चाय को चाय ही रहने दो …

पूजा सिंह, स्‍वतंत्र पत्रकार

सभी फोटो: गिरीश शर्मा

हम जैसे चाय प्रेमियों की जमात की मानें तो दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं: एक वे जो चाय पीते हैं और दूसरे जो चाय नहीं पीते हैं। जो चाय नहीं पीते उनके लिए तो बस दाग़ देहलवी के शेर में मामूली रद्दोबदल की जरूरत होगी:

लुत्फ़ ए मय तुझसे क्या कहूं ज़ाहिद
हाय कम-ब़ख्त तूने पी ही नहीं

करना कुछ नहीं है बस मय की जगह चाय कर देना है और हमारी भावनाएं उन लोगों तक बखूबी पहुंच जाएंगी जो चाय नहीं पीते लेकिन फिर भी जीते हैं।

यूं तो कड़ाके की ठंड हो या जाती हुई गुलाबी ठंड, चाय के मजे कुछ और ही हैं लेकिन ऐसा भी नहीं है कि चाय किसी मौसम की मोहताज हो। वैसे भी प्यार का भी भला कोई मौसम होता है?

ठीक-ठीक कहना मुश्किल है कि यह मेरे जीवन में कब दाखिल हुई। वह एक सच्चे दोस्त की तरह जीवन में आई जिसके बारे में यह कह पाना मुश्किल होता है कि आप उसे कबसे जानते हैं। सुबह की सैर पर, सिर में दर्द होने पर, कॉलेज या ऑफिस की कैंटीन में, थके होने पर, खुश होने पर, खाली होने पर, काम में जूझ रहे होने पर अगर कुछ याद आया तो वह चाय ही तो थी।

कहते हैं हमारे देश में चाय ब्रिटिशर्स लेकर आये। यह अपने आप में कितनी चकित करने वाली बात है कि सुदूर चीन का एक पौधा देखते ही देखते दुनिया का पसंदीदा पेय पदार्थ लगभग पूरी दुनिया पर छा गया। एक समय दुनिया की सबसे बड़ी कंपनियों में शामिल कुख्यात ईस्ट इंडिया कंपनी के कारोबार में भी चाय के व्यापार की जबरदस्त हिस्सेदारी थी। ‘बॉस्टन चाय पार्टी’ का नाम तो आपने सुना ही होगा जो अमेरिका के ब्रिटिशों से आजाद होने की प्रक्रिया में एक अहम पड़ाव बना।

दरअसल, यूरोप में चाय पहुंचाने का श्रेय ब्रिटेन को था और चाय के कारोबार पर ईस्ट इंडिया कंपनी का पूरा नियंत्रण था। ब्रिटेन के सभी उपनिवेशों को जाने वाली चाय पर कर लिया जाता था। बॉस्टन के अमेरिकी क्रांतिकारी चाय पर कर और ईस्ट इंडिया कंपनी के एकाधिकार का विरोध कर रहे थे और उन्होंने बॉस्टन बंदरगाह पर ब्रिटिश जहाजों पर लदी 342 पेटी चाय समुद्र में फेंक दी थी। हमारे देश की राजनीति में चाय ने उस समय धाक जमाई जब ‘चाय पर चर्चा’ जैसे ब्रांडिंग कैंपेन ने देश की राजनीति को ही बदलकर रख दिया।

बहरहाल, हम थोड़ा विषयांतर हो गये। बात चाय की और हमारी चल रही थी तो वापस लौटते हैं। हमने देखा कि राजनीतिक मुहावरों का प्रयोग करें तो कपड़ों से भी अधिक तेजी से दल और विचारधारा बदलने के इस दौर में अगर समाजवाद का कोई सच्चा उदाहरण नजर आता है तो वह चाय ही है। इसने छोटे बड़े का भेद मिटा दिया है और साथ ही मिटा दिया है हीनताबोध।

यह सही है कि दुनिया की दूसरी तमाम चीजों की तरह चाय की भी किस्में हैं और खबरों पर यकीन करें तो दुनिया में सबसे महंगी चाय (चीन की दा होंग पाओ नामक चाय) की पत्ती नौ करोड़ रुपये प्रति किलो के दाम पर बिकती है। फिर भी एक बात जो सबसे अधिक राहत देती है, वह यह है कि आप चाहे अपने सबसे कम हैसियत वाले दोस्त के घर जाएं या सबसे रईस दोस्त के घर-आपको एक चीज की पेशकश यकीनन की जाएगी और वह है चाय।

बचपन में मेरे लिए चाय का एक ही मतलब था- ‘पानी उबालो, अदरक और पत्ती डालो, दूध-चीनी मिलाओ और पी जाओ।’ जैसे-जैसे मैं बड़ी होती गयी मुझे मां के हाथ से बनने वाली इस चाय के अलावा एक और चाय के बारे में पता चला वह थी नींबू की चाय। ये चाय कम पत्ती और ढेर सारी चीनी से बनती थी। मेरा जीवन इन दो चायों के बीच आराम से कट रहा था कि एक दिन अजीब मुश्किल खड़ी हो गयी। दरअसल, अपनी पेशेगत जरूरत के चलते मुझे एक सज्जन से मिलने उनके घर जाना पड़ा। मेजबान खासे कुलीन व्यक्ति थे। उन्होंने मुस्कराते हुए पूछा, ‘आप कौन सी चाय पियेंगी?’ और इसके बाद उन्होंने पांच-सात ऐसे नाम लिए जो मेरे लिए बिल्कुल अजनबी थे। मेरे लिए यह स्थिति और यह प्रश्न दोनों नए थे और मुझे अचकचा देने के लिए काफी थे। मैं दो-तीन तरह की चाय के बारे में जानती थी लेकिन चाय की इतनी किस्में…तौबा तौबा।

पहली बार मेरे सामने एक ऐसा प्रश्न था जो सुनने में बहुत साधारण था लेकिन माहौल की अजनबियत और पूछने वाले की खास किस्म की कुलीनता ने उसका जवाब देना मेरे लिए मुश्किल बना दिया था। मैंने अटकते गले से किसी तरह बस इतना कहा- ‘मैं सिंपल चाय लूंगी सर।’ मेजबान मुस्कराये, मानो मेरी कमअक्ली पर मन ही मन हंसे और बोले, ‘जानती हैं देश की सबसे बड़ी समस्या क्या है? यहां के लोगों को पता ही नहीं है कि उन्हें दरअसल चाहिए क्या?’ मैं थोड़ी और असहज होने के बावजूद बोली, ‘सर मैं दूध-चीनी-अदरक वाली चाय पीना चाहती हूं।’

‘अच्छा वही जो ठेलों पर मिलती है! ऐसा करो आज तुम मेरी वाली चाइनीज चाय पीकर जाओ।’ मुझे समझ नहीं आया कि वह मुझसे पूछ रहे हैं या मुझ पर तंज कर रहे हैं। मैंने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कह दिया कि मैं तो वही चाय पीकर जाऊंगी जिसे वह ठेले वाली कह रहे हैं।

उन्होंने अपनी घरेलू सहायिका को बुलाया और कहा, ‘मेरे लिए एक चायनीज चाय और मैडम के लिए वह चाय ले आओ जो तुम पीती हो।’ सहायिका ने झुंझलाते हुए कहा, ‘मेरी चाय पत्ती खत्म हो गयी है। आपको दो दिन पहले बोला था, मेरी चीजों का आप लोग ध्यान नहीं रखते।’

उसकी बातों का कोई जवाब न देकर वह मुझसे मुखातिब हुए, ‘अब तो आपको चाइनीज चाय ही पीनी पड़ेगी।’

चाय आने तक वह मुझे चाय की तमाम किस्मों के बारे में और उनके फायदों के बारे में बताते रहे। इस बीच उन्होंने दूध-चीनी वाली सामान्य चाय के तमाम अवगुण भी गिना डाले।

उनकी कथित बेहतरीन चायनीज चाय का स्वाद मुझे तो पसंद नहीं आया। साथ में रखी चीजें खाते हुए मैंने किसी तरह वह चाय खत्म की। चाय के वर्ग भेद ने मुझे अंदर तक हिलाकर रख दिया था। घर लौटते हुए मैं सोच रही थी कि जाते ही अपनी पसंद की चाय पिऊंगी।

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