जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद
पिछला एक हफ्ता भगोरियामय रहा। झाबुआ जिले के अलग-अलग क्षेत्र का भगोरिया देखा और उसमें सांस्कृतिक विविधता देखी।
जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद जारी >
पिछला एक हफ्ता भगोरियामय रहा। झाबुआ जिले के अलग-अलग क्षेत्र का भगोरिया देखा और उसमें सांस्कृतिक विविधता देखी।
जिसे ‘खूनी सोंडवा’ कहते हैं, मुझे वहीं मिला सबसे ज्यादा आनंद जारी >
मुझे उनकी बात कुछ जम नहीं रही है। मैं काफी विचलित हो गया। ऐसा क्यों किया गया है? क्या महेश जी की खुद की यह सोच और निर्णय था या उन पर दबाव डालकर थोपा गया?
मैं विचलित हूं, मुझे बताए बिना महेश जी ने ऐसा क्यों किया? जारी >
हम बस में बैठ गए।अचानक बच्चे हमारे पास सकुचाते हुए आए। जैसे आँसू गिरने को हों। मैंने उसे गले लगा लिया। नहीं बेटे, हम आएंगे, यहीं रहेंगे।
काेई खेत नहीं गया, कोई बाजार, कोई स्कूल, राे कर बोले, बाबा मत जाओ जारी >
इतने कम समय में इतनी बड़ी सफलता! सहसा विश्वास नहीं हो रहा है। मुझे ध्यान नहीं आता कि किसी ने आज तक धर्म का नाम लिए बिना अनजाने व्यक्ति के रूप में जाकर ऐसी सफलता पाई हो।
ऐसा लगा जैसे दुनिया जीत ली, सिर्फ तीन दिन बाद जबर्दस्त मुँह की खाई जारी >
नदी ही वह स्थान है, जहाँ अकेले में हम दोनों विचार-विमर्श कर पाते हैं और अपनी कार्य-योजना तैयार करते हैं। महेश जी बहुत अधिक उद्वेलित और चिंतित हैं।
बाबा, मैं ठीक होना चाहता हूँ… बाबागिरी मेरा पीछा नहीं छोड़ रही जारी >
इतना सुंदर दृश्य है कि तबियत खुश हो गई। बस पानी की सुंदरता है और उसी में पक्षी भी हैं। सूर्योदय हुआ, पानी में से निकलता हुआ सूरज, बस देखते ही बनता है।
बुढ़े ने रहने बुला लिया, हम सामान लिए चले आए, रात में बोला, घर से निकलो जारी >
सामने खेतों में कुछ दूर पर बड़ी भीड़भाड़ दिखी, पाण्डे रोकता रहा वहाँ मत जाओ, गंदा है, जाने लायक नहीं है। महेश जी और मैं उसी तरफ चल दिए।
नाते-रिश्तेदार ‘माता-पूजन’ कर मनाते हैं ईंद, हैं न अनाेखी बात जारी >
अवधेशानंद जी ने धर्म काे सेवा कर्म से जोड़ते हुए यही कहा कि पूजा-अर्चना वास्तव में धर्म नहीं है, वरन् मनुष्य की सेवा ही वास्तविक धर्म है
स्वामी अवधेशानंद बाेले, विभूति जी आप अवश्य आइए, मुझे प्रतीक्षा रहेगी जारी >
बहुत मधुर यात्रा रही मेरी भोपाल की। अपनों को खुशी दे पाने से बड़ी खुशी शायद दूसरी नहीं होती और ऐसा महसूस हुआ इस बार मैं यह कर पाया।
उन जगहों पर लाैटना जहां कभी मन बैरागी बन कर गया था… जारी >
जो मेरी पहचान बन गई थी-जाने-अनजाने, चाहे-अनचाहे यानी वकालत, वह छूट गई। आज ऑफिस में ताला लगकर नाम पट्टिका हट जाएगी वहाँ से।
आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी जारी >