आधुनिकता के फेर में जड़ों की आवाजें अनसुनी हो गईं थी। ऑब्जर्वर को तने की मान्यता देनी होगी, जो आगे की यात्रा भी संभव बनाए और जड़ों की मजबूती का भी इशारा दे। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का वह सूत्र वाक्य इस बुद्ध पूर्णिमा पर याद करता हूं कि आगे की ओर उठा हुआ कदम आधुनिकता की दिशा का प्रतीक है और ज़मीन पर टिका हुआ कदम परंपरा से पक्के तौर पर जुड़े होने का प्रतीक है। निश्चित ही यह अवलोकन वट-वृक्ष के तने द्वारा ऑब्जर्वर के रूप में किया गया लगता है, जिसकी जड़ें तने की दृष्टि से कभी ओझल नहीं होतीं। हम सबकी भी जड़ें होती हैं और वहीं से हम आए हैं, यह सबके द्वारा सदा से भूल जाने वाला एक वाक्य रहा है, एरियल रूट्स वाले उदाहरणों के होने के बावजूद। शुक्र है, चंद ही सही पर पीपल, बरगद, मौलश्री, गूलर-औदुंबर जैसे एनलाइटन्ड/जागृत पेड़ों ने भारत भूमि पर ऐसी विभूतियों को पैदा किया है जिनकी वजह से जड़ों की बात स्मृति में हमेशा बनी रहती है। इस बुद्ध पूर्णिमा पर हंसध्वनि की कामना है कि जड़ें हमेशा आंखों के सामने बनीं रहें और आंखों के पानी से वे हमेशा स्मृति में सिंचित बनी रहें।

कालिदास से बात शुरू हुई थी जिनका संपूर्ण लेखक निसर्ग के जर्रे-जर्रे से अनुप्राणित है और उनका एक-एक शब्द ऑक्सीजन देता है। मेरा साफ इशारा है कि मल्लिका दरअसल कालिदास रूपी बरगद का एरियल रूट है, जो कि कालिदास की कल्पनाशीलता से कभी भी ओझल नहीं हुई और तभी आखिर में सारी बदलाहटों का श्रेय कालिदास मल्लिका को यह कहकर देते हैं कि मल्लिका तुम्हारी उपस्थिति ने सब बदल दिया सब कुछ। मल्लिका, जो कि रूट कॉज है, का अंत में यह कहना कि बदल देने वाली सब रूट्स/जड़ें वर्तमान की ऑब्जर्वर बनी रहती हैं और उसका कथन ही यह संकेत कर जाता है जब ऑब्जर्वर इज ऑब्जर्व्ड की प्रक्रिया एरियल रूट्स संपन्न करती चली जाती है, तब ऐसे में यह प्रक्रिया कालिदास जैसे अप्रतिम निसर्ग के प्रतिबिंबकार को पोषित-पल्लवित करती है। तो आज का दिन कालिदास के बोध प्राप्त करने की प्रक्रिया के नाम।

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