
- आशीष दशोत्तर
साहित्यकार एवं स्तंभकार
भीतर-बाहर के बीच एक रब्त भी है और कश्मकश भी
अब तो ले दे के वही शख़्स बचा है मुझमें,
मुझको मुझसे जो जुदा करके छुपा है मुझमें।
शाइरी के ज़रिए तालीम, तरबियत और फिक्रोफन की बात बहुत सलीके से कहने वाले शाइर कृष्ण बिहारी ‘नूर’ का यह शेर बहुत सीधे-सीधे अपनी बात कहता है। इस सीधी बात में जो घुमाव हैं वे इस शेर को कामयाब शेर बनाते हैं। शेर के शब्दों पर ग़ौर करें तो शेर बहुत सीधे-सीधे यह बात कह रहा है कि मेरे भीतर वही बचा है, जिसने मुझको ही मुझसे जुदा कर दिया है। देखने में इस शेर में इसके अलावा और कुछ नज़र नहीं आता मगर सोचने पर इस शेर में इतना कुछ नज़र आता है कि इसके आगे और कुछ नज़र ही नहीं आता। यहां इंसान के भीतर और बाहर के बीच एक राब्ता भी है और एक द्वंद्व भी। जो बाहर है वह भीतर हो यह ज़रूरी नहीं और जो भीतर हो वह बाहर ज़ाहिर हो यह भी मुमकिन नहीं। यह द्वंद्व हर इंसान के साथ उम्रभर रहता है। उसे समझ ही नहीं आता है कि कहां उसका भीतर निकल कर बाहर आ रहा है और कहां बाहरी सबकुछ भीतर समा रहा है। शाइर ने भीतर उसके होने की बात कही है जिसने उसे ख़ुद से ही जुदा कर दिया है।
यहां फिर एक पेंच है। भीतर किसी का मौजूद होना अलग है और छुपा होना अलग। यहां भीतर जो है वह मौजूद नहीं है, छुपा है। छुपा होना यानी जो उस इंसान की नज़रों में नहीं है, मगर फिर भी है। छुपने वाला भी कोई शख़्स है। यहां लगता है कि बहुत उलझन है। दरअसल, ज़िन्दगी में इस उलझाव के अलावा कुछ होता ही नहीं है। पता नहीं कौन कब आ कर भीतर इस तरह बैठ जाता है कि ख़ुद का भी भान नहीं रहता। शायद इश्क इसी को कहते हैं। अचानक कोई आंखों को भाने लगता है। आंखों से दिल में उतरता है। धीरे-धीरे दिल पर अपना कब्ज़ा जमा लेता है। यही वह अवस्था होती है जब इंसान को लगता है कि उस एक के अलावा अब जीवन में कुछ और बचा ही नहीं है। उसके आगे किसी और की न चाहत होती है और न कुछ सोचने की फुर्सत। वह अजाना शख़्स इस ख़ूबसूरती से भीतर छुप जाता है कि इंसान को अपनी भी फ़िक्र नहीं रहती। किसी का ख़याल नहीं रहता। उसके आगे सोच बढ़ती ही नहीं। उसके अलावा नज़रें किसी को देखती ही नहीं। यह शेर उसी इश्क़ के फलसफे का बहुत गहराई से विश्लेषण करता है।
यहां सवाल यह भी कि जिसे दुनियावी इश्क़ ऐसी नौबत तक लाने में नाकाम हो जाए उनका क्या? यहां आ कर यह शेर एक नए ज़ाविए के साथ सामने आता है। यहां इस शेर को तसव्वुफ़ के रंग में समझने की ज़रूरत महसूस होती है। अपने पर किसी शख़्सियत का असर होना अलग बात है और उस शख़्सियत का पूरी तरह काबिज़ होना अलग। यह एकदम नहीं होता। इंसान किसी भी शख़्सियत से कुछ समय के लिए प्रभावित तो हो जाता है लेकिन पूरी तरह उसके रंग में नहीं रंगता। यह सिलसिला बहुत धीरे होता है। इसी दरमियान ही किसी और की शख़्सियत इंसान पर छाने लगती है। फिर एक समय वह भी आता है जबकि वह शख़्सियत ही उस इंसान का तआरुफ कराती है। यह ऐसी अवस्था होती है, जब वह इंसान ख़ुद के बस में नहीं रहता। उस पर किसी और का प्रभाव रहता है। सब उसके रंग में भी रंगने लगता है। धीरे-धीरे इंसान उसी रंग में रंग जाता है और अपने माशूक की सूरत, उसकी अदाएं, उसकी बातें, उसका क़िरदार इंसान के भीतर बैठ जाता है। इस तरह बैठता है कि उस इंसान को ख़ुद का भी भान नहीं रहता। वह उसके भीतर छुपकर उसे संचालित करता है। एक समय वह भी आता है जब वह उस इंसान को उसकी मौलिकता से अलग कर देता है। ऐसे वक़्त उस पर सिर्फ़ उसकी शख़्सियत का ही असर होता है, खुद का नहीं।
शाइर इस दृष्टि से उस शख्सियत की बात भी कर रहा है, जो न जाने कब अपने भीतर बैठ जाती है। जो ख़ुद से ख़ुद को ही जुदा कर देती है और पता भी नहीं चलता। इसी बात को एक अलग दृष्टि से समझें तो हम उस मुकाम पर पहुंचते हैं, जहां इंसान के ऊपर ख़ुद का भी वश नहीं रहता। अक्सर यह कहा जाता है कि आस्था अंधी होती है। इस आस्था के नज़रिए से अगर इस शेर को समझें तो एक नया अर्थ खुलता है। किसी के प्रति आस्था रखना अच्छी बात है, लेकिन यही आस्था अंधानुकरण में तब्दील हो जाए तो स्थिति बहुत विकृत हो जाती है। जिसके प्रति आस्था होती है, वह इंसान के भीतर आकर इस तरह बैठ जाता है कि उससे बाहर निकलता ही नहीं। वह भीतर छुपकर उससे वह सब कुछ कराता है जो वह चाहता भी है और नहीं भी चाहता है। वह चाह कर भी ऐसी आस्था से मुक्त नहीं हो पाता। शाइर यहां ऐसे लोगों को नसीसत भी दे रहा है। वह यह कह भी रहा है कि एक इंसान को इस बात का ख़्याल होना चाहिए कि वह जो कुछ कर रहा है, वह ख़ुद कर रहा है या उससे कोई करवा रहा है। वह जो कुछ बोल रहा है, उसमें अपनी सहमति है शामिल है या किसी और की ज़ुबान बोल रहा है।
कहीं ऐसा तो नहीं कि किसी ने भीतर जाकर इस तरह आसन जमा लिया है कि वह आपके अच्छे बुरे को समझने की सलीका ही छीन गया है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह आपसे भीतर कुछ बुरा करवा रहा है। शाइर यहां ऐसे भीतर छुपे लोगों से संभलने की सलाह भी देता है। इस लिहाज़ से यह शेर कई सारे रास्तों से होकर इस मक़ाम तक पहुंचता है कि इंसान को इस बात का इल्म होना चाहिए कि उसके भीतर कौन है। उसके भीतर कौन छुप कर बैठा है। उसके भीतर से कौन बोल रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि वह भीतर बैठकर उसे ख़ुद से ही अलग कर रहा है!
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