मनरंग

जहां से शुरु हुआ था संदेशों का सफर, जहां फहराया पहली बार तिरंगा

भोपाल की यह विरासत को सरकार की नजरे इनायत दरकार है, क्योंकि यह शर्म की नहीं, गर्व की विरासत है, क्योंकि सबसे पहले यहीं ब्रिटिश यूनियन जैक को हटा कर तिरंगा फहराया गया था।

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मेरे अहसासों का इकबाल मैदान, जम्हूरियत और शाहीन जिसकी शान

मेरे लिए यह सिर्फ एक मैदान नहीं है। इसी मैदान ने यह अहसास कराया कि कोई सावर्जनिक स्थल सत्ता से सवाल पूछने और सबको इंसाफ मिले, बराबरी का दर्जा मिले, इसकी खोज के मंच भी हो सकते हैं।

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14 मिनट सितार दिल को छलनी करता है और तबला विचारों को बेचैन

इस फिल्‍म को देखते हुए सिर्फ महसूस किया जा सकता है। महसूस किया जा सकता है कि शाब्‍दिक, मानसिक और शारीरिक हिंसा किस तरह हमारे जीवन को प्रभावित कर रही है।

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मां की याद हरी है,पेड़ सूख गया है…

पहली बार जब उसको गले लगाया था तो उसकी और से मुझे उत्‍तर मिला था। लेकिन अब नहीं। पेड़ का शरीर तो खड़ा था लेकिन उसके प्राण निकल गए थे।

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जैसे,पास तो होना चाहता है लेकिन जताना नहीं चाहता

बाघ झाड़ी में छिपा होगा। उसकी आँखें चमक रही होगीं। उसकी गंध इसे भी आई होगी। इसने चाहा भी होगा कि टेडी उस ओर न जाए। लेकिन टेडी तो दौड़ पड़ा होगा! और फिर जो हुआ इसने अपनी आँखों से देखा होगा।

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साइकिल की अपनी एक तहजीब होती है

साइकिल पर चलता इंसान जीवन और अपनी खुद की गति के बीच एक अद्भुत ताल-मेल बैठा लेता है, और उनके बीच के संबंधों का संतुलन शायद ही कभी बिगड़ता होI साइकिल सवार पैदल लोगों की तुलना में तीन या चार गुना ज्यादा तेज चल लेता है।

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हे मेरे मरण, आ और मुझसे बात कर

अहा! उसकी वे स्नेह भरी आँखें! आँखे भर क्यों? चेहरा, देह, देह का रोम-रोम जिस स्नेह से, जिस प्रेम से भरा है। खासकर तब, जब वह अपनी बेटी को गले लगा रहा है! पीछे ही वह दूत प्रतीक्षा में है जिसके साथ उसे उस पार चले जाना है।

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… जैसे किसी को सदियों बाद अपनी प्रेमिका की चिट्ठी मिल गई हो

जब कोई प्रेम कविता लिखी जाती है तो उसमें महुआ का नाम भले न हो लेकिन उसकी गंध ज़रूर होती है। वह हर प्रेम की तह में बैठा होता है, जो सब जानता है लेकिन कहता कुछ नहीं।

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ये माह-ए-रमजान है मेरे बच्‍चे, मैं चाहती हूं कि तुम…

तुम्हारी गलती नहीं है, किसी ने भी तुम्हें ये बताया ही नहीं कि तुम्हारा धर्म क्या है, मानसिक ग़ुलामी से अभी तुम हजारों कोस दूर हो क्यूंकि सत्य हैं कि ईश्वर ने तुम्हें सिर्फ इंसान बनाकर भेजा था…हिंदू या मुसलमान नहीं!

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इश्‍क रूहानी: क्‍यों मैंने ताजमहल नहीं देखा…

मैं अक्‍सर जिद किया करता था, मुझे आगरा जाना है। समझाइश मिलती, छुट्टियों में जाएंगे। कई छुट्टियां आईं और गईं। मैं कई जगह गया। मगर राह में आगरा आया ही नहीं।

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