केवल अनुभव किया जा सकता था,आस्था का महासागर था वह

अनुजीत इकबाल, लखनऊ

बसंत का वह धवल प्रभात, जब हम लखनऊ से कुंभ की ओर चल पड़े। पूर्व दिशा में सूरज की पहली किरणें जब धरती को स्पर्श कर रही थीं, तब हमारी यात्रा का आरंभ हुआ। घड़ी ने छह बजने का संकेत दिया था और हृदय में उमंगों की अनगिनत लहरें हिलोरें मार रही थीं। यह केवल एक यात्रा नहीं थी, बल्कि एक दिव्य आह्वान था, कुंभ के महासंगम की ओर, जहां सैकड़ों वर्षों से आस्था, परंपरा और आत्मबोध के धाराएं एक होती आई हैं। चार घंटे के सफर में रास्ते भर मन कल्पनाओं में तैरता रहा, गंगा का दिव्य स्वरूप, साधु-संतों के अखाड़े, मंत्रों की गूंज और असंख्य दीपों से प्रकाशित वह पावन धरा। जब प्रयागराज पहुंचे, तो लगा जैसे समय की सीमाएं विलीन हो गई हों। वहां जो दृश्य था, वह केवल आँखों से देखा नहीं जा सकता था, बल्कि उसे अनुभव किया जाना था, वह आस्था का महासागर था, जहां हर लहर श्रद्धा की एक नई कहानी कह रही थी।

प्रयागराज में प्रवेश करते ही लगा जैसे पूरा विश्व ही वहां एकत्र हो गया हो। देश-विदेश से आए अनगिनत श्रद्धालु, हर भाषा, हर जाति, हर संप्रदाय के लोग, सभी एक ही उद्देश्य से यहां आए थे।आस्था की गंगा में आत्मा का स्नान करने। दूर-दूर तक भीड़ का अथाह प्रवाह और उसके बीच गंगा की शीतल लहरें, मानो सबको अपने आलिंगन में समेट लेने को आतुर थीं। चारों ओर साधु-संतों के भव्य अखाड़े, माथे पर चंदन, शरीर पर भस्म, कमंडल लिए संन्यासी और उनके मुख से निःसृत श्लोकों, मंत्रों, भजनों का मधुर प्रवाह। कहीं किसी महामंडलेश्वर का प्रवचन हो रहा था तो कहीं संन्यासियों की धूनी जल रही थी। उस अद्भुत वातावरण में एक गूढ़ शांति थी, एक अदृश्य आकर्षण, जो हर मनुष्य को भीतर से बदल देने को तत्पर था। परंतु, जीवन केवल आस्था की ऊँचाइयों तक सीमित नहीं होता, वह यथार्थ के धरातल पर भी विचरण करता है। महंगाई अपने अस्तित्व का प्रमाण दे रही थी। दवाई घर पर छूट गई थी और साधारण डिस्प्रिन की एक गोली के लिए दस रुपये देने पड़े। कुंभ का विराट स्वरूप भले ही दिव्य था, परंतु इसके भीतर भी संसार के रंग घुले हुए थे। जरूरत की चीजों के दाम आसमान छू रहे थे। पानी की एक लीटर की बोतल के लिए 80 से 100 रुपये तक मांगे जा रहे थे, जबकि उसकी वास्तविक कीमत 20 रुपये से अधिक नहीं थी। इस लूट जैसी स्थिति ने कई श्रद्धालुओं को परेशान कर दिया, लेकिन फिर भी भक्ति और आस्था के रंग में कोई कमी नहीं आई।

गंगा तट पर पहुंच कर जैसे ही पहली डुबकी लगाई, ऐसा लगा जैसे समस्त संसार एक क्षण के लिए रुक गया हो। जल ठंडा था, परंतु उसकी छुअन में एक गहरी शांति थी, मानो आत्मा के समस्त भार गंगा की धाराओं में घुलकर बह गए हों। यह स्नान केवल शरीर की शुद्धि नहीं था, यह अंतरात्मा का अमृत-स्नान था।

शाम होते ही कुंभ का एक नया रूप प्रकट हुआ। हम सेक्टर 6 की ओर बढ़े, जहां सफाई और व्यवस्था देखकर मन प्रसन्न हो गया। कुंभ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि भौतिक रूप से भी अनुशासित था। प्रशासन द्वारा यात्रियों की सुविधा के लिए टैंट दिए गए, जिससे ठहरने की कोई समस्या न हो। टैंट में आराम करने के बाद, पुलिसकर्मियों द्वारा हमें को चाय-नाश्ता भी करवाया गया, जिससे सभी को ताजगी का अनुभव हुआ। बच्चे टैंट में खेलते हुए आनंदित हो रहे थे, उनकी हँसी और उत्साह से माहौल और भी जीवंत हो गया। कुछ देर विश्राम करने के बाद, हम ‘कला ग्राम’ की ओर बढ़े, जहां पूरे भारत की संस्कृति, हस्तकला और पारंपरिक व्यंजनों का एक अनुपम संसार सजा था। कला ग्राम, कुंभ में भारत की समृद्ध लोक कला, हस्तशिल्प, संगीत और सांस्कृतिक विरासत का भव्य प्रदर्शन कर रहा था।

यह आयोजन देशभर के कारीगरों, कलाकारों और साहित्यकारों को एक साझा मंच प्रदान करता है। यहां पारंपरिक हस्तशिल्प की अद्भुत प्रदर्शनी, लोक संगीत और नृत्य की रंगारंग प्रस्तुति, साहित्यिक सत्र और विभिन्न प्रदेशों के व्यंजनों का अद्वितीय संगम देखने को मिला। यह मेला न केवल लोक कलाओं को संरक्षित और प्रोत्साहित कर रहा था बल्कि उन्हें वैश्विक पहचान दिलाने का माध्यम भी बन रहा था। यह सिर्फ एक मेला नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक आत्मा का उत्सव था, जो शिल्पकारों और कलाकारों के आर्थिक सशक्तिकरण के साथ-साथ कला प्रेमियों और पर्यटकों को भारतीय परंपराओं की झलक दे रहा था। यहां देश के विभिन्न हिस्सों के पारंपरिक पकवानों की खुशबू माहौल को और भी आकर्षक बना रही थी। पंजाब के कुलचे, महाराष्ट्र का वड़ा पाव, दक्षिण भारत के मसाला डोसा और उत्तर प्रदेश के खस्ता कचौड़ी जैसे व्यंजनों के स्टॉल देख हमारी भूख और उत्सुकता दोनों बढ़ गईं। मैंने खासतौर पर राजस्थानी थाली का आनंद लिया, जिसमें दाल-बाटी-चूरमा, गट्टे की सब्जी और मिस्सी रोटी थी। पारंपरिक स्वाद और मसालों की खुशबू ने मन को पूरी तरह संतुष्ट कर दिया।

इसके बाद, हमने गंगा के धरती पर अवतरण की कथा पर एक लघु फिल्म देखी, जिसने मन को गहरे तक छू लिया। फिल्म के भावपूर्ण दृश्य और आध्यात्मिक संदेश ने कुंभ के अनुभव को और भी दिव्य बना दिया। रात होते ही कुंभ का नज़ारा और भी दिव्य लगने लगा। हर ओर रोशनी, भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं का उत्साह देखते ही बनता था। हम फिर से घूमने निकले, पावन संगम तट की ओर, जहां आरती का भव्य आयोजन हो रहा था। वह दृश्य अत्यंत अलौकिक था, जो मन-मस्तिष्क को शांति और भक्ति से भर देने वाला था।

रात ढल चुकी थी। बच्चे थककर गहरी नींद में थे, पर हमारा मन अभी भी कुंभ के आनंद से भरा हुआ था। हम गंगा तट पर आकर बैठ गए, जहाँ अब कोई कोलाहल नहीं था, कोई भीड़ नहीं, केवल असीम शांति थी। ठंडी हवा धीरे-धीरे गंगा की सतह को सहला रही थी और जलधारा की कल-कल गूंज जैसे कोई प्राचीन राग छेड़ रही थी। रात के प्रकाश में गंगा का प्रवाह किसी स्वप्नलोक की छवि प्रस्तुत कर रहा था। ऐसा लगा जैसे समय यहां थम गया हो और हम किसी और ही लोक में प्रवेश कर गए हों। वह एकांत क्षण किसी साधना से कम नहीं था। रात के एक बजे तक हम वहीं बैठे रहे, गंगा की धारा को देखते, उसकी लय में खोते, और उसके अनहद नाद को आत्मा में समाहित करते हुए। बाद में वापस टैंट आ गए।

सुबह की पहली किरणों के साथ हम पुनः गंगा स्नान के लिए चल पड़े। इस बार हमारा स्नान संगम से लगभग 5 किलोमीटर दूर एक घाट पर हुआ। वहां पहुंचते ही आस्था और श्रद्धा से भरा माहौल देखने को मिला। महिलाएं पहले विधिपूर्वक पूजा कर रही थीं और फिर अपने गंदे वस्त्र पावन गंगा जल में धो रही थीं। कुछ महिलाएं खुले में वस्त्र बदल रही थीं, हालांकि प्रशासन ने इसके लिए अलग से स्थान निर्धारित किया था। गंगा में डुबकी लगाते ही ऐसा महसूस हुआ जैसे तन-मन दोनों शुद्ध हो रहे हों। इस बार स्नान केवल आस्था तक सीमित नहीं था, बल्कि उसमें आत्मदर्शन और आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव भी हो रहा था।

स्नान के बाद, हम अघोरेश्वर किनाराम बाबा के अखाड़े की ओर बढ़े। बाबा किनाराम अघोर संप्रदाय के प्रमुख संतों में से एक थे, जिनका जीवन तपस्या और जनकल्याण के लिए समर्पित था। कहा जाता है कि वे अघोर पंथ के महान संत थे, जिनकी साधना और सिद्धियां अद्भुत थीं। उनकी शिक्षाएं मानवता, समानता और आध्यात्मिक जागरण पर आधारित थीं।अखाड़े में पहुंचकर एक गूढ़ आध्यात्मिक ऊर्जा का अनुभव हुआ। यहां के साधुओं से उनके दर्शन और जीवन के गूढ़ रहस्यों पर चर्चा हुई। अखाड़े की दिव्यता और सादगी ने मन को शांति से भर दिया। दर्शन के पश्चात, हमें एक पवित्र पुस्तक भेंट में मिली, जिसमें बाबा किनाराम की शिक्षाओं और साधना का सार समाहित था। ऐसा प्रतीत हुआ मानो किसी ऋषि की साधना का सार हमें सौंप दिया गया हो, जो हमारी आध्यात्मिक यात्रा को और अधिक समृद्ध बना गया।

दोपहर में टेंट में लौटे तो गरमागरम आलू के परांठे और चाय की महक ने आत्मा तक को संतुष्ट कर दिया। भोजन का आनंद केवल स्वाद में नहीं होता, बल्कि उस वातावरण में भी होता है, जिसमें वह ग्रहण किया जाता है और कुंभ के पावन वातावरण में, यह भोजन किसी प्रसाद से कम नहीं था।पुलिस प्रशासन पूरी तत्परता से कार्यरत था, लेकिन प्रकृति भी अपनी छाप छोड़ रही थी। एक महीने से उड़ती रेत ने सभी पुलिस कर्मियों को खांसी और गले में खराश का उपहार दे दिया था। लगातार ड्यूटी पर तैनात रहने के कारण उनकी आवाज भारी हो गई थी और कई पुलिसकर्मी गले में जलन व सूखेपन की शिकायत कर रहे थे। हालांकि, इस कठिन परिस्थिति में भी वे अपने कर्तव्यों से पीछे नहीं हटे। राहत के रूप में, कई पुलिसकर्मी दालचीनी और अदरक वाली गर्म चाय पीकर अपने गले को आराम देने का प्रयास कर रहे थे। हर ब्रेक के दौरान वे एक-दूसरे को यह घरेलू नुस्खा आज़माने की सलाह देते, ताकि ड्यूटी पर प्रभाव न पड़े। परंतु, यह कष्ट भी कुंभ की भव्यता और श्रद्धालुओं की सेवा के आगे नगण्य प्रतीत हो रहा था। उनके समर्पण और अनुशासन ने मेले की व्यवस्था को सुचारु बनाए रखा, जिससे श्रद्धालुओं का अनुभव सहज और दिव्य बना रहा।

अंततः, यात्रा के समापन की घड़ी आई। हम फाफामऊ की ओर से लौटे, जहां भारी भीड़ थी, परंतु नियति ने हमें सहज रूप से बाहर निकाल दिया। जब पीछे मुड़कर देखा, तो लगा जैसे कोई दिव्य स्वप्न अभी-अभी पूर्ण हुआ हो। कुंभ केवल एक मेला नहीं था, यह जीवन का एक महासंगम था, जहां आत्मा ने आस्था में स्नान किया, मन ने संस्कृति के रंगों को आत्मसात किया, और हृदय ने उस अनंत धारा को महसूस किया, जो केवल गंगा में ही नहीं, बल्कि हर श्रद्धालु के भीतर प्रवाहित हो रही थी। यह यात्रा केवल एक यात्रा नहीं थी, यह एक आत्मिक जागरण था, जो जीवन भर स्मृतियों में प्रवाहित रहेगा।

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