Che Guevara Birthday
- टॉक थ्रू टीम
व्हेयर इज गन?… बंदूक कहां है? यह एक वाक्य है जो क्रांति के नायक चे ग्वेरा का प्रतीक वाक्य है। वह वाक्य जो इस विचार का प्रतीक है कि क्रांति यानी बदलाव तो बंदूक के दम पर ही आ सकता है। चे का कहना था:
क्रांंति कोई ऐसा फल नहीं है जो स्वयं जमीन पर आ गिरता है। इस फल को जमीन पर गिराने के लिए हमें खुद मेहनत करनी पड़ती है। कोई जन्मजात क्रांतिकारी नहीं होता है। संघर्षों में तपकर ही क्रांतिकारी बनता है। वह हालात को बदलने के लिए संघर्ष करता है, सबको जोड़ता है और इस प्रक्रिया में खुद भी बदल जाता है।
अपनी मौत के 59 वर्षों बाद भी चे ग्वेरा दुनिया में हर कहीं दिखाई दे जाते हैं, बदलाव की कामना के साथ। चे ग्वेरा ने कहा था कि आजादी की लड़ाई लोगों की भूख से जन्म लेती है दुनिया में आज भी भूख कायम है बल्कि पहले से ज्यादा। सत्ता की भूख, वर्चस्व की भूख और इस भूख के बरअक्स खाली पेट इंसानों की आजादी की भूख। दुनिया में कहीं भी ‘भूखे पेट’ इंसान जब क्रांति का बिगुल फूंकता है तो उसे चे ग्वेरा का चेहरा याद आता है और शायद यही कारण है कि हर जगह चे ग्वेरा की तस्वीरों वाली टी शर्ट, पोस्टर सहित तमाम सामग्री दिखाई दे जाती है।
एर्नेस्तो ग्वेरा यानी चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1928 को लैटिन अमेरिका में हुआ था। वे मेडिकल स्टूडेंट थे और अंतिम सेमेस्टर के बाद डॉक्टर बनने वाले थे। फिर जैसा होता है, जैसे युवा तय करते हैं, चे ग्वेरा ने अपने एक दोस्त अल्बेर्तो ग्रेनादो के साथ दक्षिण अमेरिका की तफरीह की योजना बनाई। दोनों दोस्त एक बाइक लेकर निकल पड़े दस हजार किलोमीटर की यात्रा पर। वह यात्रा जिसे दक्षिण अमेरिका का सबसे एडवेंचरस जर्नी माना जाता है।
1952 में जब यह यात्रा शुरू हुई तब चे ग्वेरा केवल 23 साल के थे उन्होंने अपनी यात्रा का विवरण ‘मोटरसाइकिल डायरिज’ में लिखा है। यह दुनिया की सबसे चर्चित यात्रा पुस्तकों में से एक है। वास्तव में यह पुस्तक दो यात्राओं का वर्णन करती है। यह हमें दो युवाओं की रोमांचक बाइक राइड के बारे में तो बताती ही है एक और यात्रा से रूबरू करवाती है जो युवा ‘एर्नेस्तो ग्वेरा’ के बदलाव के प्रतीक ‘चे ग्वेरा’ बनने की आंतरिक यात्रा है।

डायरी बताती है कि जब दोनों दोस्त बाइक पर निकले थे तब उनके मन में भी सैर की योजना थी, देश-दुनिया को देखने तथा मौज करने की ख्वाहिश थी। शुरू में हुआ भी यही। मगर ज्यों-ज्यों एक यात्रा खत्म होती गई मतलब दस हजार किलोमीटर का सफर खत्म होता गया और एर्नेस्तो ग्वेरा (चे ग्वेरा) के भीतर एक यात्रा शुरू होती गई। यह यात्रा चे ग्वेरा के जीवन को आमूलचूल बदल गई। इस यात्रा के बाद चे ग्वेरा ने अपने जीवन के असली मकसद को पहचाना कि उसका काम डॉक्टर बनना नहीं है।
जब युवा चे ग्वेरा ने दक्षिण अमेरिका के हालत अपनी आंखों से देखे, जब उसने जाना कि जिंदगी सबके लिए एक जैसी नहीं है, जब उसे पता चला कि दुनिया कुछ पूंजीपतियों के कब्जे में है और बाकी के लिए भूख, गरीबी, शोषण ही सच्चाई है। जैसा कि होता है, दुनिया में परिवर्तन के जितने महानायक हुए हैं सबमें आंतरिक परिवर्तन यात्राओं से आया है। चे ग्वेरा ने भी बाइक यात्रा खत्म कर ली थी लेकिन अंदर जो यात्रा शुरू हुई थी वह तो अपने असली पडाव पर पहुंचनी बाकी थी।
1953 में चे ग्वेरा अपने शहर ब्यूनस लौट आए और अपनी मेडिकल की पढ़ाई पूरी कर डॉक्टर बन गए। लेकिन भीतर जो बेचैनी थी वह उन्हें चैन में रहने कहां दे रही थी? डॉक्टरी छोड़ कर वे बदलाव लाने निकल पड़े। शुरुआत का मौका पड़ोसी देश ग्वाटेमाला में मिला जहां समाजवादी सरकार वहां शासन कर रही थी। राष्ट्रपति जैकब अर्बेंज गुजमान ने जब ग्वाटेमाला में भूमि सुधारों की शुरुआती की तो अमेरिका की यूनाइटेड फ्रूट कंपनी को नुकसान हुआ। पूंजीपतियों का लाभ खतरे में पड़ा तो अमरिकी सरकार और सीआईए ने मिल कर गुजमान सरकार का तख्तापलट करवा दिया। उस वक्त चे ग्वेरा ग्वाटेमाला में ही थे। पकड़े जाने के डर से वे मैक्सिको भाग आए और एक अस्पताल नौकरी करने लगे लेकिन उनका मन शांत नहीं हुआ।
संदर्भ बताते हैं कि मैक्सिको में उनकी मुलाकात क्यूबा से निकाले गए फिदेल कास्रो और उनके भाई राउल कास्रो से हुई। इस मुलाकात ने क्रांति का रास्ता खोल दिया। अमरीका समर्थित सरकार को हटाने के लिए चे ग्वेरा और फिदेल कास्रो मिल गए तथा क्यूबा क्रांति को नेतृत्व दिया। 1959 की शुरुआत में ही क्यूबा में तख्तापलट हो गया। चे ग्वेरा के विचारों से प्रभावित होकर फिदेल कास्रो ने नई सरकार बना कर मार्क्सवादी व्यवस्था लागू को लागू किया था।
चे ग्वेरा को उद्योग मंत्रालय का मंत्री तथा ‘बैंक ऑफ क्यूबा’ का अध्यक्ष बनाया गया। वे करीब चार साल मंत्री रहे लेकिन अनुयायी कहते हैं कि चे ग्वेरा सत्ता के लिए नहीं बने थे। जब ग्वेरा मंत्री थे, उस समय भी उनका परिवार बसों से सफर करता था। चे ग्वेरा खुद हफ्ते में श्रमदान भी करते थे। उनका लक्ष्य लैटिन अमेरिका में सामाजिक क्रांति लाना था। इसीलिए वे क्यूबा छोड़ कर कांगो चले गए। कांगो में वह तख्तापलट करके मार्क्सवादी सरकार की स्थापना करना चाहते थे। लेकिन, ऐसा हो ना सका चे अपने इस लक्ष्य में विफल रहे। फिदेल कास्रो ने उन्हें क्यूबा लौटने का सुझाव दिया लेकिन चे ने इंकार कर दिया। इसके बाद उन्होंने नौ बार बोलविया में तख्तापलट करने कोशिश की लेकिन वे सफल नहीं हुए। इसी दौरान 9 अक्टूबर 1967 को बोलिविया सेना और सीआईए ने उन्हें घेर कर मार दिया।
चे ग्वेरा का खत्म होना उनके विचार के अमर हो जाने का प्रतीक था। दुनिया भर में आज भी युवा चे ग्वेरा की फोटो वाली टी शर्ट पहन कर निकलते हैं तो इस विचार के समर्थन का सबूत मिलता है। वह विचार जो बंदूक के दम पर क्रांति लाने का ख्वाब देखता है, वह विचार जो ‘सत्ता विरोधी संघर्ष’ का नेतृत्व करता है। लोगों की भूख, बीमारी, जीवन में अभावों ने चे ग्वेरा को बदल कर रख दिया और उन्हें इस का समाधान क्रांति में दिखा। चे ग्वेरा ने कहा था कि मैंने लड़कपन के दिनों से भूख कष्ट, गरीबी, बीमारी और बेरोजगारी को देखा है। मैं कोई आजादी दिलाने वाला नहीं हूं। आजादी दिलाने वाला कोई नहीं होता। लोग खुद आजाद होते हैं।
मगर एक दुनिया वह भी है जो चे ग्वारा को हत्यारा, रक्त पिपासु कहती है. जो मानती है कि जिस विचार को लेकर चे ग्वेरा ने क्यूबा में क्रांति का साकार किया वह विचार सत्ता में रह कर लागू नहीं हो सका, तो क्या क्रांति मात्र छलावा है? दुनिया आज भी दोराहे पर है कि बदलाव का माध्यम क्यों सशस्त्र क्रांति या अहिंसा की राह? युवा खून आज भी बंदूक की क्रांति में ही बदलाव की राह देख रहा है। ऐसे तमाम युवाओं के लिए चे ग्वेरा जैसे क्रांति नायक आदर्श हैं।

चे के कुछ चर्चित कथन इस प्रकार हैं:
- घुटनों के बल जीने के बजाय में खड़ा होकर मरना पसंद करूंगा।
- यदि तुम्हें अन्याय को देखकर गुस्सा आता है, तो तुम मेरे कॉमरेड हो।
- अगर आपकी राह में कोई बाधा नहीं तो शायद वो राह कहीं नहीं जाएगी।
- जिसे मौत का डर नहींं, उसके लिए कोई भी काम नामुमकिन नहीं।
- बहुत से लोग मुझे दिलेर कहेंगे। मैं हूंं दिलेर। सिर्फ मैं अपनी तरह का एक दम अलग। एक जो अपने सच को सही साबित करने के लिए अपनी जान भी खतरे में डाल सकता है।
- तुम मुझे मार सकते हो मेरे विचारों को नहीं।
- अगर आप हर गलत बात पर गुस्से से कांपने लगते हैं तब आप मेरे साथी है।
- क्रूर नेताओं द्वारा अपनी जगह नए नेताओं को भी क्रूर बनाया जाता है।

