मां की याद हरी है,पेड़ सूख गया है…

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2 thoughts on “मां की याद हरी है,पेड़ सूख गया है…”

  1. शशि तिवारी

    जब आपने यह पेड़ लगाया होगा लगभग उसी समय मेरे घर कुछ पेड़- पौधे एक-एक कर सूख रहे थे। ठीक ऐसी ही घटना घटित हुई थी। उन पौधों को रोपने वाले, उन पर जान छिड़कने वाले भाई नहीं रहे थे। उनके असमय जाने का दुख, फिर हरे भरे पेड़ पौधों का अचानक ठूंठ बनते चले जाना…. हम सब हतप्रभ थे ! यह क्या,क्यों,कैसे …. कितने सवाल थे। फिर समझ आया था कि यह प्रकृति और मनुष्य के गहनतम अंतर्संबंध का परिणाम है। आज आपके ऐसे अनुभव जान कर यह विश्वास और पुख्ता हुआ है।

  2. Mahendra Singh Shekhawat

    अदभुत अद्वितीय।मेरे पिताजी के जाते ही उनके द्वारा लगाया गया बिल्व वृक्ष भी इसी तरह सूख गया,उनकी स्मृति में सारे के सारे पत्ते गिरा कर निरा ठूंठ हो गया था।आपका कहना सही है पेड़ भी व्यथित होते हैं।

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