‘सिनेमा नजर से नजर तक’ संवाद
भोपाल। पश्चिम ने सिनेमा को सातवीं कला कहा है। यह वास्तव में सभी कला रूपों का मिश्रण है। इस लिहाज से सिनेमा को स्वार्थी कहना चाहिए जो अपने मुताबिक कलाओं के श्रेष्ठ रूप को लेकर बाकी को हटा दिया करता है। कलाओं ने हर दौर में इंसान की श्रेष्ठता के लिए कार्य किया है। सिनेमा के एक रूप जिसे हम समानांतर या यथार्थवादी सिनेमा कहते हैं, ने भी यह कार्य किया है। आज व्यावसायिक सिनेमा निकृष्टतम क्रूरता दिखा रहा है। ऐसे में उम्मीद कला और यथार्थवादी सिनेमा से ही बनी रहेगी।
यह बात ‘सिनेमा नजर से नजर तक’ संवाद में फिल्म निर्देशक, सिनेमेटोग्राफर एवं स्क्रीनप्ले राइटर प्रो. राजीव गोहिल ने कही। प्रो. राजीव गोहिल ने भारतीय सिनेमा के कला पक्ष, विश्व सिनेमा से उसके अंतर्संबंध और सिनेमा की यात्रा में आए परिवर्तनों पर चर्चा की। इस सत्र में संवादकर्ता के रूप में पत्रकार एवं स्तंभकार (प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक एवं वेब मीडिया) पंकज शुक्ला ने सिनेमा और राजीव गोहिल की इस संदर्भ में विशेषज्ञता को जोड़कर गहरे प्रश्न किए । कार्यक्रम का आयोजन आशा पारस फॉर पीस एंड हार्मनी फाउंडेशन, भारत द्वारा किया गया था।
संवाद के पूर्व दो सशक्त और समकालीन विषयों पर आधारित फिल्मों ‘प्यास’ और ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ का प्रदर्शन किया गया। पहली फिल्म ‘प्यास’ का निर्देशन सूर्यांशु सक्सेना ने किया है। यह फिल्म एक नौजवान अर्जुन के रूपांतरण की कहानी है। वह परंपरा और सही कर्म के बीच स्वयं को फंसा हुआ पाता है। एक शिक्षक से हुई चर्चा के बाद पुजारी बनने की राह पर चल रहा अर्जुन अपने अस्तित्व, आस्था और विश्वासों से जूझता है। यह फिल्म उसकी उस परिवर्तनकारी यात्रा को दर्शाती है, जो उसके स्थापित विश्वासों को तोड़ते हुए उसे जीवन के वास्तविक उद्देश्य की ओर ले जाती है। फिल्म प्रदर्शन के उपरांत निर्देशक सूर्यांशु सक्सेना ने फिल्म की निर्माण प्रक्रिया पर चर्चा करते हुए बताया कि शून्य संसाधन के साथ तैयार यह फिल्म युवा मन के संशयों और उलझनों को व्यक्त करने का माध्यम बनी।
दूसरी फ़िल्म ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ का निर्देशन राहुल शर्मा (राहुल्य) ने किया है। अंतरराष्ट्रीय सितार वादिका स्मिता नागदेव के शास्त्रीय संगीत से सजी मार्मिक मूक लघु फ़िल्म ‘ग्वावा– ए मॉब लिंचिंग’ को प्रतिष्ठित खजुराहो अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म महोत्सव 2025 में आधिकारिक स्क्रीनिंग के लिए चुना गया है। 14 मिनट की यह फिल्म बिना किसी संवाद के भारत में बढ़ती भीड़ हिंसा यानी मॉब लिंचिंग की भयावह सच्चाई उजागर कररती है। कहानी एक ऐसे निराश्रित व्यक्ति की है, जिसकी पत्नी मृत्युशैया पर है और सारा धन उसके इलाज में खर्च हो चुका है। पत्नी को अमरूद बेहद पसंद है इसलिए मरणासन्न पत्नी को देने के लिए मंदिर से अमरूद उठा लेता है। उसे गांव वाले मंदिर से कुछ चुराते हुआ देख कर पीछा कर पकड़ते हैं और पीट-पीटकर मार डालते हैं। फिल्म में संवाद का न होना इसकी भावनात्मक तीव्रता को और अधिक प्रभावशाली बनाती है। राग मियां की तोड़ी पर आधारित बैकग्राउंड म्यूज़िक दर्शकों को गहरे संवेदनात्मक लोक में ले जाता है।
फिल्म निर्देशक राहुल शर्मा (राहुल्य) ने कहा,“हमने इस फ़िल्म को भीड़ हिंसा के खिलाफ एक मूक चीख के रूप में बनाया है। इसके शीर्षक के पीछे अकल्पनीय दर्द की एक मानवीय कहानी छिपी है। ‘ग्वावा – ए मॉब लिंचिंग’ आत्मनिरीक्षण, सहानुभूति और आवेगी रोष के इस दौर में संवैधानिक न्याय के पालन के लिए एक हार्दिक अपील है।”

भोपाल के दुष्यंत कुमार स्मारक पांडुलिपि संग्रहालय में आयोजित इस कार्यक्रम के आरंभ में फाउंडेशन की ओर से स्वागत वक्तव्य प्रो. आशा शुक्ला ने दिया। आयोजन समिति की ओर से डॉ. वीणा सिन्हा ने आभार प्रकट किया। कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर और अपर्णा पात्रिकर ने किया। प्रो. आरके शुक्ला ने अतिथियों का स्वागत किया। लव चावड़ीकर ने समन्वयन किया।

