मनरंग

वाह भइया, पुरौनी का तो डाला ही नहीं!

पन्ना से रायपुर जाने को रवाना हुए। सुबह के 11 बज रहे थे और प्राणनाथ का गजर टन्न, टन्न, टन्न बज कर शायद, सुखद सफर का आशीष दे रहा था।

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एक बैरियर बनाओ और आने-जाने वालों से टैक्स वसूलो

पन्ना में, मैं अपनी उम्र के दस बरस तक रहा पर उसकी यादें आज भी अमिट हैं। पन्ना का पन्ना समेटने से पहले उन्हें याद करना लाजमी है।

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हम लखपति होते-होते बाल-बाल बचे…

पन्ना की जो खासियत मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती थी,वो था प्राणनाथ मंदिर का गजर। गजर हर घंटे अपनी टंकार से पन्नावासियों को समय बताता, और हर प्रहर के बदलने की जानकारी भी देता।

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लगता था ड्राइवर से अच्छी जिंदगी किसी की नहीं…

पापा के ऑफिस की जो चीज मुझे सबसे ज्यादा आकर्षित करती वो था हाथ से खींचे जाने वाला पंखा। मेरा दूसरा प्यार था पापा को मिली जीप। मैं हमेशा इस गुंताड़े में रहता कि कैसे इसे चलाएं!

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आखिर मैं साबित कर पाया कि ‘मर्द को दर्द नहीं होता’

सो बचपन में उस वक्‍त तक मैंने अपने दो गुणो और दक्षताओं (skills and competencies) को साबित कर दिया था। वालेंटियर होना और डेयरिंग होना जो एक डेवलपमेंट वर्कर की एसेंशियल क्वालिफिकेशंस है।

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असल गुरु प्रेम है, जो कान उमेठता है, शाबाशी भी देता है

जेन में कहते हैं कि जब विद्यार्थी तैयार होता है, तब गुरु प्रकट हो जाता है; और जब विद्यार्थी पूरी तरह तैयार हो जाता है, तब गुरु गायब हो जाता है।

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पुतरिया के सहारे बचपन की नगरी का फेरा

बचपन के किस्से मासूमियत की नर्म शॉल में लिपट कर सालों-साल कुनकुने बने रहते हैं। ऐसे ही ढेरों किस्से हम सबकी संदूक में अवश्य तह बने रखे होंगे तो इन तहों को खोलकर बिखेर लीजिए अपने होंठों की मुस्कान बनाकर।

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महंगे कलमों के दौर में उसका नेपथ्य में चले जाना…

आज जब दुनिया में लाखों बल्कि करोड़ों रुपये मूल्य के कलम उपलब्ध हैं तब नरकट के कलम की याद वैसी ही है जैसे पीएनजी के दौर में दुनिया की पहली आग की याद या फिर सुपर कारों के इस दौर में दुनिया के पहले पहिए की याद।

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…. गति हो तो छोटी हो जाती हैं दूरियां

हम जिस दौर में बड़े हुए उस दौर में साइकिल स्टेटस सिंबल नहीं बल्कि जरूरत हुआ करती थी। साइकिल उन कुछ चीजों में शामिल है जिन्हें इस दुनिया में हो सके तो न्यूनतम बदलावों के साथ अपने पुराने रूप में बचे रहना चाहिए।

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