एक कप चाय? … हो जाए…

  • टॉक थ्रू एडिटोरियल टीम सभी फोटो: गिरीश शर्मा

एक कप चाय… इस एक वाक्‍य के कई रंग है, कई। जैसा मूड, जैसा अंदाज, जैसे अल्‍फाज वैसा चाय का रंग। कभी कड़क, कभी हल्‍का उबाल, कभी गाढ़े दूध की, कभी सिर्फ काला पानी, कभी नुक्‍कड़ वाली, कभी नफासत वाली…। कभी बुझे मन को जगा देने वाली, कभी अति उत्‍साह को थाम लेने वाली, कभी प्रेम की पिंगे भरने में सहायक, कभी बोझिल मन को थाम लेने वाले यार के बराबर। चाय के बगैर किसी की आंख नहीं खुलती, कोई न पीए तो नींद नहीं आती।

दिन
बड़ी देर से
सिकुड़ा सिकुड़ा अलसाया
दुबका सा धुंधलके में
आधी आंखें खोले देख रहा है
अरे, इसे एक चाय मिले
तो शायद इसकी नींद खुले।
– सोनल शर्मा

किसी का मन तब बनता है जब चाय मिल जाए, कोई तब ठहरता है जब प्‍याला सामने हो। कोई बात करने चाय पर मिलता है, कोई चाय के बहाने बात करता है। भई हम तो चाय नहीं पीते कहने वाले का अपना अंदाज है और चाय पीए बिना तो हम मुर्दा जान हैं कहने की अपनी ठसक। बीसियों चाय के रूप हैं और बीसियों इसके प्रेमियों के अंदाज। गर्म चाय की प्‍याली और उसको पिलाने वाली की अदद हसरत गाने में तो बहुत बाद में आई, उसके बहुत पहले से यह अरमान रगों में दौड़ता रहा है।

हम इतनी गर्म-जोशी से मिले थे
हमारी चाय ठंडी हो गई थी।
– ख़ालिद महबूब

याद करने की जरूरत नहीं है, बस चाय शब्‍द सुनिए और आपको सैकड़ों किस्‍से याद हो आएंगे। इन्‍हें याद करेंगे तो तय है कि आप मुस्‍कुराएंगे ही। चाय पर गहरे आख्‍यान बुने जा सकते हैं, चाय पर मुलाकातों पर उपन्‍यास लिखे जा सकते हैं। मामूली सी बातों से लेकर गहरे संवादों तक क्‍या कुछ नहीं घटा है चाय पर, चाय के साथ।

चाय संगत
एक छोटी-सी रसोई में
एक अकेले व्यक्ति ने
बस एक प्याली चाय बनाई
थोड़ा पानी थोड़ी शक्कर
कुटी हुई थोड़ी-सी अदरक-काली मिर्च
डेढ़ चम्मच चायपत्ती
और एक कामकाजी दिन भर की बहुत सारी थकान
आंच ने रचा जादू
उड़ी भाप
उभरी गमक चिरपरिचित फिर भी सर्वथा नवीन
बासन में जितने उपादान थे विलग
सब हुए एकाकार
चाय हुई तैयार
एक छोटी-सी रसोई में
जलतरंग की तरह बजी छन्नी
प्यार उमड़ा प्याली पर
और वाष्पीकृत हुआ एक अकेले व्यक्ति का अलगाव
– सिद्धेश्‍वर सिंह

चाय का होना दरअसल हमारी जिंदगी में प्रेम का, हौसले का, उम्‍मीद और उत्‍साह का होना है। चाय हमें जीत का हुनर दे सकती है तो हार पर ढांढस बंधाने वाला हाथ भी साबित होती है:

अक्सर लौटता हूं घर
धुल और पसीने से लथपथ
अपनी नाकामियों के साथ
थका – हारा

वह मुस्कराते हुए
एक कप चाय के साथ
सिर्फ थकान के बारे में पूछती है
और मैं भूल जाता हूं
अपनी हार।
– मणि मोहन

मुझे एक कप चाय देना… यह फरमाइश घर पर जैसे होती है, वैसे ही बाहर किसी टपरी पर, किसी कैफे भी होती है। कोई एक कट चाय मांगता है, किसी के लिए एक बड़ा मग जैसा कप भी छोटा पड़ता है। कॉलेज के कैंटीन की चाय का स्‍वाद फिर कभी मिला ही नहीं। चाय हमारी नहीं हमारे शहर की भी पहचान होती है। ऐसे शौकिन भी कम न हैं जो पसंद की चाय पीने शहर के दूसरे कोने तक जाते हैं। जरा ठहरते हैं और मन भर स्‍वाद लेकर लौट आते हैं।

मोटे तौर पर चाय की सामग्री तय ही होती है। पानी, चाय पत्‍ती, शकर और दूध। अदरक, चाय मसाला, शहद, नींबू, नमक… आदि उसका स्‍वाद बढ़ाने के उपक्रम हैं। फिर भी चाय बनाना एक ऐसा मसला है जिस पर हर किसी को महारत हासिल हो जाए मुमकीन नहीं। तभी तो जरा चुनौती दो तो वह ऐंठ कर कहती है, रसोई में सारा सामान रखा है। जाओ और बना लो चाय।

यानी कि म‍हक, मिजाज और मान वाली चाय के अपने रंग हैं मगर उसका एक रंग उसके प्रस्‍तुत करने में भी है। प्रस्‍तुत करने का भाव ही नहीं प्रस्‍तुत करने का पात्र भी। यानी कप। एक घूंट चाय भी न समाए इत्‍तू से कागज/प्‍लास्टिक के कप से आगे शीशे, चीनी, मिट्टी और पत्‍थर से बने कप भी। कलाकारों ने कप पर अपने प्रिय का चेहरा उकेर कर चाय के कप को एक खास अहसास दे दिया। जो किसी ने कप पर सुंदर वाक्‍य उकेर कर चाय को विचार से जोड़ दिया।

मोटी, धुली लॉन की दूब,
साफ मखमल की कालीन
ठंडी धुली सुनहरी धूप

हलकी मीठी चा-सा दिन,
मीठी चुस्की-सी बातें,
मुलायम बाहों-सा अपनाव

पलकों पर हौले-हौले
तुम्हारे फूल से पाँव
मानो भूलकर पड़ते
हृदय के सपनों पर मेरे
अकेला हूं आओ।
– शमशेर बहादुर सिंह

वैसे, चाय सोशल स्‍टेटमेंट भी है। लोक हो या शहरी समाज, जब तक चाय न हो, जैसे आयोजन पूरा नहीं होता। अगर ऐसा न होता तो यह उलाहना भी न होता, कैसे मेहमाननवाज है,छप्‍पन भोग परोसने से क्‍या होता है, उन्‍होंने चाय तक का तो पूछा नहीं।
चाय एक पोलिटकल स्‍टेटमेंट भी है। चाय पर चर्चा से लेकर चायवाले का प्रधानमंत्री बन जाने तक के पोलिटिकल डिस्‍कोर्स से कौन अनजान है भला? इस चर्चा के दौरान तंज भी खूब हुए और सोशल मीडिया पर वायरल भी। जैसे यह:

चाय को तीसरी बार उबालो तो वह कड़वी हो जाती है…

मुहावरों में चाय को भी हमने देखा है। किसी राजनीतिक हलचल पर अखबारों का सबसे चहेता मुहावरा रहा है, चाय की प्‍याली में तूफान। और चाय से ज्‍यादा केतली गर्म को कटाक्ष के रूप में आजमाया जाता है। जो यह दावा किया करते हैं कि हम पर किसी का रंग नहीं चढ़ता वे भी चाय के रंग में रंगे मतवाले कहलाए गए हैं। चाय की अपनी महफिल होती है और महफिल का अपना चाय रंग।

अच्छी खासी चलती गोष्ठी के बीच में यदि चाय बंटने लगे तो फिर कोई किसी की नहीं सुनता। माइक पर मौजूद कवि कविता रोककर मार्मिक अपील करता है – भाई थोड़ा रुक जाइये।
“आप पढ़ना जारी रखें”, एकाध सहृदय श्रोता को चाय सुड़कते हुए यह भी कहते हुए सुना जा सकता है।
– मणि मोहन

कहते हैं चाय तो जीवन रेखा है। हमारी भी, उनकी भी जो चाय की टपरी/ठेला/ गुमटी लगाते हैं। कवि की नजर से देखें तो यह शहर की आब भी है। एक राजनीतिक कटाक्ष भी:

चाय की गुमटी
वह रास्ते से एक तरफ थी लेकिन
बहुत से लोगों की जिंदगी के रास्ते में पड़ती थी
छोटी सी ढलान थी वहां जो थके हुए
राहगीरों को बुलाती थी आवाज देकर
कई बार वहां ऐसे लोग भी आते रहे
जिन्हें नहीं होती चाय की तलब
वे ऊबे हुए लोग रहा करते जिन्हें
कहीं और नहीं मिल पाती थी शांति
उस ढलान से लुढ़कता रहा दफ्तरों का बोझ
वहीं छूटती रहीं घर–गृहस्थी की चिंताएं
नए लगाए गए करों और अनंत महंगाई के बीच
वहां पचहत्तर पैसे की चाय थी
चीजों को दुर्लभ होने से बचाती हुई
विद्वानों को पता नहीं होगा लेकिन वह गुमटीवाला
पिछले कई सालों से
वित्तमंत्री की खिल्ली उड़ा रहा था
काम पर जाते मजदूर इकट्ठा होते रहे वहां
कभी भी पहुंच सकते थे आसपास रहनेवाले विद्यार्थी
रिक्शेवाले, अध्यापक, दफ्तर के बाबू
हर एक के लिए जगह थी वहां
बेंच कुल एक थी और एक स्टूल
जिन पर धूल और पसीने के अमर दाग थे
उनका सौंदर्य बुलाता रहा दु:खी लोगों को बार–बार
आसपास की जगहें
पहचानी जाती रहीं चाय की गुमटी से
अजनबियों को बताया जाता रहा–
‘वहां, उधर, उस गुमटी से दाएं’
एक दिन मैं अपने दोस्त के साथ वहां गया
मन ही मन शर्मिंदा होता हुआ कि मेरे शहर में
कोई जगह ऐसी सुंदर नहीं जहां मैं उसे,
बाहर से आए उत्सुक आदमी को, ले जा सकूं
खाली नहीं थे, बेंच और स्टूल
हमने एक बड़े पत्थर पर बैठकर
एक पेड़ के नीचे चाय पी
फिर एक–एक कट और
दोस्त ने कहा यह कितनी खूबसूरत जगह है
जो हर शहर में होती है लेकिन हर किसी को
खूबसूरत नहीं लगती।
– कुमार अंबुज

इनदिनों चाय सिर्फ महक, स्‍वाद और बनाने वाले के अपनत्‍व से ही ख्‍यात नहीं है बल्कि सौ से भी ज्‍यादा रूप, रंग और संस्‍कार चाय को नई पहचान दे रहे हैं। स्‍थान, मसालों और बन-ठन का अंदाज चाय को आम से खास और खास से खासकर बनाता है। गुगल पर खोजेंगे तो चाय से दुबला, सेहतमंद और मोटा होने के भी हजार सुझाव मिल जाएंगे। यह भी कि दुनिया की सबसे महंगी चाय कहां मिलती है।

वैसे, दाम के हिसाब से महंगी चाय दुनिया के किसी भी कोने में मिले, हमारे लिए तो सबसे खास, सबसे कीमती चाय वह है जिसे पीने के अरमान बने रहें और मौका मिलते ही हम कह उठें, चलो चाय पीते हैं।

एक कमरा है
एक आलमारी
एक आईना
एक ही बेड
एक कंबल
एक टेबल
मगर कुर्सियां दो हैं
टेबल पर रखी प्यालियां दो हैं
इसका मतलब यह कि

जब टूटने लगे एकांत
छाने लगे अकेलापन
तब संवाद के बहाने दो हैं
जरूरत हो तोड़ने की सन्नाटा
तो मुलाकात के इरादे दो हैं।
-पंकज शुक्‍ला

3 thoughts on “एक कप चाय? … हो जाए…”

  1. अद्भुत। चाय की तो बात ही अलग है। दिनचर्या के श्री गणेश की वाहक। चाय की चुस्की और हाथ में अखबार, करते हैं सब इनसे प्यार अपार।
    हमारे दौर में तो कप-बसी में सर्व होती थी, जिसे साझा करते हुए एक बसी यानी प्लेट और दूसरा कप से पीते हुए यादों की दुनिया आबाद किया करते थे। हार्दिक बधाई सहित
    – सख़्त सर्दी में चाय ऑर्डर की
    – हम ने मौसम से ले लिया बदला

  2. Shachindra Sharma

    सुबह चाय की चुसकियों के साथ आपका लेख पढ़ा। सच में मजा कई गुना बढ़ गया।

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