
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
बेचैनियों में मुस्कान की रहगुज़र
थी यूं तो शब-ए-हिज्र मगर पिछले पहर को,
वो दर्द उठा फ़िराक़ कि मैं मुस्कुरा दिया।
फिक्रों-फन के ऐतबार से सदी के बड़े शाइर फ़िराक़ गोरखपुरी साहब का यह शेर अद्भुत है। इस शेर के भीतर बहुत कुछ दिखाई देता है। लफ़्ज़ी मआनी पर ग़ौर करें तो शेर रात के उस अंतिम पहर को याद कर रहा है जब किसी बात का ख़्याल आया और चेहरे पर मुस्कान भी आ गई। इन दो मिसरों में इतना ही होता तो यह शेर कब का ख़त्म हो गया होता। यह शेर अगर आज भी बेचैनी पैदा करता है तो इसका मतलब यह है कि इस शेर में शाइर ने बहुत कुछ ऐसा कहने की कोशिश की है जो दिख नहीं रहा है, मगर मौजूद है।इस शेर को थोड़ा और खोलें तो इसकी तहों में एक संकेत यह भी मिलता है कि इस शेर में वियोग का सामान्य दुख है, लेकिन पिछली रात दर्द की तीव्रता असाधारण हो गई है। भावना इतनी बढ़ गई है कि रोना भी सीधा रास्ता नहीं रहता और प्रतिक्रिया उलटी होकर मुस्कान बन जाती है। यह मुस्कान ख़ुशी नहीं, बल्कि असहनीय पीड़ा की विडंबनापूर्ण, अनैच्छिक अभिव्यक्ति है। यहां दर्द कौन सा है और उसके बढ़ने पर होने वाली ख़ुशी कौन सी, यह सब कुछ महसूस करने की बात है।
ज़िन्दगी में कई लम्हें ऐसे आते हैं जब दर्द ही दवा बन जाता है। दर्द जब हद से गुज़र जाता है तो वह दवा का काम करता है। इसी तरह दर्द जब शिद्दत से महसूस किया जाए तो वह दर्द नहीं रहता, वह आनंद में तब्दील हो जाता है। उस दर्द के उठते ही चेहरे पर मुस्कान आना लाज़िम है। ऐसा लम्हा हर इंसान की ज़िन्दगी में आता है जब उसे ऐसे दर्द का इंतज़ार रहता है, जिसके कारण वह कुछ देर मुस्कुरा सके। इसीलिए हर मुस्कान के पीछे कुछ आंसू छुपे होते हैं। हर ख़ुशी के पीछे कुछ ग़म मौजूद होते हैं। शाइर यहां उन ग़मों को सीधे-सीधे व्यक्त न करते हुए एक मुस्कान के रूप में उसे उभार रहा है, जो आम आदमी की ज़िन्दगी का सच है। जुदाई की रात बहुत लंबी होती है। उस रात की कभी इंतेहा नहीं होती। वह रात हर इंसान की ज़िंदगी में लगातार चलती रहती है। उस रात का आख़िरी पहर कुछ ऐसी पीड़ा लेकर आए कि वह पीड़ा मुस्कान में तब्दील हो जाए तो ज़िन्दगी के मआनी बदल जाते हैं। अब ऐसा क्या हो जाता है कि दर्द मुस्कान में तब्दील हो जाए ! इस पेचीदगी ने ही शेर को बड़ा बना दिया है। इस शेर को ज़िन्दगी के फलसफे के रूप में भी देखा जाना चाहिए। इंसान पूरी उम्र भर अपनी ख़्वाहिशों को पूरा नहीं कर पाता है। उसे उम्र भर यही लगता है कि कुछ न कुछ ख़्वाहिश अधूरी ही रह गई । इस तरह ख़्वाहिशों और उसके बीच में एक तरह की जुदाई रहती है, दूरी बनी रहती है। वह चाह कर भी वह सब कुछ नहीं कर पाता जो चाहता है। ये ख़्वाहिशें किसी भी तरह की हो सकती हैं।
इंसान की ज़रूरतें, इंसान से प्यार और सुकून भी इसमें शामिल है। कहीं न कहीं इंसान को यह लगता है कि अगर उसे ज़रूरी सामान मिल गया तो वह इंसान नहीं मिल पाया जिसकी उसे तमन्ना थी। अगर कोई इंसान उसे मिल पाया तो उसे दौलत, शोहरत नहीं मिल पाई। अगर उसे दौलत और शोहरत भी मिल गई तो कोई ओहदा नहीं मिल पाया। अगर कोई ओहदा मिल भी गया तो सुकून नहीं मिल पाया। यानी उम्र भर किसी न किसी से इंसान की जुदाई बनी ही रहती है। लेकिन जब आख़िरी वक़्त आता है तब इंसान को यह महसूस होता है कि उसने ज़िन्दगी में क्या कुछ पाया है और क्या कुछ खोया है। उस वक़्त उसे महसूस होता है कि क्या कुछ वह कर सकता था और क्या कर पाया है। वह अंतिम क्षण ही होता है, जब वह पूरी उम्र भर का आंकलन कर पाता है। रात का अंतिम पहर भी जीवन के अंतिम क्षण की तरह ही है। जब इंसान को अपना सब कुछ याद आता है और जब याद आता है तो बहुत कुछ न मिलने के बावजूद उसके चेहरे पर एक मुस्कुराहट आती है। वह मुस्कुराहट इस बात की गवाही देती है कि मैं जिन चीज़ों के लिए उम्र भर तड़पता रहा, वे तो मेरे आस-पास ही थी।
मैं जिस सुकून की तलाश करता रहा, वह तो मेरे भीतर ही था। मैं जिस दौलत, शोहरत की उम्मीद करता रहा, वह तो मेरे अपने लोगों के बीच, उनके प्यार के बीच मौजूद थी। तब उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आती है। वही मुस्कुराहट शाइर रात के अंतिम पहर में आई मुस्कुराहट के रूप में बता रहा है। यह मुस्कुराहट एक दर्द के रूप में ही आती है। इंसान के आख़िरी वक़्त में जो दर्द उभरता है, वह दर्द इस बात की गवाही देता है कि ज़िन्दगी को जितना जीना था, जी लिए। अब मुस्कुराते हुए जाने की बारी है। एक रात भी पूरी एक जिंदगी की तरह होती है। सुबह चेहरे पर आई मुस्कुराहट सारे दर्द को ग़ायब कर देती है और एक नई ज़िन्दग़ी की शुरुआत की तरफ अग्रसर करती है। यह मुस्कुराहट ही ज़िन्दगी को हौसला देती है।
संपर्क: 9827084966

