एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-30

- विभूति झा, सामाजिक कार्यकर्ता
संपादन: चिन्मय मिश्र
यह अनिवार्य रूप से घटित हुआ भी एक साधारण दस्तावेज है। यह न तो कहानी है, न यात्रा वृतान्त। यह एक व्यक्ति की “लौटने” की गाथा है। विभूति दा की यह डायरी अबूझ सी सच्ची कहानी है। यह सत्य की अभिव्यक्ति है। –चिन्मय मिश्र
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल जिले मंडला से निकलकर सागर विश्वविद्यालय से एमए और एलएलबी। फिर जेएनयू (नई दिल्ली) से समाज विज्ञान में शोधकार्य किया। भोपाल से वकालत शुरू की और भोपाल गैस त्रासदी मामले में गैस पीड़ितों के वकील बने। एक युवा वकील ने बड़े बड़े वकीलों की दलीलों को खारिज कर भोपाल गैस पीड़ितों को मुआवजा दिलवाने की लड़ाई जीती। जिला अदालत से लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक पैरवी और फिर एक दिन अचानक पूरी प्रसिद्धि, अपने समृद्ध भविष्य की संभावना को पुराने वस्त्र की तरह उतार कर चल पड़े एक नए जीवन की खोज में। मन में विचारों का उफान और तन पर एक जोड़ी कपड़ों के साथ सबकुछ छोड़ दिया। परिवार भी। किसी फिल्म की पटकथा सा लगता यह इस डायरी के लेखक विभूति झा के जीवन की वास्तविकता है। एक ऐसा मंथन जो जीवन उद्देश्य खोजने की दिशा में बढ़ा और इस राह में उतने ही विविध अनुभव हुए। यह एक विस्तृत जीवन से साक्षात्कार है। किश्त-दर-किश्त रोचक होती जीवन दास्तां।
भोपाल यात्रा: बीती ताहि बिसारे दे… नव वर्ष 2008
मेघनगर, जिला झाबुआ, मध्यप्रदेश। आज नया साल है और संभवतः मेरे नए जीवन की शुरुआत भी! यहां एक तरफ चर्च और दूसरी तरफ रेलवे ट्रैक, बीच मे शिवगंगा का यह केंद्र। झाबुआ और धार जिले का इकलौता रेलवे स्टेशन है मेघनगर। शाम सात बजे से बिजली गुल है। अभी ठीक बारह बजे बिजली आई- नव वर्ष के स्वागत में। चर्च मे घंटे बज रहे हैं, कस्बे मे आतिशबाजी छूट रही है और रेल की पटरियों पर गाड़ियां दौड़ रही हैं। भोपाल के लिए ट्रेन साढ़े बारह के करीब है। पैदल स्टेशन के लिए निकल पड़ा, अपना बड़ा सा बैग पीठ पर डालकर। पंद्रह मिनट में स्टेशन पहुँच गया। पता चला गाड़ी आधा घंटा लेट है।
एक बजे के करीब ट्रेन आई। बहुत महीनों बाद पहली बार एसी में घुसा। राजकोट एक्सप्रेस। मात्र दो मिनट रुकी। अच्छी नींद आ गई। सुबह साढ़े सात के करीब बैरागढ़ रेलवे स्टेशन पर उतर गया। मुकेश लेने आ गया। ठंड अच्छी है। मुकेश की मोटर-साइकिल पर बैग पीठ पर डालकर चल दिए। मुकेश को पता नहीं है कि कहाँ जाना है। कहने लगा उसके घर पर भी इंतज़ाम करके रखा है, वहाँ चलूँ। मैंने कहा फिर कभी। अभी आगे चलो। बैरागढ़, लालघाटी और फिर वीआईपी लेक व्यू रोड। भोपाल में इस तरह सुबह-सुबह मोटर-साइकिल पर पीछे बैठकर इन सड़कों पर से गुजरना अपने आप में एक अनुभव है। बड़ा तालाब, उसके आस-पास पहाडियाँ और पुल, आबादी। बहुत ही सुंदर है भोपाल। पूरे छः महीने और दो दिन बाद मैं एक दूसरा ही इंसान बनकर भोपाल आ रहा हूँ। मेरा भोपाल! हमारा भोपाल!
श्यामला हिल्स की ओर मुड़ गए। वन्या की जन्मस्थली 49, श्यमल्रा रोड के सामने से निकलते हुए ऊपर पहाड़ी पर जहाँनुमा पैलेस होटल पहुँच गए- वन्या का विवाह स्थल। मेरी इच्छानुसार कादिर भाई ने कॉटेज बुक करवा रखी है। मुकेश चाबी ले आया। झिराबाग पैलेस में रुकने की आदत बनी हुई है, इसलिए बहुत अटपटा तो नहीं लगा।
11 बजे के करीब मुकेश की मोटर-साइकिल पर सवार होकर फिर निकल पड़े। मुकेश को जब फार्म हाउस की तरफ मुड़ने को कहा तो उसे थोड़ा आश्चर्य सा हुआ। देखें वहाँ पहुँचकर कैसा लगता है? आखिरकार पहुँच ही गए। गेट खोलकर अंदर घुसा। सामने बिल्कुल उजाड़ सा बगीचा, एकदम सूखी हुई घास बहुत कुछ कह रहे हैं ! अलंकार की गाड़ी खड़ी हुई है, यानि अभी वन्या और अलंकार यहीं हैं। सब बैठकर नाश्ता कर रहे हैं, किसी ने मुझे नहीं देखा। चलते-चलते बरामदे मे पहुँच गया। टफी भौंक रहा है, और सब लोग बातों में मशगूल हैं। इतने दिनों बाद इस वेशभूषा मे टफी ने नहीं पहचाना और एकदम भ्रमित होकर भौंके जा रहा है। एकदम से नंदिनी की नजर पड़ी और वह भी उसी तरह से भ्रमित और हक्का-बक्का रह गई। मुंह से कुछ बोल ही नहीं निकला। शायद मानकर चल रही थी कि मैं यहाँ नहीं आऊँगा। वन्या आकर लिपट गई और अलंकार भी खुश हो गया। नंदिनी से मैं एकदम सामान्य रूप से मिला। जानता हूँ इस सत्य को पचा पाने में भी उसे काफी समय लगेगा। थोड़ा सा नाश्ता साथ में कर लिया। थोड़ी देर में वन्या और अलंकार अपने घर चले गए। मैंने कहा मै भी आता हूँ और खाना वहीं खाऊँगा।
थोड़ी देर झूले पर बैठा रहा। मैं सामान्य रूप से बातचीत करता रहा। नंदिनी सामान्य नहीं हो पा रही है, स्वाभाविक भी है। काम-धंधे के बारे में, इंदौर की क्लासेस के बारे में और घर खर्च की व्यवस्था के बारे में बैठे पूछता रहा और करीब आधा घंटा बाद उठकर चल दिया। टफी अब तक पहचान कर सामान्य हो चुका है, लेकिन नंदिनी को मुझे लेकर सामान्य होने में समय लगेगा। वह पूछ ही नहीं पाई कि कहाँ रुका हूँ, कब तक रुकूँगा, वगैरह-वगैरह…। कुछ बोल ही नहीं पाई। शायद तय ही नहीं कर पाई कि क्या और कैसे बोलना चाहिए !
मुझे बहुत खुशी मिली, भोपाल पहुँच कर सबसे पहले नंदिनी से मिलने जाकर। जैसा मुझे करना चाहिए था, वैसा मैंने किया। आज जिस अवस्था मे मैं पहुँच चुका हूँ, मुझसे यही अपेक्षित भी था। मै तो आया ही हूँ बिना किसी अपेक्षा के। भोपाल यात्रा का पहला चरण सफलतापूर्वक पूरा हुआ।
दूसरे दिन वन्या लेने आ गई और उसके साथ फार्म हाउस चल दिया। टफी बहुत उछला-कूदा। अब उसे अच्छी तरह समझ आ गया। नंदिनी के चेहरे पर भी अब असमंजस और अनिश्चितता की रेखाएँ दिखाई नहीं दी बल्कि स्वागत की मुद्रा दिखी, सौहार्द के साथ-ही-साथ। तीनों ने अच्छे से साथ-साथ खाना खाया। वन्या भी कुछ बनाकर लाई है। बातचीत करते रहे। मैंने भी थोड़ी-बहुत अपनी काम करने की योजना बताई। यहाँ के बारे में पूछा। एक स्त्री का यहाँ इस तरह अकेले रह पाना सचमुच साहस की बात है।
4 जनवरी 2008
आज भोपाल से रवानगी है। उठकर घूमा, नहा-धोकर तैयार हुआ, जमकर नाश्ता किया। इस बीच नंदिनी का मेसेज मिला- कुकरु यात्रा के लिए शुभकामनाओं का। मैंने जवाब दिया। दस बजे यावर रशीद मिलने आ गए, कल रात लौटे हैं। बहुत खयाल रखते हैं ये लोग मेरा और बहुत सम्मान भी देते हैं। मै भी अब केवल इन्हीं के लिए सलाह-मशवरे का काम करने को तैयार रहता हूँ। बहुत किया है इन्होंने वन्या की शादी में। इनके अलावा बस दीपक और देब ही मुझसे कुछ करा पाते हैं। जब तक संभव होगा इनके लिए तो जो कुछ कर पाया वह करता रहूँगा। ग्यारह बजे के करीब मैं अपना सामान देब साहब की गाड़ी मे रखवाकर निकल गया। मुकेश घर चला गया। पूरे समय अपना सब काम-धंधा छोड़कर मेरे साथ बना रहा। देब साहब के यहाँ पहुचकर मिसेस देब से भेंट हुई, उनके चेहरे पर खुशी स्पष्ट दिखाई दे रही है। अच्छी बुजुर्ग महिला हैं। करीब बारह बजे इनके घर से कुकरु के लिए निकल पड़े। भोपाल से बाहर निकलते हुए नंदिनी का फोन आया। कहा कि मेरा कल वहाँ आना बहुत अच्छा लगा। पूछा कि फिर कब आ रहा हूँ और यह कि सीधे वहीं आऊँ।
बहुत मधुर यात्रा रही मेरी भोपाल की। एक नया व्यक्ति, नई दृष्टि, नया रूप सब कुछ जैसे एक साथ हो गया हो। बड़ी सफल यात्रा। अपनों को खुशी दे पाने से बड़ी खुशी शायद दूसरी नहीं होती और ऐसा महसूस हुआ इस बार मैं यह कर पाया। चाहा तो शायद हमेशा यही, लेकिन चाहकर भी यह पूर्णतः संभव नहीं हो पाया था। उसकी वजहें कई हैं। सबसे बड़ी वजह शायद हमारी दोनों की सोच, समझ और जीवन मूल्यों मे बड़ा अंतर ही रहा है- परिस्थितियों और परिवेश का दबाव तो अपनी जगह था ही। जो भी हो, उस सबसे निकलकर, आज इस मुकाम पर पहूँचकर, अगर अपनों को थोड़ी सी भी ख़ुशी दे पाता हूँ तो अपार सुख और संतोष का कारण बना रहेगा।
14 जनवरी 2008
भंवरताल में फुरसत मे बैठे-बैठे इस बार का भोपाल मुकाम मैंने बाकायदा प्लान किया है – किस-किस से मिलना है और कहाँ-कहाँ रहना हैं। देखें कैसे होता है। मुकेश आ गया। थोड़ी देर में हम उसकी मोटर-साइकिल पर निकल पड़े। अपने इस नए जीवन के पहले आश्रय दाताओं से मिलने। वही मंडीदीप, ओबेदुल्लागंज, बिनेका, बरखेड़ा, खटपुरा और फिर शाहगंज। 11 बजे के करीब शाहगंज पहुँच गए, सियाचरण बाबा के यहाँ — मेरी पहली आश्रयस्थली ! आज मकर संक्रांति भी है, इसलिए सब मिल गए। बहुत खुश हो गए देखकर। उन्हे लगा कि जैसे मैं वापस आ गया हूँ और अब नहीं जाऊंगा। छोटू शंभूदास तो बहुत ही गद्गद् हो गया। अब और बड़ा और समझदार लगने लगा है। मुझे भी लगा जैसे अपने ही घर वापस आया हूँ। जल्दी-जल्दी उत्साहपूर्वक खाना बना। मैं नर्मदाजी में बेहद ठंडे पानी में डुबकी लगाकर आया। नर्मदा तट पर बैठकर ही बड़ा सुख और आनंद मिलता है। आज तो यहाँ रेस्ट हाउस वाले घाट पर मकर संक्रांति का मेला लगा हुआ है और खूब भीड़भाड़ है। मुकेश को भी बहुत अच्छा लग रहा है। उसकी भी बड़ी इच्छा थी कि मैं एक बार यहाँ आऊँ। उसे भी बाबा से बड़ा लगाव हो गया है। खूब सारा खाना खाया- जबरदस्ती कर करके खिलाया। थोड़ी देर आराम किया। फिर धीरे से हिचकिचाते हुए घोषणा करनी पड़ी कि अब निकलना है। छोटू को बहुत खराब लगा। कहने लगा इसका क्या मतलब, अब क्यूँ जा रहे हो? बाबा और माताजी के चेहरे पर भी विषाद दिखा – किसी अपने को अनचाहे विदा करते हुए जिस तरह से होता है! बस हम निकल ही पड़े चाय पीकर। संयोग से गौर मास्टर भी आ गए और उनसे भेंट हो गई। अडडू से भेंट नहीं हो पाई।
शाहगंज से करीब 4 बजे निकलकर अगले पड़ाव खटपुरा आ गए, उसी बूढ़े पालीवाल बाबा की कुटिया मे जहां एक रात बिताई थी और जूते उतार कर छोड़ आया था। बाबा मिल गया। एकदम खुश हो गया। बाबा और उसकी कुटिया की हालत में काफी सुधार दिखाई दिया। थोड़ी देर बाबा के पास बैठे। बाबा ने धूनी पर चाय बनाकर पिलाई और खाने के लिए रोकने लगा। कहने लगा कुछ महीने बाद भागवत करेंगे, जरूर आना होगा। मुकेश का नंबर दे दिया। विदा लेकर आगे बढ़ गए। कितना सुंदर है यह रास्ता! इस बार ही मोटर-साइकिल के पीछे बैठकर शांतचित्त से इसकी भव्यता पूरी तरह से आत्मसात कर पाया। बिनेकागढी के हनुमानजी की कुटिया में दिन ढलते-ढ्लते पहुँच गए। वह आदिवासी बाबा नहीं मिला जिसने पहली रोटी खिलाई थी। कहीं गया हुआ है। अंधेरा होने लगा तो निकल चले। काफी सर्दी लगने लगी मोटर-साइकिल पर। मुकेश मुझे पहुंचाकर अपने घर चला गया।
19 जनवरी 2008
अलंकार काम निपटाकर जल्दी आ गया और फिर वन्या, अलंकार और मैं फार्म हाउस चले गए। सबने खाना वहीं खाया। चाय पर बैठकर बातचीत होती रही। मैंने अपनी तैयारी कर ली। जाने का समय आ गया। स्वप्न की तरह इस यात्रा के दृश्य चलते रहे। करीब एक हफ्ता ऐसे बीत गया कि पता ही नहीं लगा कि कब शुरू हुआ और कब खत्म हो गया। जो सब टूट चुका था वह फिर से जुड़ना शुरू हुआ। खट्टे और कड़वे अनुभवों में मिठास का पुट पड़ा। ऐसा लगा कि जैसे बिखरे हुए पत्थरों को जोड़कर, सँजोकर फिर एक इमारत तामीर की जा सकती है। अपना सामान बटोरा। नंदिनी ने रास्ते मे खाने के लिए कुछ रख दिया। वन्या-अलंकार के साथ उनकी गाड़ी में स्टेशन के लिए रवाना हो गए। फिर वही राजकोट एक्सप्रेस- भोपाल से मेघनगर (झाबुआ)। एक सुखद और यादगार यात्रा के बाद सैलानी वापस जा रहा है! वन्या-अलंकार इस यात्रा से बड़े खुश और संतुष्ट लग रहे हैं। इसी आशा के साथ जा रहा हूँ कि इसी तरह साथ-साथ दोनों आगे बढ़ते रहें।
लगभग 20 दिन भोपाल और भंवरताल में बिताकर वापस झाबुआ जा रहा हूँ। बड़े मीठे बीस दिन। जल्दी खाना खा लिया और सोचते -सोचते झपकी लग गई। मेघनगर रात डेढ़ बजे के करीब पहुँचती है। ठंड बिल्कुल भी नहीं है। रतलाम के बाद नहीं सोया। डर था कि कहीं नींद ना खुले। आखिर तीन बजे के करीब मेघनगर आ गया। अब सुबह का कुछ उजाला होने तक यहीं प्लेटफ़ार्म पर बैठना है। बैठे-बैठे चार बजे के करीब अचानक बहुत सर्द हवा चली, एकदम सिहरन होने लगी। शाल निकालकर ओढ़ लिया……।
इस नई शुरुआत पर एक भीली गीत का उल्लेख करना अच्छा लग रहा है !
मादलिया मादल बजाहूँ धड़ीक बाजु भातु रे,
तात्या थारा हाथ ना चाले रे महरा पाँव ना चाले रे,
मादलिया मादल बजाहूँ धड़ीक बाजु भातु रे,
थालीया थाली बजाहूँ धड़ीक बाजु भातु रे,
थारा हाथ ना चाले महरा पाँव ना चाले रे,
फेपड़ी या फेपड़ बजा थारो मुंडों ना चाले रे,
महरा पाँव ना चाले रे।
भील युवतियां मांदल, थाली और फेपरियां बजाने वाले से कहती हैं-हे मांदल बजाने वाले भाई, जरा जोर से मांदल बजा। हे थाली बजाने वाले भाई, ताल से थाली बजा। हे फेपरिया बजाने वाले भाई, मधुर सुर से बजा। आज ख़ुशी के अवसर पर थोड़ी देर के लिए नांच ले।
नए साल पर बाहर भले ही मांदल, थाली या फेपरिया नहीं बज रहे हों। पर मेरे भीतर संगीत बज रहा था और मन थिरक भी रहा था। ऐसा मौका, जीवन में शायद एक बार ही आता है !
क्रमशः…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा की सभी कड़ियां यहाँ देखेंः
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-1: अनजान द्वारा खुद को समझे जाने से जीवन मनोहारी हो गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-2: भोजन करने और भोजन पाने के बीच का अंतर भी समझ आने लगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-3: उसने मेरे पैर छू कर कहा, बाबा, कहीं मत जाओ…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-4: मैंने सोचा, खतरनाक होने के लिए खतरनाक होना जरूरी नहीं होता
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-5: वाह, पचास रुपए? बड़े दिनों बाद इतने रुपए एक साथ देखे थे…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-6: जीवन में पहली बार रोजदारी की थी, वह भी भक्ति की!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-7: भोपाल करीब आने लगा तो मैं ट्रेन में ऊपर चढ़कर बैठ गया…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-8: दोनों घूम-घूम कर पार्टी का प्रचार कर रहे हैं, सावधान रहना
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-9: नक्सलवाद के एक काल्पनिक बिजूके को प्रतीक बनाया गया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-10: मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वे एकदम उछल पड़े…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-11: कथा वाचक की नई भूमिका, मुझे अंदर से हँसी आ रही थी…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-12: वृंदावन की कुंज गली में बदल गया मेरा नजरिया
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-13: ब्रज जा कर जाना, श्रद्धा से किस तरह आनंदित रहा जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-14: मैं बाबा नहीं बन पाया…मैं हार गया!
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-15: अहसास हुआ कि लोग सफर को मंजिल से बेहतर क्यों बताते हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-16: मैं संघ का भेदिया हूं, वकील तो ऐसे होते नहीं हैं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-17: घर बनते जाते हैं, जमीन बंटती चली जाती है लेकिन रहते सब साथ-साथ हैं
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-18: सौ दिन पूरे… लगता है घर से बहुत दूर न जाकर गलती कर दी
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-19: मैं सन् उन्नीस सौ बावन में सातवीं फेल हुआ हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-20: संभवतः किसी को उम्मीद नहीं होगी कि मैं इस तरह फट पडूंगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-21: दहेज का दबाव न हो तो हर मर्द चार-पांच ब्याह कर लेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-22: पूरे पच्चीस साल बाद पैदल अपने गांव भंवरताल जा रहा हूं…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-23: अपने गांव भंवरताल में हूं; एक वो दिवाली थी, एक ये दिवाली है, एकदम अलग
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा-24: खबर फैल गई कि मैं ‘बैरागी’ हूं, इनाम नहीं मिलेगा
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 25ः भंवरताल में आखिरी रात है, पता नहीं कब आना होगा…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 26ः वकालत छोड़ी, फिर अपनाई, मैं उलझता चला जा रहा था…
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 27: उस दिन मैं अचानक छोटा-मोटा ‘महामानव’ बन गया… मगर
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 28ः चोम सिंह ने समझा दिया, 21 वीं सदी में अपनी शर्तों पर जिया जा सकता है
एक लक्ष्यहीन यात्रा की गाथा− 29ः आज ऑफिस में लगेगा ताला, नाम पट्टिका हट जाएगी

